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Friday 24 Nov 2017

बांग्ला कहानी :हमारी बातें

रामनाथ राय अनु. दिलीप कुमार शर्मा
 हेजलवुड स्कूल, साढ़ा नेवजी टोला, पोस्ट-तेलपा, छपरा सारण-841302 ; बिहार
मो. 9471678183
मेरी पत्नी खाना बनाती है, मैं ऑफिस जाता हूं। छुट्टी के दिन हम घर में ही रहते हैं, कभी-कभी हम कहीं घूमने भी जाते हैं। किसी दिन हम चिडिय़ाघर जाते हैं, तो किसी दिन गंगा किनारे जा कर हम घंटों बैठे रहते हैं। हम आइसक्रीम खाते हैं, मंूगफली खाते हैं। झालमुड़ी खाते हंै। एक दिन मैं झालमुड़ी खाते-खाते पत्नी से कहता हूं- मैं तुम्हें एक दिन एक चीज खिलाऊंगा।
    क्या?
    मैं तुम्हें चाउमिंग खिलाऊंगा।
    वह क्या है?
    चीन देश का भोजन।
    बहुत महंगा मिलता है क्या?
    नहीं, उतना महंगा नहीं मिलता।
    आप खाए हैं क्या?
    नहीं।
    इस तरह बातें करते रात हो जाती है। हम ट्राम से घर लौट आते हैं। घर आ कर भी हम लोगों की बातचीत अधूरा रह जाती है।
मैं कहता हूँ-आज हम लोगों का बहुत घूमना हुआ है।    हाँ, घूमना तो हुआ है मगर मेरा पैर दर्द करने लगा है।
    पहले क्यों नहीं कही। कहती तो।
    कहती तो आप गुस्सा जाते।
    यह कैसी बात हुई! भला मैं क्यों गुस्सा करता?
    उसके बाद हम लोग भोजन करते हैं, फिर सो जाते हैं। दूसरे दिन हम उठते हैं। मैं चाउमिंग खिलाने की बातें भूल जाता हूं। पत्नी भोजन बनती है, मैं भोजन करने के बाद अपने ऑफिस चला जाता हूँ।
    हम लोग अक्सर सिनेमा देखने जाते हैं। एक साथ ही बैठते हैं। इंटरवल के समय हम चनाचूड़ खाते हैं। हम लोग बहुत आहिस्ता-आहिस्ता बातें करते हैं। हम लोगों की बातें किसी को सुनाई नहीं देती है। सिनेमा देखने के बाद हम लोग एक रेस्त्रां में आ जाते हैं। मैं चाय पीते-पीते पत्नी से कहता हूँ-मुझे सिनेमा अच्छा नहीं लगा।
    क्यों?
    बेकार की कहानी है।
    आजकल का सिनेमा ऐसा ही होता है।
    नहीं, ऐसा नहीं होता है।
    नहीं, होता है।
    मैं इस विषय पर और तर्क नहीं करता हूँ। कुछ देर के बाद मैं फिर अपनी पत्नी से कहता हूँ- एक दिन मैं तुम्हें एक अंग्रेजी सिनेमा दिखाऊँगा।
    मुझे अँग्रेजी सिनेमा समझ में नहीं आयेगा।
    मैं तुम्हें बाद में समझा दूँगा।
    उसके बाद हम घर लौट के आ जाते हैं। भोजन करने के बाद हम सो जाते हैं। अगले दिन हम सो कर उठते हैं। मैं अँग्रेजी सिनेमा दिखाने के बारे में भूल जाता हूँ। पत्नी खाना बनाती है, मैं भोजन करने के बाद ऑफिस चला जाता हूँ।
    एक दिन ऑफिस से घर आने पर पत्नी कहती है-चाचा जी हमारे घर आए थे।
क्यों?
उनकी बेटी की शादी है।
कब शादी है?
इसी सोमवार को।
हम सोमवार को शाम से ही सजना शुरू कर देते हैं। हम अपने चेहरे को साबुन से रगड़-रगड़ कर खूब साफ करते हैं। अपने चेहरे पर स्नो और पावडर लगाते हैं। पत्नी कानों में झुमका पहनती है। बनारसी साड़ी पहनती है। मैं तांत का धोती पहनता हूं। गरद का पंजाबी पहनता हूं। पॉलिश से चकमक करता हुआ जूता पहन कर घर से बाहर निकल जाता हूँ। उपहार देने के लिए एक किताब खरीदता हूँ। उसके बाद हम एक टैक्सी पकड़ कर शादी घर चले जाते हैं। मैं उपहार देता हूं। उपहार देने के बाद हम एक साथ नहीं रहते हैं। मेरी पत्नी महिलाओं के गोल में चली जाती है। मैं पुरुषों के गोल में चला जाता हूं। कुछ देर के बाद हमें भोजन के लिए बुलाया जाता है। हम एक साथ खाने बैठ जाते हैं। भोजन करने के बाद हम पान चबाते-चबाते शादी घर से बाहर निकल आते हैं। फिर हम एक टैक्सी पकड़ कर अपने घर लौट आते हैं। बिस्तर पर सोये-सोये मैं अपनी पत्नी से कहता हूँ- शादी घर में भोजन अच्छा ही था।
माँस तो थोड़ा लग गया था।
मगर मुझे तो समझ में नहीं आया।
छेछड़ा मगर बहुत अच्छा बना था।
कालिया भी अच्छा ही बना था। पता नहीं किसने बनाया था?
किसने क्या? हलुआई ने बनाया होगा।
यह सुन कर मैं चुप हो जाता हूँ। कुछ देर के बाद पत्नी फिर कहती है- मेरा बनारसी साड़ी क्या अच्छा नहीं लग रहा था?
क्यों, क्या हुआ?
कुछ औरतें कह रही थी।
सच कह रही हो?
हाँ, बाबा मैं सच कह रही हूँ।
ठीक है। इस बार मैं तुम्हारे लिए इससे महँगा एक बनारसी ला दूँगा।
इस बातचीत के बाद हम लोग सो जाते हैं। अगले दिन हम सो कर उठते हैं। मैं पत्नी के लिए महंगी बनारसी साड़ी खरीद लाने की बात भूल जाता हूँ। पत्नी खाना बनाती है, मैं भोजन करने के बाद अपने ऑफिस चला जाता हूँ।
अक्सर ही हम दोनों की इच्छा कहीं दूर घूमने जाने की होती है। हमारा मन समुद्र किनारे पैदल चलने का होता है। एक साथ पहाड़ पर चढऩे की बहुत इच्छा होती है। एक दिन मैं रास्ता चलते-चलते अपनी पत्नी से कहता हूँ- इस बार मैं तुम्हें पूजा की छुट्टी में कश्मीर ले कर चलूँगा।
कश्मीर तो बहुत दूर है।
तो क्या हुआ?
वहां जाने में बहुत पैसा लगेगा। इतना पैसा कहाँ से आएगा?
यह तुम्हें सोचने की जरूत नहीं है।
पत्नी कुछ नहीं कहती है। इतना सुनने के बाद चुप रह जाती है। कुछ देर चुप रहने के बाद इतना ही  कहती है- क्लॉक खरीदूंगी।
मैं एक कश्मीरी शाल खरीदूंगा।
फिर हम पैदल चलते-चलते थक जाते हैं। हम लोगों को अब आगे चलना अच्छा नहीं लगता हैं। बातचीत करना भी अब अच्छा नहीं लग रहा हैं। हम घर लौट आते हैं। भोजन करने के बाद हम सो जाते हैं। अगले दिन हम सो कर उठते हैं। मैं कश्मीर जाने की बात भूल जाता हूँ। पत्नी खाना बनाती हैं, मैं भोजन करने के बाद अपने ऑफिस चला जाता हूँ।     
अक्सर मुझे अपनी पत्नी के लिए एक फ्लैट खरीदने की इच्छा होती है। अखबार में मैं जब कभी किसी फ्लैट का विज्ञापन देखता हूं तो पत्नी को भी देखता हूं। पत्नी फ्लैट का विज्ञापन देखकर हंस पड़ती है। पत्नी को हंसता देख कर मैं पूछता हूँ- तुम हंस क्यों रही हो?
फ्लैट कितने का मिलेगा आप जानते हैं क्या?
कितने का?
लाखों का।
तो क्या हुआ? मैं लोन ले लूँगा।
लोन पूरा कैसे होगा?
तुम्हें चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है। लोन ठीक पूरा हो जाएगा।
यह सुन पत्नी मेरे तरफ चकित हो कर ऐसे देखने लगती है मानो कुछ कहना भूल गई हो। कुछ देर के बाद मैं फिर कहता हूँ- मैं तुम्हारे लिए एक चीज खरीद कर दूंगा।
क्या?
एक कार।
कार खरीद कर क्या होगा?
हम सैर करेंगे। उस में बैठ कर भरपूर हवा खाएँगे।
यह सुन कर पत्नी हंसने लगती है। मैं भी पत्नी के साथ हंसने लगता हूँ। हंसते-हंसते मुझे अचानक दर्द होने लगता है। छाती में अचानक जोर-जोर से दर्द होने के कारण मेरी हंसी रुक जाती है। पत्नी के साथ बातचीत करना मुझे और नहीं सूझता है। कुछ देर बाद स्वाभाविक होकर मैं पत्नी से कहता हूँ -मैं तुम्हारे लिए एक फ्रिज खरीदूँगा।
नहीं, फ्रिज की कोई जरूरत नहीं है।
एक रेकार्डर खरीद दूँगा।
नहीं, टेप रेकार्डर की कोई जरूरत नहीं है।
टीवी खरीद दूँगा।
नहीं, टीवी की कोई जरूरत नहीं है।
क्यों?
हम लोग क्या अमीर आदमी हैं?
आजकल हर साधरण आदमी यह सब कुछ अपने घर में रखने लगा है।
मगर हम लोग तो एकदम ही साधारण आदमी हैं।
नहीं, हम साधारण आदमी नहीं हैं।
पत्नी मेरा उत्तर सुन कर चुप हो जाती है। मैं उसे समझाने लगता हूं कि फ्रिज रखने से क्या-क्या फायदे हैं। समझाने लगता हूं कि टेप रेकार्डर किस काम में आता है। समझाने लगता हूं कि टीवी रहने से क्या होता है। समझाने लगता हूं कि इन सभी चीजों का हमारे जीवन में क्या-क्या फायदा  है। यह सब समझाते हुए मैं एकदम चौंक जाता हूं जब देखता हूं कि पत्नी कहीं और देख रही है। उसका ध्यान कहीं और है। वह मेरी बातें नहीं सुन रही है। अब मैं चुप रह जाता हूं। फिर हम लोग भोजन करने के बाद सो जाते हैं। दूसरे दिन सुबह उठते हैं। मैं फ्लैट और कार खरीदने की बातें भूल जाता हूं। फ्रिज, टेप रेकार्डर और टीवी के बारे में मुझे कुछ याद नहीं आ रहा है कि मैंने क्या कहा था। पत्नी खाना बनाती है, मैं भोजन करने के बाद अपने ऑफिस चला जाता हूँ।     
बिस्तर पर सोए-सोए एक रात मैं अपनी पत्नी से कहता हूँ -तुम्हारा भाग्य खराब है।
वह कैसे?
अगर तुम्हारा भाग्य अच्छा होता तो मेरे साथ तुम्हारी शादी नहीं होती।
मुझे तुम्हारे साथ रहते हुए किसी चीज की कमी नहीं है।
यह सब झूठी बातें हैं।
नहीं। विश्वास कीजिए मैं सच कह रही हूँ।
मैं कैसे विश्वास करूँ, मैं तुम्हें चाउमिंग खिला न सका। तुम्हें अंग्रेजी सिनेमा दिखा न सका। तुम्हारे पास महँगा बनारसी साड़ी नहीं है। तुम कभी कश्मीर गई नहीं। हमारा कोई फ्लैट नहीं है। अपना कोई कार नहीं है। फ्रिज नहीं है। टेप रेकार्डर नहीं है। अपने घर में कोई टीवी नहीं है।
नहीं है तो क्या हुआ? नहीं रहे।
तुम्हें इसके लिए दुख नहीं होता है?
नहीं।
तुम खुश हो?
हाँ मैं बहुत खुश हूँ।
पत्नी का यह उत्तर सुन कर मुझे अच्छा नहीं लगता है। मैं जानता हूँ मेरी पत्नी सही कह रही है। मेरी पत्नी कभी मुझसे झूठ नहीं कहती है। वह मुझसे कभी झूठ नहीं कह सकती है। फिर भी मुझे कष्ट क्यों हो रहा है? मैं समझ नहीं पा रहा हूं। मैं चुपचाप सोए रहता हूँ। मुझे नींद नहीं आ रही है। पत्नी सो जाती है। कमरे में नीले रंग का बल्ब जल रहा है। नीले रंग के प्रकाश में पत्नी का चेहरा बदला हुआ लग रहा है। मेरी पत्नी मुझे दूसरी तरह की लग रही है। उसके कपाल पर उग आयी सिकुडऩ मुझे दिखाई नहीं दे रही है। उसकी आंखों के आसपास का कालापन मुझे दिखाई नहीं दे रहा है। मैं पत्नी के चेहरे को देखता रहता हूं, आहिस्ता-आहिस्ता पता नहीं मुझे कब नींद आ जाती है। दूसरे दिन फिर सुबह सो कर उठता हूँ। सब बातें भूल जाता हूँ। पत्नी खाना बनाती है, मैं भोजन करने के बाद अपने ऑफिस चला जाता हूँ।     
देखते-देखते हम बूढ़े हो जाते हैं। हमारा बाल एक-एक कर के पकने लगता है। एक दिन छुट्टी के दिन मेरी पत्नी मेरे सिर से पके हुए बाल को उखाड़ते हुए कहती है- अब तुम बूढ़े हो गए हो!
मैं क्या अकेला बूढ़ा हुआ हूँ?
हां। मैं तो अभी बूढ़ी नहीं हुई हूँ।    
दिखाऊं?
हां, दिखाए।
मैं बहुत मेहनत के बाद अपनी पत्नी के सिर से एक पका हुआ बाल निकल पाता हूं। पत्नी को दिखाता हूं। पत्नी अपने सिर का पका हुआ बाल देख कर चौंक जाती है और कहती है-हाँ आप सही कह रहे हैं, मैं भी अब बूढ़ी हो गई हंू। यह कैसे हो गया?
जैसे हर इंसान बूढ़ा होता है।
वैसे हम भी बूढ़े हो गए हैं।
हां, वैसे ही हम भी बूढ़े हो गए हैं।
हमारी शादी को कितना वर्ष हो गया?
लगभग बीस वर्ष तो हो ही गया होगा।
धत! इतना वर्ष अभी नहीं हुआ होगा!
धत क्या, मैं सच कह रहा हूं अपनी शादी का बीस वर्ष हो गया है।
इतना दिन हो गया!
हाँ, इतना दिन हो गया!
यह सुन कार पत्नी चुप हो जाती है। कुछ देर के बाद मैं ही पत्नी से कहता हूँ- तुम्हारे लिए हैयरडाई खरीद कर ला दूँगा।
पत्नी कोई उत्तर नहीं देती है। मुझे भी अब आगे कहने की कोई बात नहीं सूझती है। मुझको लगता है मैं अपनी बातें खो बैठा हूं। आहिस्ता-आहिस्ता शाम होने के बाद अंधेरा हो जाता है। फिर रात हो जाती है। हम लोग भोजन करने के बाद सो जाते हैं। दूसरे दिन फिर सुबह सो कर उठते है। मैं हेयरडाई की बातें भूल जाता हूँ। पत्नी खाना बनाती है, मैं भोजन करने के बाद अपने ऑफिस चला जाता हूँ।
इस तरह ही हम लोगों का दिन व्यतीत होने लगता है। महीना बीतने लगता है। वर्ष बीतने लगता है। हमारा बाल और पकने लगता है। अब हम चिडिय़ाघर नहीं जाते हैं। गंगा किनारे जा कर वहाँ बैठते नहीं हैं। अब हम रह-रह कर एक-एक दिन दक्षिणेश्वर के काली मंदिर जाते हैं। मंदिर जा कर काली माँ की पूजा करते हैं। एक दिन मैं अपनी पत्नी से कहता हूँ- जानती हो रामकृष्ण परमहंस देव क्या कहते हैं?
नहीं जानती।
रामकृष्ण देव का कहना है, कर्म कितने दिनों का है? जितना दिन उससे लाभ नहीं लिया जा सके। उससे अगर लाभ मिल जाए तो कर्म चला जाता है।
मगर हम लोगों का कर्म तो हमेशा के लिए है।
कैसे?
रामकृष्ण देव क्या कहते थे जानते हैं?
क्या?
भूखे पेट भजन नहीं होता है।
पत्नी की यह बात सुन कर मैं हंस पड़ता हूँ। पत्नी भी मेरे साथ हंसने लगती है। हंसते-हंसते हम सो जाते हंै। दूसरे दिन हम सुबह सो कर उठते हैं। मैं रामकृष्ण परमहंस देव की बातें भूल जाता हूँ। पत्नी खाना बनाती है, मैं भोजन करने के बाद अपने ऑफिस चला जाता हूँ।