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Wednesday 22 Nov 2017

अज़ीजुन निसा: \'1857 का विद्रोह और स्त्री चिंतन\'


बरखा
शोधार्थी
दिल्ली विश्वविद्यालय
भारत के प्रथम स्वाधीनता संग्राम के नाम से विख्यात 1857 की क्रांति भारतीय इतिहास में अपना विशेष दर्जा रखती है। अपनी 200 वर्षों की गुलामी के दौरान भारतवासियों ने आजादी हेतु कई लड़ाइयां लड़ी जिनका श्रीगणेश सन् 1857 की क्रांति से हुआ। देश का यह प्रथम स्वाधीनता संग्राम अपनी असफलता के बावजूद महत्वपूर्ण है। चूंकि इस संग्राम में पहली बार हिन्दुस्तानी आवाम ने एकजुट होकर ईस्ट इंडिया कंपनी का विरोध किया। 1947 में मिली आजादी की जड़ े इसी संग्राम में निहित थी।
1857 की क्रांति शोषण, उत्पीडऩ, दमन के विरूद्ध भारतीय अवाम के प्रतिरोध की महत्वपूर्ण कड़ी है। यह एक खूनी सशस्त्र क्रांति थी क्योंकि तब तक गांधी का अहिंसावाद राजनीति में प्रवेश नहीं कर पाया था। त्रिपुरारी शर्मा के अनुसार- 'ये काले और गोरों के बीच की कशमकश है जो फैसले के लम्हे को छूने जा रही है। एक काली चमड़ी के जख्म का मुआवजा है एक गोरी जिंदगी, उससे कम नहीं।ÓÓ1
देशी राज्यों का विलय, अंग्रेजों द्वारा भारतीय धर्म और संस्कृति में हस्तक्षेप, चर्बी वाले कारतूस इत्यादि इस विद्रोह के प्रमुख कारण थे। विद्रोह में भाग लेने वाले अधिकांश व्यक्ति सैनिक थे। चर्बी वाले कारतूसों के कारण वे त्रस्त थे उनका जमीर तक बिक गया था और धर्म भी छिन गया था, एक ऊब, एक टीस, एक घृणा उनके भीतर थी जो उनकी नस-नस में जहर की भांति फैल रही थी। ये ऊब शम्सुद्दीन के इस वक्तव्य में स्पष्ट नजर आती है। ''शम्सुद्दीन: पर वाह रे अंग्रेज मालिक तुझे जान दी, लहू दिया, जज़्बात भी दिये...। एक खुदा ही तो मेरा था। उसी से हर मुश्किल बरदाश्त करने की ताकत मिली थी पर अब वह राहत कहां? रूह से आँख मिलना मुहाल है।ÓÓ2
किन्तु इस क्रांति में मुख्य तौर पर प्रतिरोध का स्वर ही उभरकर सामने आता है। यह क्रांति सैनिकों का विद्रोह मात्र नहीं थी अपितु यह उत्पीडि़त, शोषित व प्रताडि़त भारतीय जनमानस की एक व्यापक राष्ट्रीय क्रांति थी। इस क्रांति का प्रमुख केन्द्र मेरठ, दिल्ली, कानपुर, लखनऊ, इलाहाबाद, बरेली, बनारस, झांसी, ग्वालियर तथा बिहार रहा। 1857 की क्रांति के बाद भारत में एक महान परिवर्तन, एक युगांतर आया और यह युगांतर भारतीय स्वतंत्रता की नींव बना, साथ ही भारतीय साहित्य में भी इसकी प्रतिध्वनि सुनाई दी।
इस विद्रोह में एक बड़ा हिस्सा सैनिकों का भले ही रहा हो किन्तु इसे सैनिक विद्रोह नहीं कहा जा सकता। चूंकि यह एक ऐसा विद्रोह था जो जाति, वर्ग, वर्ण व लिंग के बंधनों से कुछ हद तक परे था। उसमें हर वर्ग, हर वर्ण, हर धर्म-सम्प्रदाय की स्त्रियों ने जमकर हिस्सा लिया। यहां तक कि इनमें से कुछ स्त्रियों ने तो स्वयं हथियार लेकर दुश्मन का सामना किया। झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, झलकारी बाई, बेग़म हजरत महल, रानी द्रौपदी बाई, चौहान रानी, रानी ईश्वरी कुमारी, बालिका मैना, रानी तेजबाई, जैतपुर की रानी और तवाय$फ अ•ाीजुन निसा इत्यादि ने भी इस समर में अपनी महत्वपूर्ण उपस्थिति दर्ज कराई। इसलिए कुछ इतिहासकारों ने इसे भारत का राष्ट्रीय विद्रोह कहा है।
डॉ. रामविलास शर्मा के अनुसार- ''1857 की राजक्रांति संसार की पहली क्रांति है जो साम्राज्य-विरोधी होने के साथ सामंत-विरोधी भी है।ÓÓ3
इस तरह से देखें तो पाएंगे कि 1857 का विद्रोह एक व्यापक पैमाने पर घटित राष्ट्रीय संग्राम था। मंगल पाण्डेय, बहादुरशाह ज$फर, नाना साहेब, कुंवर सिंह, मौलवी अहमदुल्ला, शहजादा फिरोज शाह, खान बहादुर खां जैसे पुरुष सैनानियों के साथ झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, बेगम हजरत महल, बहादुरशाह की बेटी जहानआरा, चित्तौड़ की रानी चेनम्मा, बालिका मैना जैसी कुछ वीरांगनाओं को इतिहास व साहित्य में  स्थान मिला। किन्तु इनके अतिरिक्त साधारण तबके की स्त्रियों, तवायफों को इतिहास व साहित्य की परिधि से बाहर ही रखा गया। यह सच में इतिहासकारों के पक्षपातपूर्ण रवैये का ही परिणाम है कि उन्होंने इतिहास में पुरुषों, रानियों, बेगमों व उच्च तबके की स्त्रियों को ही स्थान दिया।
इस पक्षपात के पीछे पितृसत्तात्मक सोच है जिसके अंतर्गत पुरुषों व सत्तासीन व्यक्तियों को ही महत्वपूर्ण माना जाता है। इसी सोच के कारण स्त्रियों को सदा से उपेक्षित किया गया। उन्हें पुरुषों से कमतर आंका गया। उन्हें इतिहास से भी उपेक्षित किया गया है । इसी कारण इतिहास एकांगी है। उसकी पुनव्र्याख्या अनिवार्य है। सिमोन द बोउवार के शब्दों में-
''अतीत में प्रत्येक इतिहास का निर्माता पुरुष ही रहा है... बहुत पहले ही एक नारीवादी ने कहा था। अब तक औरत के बारे में पुरुष ने जो कुछ भी लिखा उस पूरे पर शक नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि लिखने वाला न्यायाधीश और अपराधी दोनों ही हैं।ÓÓ4
इतिहास का निर्माता, व्याख्याता पुरुष ही रहा है इसीलिए सत्तासीन स्त्रियों के अतिरिक्त अन्य स्त्रियों को सदा से उपेक्षित ही रखा गया है। इन्हीं वीरांगनाओं में एक मुख्य उपेक्षित चरित्र है, अजी जुन निसा का। जिस पर त्रिपुरारी शर्मा ने अपने नाटक 'सन सत्तावन का किस्सा: अजीजुन निसाÓ द्वारा प्रकाश डाला हौ। अजीजुन मुख्यत: एक ऐतिहासिक चरित्र है। त्रिपुरारी शर्मा के अनुसार जब वे कानुपर में थीं, तब उन्हें 1857 की क्रांति और अजीजुन के विषय में काफी महत्वपूर्ण जानकारियां मिली। अजीजुन के चरित्र से वे इतनी प्रभावित हुई कि उन्होंने इस चरित्र पर काम करने का निर्णय लिया। इसके लिए उन्होंने 1857 के विद्रोह से संबंधित इतिहास, साहित्य व ग्रंथों का अध्ययन कर अपने ज्ञान को विस्तृत किया और इसके पश्चात् उन्होंने अजीजुन निसा नाटक लिखा और मंचन भी करवाया।
अजीजुन  निसा नाटक त्रिपुरारी शर्मा का एक बहुप्रसिद्ध नाटक है जिसके केन्द्र में है कानपुर की मशहूर तवाय$फ अजीजुन निसा। हमारे भारतीय समाज में जहां एक तरफ  स्त्री की स्थिति दोयम दर्जे की है वहीं एक तवायफ की स्थिति और भी दयनीय है। तवाय$फ हाशिए की स्त्री है जिसे दोहरा अभिशाप झेलना पड़ता है। किन्तु तवाय$फ और वेश्या में अंतर है। वेश्या की स्थिति तवाय$फ से भी निम्नतर है। तवायफ़  अदाकारा है जो अपने हुनर से लोगों का दिल बहलाती है वहीं वेश्या अपने तन का सौदा करती है। जहां तक अजीजुन निसा का सवाल है वह एक मशहूर तवायफ़ है जो गौरवपूर्ण जीवन जीती है। वह स्वतंत्र रहती है। किसी शहजादे की जी-हुजूरी नहीं करती।
अजीजुन  निसा एक वीरांगना है। एक सिपाही है। कानपुर के विद्रोह का दृश्य उभारते हुए नाटककार उसके चरित्र को इन शब्दों में मुखरता प्रदान करती हैं- ''सन् सत्तावन का कानपुर बारूद और लहू से लथपथ और उसी शहर की मशहूर तवायफ़ अजीजुन निसा जो सिपाही बनकर दोराहे पर खड़ी हुई है । तवाय$फ से सिपाही और खुद को सिपाही साबित करने की लगातार कोशिश, यही है अज़ीजुन निसा की कहानी।ÓÓ5
अजीजुन  के कोठे पर क्रांतिकारी अपनी गुप्त बैठकें करते थे। कुछ इतिहासकारों का यह भी अनुमान है कि अजीजुन ने भी स्त्रियों की टोली बनाई थी। उस टोली में सम्मिलित स्त्रियां पुरुष वेश में तलवार लिए घोड़ों पर चढ़कर नवयुवकों को क्रांति में भाग लेने की प्रेरणा देती थीं। वह घायल सिपाहियों की मरहमपट्टी करने के साथ उन्हें खाद्य सामग्री भी वितरित करती थी। इस तरह से देखें तो पाएंगे कि अजीजुन का चरित्र एक तवाय$फ के चरित्र से दूर और एक सिपाही के चरित्र के अधिक निकट है। सन् सत्तावन का वह समय जब चारों तरफ बलबला उठ रहा था। ऐसे समय में अजीजुन ने समय की मांग के अनुरूप स्वयं के चरित्र का विकास किया। स्त्री होने के बावजूद वह स्वयं युद्ध क्षेत्र में एक योद्धा की भांति लडऩे का निर्णय लेती है। किन्तु उसे यह कहकर रोका जाता है कि ''ये मर्दों की लड़ाई है, उन्हें निपटाने दो, जिससे तुम नावाकि$फ हो, जिसके नाकाबिल हो।ÓÓ6
अजीजुन  का चरित्र इस नाटक में उपस्थित अन्य स्त्री चरित्रों से भिन्न है। जुबैदा का चरित्र हिंसा का विरोध करता है किन्तु अजीजुन जानती है कि हिंसा समय की मांग है, आज उसे रोका नहीं जा सकता। अन्य स्त्रियों की भांति वह जंग से डरती नहीं, जंग से भागती नहीं अपितु जंग के लिए अपना हृदय पत्थर कर लेती है । अंधेरे में चलने की उसकी यह हिम्मत ही उसे हाशिये से केन्द्र में ला खड़ा करती है। रौशनी, जुबैदा से अलग वह अपने समय के अनुसार अपना रास्ता खुद चुनती है। वह एक तवाय$फ है इसीलिए वह अपने निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र है, वह एक आधुनिक सोच वाली स्त्री है जो समय की मांग के अनुरूप सही निर्णय लेती है।
 वह कहती है- ''सिपाही का वजूद सरकार का था, तवायफ का दिल भी किसी का नहीं था। शायद अल्लाह ने इसी के सबब मुझे तन्हा और बेखानोमा रखा था कि मैं अंधेरे से टकरा सकूं, अनजाने रास्तों पर बेनियाज और बेखौ$फ चल सकूं।ÓÓ7
अपने 'शहरे गरीबांÓ से प्रेम करने वाली अजीजुन स्वाभिमानी है वो किसी शहजादे की जी-हुजूरी मंजूर करने की बजाए सिपाही से दिल लगाना चाहती है- ''महाजन घर चलाने के लिए है और सिपाही दिल लगाने के लिए।ÓÓ8
अजीजुन  एक खूबसूरत हसीना है जो जंग की दीवानी है और वह उस जंग में खुद शिरकत करना चाहती है।
'अजीजुन और मुझे जंग से मुहब्बत है जो मेरे दरवाजे पर दस्तक दे चुकी है ।ÓÓ9
उसके मन में न अदावत है न गुस्सा, बस एक मकसद है जो उसे पूरा करना है वह खुदा की शुक्रगुजार है कि उसने उसे उस दौर में पैदाइश दी।
''खुदा ने मुझे इस दौर में पैदाइश दी है, इस शहर में जगह दी है, जिसके इशारे पर जंग में शामिल हुई तो वह दिखाएगा, आगे की सबील भी। यह बदन सख़्त हो जाए चमड़ा बन जाए। सौ खंजरों के जख़्म सह सके।ÓÓ10
इस जंग के पीछे उसका बस एक ही मकसद है वह उस दिन के इंतजार में है- ''तुम तसव्वुर कर सकती हो वह दिन जब कोई गोरा चेहरा यहां नहीं होगा। हिकारत भरी निगाहें नहीं... जिनके आने से इस जमीं पर बेगानगी फैल गई, वह नहीं रहेंगे।ÓÓ11
सात रुपये का एक सिपाही और लाखों की एक अजीजुन में से यदि चुनना पड़े तो वह निश्चित रूप से सिपाही को चुनेगी। वह अब घुंघरू से नहीं अपितु बारूद और शमशीर से खुद को जोड़ती है। मूल रूप से देखा जाए तो यह नाटक अजीजुन के चरित्र के विकास को दिखाता है, उसके हृदय में देश प्रेम की भावना इतनी प्रगाढ़ है कि वह हर संभव तरीके से अपने देश के लिए कुछ न कुछ  करना चाहती है। कभी गुप्तचर के रूप में तो कभी सिपाही के रूप में।
इस नाटक में अजीजुन के चरित्र की कई परतें खुलती हैं एक तवाय$फ ही सही परन्तु उसके चरित्र को खंगाला जाए तो वह एक साहसी, वीरांगना है जो युद्ध में उतरने को तत्पर है। उसकी सोच अपने-अपने समय की मांग के अनुरूप है। वह अपने शहरे गरीबां से प्रेम करती है, शहरे गरीबां के लोगों से भी प्रेम करती है उसे नफरत सिर्फ  उनसे है जो उसके शहरे गरीबां को गुलाम बनाए हैं। नाटककार ने इस नाटक में अंग्रेजी हुकूमत द्वारा किए गए अत्याचारों को भी उभारा है। वे गांव जो कभी आबाद थे, आज वे वीरान हैं। उसके नागरिक पेड़ों पर मृत लटके हैं, शहर में हर जगह अंग्रेजी हुकूमत की क्रूरता के दृश्य नजर आ रहे हैं। ऐसे में नाटककार यह प्रश्न भी उठाती है कि क्या हिंसा के प्रत्युत्तर में हिंसा जायज है? किन्तु यह भी सत्य है कि हर जगह अहिंसा कारगर नहीं, हिंसा उस समय की परिस्थिति व परिवेश की मांग थी।
नाटक में दिखाया गया है कि अंग्रेजी फौज हमले के लिए आ रही है, वह खुश है क्योंकि वे ये सोच रहे हैं कि कानपुर में भी वे विजयी होंगे। ऐसी स्थिति में अजीजुन ऐसा मार्ग खोजती हैं जिससे लाखों कोशिशों के बावजूद भी उन्हें (अंग्रेजों को) सुकून न मिले। वह कहती है- ''अजीजुन - मत्महे नजर बीबीघर है क्या वहीं उनकी शिकस्त का यादगार मकबरा नहीं बन सकता।ÓÓ12
उसका ऐसा कहना निश्चित रूप से यह सिद्ध करता है कि अजीजुन में क्रांति की कितनी ललक है। देश-प्रेम हेतु वह स्वयं घोड़े पर सवार हो हाथों में शमशीर लेकर युद्ध करती है। वह जिस तरह से लड़ती है उससे उसका स्त्रीत्व कदापि नहीं झलकता। वह उस समय मात्र एक सिपाही थी, जिसका लक्ष्य था विजय पाना और शत्रुओं पर टूट पडऩा। वह मर्दानी बनकर शत्रुओं का विनाश करती है।
मूल रूप से देखें तो अजीजुन ऐसी स्त्री है जो स्वयं को पुरुषों के क्षेत्र में साबित करती है। अपने समय की मांग के अनुरूप अपने चरित्र को निखारती है। उसका चरित्र बहुआयामी है। एक तरफ  वह प्रेम और समर्पण की देवी है तो वहीं दूसरी तरफ  वह युद्ध भूमि पर लडऩे वाली वीरांगना। जिसका ध्येय राष्ट्र मुक्ति है। 1857 के प्रमुख क्रांतिकारी नारी चरित्रों में अजीजुन का चरित्र भी अपनी महत्ता रखता है, वह तवाय$फ ही सही किन्तु एक देश-भक्त भी है जो स्वयं को सिद्ध करती है।
संदर्भ:
1. 'सन् सत्तावन का किस्सा:अजीजुन निसाÓ, वाणी प्रकाशन, 1999, पृ .45
2. वही, पृ .12
3. 1857 की राज्यक्रांति और माक्र्सवाद, डॉ. रामविलास शर्मा , पृ .53
4. स्त्री उपेक्षिता, सिमोन द बोउवार, हिन्दी पॉकेट बुक्स, पृ.26
5. 'सन् सत्तावन का किस्सा: अजीजुन निसाÓ, वाणी प्रकाशन, 1999, भूमिका
6. वही, पृ .45, 7. वही, पृ .36, 8. वही, पृ .7, 9. वही, पृ .35, 10. वही, पृ .47,
11. वही, पृ .55, 12. वही,
पृ .80 ठ्ठ