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Tuesday 21 Nov 2017

लॉटरी

पवन चौहान
गांव व डाकघर महादेव,
त. सुन्दरनगर,
जिला मण्डी-175018
मो. 09418582242,
कल हुई वर्षा ने सर्दी का पूर्ण अहसास करा दिया था। बादल भी अपनी आंख मिचौली का खेल बंद कर चुके थे। बादल रहित नीला आसमान आज सूर्य के रास्ते में कोई रुकावट पैदा करने के मूड में नहीं लग रहा था। धूप पूरी तरह से खिली हुई थी। सर्दी का मौसम गांववालों के लिए दूसरे मौसमों के मुकाबले थोड़ा आराम लेकर आता है। गेहूं खेतों में बीजा जा चुका होता है। इस मौसम की बात करें तो पशुओं के लिए घास सर्दी आने से पहले ही कूपों, कोठों और पशुशाला की तालड़ी में इकट्टठा कर लिया जाता है। कहीं दूर जाने की जरूरत नहीं पड़ती। लेकिन दूसरे मौसमों में पशुओं के लिए घास जब दूर फाटों से और बरसात में पानी से लबालब सिर पर उठाकर लायी जाती है तो हालत खराब हो जाती है। सर्दी के मौसम में काम अब सुबह-शाम का खाना बनाने तक सीमित रह जाता है। बाकी सारा दिन तो औरतों का धूप सेंकने, स्वेटर बुनने, मांजरी व बैठकू बनाने, गलगल के मुरब्बे के साथ-साथ भूने सोयाबीन या भूनी मक्की को चबाने और इकट्ठे बैठकर यहां-वहां की गप्पे हांकने में ही बीत जाता है।
    निर्मला तेरे स्वेटर की बुनती तो बड़ी सुन्दर है। कहां से सीखी? धूप सेंकने के अपने अड्डे पर बैठी औरतों में से चंपा ने निर्मला के स्वेटर की तारीफ  के साथ-साथ एक प्रश्न कर डाला था।
    मुझे किसी से बुनती सीखने की जरूरत नहीं है। ये पूछो कि किस-किस ने मुझसे बुनती सीखी है। स्वभाव से घमंडी निर्मला ने जबाब दिया।
    हां भई चंपा। तू क्या निर्मला को हमारे जैसी अनपढ़ गंवार समझती है। गांव में यही तो पहली पढ़ी-लिखी बहू आई थी। इसका दिमाग हमारे जैसा थोड़े ही है। क्या तू नहीं जानती, पढ़े-लिखे अनपढ़ों से ज्यादा समझदार होते हैं। हमारे पास निर्मला जैसा तेज दिमाग कहां? क्यों निर्मला? औरतों के इसी समूह में से गौरी ने बातों-बातों में निर्मला की तारीफ  के साथ-साथ एक व्यंग्य भी कस दिया था।
    निर्मला ने गौरी की बात का कोई उत्तर तो नहीं दिया लेकिन अपनी तारीफ  सुनकर उसके छिदरे दांत जरूर निकल आए थे। वहीं चंपा और गौरी के चेहरे पर भी निर्मला पर किए व्यंग्य बाण से हल्की-सी मुस्कान उभर आई थी।
    इसी बीच गांव की कच्ची सड़क के दूसरी ओर से अपने मकान से मीरा प्लेट में गलगल का मुरब्बा बना कर ले आई थी। गले में सोने का नेकलेस, इअरिंग, सोने का ही मंगलसूत्र पहने ऐसा लग रहा था मानो आज मीरा किसी शादी या उत्सव में शरीक होने जा रही हो।
    वाह री मीरा ! तूने तो मेरे दिल की सुन ली। आज मेरा खट्टा खाने का बड़ा मन कर रहा था। मुरब्बे को देख चंपा की आंखें चमक उठी थी। जल्दी ला री! मेरा मुंह तो पानी से भर गया है।
मुझसे भी रहा नहीं जा रहा। गौरी और निर्मला भी चंपा की तरह अपनी चाहत दबा नहीं पा रही थी।
    प्लेट को जैसे ही मांजरी पर रखा गया सभी मुरब्बे पर ऐसे टूट पड़े जैसे खाने की कोई प्रतियोगिता चल रही हो। चंपा ने तो चार-पांच टुकड़े बिना चबाए फटाफट ऐसे निगल लिए जैसे वर्षों से उसने मुरब्बा खाया ही न हो।
    इसी बीच ईष्र्यालु निर्मला का ध्यान मीरा के गहनों पर जा टिका था। मीरा, आज तो तू पूरी तरह गहनों से लदी हुई है। क्या बात है? कहीं जा रही हो क्या? निर्मला ने प्रश्न किया।
    कहीं नहीं। मीरा ने कानों पर पड़े उन बालों को अपनी उंगलियों से एक तरफ को हटाते हुए कहा जो उसके इअरिंग को छुपा रहे थे।
    फिर आज ये साज संवर किसलिए? निर्मला ने फिर एक प्रश्न कर डाला था।
    मैं अभी बाजार जाकर .........
    मीरा की बात को बीच में ही टोकते हुए निर्मला एक बार फिर बोली, मीरा, मैं तो अभी देख पा रही हूं तेरा ेनेकलेस, मंगलसूत्र और यह इअरिंग, वो भी मैचिंग। किसी से उधार लिए हैं या फिर लॉटरी लगी है? दो हफ्ते पहले घनश्याम की शादी में तो तू खाली गला लेकर घूम रही थी, कानों में तेरी वही ओल्ड फैशन्ड बालियां लटक रही थीं और मंगलसूत्र भी तूने नाम का ही पहन रखा था।
    लेकिन चाहे कुछ भी हो। पूरे सैट का डिजाइन है सुन्दर! चंपा ने गहनों की तारीफ करते हुए कहा।
मैं तुझसे कुछ पूछ रही थी मीरा। क्या ये गहने तूने किसी से पहनने के लिए लिए हैं या फिर तेरी लॉटरी लगी है? निर्मला चंपा द्वारा की गई गहनों की तारीफ से चिढ़ते हुए बोली।
    मीरा भी तो कब से यही चाह रही थी कि कोई उसके गहनों के बारे में पूछे। उनकी तारीफ  करे। मुरब्बा खिलाने के बहाने वह अपने गहने ही दिखाने तो आई थी। निर्मला के प्रश्न के उत्तर में चेहरे पर एक गुदगुदाती सी मुस्कान बिखेरते हुए मीरा बोली, तू तो जानती है निर्मला। दो महीने पहले हमने जो दो आवारा गायों को पकड़ा था। उन दोनों को डॉक्टर से चेक करवाने पर पता चला कि वे दोनों गर्भवती हैं। बस, फिर क्या था। हमारी तो लॉटरी लग गई। कुछ दिन पालने के पश्चात् हमने परसों उन्हें बेच दिया। गायों की नस्ल और सेहत को देखते हुए ग्राहकों ने उनकी मुंहमांगी कीमत दी। कुछ रूपए हमने अपने डाले और आज हम उन रूपयों से ये कुछ गहने ले आए। वैसे निर्मला, मुझ पर ये कैसे लग रहे हैं? जंच भी रहे हैं या नहीं?
    ठीक ही लग रहे हैं। पर डिजाइन इतना बढिय़ा नहीं है। मेरे सेट का डिजाइन देखा है तूने? निर्मला का ईष्र्यालु भाव एक बार फिर छलक पड़ा था।
    मुझे तो इन गहनों का डिजाइन बड़ा सुन्दर लगा। वैसे तेरी तो सचमुच में लॉटरी निकल आई है मीरा। चलो इसी बहाने बेचारी गायें भी यहां-वहां की ठोकरें खाने से तो बच गई। उन्हें रहने का एक स्थाई ठिकाना तो मिला। नहीं तो बेचारियों को रोज किसी न किसी के डंडे खाने पड़ते। सर्दी के ठंडे थपेड़ों की मार झेलनी पड़ती। चंपा ने गायों के प्रति हमदर्दी जताते हुए कहा।
    तू ठीक कहती है चंपा। आज क्या जमाना आ गया है। जिस गाय को हम पूजते हैं। जिसे बैतरनी पार करने का जरिया मानते हैं। हमारी धार्मिक आस्था का एक अटूट हिस्सा होते हुए भी वह आज मनुष्य के स्वार्थ की बलिबेदी पर इस कदर चढ़ चुकी है कि सारी उम्र उसका दूध, घी खाने के बाद उसके बूढ़े या फिर बांझ होते ही बड़ी बेदर्दी से उसे घर से दूर कहीं दर-ब-दर की ठोकरें खाने के लिए छोड़ दिया जाता है। दूध बंद होते ही उसे एक दिन का घास तक खिलाने में भी उन्हें तकलीफ होने लगती है। गांवों, शहरों, चौराहों, हर जगह पर आज ऐसे ही मनुष्यों के स्वार्थीपन के परिणाम स्वरूप हमें ढेरों गायें रोज दिख जाती हैं। बेचारी। एक लम्बी सांस छोड़ते हुए गौरी ने भी चंपा की बात का समर्थन किया।
    निर्मला न चाहते हुए भी अभी तक मीरा के गहनों की चमक-दमक में ही खोई हुई थी। स्वेटर बुनना तो जैसे वह कब का भूल चुकी थी। मन ही मन वह यही सोच रही थी कि उसके पास इतने सुंदर गहने क्यों नहीं है ?
    ''मैंने भी उनसे गाय पकडऩे के लिए कहा था।ÓÓ निर्मला एकदम अचानक ऐसे बोल पड़ी जैसे वह अभी-अभी नींद से जागी हो। लेकिन वह हैं कि मेरी बातों पर जरा भी ध्यान नहीं देते। कहते हैं अगर गाय को बेचने के लिए ही पकडऩा है तो फिर मैं नहीं पकड़ूंगा। यदि गाय को पाल सकती हो तो मैं कोशिश कर सकता हूं। अब उन्हें कौन समझाए कि गाय पालना कितना मुश्किल है और महंगा भी। रोजाना पीठ पर खेतों से घास उठाकर लाओ। गोबर उठाओ, गाय को नहलाओ-धुलाओ, उनके नीचे बिछे मैल को उठाओ। ना बाबा ना। मैं अपने हाथ-पैर गोबर और उनके मैल से गंदे नहीं कर सकती। इससे तो मेरे सुंदर हाथ-पैर ही फट जाएंगे। ऊपर से न तो आराम से बैठ कर कहीं बातें ही कर पाते हैं और न ही रिश्तेदारों के यहां खुले मन से जा पाते हैं।
    तो तू क्या समझती है निर्मला। गाय से दूध-घी ऐसे ही फ्री में मिल जाता है क्या? चंपा ने निर्मला को टोकते हुए कहा।
    दूध, घी कौन कमबख्त चाहता है। मैं तो मीरा की तरह लॉटरी पाना चाहती हूं। काश! मेरे पति भी गायों को पकडऩे की जरा-सी कोशिश करते तो आज मेरे पास भी...बुरा-सा मुंह बनाते हुए निर्मला एकदम चुप-सी हो गई थी।
    अरे निर्मला, तू भी कहां उलझ गई। ले मुरब्बा खा। चख तो सही। मीरा क्या बढिय़ा मुरब्बा बनाकर लाई है। गौरी ने मुरब्बे की प्लेट निर्मला की ओर बढ़ा दी थी।
    अरे वाह ! मुरब्बा तो सचमुच में बहुत अच्छा है। पर मीरा तुम्हारे घर तो गलगल का कोई पेड़ नहीं है। फिर कहां से ये गलगल आए हैं? मुझे भी अचार के लिए गलगलों की जरूरत है। थोड़े से गलगल मुझे भी दे देना। निर्मला ने मुरब्बे की तारीफ  के साथ-साथ गलगलों की अपनी मांग भी मीरा के सामने रख दी थी।
    ''मेरे पास तो निर्मला अब तीन-चार गलगल ही बचे हैं लेकिन मेरे साथ जंगल चलना। हमें जंगल में गलगलों और नींबू के पेड़ों का खजाना इस बार हाथ लगा है। तू चाहे वहां से जितने मर्जी ले आना। कुछ दिन पहले सावित्री और पार्वती के साथ मैं भी जंगल से खरकने (एक जंगली पौधे से बनाया गया झाडू) लाने गई थी। वापसी के समय हमें यह खजाना मिला। ले तो मैं ढेर सारे आती परंतु सिर पर पहले से ही खरकनों का बोझ था इसलिए अपने गुजारे लायक ही लाई थी। इस बार हम दोनों जाएंगे और बोरी भरकर गलगल और नींबू लेकर आएंगे। चलेगी न तू मेरे साथ?ÓÓ
''तू क्या पागल हो गई है मीरा। मैं और जंगल। वो भी गलगल के लिए। न बाबा न ! और देखो तो, तुम खरकने भी ले कर आ गई।ÓÓ निर्मला ने इस हैरानी से कहा जैसे मीरा ने कोई गुनाह कर दिया हो।
''पता नहीं रास्ते में कितने लोगों ने तुम्हें देखा होगा। क्या सोचा होगा उन्होंने तुम्हारे बारे में कि कितनी कंजूस हैं ये औरतें। रास्ते में जो बाजार पड़ता है वो तुमने पता नहीं कैसे पार किया होगा।
''क्यों ? हमने ऐसा क्या कर दिया निर्मला?ÓÓ मीरा हैरानी में बोली।
    ''मीरा, पहले के समय में ऐसा कर लेते थे। उस वक्त की परिस्थितियां ही वैसी थी जब लोग जंगल से घास, लकड़ी और खरकने वगैरह लाते थे। लेकिन आज की परिस्थिति अलग है। आज जब घर पर ही ये सब चीजें आसानी से मिल जाती हैं तो फिर इसके लिए जंगल जाने की क्या जरूरत है। मैं तो इस काम के लिए जंगल कभी न जाऊं। तुम पता नहीं कैसे.........।ÓÓ निर्मला यह सब कह कर मीरा की खिल्ली उड़ाने की कोशिश में लगी थी।
        गौरी निर्मला की बात को बीच में ही टोकते हुए बोली। ''तू भी सच्ची बोल रही है निर्मला। तेरे घर में कोई पशु तो है नहीं और तू ठहरी सास-ससुर की इकलौती बहू। घर में देवरानियां-जेठानियां हों तब पता चलता है घर में कैसे काम होता है। आदमी को अपने बुरे वक्त में सब-कुछ करना पड़ता है। हमने भी ऐसे ही कई मील पैदल चलकर दूर जंगल से अपनी पीठ पर लकड़ी, घास और खरकने वगैरह ढो-ढोकर अपने घर की हालत को संवारा है। पाई-पाई जोड़कर हमने अपने आज को सहारा दिया है। जिसने गरीबी को नजदीक से देखा हो, उसे बाजार से मिलने वाला चालीस-पचास रूपए का झाडू खरीदते समय ऐसा लगता है जैसे वे अपने घर की कमाई को बेकार कहीं गंवा रही हो। ऐसा महसूस होता है जैसे हम किसी काम की न बची हों। हम जैसे बूढ़ी हो गई हों। जैसे हममें जान ही न बची हो। जब तक हमारे में ताकत है। हम यह सब नहीं छोड़ सकती। और तू क्या कह रही थी। लोग क्या कहेंगें ? बाजार कैसे पार किया होगा ? इसने ऐसा क्या गुनाह कर दिया। कोई चोरी तो नहीं की इसने न, जो ये लोगों की बातों से डरे। या बाजार से जाने में कतराए।ÓÓ गौरी निर्मला की बात को झेल नहीं पाई थी। उसे यह सब उन मेहनती औरतों का मजाक लगा जो अपने श्रम का सदुपयोग कर रही हैं।
    निर्मला बात को नरमी प्रदान करते हुए बोली, ''दीदी, मेरा मतलब यह नहीं था। मैंने भी तो कभी पशु पाले थे। क्या मैं नहीं समझती। मैं तो बस यूं ही आज के दौर को............।ÓÓ
    ''जानती हूं तेरा मतलब। और ये आज का दौर क्या लगा रखा है तूने। यह आज का दौर ही तो है जिसने गांव की औरतों तक को नहीं छोड़ा। सब की सब निठल्ली और आलसी होती जा रही है। अपनी नेलपॉलिश और लिपस्टिक मिटने के डर से कमबख्तों ने अपने खेतों में काम करना तक छोड़ रखा है। अपने पशुओं के लिए खेतों से घास निकालने तक में उन्हें तकलीफ  होती है। मजदूरों को रूपए देकर काम करवा लेंगी लेकिन अपने हाथ-पैर नहीं चलाएंगी। रानियां बन कर सारा-सारा दिन बैठी रहती हैं। जैसे पता नहीं उनके पुरखों ने उनके लिए कुबेर का खजाना छोड़ रखा हो। नौवां महीना लगा होता था तब भी हम पच्चीस-तीस घास के पुल्ले अपने सिर पर उठा कर दूर जंगल से लाती थीं। लेकिन आज दिखावा ज्यादा और मेहनत कम है।ÓÓ गौरी की तीखी व्यंग्य भरी बातों ने निर्मला को थोड़ी देर के लिए चुप करा दिया था।
    ''अरे गौरी, तुम भी न। छोड़ इन बातों को। ले मुरब्बा खा। नहीं तो यह भी तेरी बातों की तरह कड़वा हो जाएगा।ÓÓ चंपा ने मजाकिया लहजे के साथ गौरी का ध्यान उसकी पसंदीदा चीज पर लगा दिया था।
    ''क्या चंपा दीदी। जब प्लेट में सिर्फ  दो-तीन टुकड़े रह गए हैं। तब तुम कह रही हो।ÓÓ निर्मला से ज्यादा देर तो चुप बैठा नहीं जा सकता था। एक बार वह फिर आदतानुसार शिकायती लहजे में बोल पड़ी थी।
''भई देखो, प्लेट तुम्हारे सामने ही थी लेकिन तुम्हें मीरा के गहनों का हालचाल पूछने से फुरसत मिली होती तभी तो तुम मुरब्बे का आनन्द ले पाती न।ÓÓ
    चंपा की बात पर गौरी और मीरा खिलखिलाकर हंस पड़ी थी। निर्मला के चेहरे पर भी हंसी और गुस्से का एक मिश्रित-सा भाव उभर आया था।
मुरब्बा खाते-खाते गौरी बोली,'मैंने कल ही सुना कि बिमला के लड़के राजेश ने भी आवारा गायों को पकड़कर बेचा। क्या यह सही है ?Ó    
    'हां, बिलकुल गौरी। उसने परसों ही एक गाय को जो उसने दो हफ्ते पहले पकड़ी थी, नौ हजार में बेचा। उसकी देखा-देखी में अब हर गांव वाला दिन-रात इसी मौके की तलाश में रहता है कि कब उनके हाथ कोई आवारा गर्भवती गाय लग जाए जिसे बेचकर वे कुछ रूपए कमा सकें। ऐसी गायों को लोग अब लॉटरी कहकर पुकारने लगे हैं। सबकी नजरें आजकल आवारा गायों के पेट और थनों पर टिकी रहती हैं। जरा-सा भी किसी को लगा कि गाय गर्भवती है तो वे उसे पकड़ कर गांव में खुली डिस्पेंसरी में चेक करवाकर उसके गर्भवती होने की तसल्ली कर लेते हैं। अगर गाय गर्भवती हुई तो उसके भाग खुल गए समझो। अगर नहीं, तो उसे फिर से दर-ब-दर की ठोकरें खाने को छोड़ दिया जाता है।ÓÓ चंपा ने सारी बात खुलकर बता दी थी।
''चलो इसी बहाने बेचारी गायों को इस कड़कती सर्दी में रहने का कोई स्थाई ठिकाना तो मिल जाता है। बेचारियों को घास के लिए यहां-वहां की ठोकरें तो नहीं खानी पड़ती।ÓÓ गौरी ने भी अपना पक्ष रख दिया था।
निर्मला सबकी बातें चुपचाप सुने जा रही थी। अबकी बार उसके मुंह से एक शब्द भी नहीं फूटा था।
    ''लेकिन स्थायी ठिकाना तो बेचारी कुछ एक भाग्यशाली गायों को ही मिल पाता है। उससे कई गुणा ज्यादा तो लोग फिर से और गायों को आवारा दर-ब-दर की ठोकरें खाने का छोड़ देते हैं।ÓÓ चंपा ने अपना पक्ष रखा।
'हमने अपने इलाके में इस तरह से और इतनी मात्रा में कभी आवारा गायों को नहीं देखा। परंतु अब आदमी बेचारा भी क्या करे।Ó
'क्यों ? आदमी को क्या हो गया ?Ó चंपा बोली।
'सारी घासनियां जहां कभी हमारे पशु चरते थे। वहां तो अब सीमेंट फैक्टरी, कारखानों या फिर लोगों के नए घरों ने कब्जा जमा लिया है। बहुत सी घासनियां ऐसी हैं जहां घासनी का नजदीक वाला किसान उन घासनियों पर अपना नाजायज कब्जा कर बैठा है। वह उस सरकारी जमीन को भी अपना मान रहा है। उसने चारों ओर से बाड़ लगा दी है। अब कहां जाएं हमारे पशु चरने। अब वही किसान इन घासनियों को शहर से आए व्यापारियों को घास निकालने के लिए हर साल बेच देता है और फिर वही व्यापारी हमें हमारी ही घास मुंहमांगी कीमत पर बेच रहा है। सभी चुपचाप बैठे तमाशबीन बने हुए हैं। नौकरीपेशों को इसके विरुद्ध जाने का समय नहीं है और बेचारे किसान को या तो इस सबके खिलाफ  जाने की हिम्मत नहीं है या फिर उसे न्याय का सही रास्ता मालूम नहीं है।Ó मीरा ने अपनी बात रखी।
मीरा की बात का समर्थन करते हुए गौरी बोली,'मीरा, बिलकुल सही कह रही हो तुम। मेरे मायके वालों के पूरे इलाके में तो ईंट भ_े वालों ने जमीन को लीज पर ले रखा है। वे उस जमीन को कई सालों से खोद रहे हैं। सारे के सारे खेत अब सूखे, भूरे और बंजर मैदानों में बदल गए हैं। यह सब आदमी का खुद का ही किया धरा है। आज आदमी को सिर्फ रुपये चाहिए। वह उस जमीन का सौदा करने से जरा भी नहीं कतराता जिस जमीन को उनके बाप-दादा ने संभाल-संभाल कर रखा और बिजली प्रोजेक्ट वालों से वे अनपढ़ किसान अपनी जान की परवाह किए बगैर भिड़ गए थे। उन्होंने बड़ी से बड़ी मुश्किल आने पर भी अपनी जमीन को बेचने का सोचा तक नहीं। उसी जमीन को आज की यह पीढ़ी अपने ऐशो-आराम के लिए किसी फैक्टरी, ईंट भ_े या फिर किसी होटल बनाने वाले व्यापारी को लगी-फबी कीमत पर पता नहीं क्या सोचकर बेच रही है। यदि जमीन के साथ ऐसा ही सब चलता रहा तो गायें ऐसी सड़कों पर, गांवों में, चौराहों पर यूं ही आवारा घूमती, किसी गाड़ी के नीचे कुचलती, लोगों से मार खातीं और ठंड के थपेड़ों को झेलती नजर आएंगी।Ó गौरी ने भी अपना गुस्सा बाहर निकाल कर रख दिया था।
    ''तुम सच कह रही हो गौरी। बात तो तुम्हारी एकदम सही है। लेकिन फिर भी जो लोग इन गायों को इस्तेमाल करने के बाद आवारा दर-ब-दर की ठोकरें खाने के लिए छोड़ रहे हैं। उनका क्या? गायों को ऐसे छोड़ देना, यह बात मेरी समझ से बिलकुल बाहर है। मुझे तो इसका एक ही हल नजर आता है। जो भी कोई अपना पशु कहींआवारा छोड़ता हुआ पकड़ा जाए, उसके लिए कोई ऐसी सख्त सजा सुनिश्चित करे ताकि दोबारा कोई ऐसी नीच हरकत न कर पाए।ÓÓ चंपा अपनी बात पर सख्त होते हुए बोली।
    गौरी और मीरा ने चंपा की बात का समर्थन किया। लेकिन निर्मला अधजगी सी अभी भी कहीं खोई हुई थी। उसकी आंखों में मीरा के गहने अभी भी लटक रहे थे। अंदर ही अंदर उसके कोई योजना जन्म ले रही थी। समय बीतने के साथ-साथ बातों का दौर भी थमता चला गया। धूप सेंकने के स्थान पर अब ठंडी हवाओं ने कब्जा करना शुरू कर दिया था। सभी धूप सेंकने के अड्डे से उठकर अपने-अपने घर के काम-काज में उलझ चुकी थीं।
एक नई सुबह के साथ धूप सेंकनें का अड्डा फिर से जम चुका था। सारी औरतें आ चुकी थी। कमी थी तो सिर्फ  निर्मला की।
    ''क्यों चंपा ! निर्मला को कहां छोड़ आई। आज उसे अपने साथ लाना भूल गई क्या?ÓÓ गौरी ने चंपा से प्रश्न किया।
    ''निर्मला शायद अब कई दिनों तक हमारे बीच दिखाई नहीं देगी।ÓÓ चंपा ने कहा।
    ''क्यों !ÓÓ गौरी के शब्दों में हैरानी थी।
    ''क्योंकि कल रात से उसका पति अस्पताल में दाखिल है।ÓÓ
    ''उसे क्या हुआ है !ÓÓ
    ''निर्मला जब कल यहां से घर गई तो उसके मन से मीरा के गहनों का भूत उतरा नहीं था। शाम को अपने पति के आते ही उसने गाय को पकडऩे का राग अलापना शुरू कर दिया। उसका पति मना करता रहा लेकिन वह न मानी। कहने लगी, जानते हो, मीरा की तो लॉटरी निकल आई है। उसने गहनों का एक पूरा सेट गायों को बेचकर खरीद लिया है। मैं पहले ही आपको कहती रही कि गर्भवती गाय को देखकर पकड़ लो। लेकिन तुम आलसी के आलसी ही रहे। अगर तुमने कोशिश की होती तो वे दोनों गायें आज मीरा के खूंटे पर न होकर मेरे खंूटे पर बंधी होती और वह प्यारा-सा सोने का सेट मेरे गले की शोभा बढ़ा रहा होता। पता है, जब वह अपने गहनों को दिखाती फिर रही थी तो मुझे उस वक्त आप पर कितना गुस्सा आ रहा था।ÓÓ
    अपने बारे में सुनकर मीरा के चेहरे के भाव बदल चुके थे। उसे निर्मला की घटिया सोच पर गुस्सा आ रहा था।
    ''लेकिन चंपा! तुम इतने दावे के साथ कैसे कह सकती हो कि निर्मला ने यह सब कहा।ÓÓ मीरा जैसे बात की पुष्टि कर लेना चाहती थी।
    ''अरे भई, यह भी कोई पूछने वाली बात है। एक तो हम दोनों परिवारों के आंगन एक और दूसरा निर्मला की भोंपू की तरह आवाज। कुछ न भी सुनना हो तब भी सब-कुछ साफ-साफ  सुनाई पड़ ही जाता है।ÓÓ चंपा ने मीरा की बात की पुष्टि कर दी थी।
    ''लगता है मीरा आज जानबूझ कर अनजान बन रही है। क्या इसे निर्मला की आदत का पता नहीं। खैर, जो भी है। पर चंपा उसके बाद क्या हुआ ? क्या उसका पति गाय पकडऩे चला गया ?ÓÓ गौरी ने विषय को फिर पटरी पर ला दिया था।
    ''जाता क्यों नहीं। वह अपने पति को इतना कुछ सुना बैठी थी कि बेचारे को मजबूरी में जाना ही पड़ा। अपने लड़के को साथ लेकर वह उन गायों के झुंड की ओर गया जहां वे रात को विश्राम करती थीं। एक गाय उनकी नजर में पहले से ही थी। उस गाय को पकडऩे के चक्कर में गायों के झुंड में बैठे सांड ने उसे ऐसी टक्कर मारी कि उसे रात को ही अस्पताल में भर्ती करवाना पड़ा। सुना है सांड ने उसे पेशाब की जगह पर टक्कर मारी है। उसी का लड़का सुबह बता रहा था कि पिता जी का ऑपरेशन करना पड़ेगा जिसमें काफी खर्चा आएगा। मैंने तो यहां तक भी सुना है कि निर्मला को रूपयों के लिए अपने कुछ गहने तक बेचने पड़ गए हैं।ÓÓ
    ''बेचारी निर्मला! उसे तो लेने के देने पड़ गए। न तो वह जिद करती और न ही यह सब होता। आदमी कभी-कभी एक-दूसरे की देखा-देखी में अपना ही नुकसान कर बैठता है। जिसकी उसने कल्पना तक नहीं की होती।ÓÓ गौरी के शब्दों में निर्मला के प्रति सहानुभूति थी।
    ''गौरी, तुम सच कह रही हो। निर्मला को शायद अब यह अहसास हो गया होगा कि लॉटरी कई बार ऐसे भी निकलती है जो कभी-कभी पूरे घर को बरबाद भी कर देती है।ÓÓ चंपा ने भी गौरी की बात का समर्थन किया।