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Friday 24 Nov 2017

व्यंग्य-मणकों की माला

श्याम विमल
विमल वाटिका, बी-96, सेक्टर-26
नोएडा-201301
मो. 09871023343
कविता-कहानी-निबंध-अनुवाद-संपादन जैसी विधाओं में पंद्रह पुस्तकों के लेखक पचहत्तर वर्षीय केवल गोस्वामी का पहला व्यंग्य-संग्रह प्रकाश में अब आया है। संग्रह की शीर्षक-माला में किस्सा-कथा-गाथा-पुराण जैसे शाब्दिक मणके पिरोए गए हैं जिनसे जाहिर हो जाता है कि मूलत: कवि केवल गोस्वामी के मनोयोग के ही ये मणके हैं जिन्हें उन्होंने अपनी कर-कलम से लिख-लिख पिरोया है ऐसा कि पाठक भली-भांति समझ जाता है कि यह लेखक सरकारी स्कूल का मास्टर ही हो सकता है।
किताब के पिछवाड़े पर छपे परिचयानुसार 'चालीस वर्षों की अध्यापकीÓ करने वाले स्कूल मास्टर तथा साहित्यिक माहौल के मकडज़ाल से कथा-तंतु व पात्र रूप ले-लेकर शब्दों की कीमियागरी या जादूगरी साफ झलका दी है व्यंग्यकार ने। फिल्मी मुन्नाभाई के जैसा 'कैमिकल लोचाÓ लेखक की रग-रग में रेंगता हुआ व्यंग्य का जूस पाठक के भीतर तक कुशलता से रिसता है।
'किस्सा विचित्र कुमार काÓ नामक संग्रह में कुल 17 व्यंग्य लेख हैं। इनमें पिछली सदी के उत्तरार्ध तथा वर्तमान सदी के पहले दशक के विविध रंगी फूल-कांटे सुगंधित करते हुए व्यंग्य की गझिन व बेदाग चदरिया बुनी है। यदि जरूरी और पठनीयता की दृष्टि से कुछ गिनाऊं तो ये हैं राजनीतिक प्रकरण में- 'अनर्थगाथाÓ, 'मैट्रिक फेल बीए पास करेंÓ, 'प्रजातंत्र के कुत्तेÓ, 'होनहार बिरवान केÓ, साहित्यकार जगत में- 'बरखुर्दारÓ, 'दुखवा मैं का से कहूंÓ, प्रकाशक-बिरादरी में- 'अथ प्रकाशक पुराणÓ, 'शुभकामनाएं देने वालेÓ, वर्तमान समाज के परिप्रेक्ष्य में- 'चमचे मुरादाबादीÓ, 'पंडित जीÓ, 'सियापा डॉटकॉमÓ इत्यादि विनोदोत्पादक व्यंग्य हंै, अपने अनुभव के साक्ष्य में सरकारी स्कूल के मास्टरों की बदनसीबी पर भी तंज कसे गए हैं यहां।
पहले बताया जा चुका है कि संग्रहित व्यंग्य लेखों में किस्सागोई भी है जो अंतर्धारा सी शब्द-दर-शब्द प्रवहमान है। किस्सागोई है तो पात्र भी होंगे, हैं पात्र-कुछ दुर्गुणों के कारण दुत्कारे जाने वाले नाम लगते हैं। अनोखेलाल, विचित्र कुमार, रामभरोसे लाल, भोलीबाई, रामडित्ती, कूड़ेमल। बड़े दयनीय से लगते नामों को भी लेखक ने आदतन मसालेदार बनाने की पूरी कोशिश की है, इसके पीछे व्यंग्यकार की प्रतिकृत प्रतिबद्ध मंशा उजागर होती है।
केवल नामी प्रतीकों में न फंसे रहकर स्पष्टत: नामोल्लेख भी करने का साहस निर्विकार भाव से जुटा लिया गया है। प्रसंगत: अज्ञेय के निधन पर अपना 'दुखवाÓ किस रूप में कवि-प्लस व्यंग्यकार रवीन्द्रनाथ त्यागी को बनाया। 'दुखवा मैं कासे कहूंÓ इस नाते पठनीय है। साहित्यिक पुरस्कारों की भारतीय संस्कृति में अपारदर्शिता नहीं रही, सब कुछ साफ है- गंगा नदी की आधुनिकता दशा जैसा, 'पता नहीं पुरस्कारों के निर्णायकों को हमारे मित्र से किस जन्म का बैर हैÓ... 'इस बार फिर वे एक ऐसे सर्वश्रेष्ठ साहित्यकार को न जाने कहां से धो-पोंछकर ले आए और वर्ष का सर्वश्रेष्ठ पुरस्कार उसके नाम कर दियाÓ 'बरखुर्दारÓ (पृ. 28) पर, नाम न सही पुरस्कारवाला वर्ष भी नहीं बताया गया, क्या हर वर्ष की यही नीयत है? इस विलापी प्रतिक्रिया के पीछे बड़े दयनीय विचित्र नाम छिपे हो सकते हैं जो न केवल मित्र होंगे, सभी अपुरस्कृत वृद्ध लेखक बंधु ही होंगे।
केवल गोस्वामी का अनुभूत निर्णय पूर्वोक्त व्यंग्य लेख में फटे पोस्टर-सा उजागर है- ''कवि-लेखक हो और एकाध स्कैंडल न हो तो न तो रचना में परिपक्वता आती है और न ही लेखक का कोई भविष्य होता है।ÓÓ (पृष्ठ-29)
सो हिन्दी-साहित्यकाश में भविष्यहीन लेखकों के शवों पर युद्धांत वाले कुरुक्षेत्र में मांसाहारी विहंगवृंदों का मंडल मंडरा रहा है।
88 पृष्ठों के इस व्यंग्य संग्रह में कुछ चुटीली-चुटकीली-जायकेदार उक्तियों का आनंद उठाइये और अपना ज्ञान बढ़ाइए।
-ऑपरेशन वा•ा सक्सैसफुल बट दि पेशेंट डाइड, यानी प्राय: विमोचन-समारोह सफल होता है और पुस्तक मर जाती है।
- व्यावसायिक खतरों को ध्यान में रखते हुए अगर प्रकाशक किसी बेचारे लेखक की रचना का शीर्षक बदल देता है तो इसमें कुछ भी अनैतिक नहीं। (पृ. 64)
- कांग्रेसी कुत्ते ने अटल जी को काटने की कोशिश की, पढ़कर पहली बार मेरे ज्ञान में वृद्धि हुई कि आखिरकार कुत्तों का भी राजनीतिकरण हो ही गया। (पृ. 59)
- इलाहाबाद नेताओं की हड्डियां बहाने के लिए जाना जाता है (पृ. 81)
- तोहफा देना भी चमचागिरी का ही बदला हुआ मॉडर्न रूप है साहब की बीवी के जन्मदिन पर... (पृ. 83)
- हमारी हाल की राजनीति में स्विटजरलैंड का विशेष महत्व है, वह हमारा खास राजदार है। (पृ. 86)
-यदि लोकसभा का चुनाव हार गए तो राज्यसभा के रास्ते संसद में आ जाओ और केवल सांसद ही नहीं मंत्री भी बनो।
- परीक्षा उसी ने दी ग्रेजुएट हम हुए।
- 'अफसरों का चाटों और मातहतों को काटोÓ उनके जीवन का सुनहरा सिद्धांत था।
- किताब कहां से छपनी है, किससे विमोाचन करवाना है, किससे समीक्षा लिखवानी है, इस जरूरी तैयारी से वह हमेशा बेगाना ही रहा।
और ज्यादा उद्धरण देकर आपकी पढऩे की भूख को उकसाना चाहता हूं न कि तत्काल तृप्त कर देना, 'पीपुल्स पब्लिशिंग हाउसÓ से प्रकाशित, इसलिए 75 रुपए की यह सस्ती पर कीमती पुस्तक जरूर पढ़ी जानी चाहिए। इसमें आधे से अधिक लेख सर्वगुण-संपन्न है। लेखक केवल गोस्वामी अन्य विधाई मणके छांडि के व्यंग्यविधा की माला पिरोते रहें तो ज्यादा चर्चित होते रहेंगे।