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Thursday 23 Nov 2017

सैमुअल की डायरी


  डा. बी. एस. त्यागी
140, अंकित विहार, पचैंण्डा रोड़
मुजफ्फरनगर- 251001 मो 9456669403
'सैमुअल की डायरीÓ के लेखक बलदेव कृष्ण कपूर हिन्दी साहित्य के कथा जगत में किसी परिचय के मोहताज नही हैं। अपने चारों ओर समाज में चल रही उथल-पुथल पर कपूर साहब की अच्छी पकड़ है। वे घटनाओं को तसल्ली से देखते और परखते हैं फिर कहानी के ढाँचे में ढालते हैं। घटना को किसी ढाँचे में ढालना एक कला है और इस कला में कपूर साहब निपुण हंै। इस कहानी संग्रह की पहली कहानी  बिस्तर सुखबीर सिंह और वैद्य जी नामक पात्रों के माध्यम से मनुष्य के मन के लालच को बड़ी ही खूबी से बाहर निकाती हैं जिसकी वजह से वह मुसीबत में भी फंस जाता है। दूसरी कहानी शिकारी अत्यन्त मार्मिक कहानी है जिसमें एक मां व शेरनी के मनोभावों का बड़ा ही मनोवैज्ञनिक चित्रण है। पाठक के लिए अनुमान लगाना कठिन है कि शेरनी मां-बेटे को नहीं खायेगी जब उनके बीच का फासला कुछ भी नहीं था। कौशल्या जब यह घटना अपने पति डा शर्मा को बताती है तो वह शिकार करना छोड़ देता है। यह सब इतना सहज रूप में उभर कर आया है कि पाठक पात्रों के साथ स्वत: ही जुड़ जाता है। वह अन्त तक सांस थामे पढ़ता जाता है और कौशल्या के साथ ही गहरी सांस छोड़ता है- कौशलया को लगा, अहिल्या हो गयी उसकी देह में प्राण लौट आये हैं। उसने वासु के बालों को सहलाया। वासु ने माँ को देखा और उंगली उठाकर इशारा किया शेरनी के कभी पीछे, कभी आगे फुदक-फुदक कर चलते शेरनी के चंचल बच्चे की ओर।Ó (पृ.21)। मुल्जिम नाम की कहानी पुलिस की कार्य शैली एवं अपराधी के प्रति उसका रवैया दिखाती है, लेकिन अपराधी के मनोभावों को समझने में हम सभी असफल हो जाते हैं, यही इस कहानी की विशेषता है। अपराधी बलवंतसिंह का चरित्र देखिए जब वह अस्पताल से पुलिस अधीक्षक को फोन करता है- आज एडीजे की अदालत में मेरी पेशी है। कोई और सिपाही भेज दीजिए, जो मुझे अदालत ले जाएगा।Ó(पृ. 28) पूरी कहानी बड़ी ही मार्मिकता के साथ समाप्त होती है और पाठक के मन में अपराधी का चरित्र धीरे-धीरे उभरने लगता है जैसे धुंध में से कोई व्यक्ति निकल कर आ रहा हो। एक अन्य कहानी प्रतिकार बहुत बड़ा सच हमारे सामने प्रगट करती है। जब दबंगइयों के सामने सभी बड़े आदमी बौने हो जाते हैं तब मरता क्या नहीं करता वाली कहावत सच साबित होती है। कंछी अपने घर की इज्जत बचाने के लिए अपनी जान पर खेल जाता है इस तरह से कि रामधारी को यकीन ही नहीं होता- इस साले मरियल कंछी में इतना दम कहाँ से आ गया? साले के खुट्टल दाँत अब भी इतने पैने हैं? (पृ.42) उधर शीला जो रामधारी से अपनी इज्जत हर कीमत पर बचाना चाहती थी, फंूकनी उठाई और उसके सिर पर दे मारी। पिस्तौल का ट्रिगर दब गया और गोली उसकी जांघ में जा लगी और खून का फव्वारा छूट पड़ा। प्रस्तुति बड़ी ही प्रभावशली बन पड़ी है। यह कहानी कई स्तरों पर काम करती है। इसे कपूर साहब की अनेक सफल कहानियों में से एक कहा जा सकता है। एक इमारत कहानी उस वक्त की याद दिलाती है जब लोग आत्मा की आवाज पर सही गलत का फैसला करते थे। किये का फल तो भोगना पड़ता है, ऐसी मान्यता लोगों के जीवन में मार्ग प्रशस्त किया करती थी। कहानी का अन्त पाठक के जहन में बार-बार उभरता है- नन्दू सिंह खामोश हो गया। चुपचाप कुर्सी से उठकर उसने बहुत पहले धूप के कारण बंद खिड़की को खोल दिया। रामलाल कभी मुन्नवर अली को अपने मन की आँखों से देखता और कभी उस शानदार इमारत को। (पृ. 50)
तैंतीस दिन अत्यन्त रोचक व मार्मिक कहानी है। किस तरह एक नव-नियुक्त अध्यापक पूरे महीने तनख्वाह का इंतजार करता है और जब उसे नहीं मिलती तो उसकी मनोदशा क्या हो जाती है? एक था शेक्सपियर कहानी को ऐतिहासिक कहानी कहा जा सकता है, जिन लोगों को इस महान नाटककार के विषय में थोड़ी अथवा बिल्कुल जानकारी नहीं है, उनके लिए बहुत ही उपयोगी है। शेक्सपियर के जीवन को बड़े ही रोचक ढंग से प्रस्तुत किया गया है। कूड़ा कहानी में आजकल की पीढ़ी व माता-पिता के बीच बढ़ती उदासीनता को उठाया गया है। एक पुत्र अपनी मां को सड़क पर यह कहकर छोड़ जाता है कि वह गाड़ी में पैट्रोल लेने जा रहा है। मां उस पर यकीन कर लेती है और पूरे दिन तपती दुपहरी में शाम तक उसका इंतजार करती रहती है। एक व्यक्ति जो उसे प्रतीक्षा करती देख रहा था, वह उस पर दया कर अपने घर लाता है। किसी तरह वह उसके बेटे का फोन नम्बर का पता करता है लेकिन बेटा साफ  मना कर देता है लाने के लिए। अन्त में उसे वृद्धाश्रम मे जगह मिलती है। सुनन्दनी ने मछली के बचे हुए कांटे को कूड़ादान में फेंकते हुए कार्तिक को सिर से पाँव तक देखा और वह सिहर उठी इस वाक्य पर कहानी समाप्त होती है जो कई स्तर पर चोट करता है।
इस संकलन की अंतिम कहानी है सैमुअल की डायरी जिसके ऊपर कथा-संग्रह का नाम रखा गया है। निश्चित रूप से ही यह कहानी इस संग्रह की सर्वश्रेष्ठ कहानी है। अफ्रीकी परिवेश में लिखी गई यह कहानी एक पत्रकार के जीवन से जुड़ी है। उसके अन्दर का झांकता इंसान व अफ्रीकी बच्चों की दुर्दशा व दीनहीनता की रोंगटे खड़े कर देने वाली कहानी है। एक झलक देखिए-Óसैमुअल! धिक्कार है तुम्हें! त्ुाम भी उन्हीं जैसे हो जिन्होंने ईसा मसीह को सलीब पर लटका दिया था। तुम्हारा अपराध क्षमा किये जाने योग्य नहीं है। पलंग के किनारे रखे तकिये पर लेटा हुआ मुझे वही भूख से मरता हुआ बच्चा दिखाई दे रहा है। वह अब भी कह रहा है...रोटी दो! रोटी दो!!Ó (पृ.125) पाठक इस बात का अन्दाजा करने में असफल रहता है कि सैमुअल के अन्दर इतना बड़ा परिवर्तन आ सकता है, उस पर मानवीयता इस सीमा तक हावी हो सकती है।   
 कपूर साहब की भाषा सहज एवं प्रवाहमयी है। पात्रों एवं लेखक की भाषा में अन्तर साफ नजर आता है। अलग-अलग वातावरण के पात्रों को लेखक ने बखूबी उठाया है जिससें उसकी मजबूत पकड़ साफ दिखाई देती है। लेखक स्थानीय चित्र भी खूब खींचता है। कई एक कहानियों में ये चित्र बड़े ही मन लुभावने बन पड़े हैं। एक चित्र पहाड़ी क्षेत्र का देखिए- अक्तूबर का महीना था, शाम की हवा में हल्की-सी ठंडक आ गई थी। फौजी गाडिय़ाँ चौडी सड़क से नीचे आ रही थीं। सड़क के एक छोर से पगडंडी घूमती हुई नीचे जा रही थी। चीड़ के पेड़ पगडंडी के मुहाने पर दोनों ओर पहरा देते हुए सिपाहियों जैसे लग रहे थे-हरी वर्दी में विशालकाय सिपाही जैसे। पेड़ों से गिरी आकर्षक डिजाइन वाली चीड़ के पेड़ों की पत्तियों ने जैसे वासु को अपने साथ खेलने के लिए पुकारा हो- वह भागकर पेड़ों के नीचे गिरी हुई चीड़ की पत्तियाँ उठा-उठाकर प्रफुल्लता से कौशल्या को दिखाने लगा। पेड़ों की भीनी-भीनी महक, गालों को सहलाती हुई मीठी-मीठी हवा। (पृ.18-19) पूरे अवतरण में काव्यात्मक प्रवाह है।
ऐसे सुन्दर चित्र लगभग सभी कहानियों बिखरे पड़े हैं। ये अवतरण पाठक को सीधा उस परिवेश से जोड़ देते हैं। प्रस्तुत संकलन अत्यन्त पठनीय है। भाषा-शैली एवं कथ्य की दृष्टि से बड़ा ही सशक्त है। मुझे आशा है कि हिन्दी जगत में इसका भरपूर स्वागत होगा।