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Monday 20 Nov 2017

जातीय संघर्ष की स्त्री आत्मकथा : शिकंजे का दर्द

भावना मासीवाल
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय
जाति एक ऐसी विभेदीकरण की विचारधारा है जो हमारे समाज के भीतर तक समाई हुई है। भारत में जाति प्रथा का उदय हजारों वर्ष पूर्व हुआ था। यह प्रथा प्राचीन काल में विद्यमान वर्णव्यवस्था की ही उत्तराधिकारिणी है। वर्णव्यवस्था एक ऊपरी किस्म का बँटवारा करती थी, जहाँ एक पेशे या कुल के लोग आ सकते थे वहीं जातिगत विभाजन बहुत ठोस और पक्के थे। हरेक पेशे के लिए जिनमें जातियां थी जो न आसानी से जाति बदल सकती थी न पेशा। वर्णव्यवस्था की उत्पत्ति निजी व समूह के हितों की रक्षा के साथ-साथ श्रम शक्ति के विभाजन के उद्देश्य से हुई थी। परंतु धीरे-धीरे इसकी संरचना में बदलाव आता गया और यह बदलाव ही आज वर्ण-व्यवस्था का विघटित रूप है। पहले व्यक्ति जहां केवल सवर्णों द्वारा ही प्रताडि़त होता था आज वह अपनी स्वयं की जाति में भी निम्न होने की मार को सहता है। नागफनी आत्मकथा में रूपनारायण लिखते हैं कि अमेरिका द्वारा नागासाकी और हिरोशिमा में गिराए गए बमों का दुष्प्रभाव इतना भयंकर नहीं था जितना प्रभाव इन सामाजिक बमों का दलितों पर पड़ा। यदि वह दलित एक स्त्री है तो वहीं उसका शोषण तिगुना हो जाता है।
भारतीय समाज में धर्म से अधिक सख्त शिकंजा जाति का है, जिससे कोई भी व्यक्ति मुक्त नहीं हो सकता है। डॉ अंबेडकर लिखते हैं- जाति की सदस्यता किसी क्लब की सदस्यता के समान नहीं है जो कि हर किसी को मिल सके। जाति की सदस्यता जाति में पैदा हुए लोगों तक ही सीमित होती है। मनुष्य चाहकर भी जिसमें परिवर्तन नहीं ला सकता है और जो मृत्यु पश्चात भी उसका पीछा नहीं छोड़ती है। इस सच को स्वीकारते हुए नारीवादी लेखिका कुमुद पावड़े लिखती हैं- स्थिति यह है कि कोशिश करने पर भी मेरे लिए अपनी जाति भुला पाना संभव नहीं है। और तब मुझे यह बात याद आती है जिसे मैंने कहीं सुना था, जाति वह चीज है जिसके साथ हम जन्म लेते हैं और जिससे मरकर भी छुटकारा नहीं पाया जा सकता। इसी तरह से गेल आम्वेत अपने निबंध कास्ट, क्लास एंड लैंड इन इंडिया: इन इंट्रोडक्टरी ऐसे में लिखते हैं- जाति जमीनी हकीकत है, इसकी बुनियाद जमीनी है । यह केवल एक स्वरूप (फॉर्म) भर नहीं बल्कि ठोस वस्तु (कंटेंट) है । इसने भारतीय समाज को रूप-आकार प्रदान किया है। जाति की यह ठोस आधार भूमि ही आज सामाजिक व्यवस्था की संचालक है ।
जाति व्यवस्था वंशानुगत समूहों का पुंज है जैसा कि अंबेडकर ने लिखा कि हिंदू समाज जातियों का एक समूह है और प्रत्येक जाति एक बंद समूह है। जातियों की स्थिति का निर्धारण जिसमें आनुष्ठानिक रूतबे के तहत किया जाता है। जातियों के बीच की असमानता यानी किस जाति को उच्च माना जाए और किसे निम्न, इसका आधार मूल्य आधारित मापदंड है, जिनकी जड़ें धर्मशास्त्रों में थी। पंडिता रमाबाई अपनी पुस्तक एक हिंदू स्त्री का जीवन में लिखती हैं- आज भी इन पुराने नियमों को नजरंदाज नहीं करते हैं तथा कहते हैं कि निम्न जाति के किसी सदस्य का छुआ पानी तथा भोजन ग्रहण नहीं करना चाहिए। जो हिंदू इस नियम का उल्लंघन करते हैं, वे अपनी जाति से तत्काल च्युत हो जाते हैं तथा जाति को पुन: प्राप्त करने के लिए कठोर प्रायश्चित से गुजरना पड़ता है। 1870 में पंडिता रमाबाई भारतीय समाज में व्याप्त जातीय संरचना का जो यथार्थ हमें बताती हैं, वही यथार्थ सौ वर्षों से अधिक समय उपरांत सुशीला टाकभौरे शिकंजे का दर्द आत्मकथा में उद्घाटित करती है। वह अपनी संपूर्ण आत्मकथा में शिकंजे की जकडऩ की बात करती है और वह शिकंजा कोई और न हो कर जाति का शिकंजा है। जिसकी जकडऩ में कैद जिंदगी व उससे बाहर आने की छटपटाहट आत्मकथा में देखी जाती है। बचपन से युवावस्था तक मेरे जीवन के दिन अनेक प्रकार के शिकंजों में जकड़े हुए थे। इस जकडऩ के कारण मेरे जीवन और व्यक्तित्व का विकास अवरुद्ध होता रहा। मेरी आत्मकथा में दलित, अछूत जीवन की घनीभूत पीड़ा के अनेक चित्र हैं, अनेक प्रसंग हैं जो समाज की मानसिकता का साक्षात्कार कराते हैं। वह प्रसंग फिर विद्यालय का ही क्यों न रहा हो जहां वह लिखती हैं कक्षा में ब्राह्मण, बनियों के बच्चों सबके आगे बैठाया जाता था। पिछड़ी जाति के बच्चों को पीछे बैठाया जाता। अछूत बच्चे सबसे पीछे अलग बैठते थे। कक्षा में यह श्रेणी वर्गीकरण जैसा था। कमोबेश स्कूल का ऐसा ही चित्र जूठन में ओमप्रकाश बाल्मीकि भी खींचते है और तुलसीराम भी। तुलसीराम मुर्दहिया आत्मकथा में लिखते हैं कि पहली पंक्ति रोल नंबर एक से शुरू होकर तेरह पर समाप्त हो गई,  शेष दो पंक्तियों में इसी क्रम में पंद्रह-पंद्रह बच्चे बैठते थे। मेरा नाम और स्थान पहली कतार में रोल नंबर पाँच के साथ होता था। शीघ्र ही इस तेरह का रहस्य उजागर हो गया। हम सभी दलित थे। मुंशीजी की उपस्थिति में हमें कोई अन्य बच्चा नहीं छूता था। समाज का जाति आधारित पदानुक्रम विभाजन लेखिका को अपनी कक्षा में भी उनकी यथास्थिति का बोध कराने से नहीं चूकता है। जाति आधारित शोषण की इस राजनीति को आज भी देखा जा सकता है।
शोषित उस समय भी पीडि़त थे और आज भी पीडि़त हो रहे हैं। उनकी पीड़ा कम तो नहीं मगर बढ़ अवश्य गई है। पहले वह केवल सवर्णों द्वारा प्रताडि़त होते थे परंतु जाति के बदलते स्वरूप ने इस मोड़ पर लाकर खड़ा किया जहां पर वह अपनी जाति के भीतर भी शोषित होने को मजबूर है क्योंकि जाति के भीतर भी विद्यमान उपजातियों में भेदभाव बहुत गहरा है। जिसमें सर्वाधिक प्रभावित हाशिए पर खड़ा व्यक्ति है। तिरस्कृत आत्मकथा में सूरजपाल चौहान लिखते हैं अरे आप भी अजीब बात करते हैं। सोनकर और हमारी जाति में जमीन आसमान का अंतर है। वह सूअर खटिक हैं और हम बकर खटिक। ऐसे में हजारीप्रसाद द्विवेदी का कथन सत्य प्रतीत होता हैं कि हर छोटी से छोटी जाति अपने से छोटी एक जाति ढूंढ ही लेती है। शिकंजे का दर्द आत्मकथा में भी सुशीला टाकभौरे जाति के भीतर जाति के बढ़ते क्रम पर लिखती हैं-स्कूल में ढीमर, पासी, खटिक, कंजर, चमार, बसोर, बलाई आदि अनुसूचित जाति के बच्चे पढ़ते थे। मगर मुझे उन सबसे निम्न अछूत माना जाता था। ये एसीसी बच्चे भी मुझे अपने से निम्न मानते थे। मैं सबसे नीचे के पायदान पर थी। जाति के भीतर भी जाति का यह विभाजित पदानुक्रम भारतीय समाज व्यवस्था के लिए घातक है ।
अंबेडकर के शब्दों में कहें तो जाति प्रथा के चारों तरफ  बनी दीवार अभेद्य है और वह जिन पदार्थों से बनी है, उनमें तर्क और नैतिकता जैसे ज्वलनशील तत्वों का समावेश नहीं है। तुलसीराम स्वयं महसूस करते हंै कि कम्युनिज्म ने केवल वर्ग को समानता का मुख्य आधार माना और जाति को अनदेखा कर दिया। कम्युनिस्ट होने के कारण तुलसीराम अधिक गहराई से इसे जान पाते हैं जब उनके ही कम्युनिस्ट कार्यकत्र्ता किसी जातीय भेदभाव व असहमति के चलते उन्हें कम्युनिस्ट पार्टी के पद से निकाल बाहर कर देते हैं और उनकी जगह एक अन्य दलित वर्ग के व्यक्ति को बिना उस पद की योग्यता के कार्यभार सौंप देते हैं। यह एक तरह की उभरती दलित राजनीति है जो तथाकथित दलित समाज के साथ खेली जा रही है। तुलसीराम लिखते हैं: यह पुरानी रणनीति रही है कि किसी दलित को कुचलना हो, तो उसके समक्ष दूसरे दलित को खड़ा कर दिया जाए। ताकि लोगों को पार्टी या समाज का निर्णय सामाजिक भेदभाव का प्रतीत न हो। समाज में सवर्णों का वर्चस्व है। जिन्होंने हाशिए के लोगों की मानसिकता को इस तरह पोषित किया कि उन्होंने अपनी स्वयं की दृष्टि को ही संकुचित कर लिया तथा इस सत्य को स्वीकारा कि, बच्चों को पढ़ाकर क्या होयगो, अपनी जाति तो वही रहेगी। काम रोजगार तो अपनी जात के ही करनो पड़ेगो, फिर क्यों बच्चों को परेशान करें। यह धारणा दलित समाज में बहुत गहरे से समा चुकी थी। यही स्थिति तुलसीराम के साथ रही। तुलसीराम जब पैदा होते हैं तो उनके माता-पिता उनको एक सिद्धहस्त मछरमरवा (मछली पकडऩे में माहिर व्यक्ति) के रूप में देखना चाहते हैं । एक तरफ पुत्र का भविष्य इंजीनियर और डॉक्टर के रूप देखा जा रहा है तो दूसरी तरफ मछरमरवा के रूप में। इस पर लेखक स्वयं आत्मकथा में ही टीप करता है कि मेरे माँ-बाप की सर्वोच्च आकांक्षाओं की पहुंच मुझे एक सिद्धहस्त मछरमरवा के रूप में देखने तक ही सिमटकर रह गई थी। जाहिर है, एक दलित खेत मजदूर और मजदूरनी की आकांक्षा इससे ज्यादा और क्या हो सकती थी?  यह सामाजिक गठन की मानसिकता थी। सुशीला टाकभौरे जिसे महसूस करती हैं और उससे बाहर आने का प्रयास करती है। वह शिक्षा को अपनी जातीय पीड़ा की समाप्ति का हथियार बनाती हैं। इसके लिए पूर्ण मनोयोग से अध्ययन करती हैं। तमाम असुविधाओं शोषण और जातीय भेदभाव के दंश को सहते हुए वह अध्यापिका के पद पर मनोनीत होती हैं। परंतु रुतबा उनकी जाति को छुपा नहीं पाता । बल्कि वह उन्हें समाज का वास्तविक आईना दिखा जाता है जिसमें भले ही वह प्राध्यापिका हो परंतु उनकी पहचान झाड़ू वाली, जमादारन और भंगी  के रूप में होती है। जिसका प्रयोग एक जाति विशेष के लोगों को संबोधित करने के लिए किया जाता है। स्वयं सुशीला टाकभौरे लिखती हैं- मेरा दर्द उस शिक्षित, सम्मानित दलित महिला का दर्द है, जो पीएचडी प्राप्त कॉलेज की प्राध्यापिका होने के बाद भी जाति के रोजगार के नाम से जानी जाती है। मेरी आत्मकथा मेरी वेदना का दस्तावेज है। इसी अपमान से पीडि़त होकर लिखती हैं- पीएचडी प्राप्त,  कालेज की प्राध्यपिका, जाति के नाम पर कहलाती है, सिर्फ झाडूवाली  ।
हमारे समाज में श्रम का विभाजन कर्म नहीं बल्कि जन्म है। मोहनदास नैमिशराय अपनी कहानी हारे हुए लोग में लिखते हैं, अजी हमें क्या मतलब आप कलक्टर भी हैं। नौकरी करने से आदमी की जात तो नहीं बदल जाती, रहता तो वही है। यही स्थिति सुशीला टाकभौरे की रही, जहां शिक्षिका जैसे सम्मानित पद पर आसीन होने के बाद भी उनका रूतबा एक भिखारी के समक्ष नगण्य बन जाता है। भिखारी जब उनकी जाति से परिचित होने पर, उनसे भीख लेना भी अपनी जाति का अपमान समझता है। महाराज जी, इस घर की भिक्षा नहीं लेना । यहां जमादारन रहती है। अच्छा हुआ माता जी, आपने बता दिया। मैं भला उनके घर का आटा कैसे ले सकता हूं। स्वयं भीमराव अंबेडकर भी जाति प्रथा का विनाश अपने लेख में जाति के यथार्थ को बताते हुए कहते हैं कि वर्ण व्यवस्था और जातिभेद वस्तुत: श्रम का नहीं, श्रमिकों का विभाजन है। यही कारण है कि यहाँ नीचे गिराई गई जाति का मुख्य मनुष्य ऊपर वाली जाति का पेशा नहीं कर सकता। सुशीला टाकभौरे भी सत्यापित करते हुए अपनी आत्मकथा में जाति व्यवस्था के विभेदीकृत रुप को बताती हैं। जहाँ जन्म से पूर्व ही व्यक्ति के व्यवसाय का निर्धारण जाति आधार पर कर दिया जाता था। गाँव में काम बंटे हुए थे। पिताजी मरे कुत्ता, बिल्ली उठाकर फेंकते थे मगर मरे ढोर (गाय, भैंस, बैल) को हाथ नहीं लगा सकते थे। यह काम चमार जाति का था। सबके काम बंटे थे। अपनी जाति का काम अलग हटकर करने पर जाति से बाहर कर दिया जाता था।
हमारे समाज का मूल्यांकन जाति के आधार पर होता है। जाति ही व्यक्ति की पहचान बताती है। यदि सवर्ण समाज में आप जन्मे हैं तो सम्माननीय व्यक्ति कहलाएंगे। सभी सुख सुविधाओं व साधनों के उपभोग के अधिकारी होंगे। वहीं यदि आप निम्न जाति में पैदा होते हैं, तो हर पल अपमान व पीड़ा का सामना करना पड़ेगा। सुशीला टाकभौरे की सास की अकस्मात मृत्यु हो जाने पर पड़ोसियों द्वारा हिकारत की नजर से देखना, जरूरत के समय में भी जाति के मोह में अंधे रहकर इंसानियत को भूल जाना। यह सब तो ठीक है मगर आप इन्हें रिश्तेदार के घर ले जाओ। वहाँ ले जाकर वह सब क्रियाकर्म करो। हमारे घर में यह सब नहीं होना चाहिए। आप लाश यहाँ से ले जाओ।
भारतीय समाज में व्याप्त जाति व्यवस्था एक जटिल संरचना है । समय-समय पर पश्चिम और भारत के विद्वानों ने जिसे समझने का प्रयास किया और पाया कि जाति व्यवस्था उच्च व निम्न की विभाजित रेखा है। सभी प्रकार की सुविधाओं को जिसमें कुछ सवर्ण या उच्च जातियों के लोगों तक सीमित रखा गया है। जिसके कारण पिछड़ी और दलित जातियां युगों तक इस व्यवस्था में शोषण और दमन का शिकार होती रहीं। सभी प्रकार की सामाजिक गतिविधियों से जिसमें निम्न वर्ग को दूर रखा जाता है। समाज का वर्गीय चरित्र भी यहाँ जाति से निर्धारित होता है। दलित समाज का शोषण ऐसे में दोहरा हो जाता है और महिला होने पर तिहरा । सुशीला टाकभौरे की नानी, माँ व स्वयं उनका व्यक्तित्व इस तिहरे शोषण से शोषित रहा। नानी जहां बिना मेहनताने के श्रम से शोषित होती है तो परिवार के अन्य स्त्री पात्र श्रम का आधा मेहनताना दिए जाने के शोषण से। दिन भर धूप में पसीना बहाने के बाद हमारी मेहनत की कमाई बहुत कम दी जाती। माँ कभी ज्यादा देने के लिए कहती है तब मालिक कहते- जो हिसाब है उसी हिसाब से देंगे। आना है तो आओ, नहीं तो मत आओ। समाज का एकतरफा जातीय विभाजन केवल समाज में नैतिक मानदंडों का निर्धारण नहीं करता बल्कि श्रम के भीतर भी जाति आधारित विभाजन को रेखांकित करता है जिसे माक्र्स ने श्रम का विभाजन कहा और अंबेडकर ने श्रमिकों का।
समाज में विद्यमान उच्च व निम्न की यह विभाजनरेखा आज व्यक्ति के भीतर संस्कार रूप में समा चुकी है। भले ही आज समाज में कहा जाता है कि हम जात-पात नहीं मानते। परंतु उसके भीतर समाए संस्कार उसे उसकी जाति से समय-समय पर परिचित करवाते रहते हैं, जो उन्हें जातीय भेदभाव को स्वीकारने के लिए मजबूर करती है। मिसेज सोलंकी का व्यक्तित्व इसी को रेखंकित करता है। जहाँ प्रारंभ में वह अपने विद्यालय की सहअध्यापिका सुशीला टाकभौरे के साथ उनके घर आती है, चाय नाश्ता करती है। वहीं पड़ोसन जब मिसेज सोलंकी और सुशीला टाकभौरे की जाति के बीच के अंतर को बताती हैं साथ ही न आने की सलाह देती हैं, तब समाज व जाति का डर उनमें पैदा होता है और न चाहकर भी मिसेज सोलंकी को कहना पड़ता है- देखो, आप बुरा मत मानना। मैं छुआछूत नहीं मानती, मगर आप अपनी पड़ोसनों को यह मत बताना कि मैं आपके घर खाती पीती हूँ। ये लोग हमारी जाति के लोगों को यह बतायेंगे तो अच्छा नहीं लगेगा। समाज का डर, जाति से बाहर कर देने का डर व्यक्ति के भीतर इतना गहरा समाया है कि वह चाह कर भी इस अंतर को समाप्त करने में खुद को अक्षम पाता है।
कहने को तो भारत 21वीं सदी में कदम रख चुका है। सन 2020 तक भारत को विकसित देशों की कतार में खड़ा कर देने की बात कही जा रही है। मगर वास्तविकता यह है भारत बाहर से भले ही खुद को आधुनिक माने, उसका सामाजिक समीकरण आज भी मध्ययुगीन ही है। इस सत्य से व्यापक दलित समाज परिचित है। वही इस सामाजिक मूल्य पद्धति का शिकार है। जिन हालातों में दलित व्यक्ति जन्म लेते हैं, समाज में पलते बढ़ते हैं, जिन तकलीफों को झेलते हैं उनका दर्द भी वे जानते हैं। विडंबना तो यह है कि जिस समाज ने यह दर्द दिया है वह अपने इस अपराध को स्वीकारने के लिए तैयार नहीं है। गांव में सवर्ण सफाई कर्मचारियों पर अत्याचार करते हुए भय दिखाकर गंदगी समेटने का गंदा घिनौना काम जबरन करवाते थे। यदि कोई यह काम न करे, उन्हें  डराया-धमकाया जाता। जातीय समाज ने कर्म को जन्म आधारित बना दिया है। उसके पालन के लिए बहुत सारे नियम, कायदे, कानून, धर्म ग्रंथों में पहले ही लिख दिए, ताकि सत्य की प्रामाणिकता का सही-सही आकलन किया जा सके। सुशीला जी लिखती हैं सारे नियम, कायदे कानून धर्मग्रंथों में लिखे थे, हमें कुत्ते, सुअर जैसे जानवर पालने के निर्देश थे। डॉ भीमराव अंबेडकर भी इसी यथार्थ से हमारा परिचय करा चुके थे कि वर्ण व्यवस्था और जाति भेद वस्तुत: श्रम का नहीं श्रमिकों का विभाजन है । यहाँ भंगी हलवाई का काम नहीं कर सकता। पुरोहित नहीं बन सकता। ऐसा कोई सार्वजनिक काम नहीं, जिसमें भंगी से ब्राह्मण तक समान भाव से लग सकें। आजीवन अपनी ही जाति के पेशे को अपनाने के लिए बाध्य है। यदि वह इससे बाहर आने का प्रयास भी करता है तो दण्ड का भागीदार बनता है। व्यक्ति जाति समाज की एक इकाई है। वह चाहे शिक्षित होकर उच्च पद पर क्यों न पहुंच जाए? चाहे कितने ही बड़े शहर में रहने चला जाए, फिर भी जाति उसके साये के समान साथ रहती है जो जाति में पैदा होने की टीस बढ़ाता है क्योंकि हम कुछ भी बन जाएं, कुछ भी पा लें, फिर भी जाति व्यवस्था का संरक्षक हिंदू धर्म हमारे साथ हमेशा भेदभाव करेगा।
जाति व्यवस्था का यह स्वरूप केवल हिंदू समाज तक ही सीमित नहीं है बल्कि गैर हिंदू समाज में भी देखा जा सकता है। सुशीला टाकभौरे अंबेडकरवादी विचारधारा की होने के कारण स्वयं को हिंदू समाज का नहीं मानती हैं। परंतु हिंदू समाज का पूरा प्रभाव धार्मिक कर्मकांडों से लेकर दैनिक जीवन की गतिविधियों में उन पर रहा। अछूत होने का जो अहसास बचपन में विद्यालय की सहपाठियों द्वारा उनके टिफिन का खाना न खाने से शुरु होता है, वही विद्यालय की अध्यापिका बन जाने के उपरांत भी जारी रहता है, जहाँ सह अध्यापिकाओं द्वारा उनके घर खानपान से परहेज किया जाता है। व्यक्ति चाहे कितना ही पढ़ लिख क्यों न जाए। मगर जातीय अभिमान उससे छूटते नहीं बनता।
 जाति भारतीय सामाजिक संरचना का वह ढांचा है जिसमें बदलाव तो अपेक्षित है परंतु उसका खात्मा आज भी प्रश्न चिन्ह के रूप में सामने है। जाति क्या है? उसका मूल स्वरूप क्या है? भारतीय समाज व उसकी अर्थव्यवस्था किस तरह इससे प्रभावित है। यह प्रश्न यथावत हमारे समक्ष बने हुए हैं। शिकंजे का दर्द आत्मकथा इसी जातीय अभिशाप का जीवंत दस्तावेज है, जो दलित जीवन की मूक पीड़ा को वाणी देती है और कहती है - गरीब होने की अपेक्षा गरीबी का अपमान सहना ज्यादा बुरा होता है अपमान तब ज्यादा महसूस होता है, जब लोग हमें शुरु से अपमान के लायक मान कर ही चलें। ऐसी सामाजिक मानसिकता से मिला अपमान मेरे जीवन में ज्यादा पीड़ादायक रहा है। दलित बचपन एक अलहदा बचपन है। यह भारतीय बचपन की गौरवशाली इमारत को ध्वस्त कर देता है। दलित बचपन भारत के बचपन का जो नया दृश्य प्रस्तुत करता है उससे बचपन के प्रति घृणा पैदा होती है। यह घृणा असल में भारतीय समाज की अमानवीय और विषमतापूर्ण सभ्यता और संस्कृति के प्रति है। जो बचपन का गुणगान करने के आदी हैं। दलित बचपन में प्रवेश के लिए बहुत ज्यादा संवेदनशील और मानवीयता से परिपूर्ण ह्रदय चाहिए। बचपन की ये विडंबनाएँ सभी दलित आत्मकथाओं के पन्नों पर अंकित मिलेंगी। यह भारतीय समाज की ही एक सच्चाई है जहाँ बचपन बोझ है, घृणा है।