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Tuesday 21 Nov 2017

चार दोस्त

मेेराज अहमद
हिन्दी विभाग,
ए. एम. यू. अलीगढ़
जल्लू को मैंने जब अन्तिम बार देखा तो उनका कुल भार चालीस किलो से अधिक न रहा होगा। चलते देखा तो बस यही लगा कि, हवा का एक झोंका आयेगा वह उससे टकराएंगे तो भहरा कर गिर जायेंगे। उनकी शक्ल और शरीर को देखकर उनकी आयु का अनुमान लगाना आसान नहीं था। वह तो मैं उनको बचपन से ही जानता हूं, इसलिए यह बताना आसान है कि उनकी आयु पचास-बावन की है। बाहर से दिखने वाले शरीर के किसी भी हिस्से पर मांस का नामोनिशान तक नहीं था। अस्थियाँ और नसें त्वचा से निकल भागने को तत्पर दिखीं। बचपन में जल्लू गदबदे शरीर के थे। कुछ एक शैतान बच्चे उनको मोटका कहते थे। खेलकूद में वह हमेशा ही हम सब साथियों से चार कदम आगे रहते थे।
उनका घराना अपनी बिरादरी के खाते-पीते घरानों में गिना जाता था। बिनकारी का काम था। टान्डा से धागा खरीदकर आता और घर में करघा पर बिनकर तैयार माल खलीलाबाद की कपड़ही में बिकने जाता था। घर की औरतें, बच्चे, जवान, बूढ़े सभी के सहयोग से धागा कपड़ा में तब्दील होता। जल्लू के दादा बेसहना भी थे। खुद उनके घर चार करघा चलते बाकी गाँव के छोटे बुनकरों का माल भी खलीलाबाद की कपड़ही तक वही बेचने ले जाते। बस! खर्चा-खोराकी ही दूसरे बुनकरों के जिम्मे होती। उसी के लिए भले घट-बढ़ कर लें, बाकी वह व्योपार नहीं करते थे। हफ्ते का बाजार करके लौटते तो उनका एक छोटा झोला कम्पट, खट्टी-मीठी संतरे की गोलियों, गट्टा-बताशा, रेवड़ी, मोमफली और दाना-लइया से भरा होता। जल्लू घर में अपनी पीढ़ी की पहिलौठी की औलाद थे। इसलिए सबसे पहला और सबसे अधिक पर उनका अधिकार होता था। हम जैसे दस-पाँच बीघे की जोत वाले किसानों के बच्चों की तो बात ही दीगर थी, मेरे साथ मेरी कक्षा में पढऩे वाले गाँव के चार आना के जमींदार चौधरी दिलावर खाँ का पोता अल्लन, मुखिया चौधरी रहीम खाँ के साहेबजादे हलीम भी जल्लू के बाबा के बाजार से वापसी की प्रतीक्षा करते। जल्लू हमेशा ही अपने कुरते की बगली जेब से उनके लिए कुछ-न-कुछ जरूर निकालते। मुझे तो बस चूरा-चुरकुन मिलता।
जल्लू, अल्लन और हलीम की दोस्ती के बीच मैं तो बस इसलिए शामिल था कि हमारी कक्षा एक थी और मकतब से लेकर जूनियर हाईस्कूल तक स्कूल भी एक था। साथ का आना-जाना था इसलिए मैं भी उनके साथ ही रहता था। जल्लू सातवीं कक्षा में लुढ़क गये फिर पढ़ाई छोड़ दी। घर में किसी ने उन पर कोई दबाव भी नहीं डाला। परिवार के दूसरे बच्चों में तो अधिकांश ने स्कूल का मुँह ही नहीं देखा, बस खाते-खेलते बड़े हो रहे थे। उनके बाबा का मानना था कि बझना तो रूई-सूत में ही है तो सात-आठ से क्या फर्क पडऩे वाला है? बुनाई-तनाई में हुनर की जरूरत होती है, तालीम की नहीं। घूम-खा लें।
आठवीं पास करके मैं आगे की पढ़ाई के लिए अपनी ननिहाल चला गया। अल्लन वहीं इलाके के इंटर कालेज में पढ़ाई करते किसी तरह घिसट-घिसट कर हाईस्कूल तक पहुँचे। तीन-चार बार परीक्षाएँ दीं। पास नहीं हुए, परिवार की खेती सँभाल ली। आधुनिक तकनीक के प्रयोग से काफी आगे बढ़ गये। हलीम ने अपने बाप के दम पर बी ए कर लिया फिर उनकी नेतागीरी को सँभालते हुए ईंट-भ_े के व्यापार में लग गये। डिप्लोमा करके काफी संघर्ष के बाद मुझे भी सरकारी महकमे में नौकरी मिल गयी। नौकरी ऐसे विभाग में थी कि देखते-ही-देखते मेरे बुरे दिन हवा हो गये। छोटी होने के बावजूद मेरी नौकरी में आमदनी अच्छी थी। मैंने राजधानी के शहर में घर भी बनवा लिया।
 जल्लू के बाबा के मरते ही उनके घर में बंटवारा हो गया। उसी समय कारोबार भी ढीला होने लगा। असल में करघे पर सूती चारखाने वाले गमछे बुने जाते थे। पास के दो छोटे कस्बों में पावरलूम की बाढ़-सी आ गयी। कुछ एक पावरलूम पहले भी थे, लेकिन पारम्परिक लुंगी और स्टिबल की पीली चादरों की बुनाई होती थी। इधर असली धागे महंगे होने लगे, उधर उसकी जगह पर बिनकारी के लिए प्रसिद्ध बड़े कस्बे टान्डा में सस्ते किस्म के कृत्रिम धागे से बने कपड़ों बुने जाने लगे। वह सस्ते और टिकाऊ थे इसलिए उन कपड़ों ने बाजार पर कब्जा कर लिया। देखते ही देखते करघे बन्द होने लगे। गाँव के बुनकर एक-एक करके पास के छोटे-बड़े कस्बों में जाकर पावरलूम पर कारीगरी करने लगे। जल्लू के बाप को पारिवारिक परम्परा में मिला करघा कुछ दिन बाद बन्द कर देना पड़ा।
गाँव में बुनकर बिरादरी के पास खेती की जमीन न के बराबर थी। बस दो-दो चार-चार बिसवा रिहाइशी जमीनें थीं। कुछ एक लोगों ने बढ़ते परिवार की जरूरत के अनुसार उस पर छान-छप्पर के घर बनवा लिए बाकी कइयों के काम बन्द होने के कारण अचानक आयी तंगहाली ने उन्हें उन जमीनों को बेचने पर विवश कर दिया। जिस इलाके में बुनकरों की जमीनें थीं वहीं एक नया मुहल्ला बसने लगा। जल्लू के अब्बा अपने भाइयों में बड़े थे, इसलिए जाहिर तो वह यही करते कि सबसे अधिक काम करते हैं, लेकिन वह काम कर नहीं पाते थे। उनको गिरस्ता से मजूरा बनना मंजूर भी नहीं था। गाँधी आश्रम से सूत लाकर खादी बुनने की कोशिश की, लेकिन कामयाब नहीं हो सके। पावरलूम पर ड्यूटी बड़ी कठिन थी। एक हफ्ते रात तो एक हफ्ते दिन की ड्यूटी। साल-छ महीने उन्होंने कोशिश की लेकिन उनसे काम सध नहीं पाया। यह वही समय था जब जल्लू की रेखें आ गयी थीं। छोटी दो बहनें थीं। फिर एक भाई। उनकी बिरादरी में इसी आयु में लड़कों के विवाह हो जाते थे। उनके पीठ की बड़ी बहन के विवाह को तो एक तरह से अकाज हो रहा था। अब्बा ने हिस्से की जमीन को बेचकर जल्लू और उनकी बहन का विवाह कर दिया।
जल्लू भी गाँव के दूसरे लोगों के साथ पड़ोस के कस्बे में जाकर बिनाई करने लगे। जल्दी-जल्दी एक बेटा और एक बेटी पैदा हुए लेकिन अधिक दिनों तक जिन्दा न रह सके। बीच में भिवंडी का भी दो सफर किया, तीसरी बार गये तो बहुत बड़ी बीमारी लेकर आये। भिवंडी में बड़े पैमाने पर पावरलूम के कारखाने चलते हैं। आस-पास के कस्बों की अपेक्षा वहाँ बिनाई अधिक थी लेकिन न तो रहने का ठीक से ठिकाना न खाने का। ऊपर से गंदगी के कारण अक्सर कारीगरों को कभी मलेरिया तो कभी टाइफाइड हो जाता। कुछ एक नौजवान जेब में रूपया होने के कारण रंडियों के फेर में पड़ जाते। उससे भी सिफलिस और सुजाक की बीमारी हो जाती। जल्लू को भी वहाँ की हवा रास नहीं आयी। बुखार लेकर आये। कुछ दिन यूं ही बीमार रहे बाद में पता चला कि टीबी हो गयी है। काम न कर पाने की वजह से जीना मुहाल हो रहा था, इलाज कहाँ से करवाते। बाप थे। किसी तरह माँग-जाँच कर लोगों से मदद ली। सरकारी अस्पताल में इलाज हुआ। काफी दवाएँ मुफ्त में मिल जातीं। वह ठीक भी हो गये। मगर डॉक्टरों ने खानगी के लिए कहा, उसके लिए पैसा चाहिए था। फिर तो उनकी तन्दुरुस्ती जो एक बार गयी तो फिर वापस नहीं लौटी। आश्चर्य की बात यह थी कि वह साल-दर-साल जिये जा रहे थे।
मेरा संबंध गाँव से नाम-मात्र ही रह गया था। आना-जाना ननिहाल में होता। मेरा छोटा भाई भी गांव छोड़कर चला गया। बहनों की तो कब की शादी हो चुकी थी। मंझला भी अब्बा के हयात रहते तक तो गांव में रहा फिर अपनी ससुराल के कस्बे में जाकर दुकान खोल ली। सब अपने-अपने में व्यस्त हो गये। हमने खेत अल्लन के हवाले कर दिया। वह नियत अनाज का दाम जोड़कर दे देता। हक तो तीनों ही भाई का बनता, लेकिन मंझला ही वहां से निकट था तो वही लेता। न उससे कभी किसी ने मांगा न ही उसने दिया। खाली घर भी जर्जर हो गया था। हम सभी भाई कभी-कभार शादी ब्याह के अवसर पर जाते भी तो कोशिश यही होती कि रात न रुकना पड़े। मैं वहीं से ननिहाल चला जाता, लेकिन वहाँ की खबर जरूर कहीं-न-कहीं से हासिल कर लेता।
अल्लन के दोनों छोटे भाई सऊदी अरब चले गये। इस समय पैसों में गांव में उसकी कोई बराबरी नहीं कर सकता है। बाकी उसके दादा के जमाने की हनक नहीं रही। हाय रुपया! हाय रुपया! नई पीढ़ी के लड़के उसे चौधरी अल्लन के बजाय सेठ कहने लगे। पास के दोनों कस्बों में उसकी कई जमीनें हो गयीं। उसके पास खेती की कमी नहीं थी, फिर भी उसने कुछ खेत भी खरीदे, लेकिन बाद में उसने खेती की जमीन खरीदना बन्द करके कस्बे में जमीन खरीदनी आरम्भ कर दी। उनको शुगर और दिल की बीमारी हो गयी, इलाज के नाम पर बस जहां-तहां दिखाते-फिरते हैं। लोग-बाग यहाँ तक कहते कि, अल्लन सेठ को रुपयों के आगे कुछ दिखता ही नहीं! उसके बड़े बेटे ने कस्बे में एक टेंट हाउस खोल लिया बाकी दो छोटे बेटे, एक बेटी और उसके और भाइयों के बच्चे पढ़ाई-लिखाई के लिए राजधानी चले गये। दोनों भाइयों की पत्नियाँ घूम-फिर कर वहीं रहने लगीं। मगर यह बात कम ही लोगों को मालूम थी कि, वहीं राजधानी के किसी बाहरी इलाके में जमीन लेकर उसके परिवार का घर भी बन गया है। तमाम धन दौलत के बावजूद उनकी कंजूसी ही इलाके में उनकी पहचान थी।
हलीम की स्थिति बीच में आर्थिक रूप से बहुत खराब हो गयी। भ_े का कारोबार बंद हो गया, तभी वह एक बार सत्ता विरोधी पार्टी की तरफ  से जिलापंचायत की सदस्यता का चुनाव लड़ गये। हार गये। उसी में घर की सारी लेई-पूँजी खत्म हो गयी। अगर परधानी न होती तो खाने के लाले पड़ जाते! बेटा अभी ठीक से जवान भी नहीं हुआ था, लेकिन उसने न जाने कहाँ से बला की दुनियादारी सीख ली। उनको किनारे करके खुद आगे आ गया। उसने सत्ता पक्ष की पार्टी का दामन थाम लिया। विधायक के साथ ठेकेदारी करने लगा। देखते-देखते ही देखते घर की हालत सुधर गयी। हलीम बेटे के बल पर परधानी का चुनाव दुबारा जीत गये। पहले की अपेक्षा गाँव के विकास की योजनाओं में सरकार की तरफ  से आने वाले पैसों की भरमार हो गयी। लड़का विधायक जी के साथ रहकर यह सीख गया कि सरकारी पैसों को कैसे वैध तरीके से हासिल किया जा सकता है।
दो साल पहले हलीम का बेटा किसी काम से राजधानी आया। पता करते हुुए मेरे घर तक आ गया। मैं घर ही था। पद तो मेरा मामूली ही है, लेकिन मेरे तामझाम को देखकर काफी प्रभावित हुआ। मेरा घर बाहर से तो मामूली ही दिखता है, लेकिन अन्दर सुख-सुविधा का कोई ऐसा साधन नहीं है जो न हो! हर कमरे में एसी और महंगे-महंगे फर्नीचर देखकर वह हैरान हो गया। इसके बाद तो महीने-पन्द्रह दिन बाद उसका फोन आ ही जाता।
हलीम के बेटे के कारनामे चाहे जैसे रहे हों, लेकिन वह गांव के गरीबों में काफी लोकप्रिय था। उनकी छोटी-छोटी हजार-दो हजार रुपयों की मदद करता रहता। यही नहीं, जाने कहां-कहां से सर्दियों में कम्बल तो कभी ईद में उनके लिए कपड़ों और यहां तक की दो-एक बार सेवइयों और चीनी तक का जुगाड़ कर दिया था। उसके दरवाजे पर दो-चार अधेड़-बुजुर्ग गरीब-गुरबा बैठे रहते। पता चला कि शाम-सुबह में तो अच्छी खासी गम्मज होती है। बीच में मैं जब एक बार दिन भर के लिए गया तो मुझे इस बात का एहसास हो गया। असल में मैं गया तो एक खानदानी चचा के यहाँ विवाह में शामिल होने लेकिन वहाँ मैं औपचारिकता पूरी करने भर को ही रुका। बाकी समय हलीम के घर ही रहा। बेटे की सक्रियता ने हलीम को असमय ही निष्क्रिय-सा कर दिया था। उसने बड़ी-बड़ी दाढ़ी रख ली थी। कुछ ही बाल काले थे बाकी सफेद हो गये थे। अल्लन से तो बस चचा के यहाँ खाने के समय ही मुलाकात हुई थी, उसे कहीं जाना था इसलिए वह रुका नहीं। जो हलीम अपने बचपन से ही नम्बर एक का काइयाँ था और चालबाज था वह अचानक मुझे बदला-बदला लगा। उसकी बातों के केन्द्र में अधिकतर धर्म और रोजा-नमाज की बातें रहीं। उसने दिन का अपना काफी समय मस्जिद में व्यतीत किया। हलीम के बेटे का व्यवहार जरूर ऐसा था मानों मैं उसके बाप के बजाय उसका साथी था। वहीं काफी दिनों बाद मेरी जल्लू से मुलाकात हुई थी। वह गाँव के दूसरे लोगों के साथ घर के बाहर बनी बैठक में एक किनारे बैठा था। पुरानी पीढ़ी के लोगों को पहचानने में तो मुझे कोई परेशानी नहीं हो रही थी, लेकिन कुछ एक अन्जान चेहरे थे उन्हीं में मैंने जल्लू को भी शामिल करते हुए रस्मी तौर पर हाथ मिलाया तो उसने उसी लहजे में मेरा नाम लिया जैसे पहले लेता था, मैं तो एकबारगी हैरान रह गया। मैं उसके हाथ को हाथ में लिए रहा, लेकिन हाथ में मुझे गरमी-सरदी किसी तरह का एहसास नहीं हो रहा था। असल में वह मुझे इस तरह देखने लगा जैसे हलीम के बेटे के दरबार में आने वाले दूसरे अजनबियों को देखता रहा होगा। हालांकि मुझे वह मुझसे पहले ही पहचान गया। मेरा मन हो रहा था कि मैं उसे यहाँ से कहीं अलग ले जाऊँ उससे बातें करूँ। मुझे लग रहा था कि उससे मैं शायद पिछले तीन-चार वर्षों से नहीं मिला, लेकिन जब स्मृति पर दबाव डाला तो पता चला कि हमको मिले मेरे अनुमान से कहीं अधिक वर्ष हो गये। उसने उसी समय मुझे बताया कि, मेरे मंझले भाई से मेरी खबर मिलती रहती है। हलीम का बेटा महफिल में मेरी जब-तब चर्चा करता रहता है।
जल्लू के यहाँ दोनों बच्चों की पैदाइश के काफी दिनों तक कोई सन्तान नहीं पैदा हुई, लेकिन बाद में फिर से बच्चे पैदा होने लगे। पांच बच्चे और पैदा हुए। दो बेटे और तीन बेटी। बड़ा बेटा दो बेटियों से छोटा और एक बेटी से बड़ा है। वह अभी इतना बड़ा नहीं हुआ है कि काम पर लगाया जा सके। उससे बड़ी दो बेटियां हैं। उसे भिवंडी गये एक लम्बा अरसा हो गया। हालांकि अभी भी वहां जाना चाहता था। उसे लगता था कि तन्दुरुस्ती जैसे ही ठीक हुई उसे जाना ही होगा। यह बात मेरे मन में उसी समय आयी कि अब इस उम्र में तन्दुरुस्ती सही होगी? उनकी बातों को अनसुना करते हुए वहां मौजूद गांव के दूसरे लोग मुझसे मेरे परिवार और छोटे भाई के परिवार के संबंध में बातें करने लगे। मैं सबको नजरअन्दाज करके जल्लू से बात भी तो नहीं कर सकता था। मैं उन लोगों से मिलकर हलीम के बेटे की घर वाली बैठक में आया। असल में मैं थक गया था।
हलीम भी जोहर की नमाज से निवृत्त होकर आ गये थे। मेरा मन हुआ कि जल्लू को यही बुलवा लिया जाय। कहा भी, लेकिन पता चला कि वह चला गया। हलीम ने बताया कि, इस समय गाँव मेें अगर गरीबों की सूची बनाई जाय तो जल्लू उसमें सबसे नीचे आयेंगे। अगर गरीबी रेखा से नीचे के लोगों के लिए सरकारी योजना के तहत लालकार्ड से लगभग मुफ्त में मिलने वाला अनाज न होता तो उसके बच्चों का पेट न भरता। ऊपर से बेटियां वैसे ही रहना-पहनना चाहती हैं जैसे हम लोगों के घरानों की बहन-बेटियाँ रहती-पहनती हैं। जल्लू की इस दशा पर उन्होंने बजाय अफसोस व्यक्त करने के हिकारत भरे स्वर में यह भी बताया कि, उसकी बेटियों का चरित्र ठीक नहीं हैं। जितना जल्दी हो सके शादी-ब्याह करके जल्लू को सिर से आफत दूर कर देनी चाहिए।
शहर में मेरे घर आने के बाद हलीम के बेटे फोन का जो सिलसिला आरम्भ हुआ था वह बरकरार ही नहीं रहा, बल्कि बढ़ता ही गया। जिस विभाग से उसकी ठेकेदारी का संबंध था मैं भी उसी में था, वहाँ उसके जनपद मुख्यालय में मेरे दो-तीन जानने वाले थे। इस बात का पता चलते ही उसने अपने दो-एक अटके हुए कामों के लिए कहा। मेरे कहने पर वह काम हो भी गये। फिर तो उसकी निकटता मुझसे और बढ़ गयी। हफ्ता-दस दिन और कभी-कभी उससे पहले भी फोन आने लगा। मैं अपने गांव से लगभग कट-सा गया था, लेकिन उसने मुझे फिर जोड़ दिया। अल्लन का फोन नम्बर भी उसी से मिला। उससे भी बात होने लगी। उसे मैं ही फोन करता। वह हमेशा जल्दी में होता। अपनी तरक्की की दो एक बातें बताकर वह मुझे टाल ही देता। इसके बावजूद उससे बातें करके मैं ना जाने क्यों फिर से खुद को तरोताजा महसूस करने लगा था। इधर कुछ दिन पहले शायद उसने अपना नम्बर बदल दिया था। मैं समझता था कि वह मुझे टालता है, फिर भी मुझे उससे बात करने की तलब-सी होती। हलीम से तो कभी-कभी, लेकिन उसके बेटे से बातें होती ही रहतीं।
समाज के अधिकांश साधारण लोगों की तरह मैं भी स्वयं को आदर्शवादी सांस्कारिकता के कारण असाधारण समझता हूं। यह प्रवृत्ति समय-समय पर बाहर आने को बेचैन रहती है। एक दिन मैंने उसी बेचैनी से संचालित होकर हलीम के बेटे से बातों ही बातों में गांव के दो-एक वास्तविक जरूरतमंदों की मदद की पेशकश कर दी। असल में देश-दुनिया में होने वाली तमाम तरक्की के बावजूद अभी भी हमारे जैसे गाँवों में लोगों की दयनीय स्थिति के कारण ठीक से दोनों समय भोजन न मिलने की बात चल निकली थी। उसने जो किस्से बताये मुझे विश्वास ही नहीं हो रहा था। उसका कहना था कि पावरलूम पर बिनाई करने वाले गाँव के भूमिहीन मुसलमान कारीगरों में अधिकांश के परिवार का पेट भले आधा-तीहा भर जाय पर इच्छित भोजन शायद ही मिलता हो। मटर की दाल और राशन से मिला सड़े-गले चावल का भात, दो नम्बर के गेहूं की रोटी और तरकारी के नाम पर आलू और कोंहड़ा-लौकी के अलावा अगर कभी-कभार अच्छा खाते हैं तो बूढ़ी भैंस का गोश्त। वरना हमा-सुमा में होने वाली शादी ब्याहों की दावतों में ही अच्छा खाना नसीब होता है। भले सब उजला कुरता पहनते हों! जल्लू के खानदान का हाल तो ऐसा है कि बस रोटी और तन सभी किसी तरह से ढंकते हैं। फिर उसने बताया कि जल्लू की बेटियों की शादी का तो अकाज हो रहा है। उसकी बिरादरी में कम ही लड़कियाँ इस उम्र तक बिनब्याही रह जाती हैं। उसने यह भी कहा कि यह उनके लिए ही नहीं, बल्कि गाँव वालों के लिए भी ठीक नहीं! मैं उसका मलतब समझ गया।
मेरेे मन में आया कि मदद का पहला हकदार तो वही है। तभी मुझे अल्लन और हलीम का ध्यान आया। जल्लू खाने-पीने से लेकर खेलकूद तक में इन दोनों का कितना ध्यान रखता था। मुझे तो वह बस यूं ही किसी लग्गू-भग्गू की तरह समझता था। उन लोगों को आगे आना चाहिए था। हलीम तो अल्लामा हो गया हैं! हर समय इस्लाम औैर मजहब की बात करता है! इस्लाम का तो यह भी एक अहम फरीज़ा (कर्तव्य) है। धन-दौलत में पड़ोसी और संबंधियों का पहला हक है। मित्र तो सबसे निकट होते हैं। मुझे याद आया कि जब मैंने उस दिन जल्लू के सिलसिले में बात करनी चाही तो उसने उस पर कोई तवज्जो ही नहीं दी थी। मानो उसकी दुनिया में उसका कोई वजूद ही न हो। बात भी की तो घुमा-फिरा कर उसकी बेटियों की बदचलनी तक ही सीमित रही।
जिस दिन किसी की मदद के सिलसिले में मेरी हलीम के बेटे से बात हुई उसके तीसरे ही दिन जल्लू का फोन आ गया। उन्होंने बड़े सपाट स्वर में बेटी के विवाह में मदद की मांग की। मुझे अजीब सी उत्तेजना महसूस हुई। भले ही जल्लू को मैंने बड़ी ही खस्ता हालत में देखा, लेकिन मेरे मन में उसकी वही छवि प्रभावी थी जो हमारी किशोरावस्था में थी। मैं उसके फोन के बाद रोमांचित सा था। उसी दिन नहीं, बल्कि फौरन ही हलीम के बेटे को फोन लगाया। वह मिला नहीं, इत्तेफाक से उसकी पत्नी ने फोन उठाया। मेरे नाम बताने पर उसने मुझे पहचान लिया और बताया कि वह तो बाहर हैं अगर मैं कहँू तो अब्बा यानी कि हलीम से बात करवा दे। मैं भला कैसे मना करता? मुझे पता था कि वह मेरी बातों को हवा में उड़ा देगा। मेरी आशा के अनुसार ही उसने मेरी उत्तेजना को हवा में उड़ाते हुए कहा कि, मुझे इन लोगों के चक्कर में नहीं पडऩा चाहिए। इनकी बिरादरी के अधिकांश लोग सफेदपोशी का दिखावा करने वाले बड़े ही शातिर दिमाग हैं। निहायत कामचोर और नाकारा लोगों की किसी तरह की मदद ठीक नहीं। अगर मैंने किसी एक की मदद कर दी तो हर हफ्ते ऐसे ही फोन न आये तो कोई आश्चर्य की बात नहीं! उसने यह भी कहा कि, उसका बेटा इन लोगों का और शह देता है। वह शायद उसे भला-बुरा भी कहना चाहता था, लेकिन कहा नहीं पर उसने बड़ी ही तल्ख बात कही। एक तरफ  तो इनको मदद चाहिए! खाने के लाले हैं। इनके बच्चों को देखो! फोन चाहिए। बेटियाँ नम्बर एक की आवारा हैं। एक-से-एक कपड़े चाहिए। फैशन में तो उनकी कोई होड़ ही नहीं कर सकता है! उन्होंने बताया कि उनके यहाँ मोबाइल चार्ज करने दिन में दो-एक बार तो आ ही जाती हैं, लेकिन कितना भी जरूरी हो क्या मजाल किसी काम में हाथ बँटा दें। बेटे की ही चाल पर अपनी बहू को बताते हुए उन्होंने यह भी कहा कि, यह इन्हीं दोनों की शह है कि घर बाहर दोनों जगहों पर हर समय जमघट लगा रहता है। उन्होंने अफसोस जताते हुए यह भी कहा कि अगर उनकी चलती तो ऐसे लोगों को अपनी चौखट पर कदम तक न रखने देते। उन्होंने अपने समय को याद करते हुए कहा कि तब भी चुनाव में यही लोग साथ रहते थे, लेकिन इतना सिर नहीं चढ़े थे। असल में जहाँ तक मुझे याद है जब वह एक चुनाव हारे थे तो उसमें जल्लू के अब्बा नेे विरोध कर दिया था इसीलिए हमेशा से ही उनका साथ देने वाली उनकी बिरादरी के काफी वोट उन्हें नहीं मिले थे।
हलीम की उलजुलूल बातें सुनकर मैंने निर्णय किया कि सच्चाई का पता क्यों न अल्लन से लगाया जाया। हलीम से उसका नम्बर मांगा तो हलीम ने पहले तो मेरी बातों को कोई भाव नहीं दिया, जैसे मैंने यूं राह चलते कोई बात कर दी हो, लेकिन जब मैंने अपनी बात पर बल दिया तो उन्होंने बताया कि अल्लन हमेशा तो अपना नम्बर ही बदलते रहते हैं। आसानी से नम्बर किसी को देते भी नहीं! हलीम का ख्याल था कि जहाँ उनके लाभ की बात न हो वहाँ से वह किसी तरह का मतलब नहीं रखते है। अब तो मिलना-जुलना भी कभी-कभार ही किसी-किसी नमाज के समय ही होता है। वह तभी नमाज पढऩे आते हैं जब फुरसत हो! हाँ बेटे से जरूर छनती है, क्योंकि परधानी के नाते आये दिन काम पड़ता रहता है। उन्होंने यह जरूर बताया कि उनका बेटा नम्बर दे सकता है।
मैंने हलीम के बेटे से नम्बर लेकर अल्लन को फोन किया। मैं उसे भी फोन करते समय उत्तेजित था। मुझे नम्बर बदलने के बाद दुबारा नम्बर न देने को लेकर शिकायत भी करनी थी, लेकिन मेरी उत्तेजना के विपरीत उसने बड़े ही ठंडेपन से मेरे सलाम का जवाब देते हुए फौरन ही पूछा कि मैंने उसे किस काम से याद किया है? मेरी सारी उत्तेजना जाती रही। एक बार तो मन में आया कि फोन काट दूँ, चूँकि मैंने तो राय-मशवरे के लिए फोन किया था, इसलिए अपने ऊपर जज़्ब किया। असल में यह मेरी गलती थी कि मैंने उसे किसी बात राय-मशवरे के लिए फोन किया, क्योंकि वह जब भी मिला रूखा व्यवहार किया! लेकिन जब फोन कर ही दिया था तो मैंने सोचा कि उससे बात कर ही लूं। उसकी प्रतिक्रिया तो हलीम से भी एक कदम आगे की थी। उसकी राय थी कि मैं भूलकर भी ऐसा न करूँ। इन लोगों की तुम्हारे जैसे दरियादिल लोगों की वजह से ही तो मुफ्तखोरी की आदत-सी पड़ गयी है। उसका कहना था कि, काफी पहले जब हथकरघा बंद हो गया था तभी एकाध बार उसने इन लोगों से कहा कि तुम्हारी औरतें बेकार हो गयी हैं क्यों नहीं गाँव में कटिया वगैरह का काम कर लेतीं हैं। बवाल खड़ा कर दिया था लोगों ने। भाई मैंने तो काम के लिए कहा था, इज्जत बेचने की बात नहीं की थी! इन लोगों का ऊपर वाला ही समझ सकता है!
मदद की बात पर तो वह एक तरह से भड़क ही गया। देखा तो नहीं लेकिन गांव में किसी का किसी से नहींछुपता। उसका कहना था इसकी दोनों बेटियां अपना मोबाइल रखती हैं। उनका कपड़ा हमारे घराने की लड़कियों से बढ़कर रहता है। साग खोंटने के बहाने सिवान के चारों तरफ  का कोई गांव ऐसा नहीं जिसे यह अपने कदमों से नापती न हों। बरजने पर इनके बाप लोग कहते हैं कि, जब अपने गांव के चौधरी जमींदार हमें खेत की मेंड़ पर पैर नहीं रखने देते हैं तो साग-पात के लिए आन गांव में तो जाना ही होगा। किसी के पास एक बिसवा जमीन नहीं है, लेकिन लेंहड़ाभर बकरियां सबके घरों में हैं। उसकी इस बात पर मैंने जब यह कह दिया कि यह तो अच्छी बात है। कम-से-कम उनकी बदौलत इनका थोड़ा-बहुत घर का खरचा तो जाता होगा, तब वह और भड़क गया, लेकिन बकरियाँ चरती तो हमारी ही जमीनों में हैं! कहने लगा, खरचा नहीं उससे वह अपना फैशन करती हैं। अन्त में उसने कहा कि, पैसा अगर काट रहा है तो किसी मदरसे में दे दो! जमातें आती रहती हैं। भेज दो मैं उनका खाना-पानी कर दिया करूँगा। तालीमी और दीनी दोनों काम हो जायेंगे।
मेरे दिमाग में तभी यह आया कि उनकी अभी तो यही उम्र है। आखिर कब अपने शौक-सिंगार पूरे करेंगी! बाप गरीब है या गरीब परिवार में पैदा हो गयीं इनमें इनका क्या दोष है? मन पर भला किसका पहरा लगता है। तभी मुझे यह भी याद आया था कि जल्लू मुझे खाने पीने की बची-खुची चीज अल्लन और हलीम के बाद ही देता। मुझे बहुत बुरा लगता। मैं उस समय हर बार यही तै करता कि बस अब बस! इस तरह अगर कुछ भी देगा तो मैं साफ  मना कर दूँगा। लेकिन उस अवसर मैं अपना पिछला निर्णय भूल जाता। जल्लू के साथ-साथ इन दोनों की भी ठकुरसोहाती करने लगता। बिना अपने भावों को प्रकट किये मैंने मदद के सिलसिले में उसकी तमाम नसीहतों को दरकिनार करके यह पूछा कि कितनी रकम दी जाय तो वह फिर भड़क गया। इन सब की कामचोरी में हमी जैसे लोगों की शह होती है! आक्रोश कम होने के बाद उसने राय दी कि पैसे अगर इफरात हों तो कहीं किसी जमीन में बझा दूँ, मेरे न सही बच्चों के काम आयेगी। बेटी के लिए जेवर भी बनवाये जा सकते हैं। उसने यह भी राय दी कि अगर करना ही है तो कि मस्जिद के लिए कुछ कर दो। अब गाँव की मस्जिद छोटी पड़ रही है। इन्हीं बुनकरों की जमीन पर बसी नई आबादी मस्जिद से दूर भी काफी है। वहाँ एक जमीन है। मस्जिद के नाम पर वह सस्ती भी मिल सकती है। मस्जिद बन गयी तो ठीक नहीं तो बाद में कुछ-न-कुछ देकर ही जायेगी! उसने एक राज की बात यह भी बताई कि वह जमीन, जिसे खरीदने की बात कर रहा है, अब तक वह ले भी चुका होता, लेकिन वह जल्लू के खानदान की ही है। दो भाइयों के बीच लफड़े और इसी जलुआ के नाते नहीं मिल पाई। उसका साफ  इशारा था कि उस जमीन को अगर वह मस्जिद के नाम पर लेने की कोशिश करेगा तो मिलना नामुमकिन है, लेकिन मुझे आसानी से मिल जायेगी। उसने साफ तौर पर कहा कि मस्जिद बनी तो ठीक नहीं तो वह मुझे मुनाफा देकर ही जायेगी। इस बात की जिम्मेदारी उसी की होगी।
अल्लन की यह बातें सुनकर मैं अवाक रह गया, लेकिन यह भी नहीं समझ में आया कि मुझे क्या करना चाहिए। मेरी सेवानिवृत्ति में अब मुश्किल से आठ-नौ साल बाकी हैं। नमाज मैं बस जुमे के दिन ही अदा करता हूँ। मेरे कई पुराने साथियों ने बालों का रंगना तक छोड़ दिया तो पता चला कि उनके अधिकांश बाल सफेद हो चुके हैं। राजधानी के शहर वाले घर में एक दिन पड़ोस के गाँव सेे हमारी हमजोली के एक सज्जन आये। वह जनपद मुख्यालय में सरकारी स्कूल में लिपिक थे। वहीं घर बनवा कर सपरिवार रहने लगे थे। वह हमारे साथियों में से ही थे। बच्चों में से किसी ने मुझसे आकर कहा कि, आप के गाँव से कोई बाबा आये हैं। उनकी लगभग सनसफेद-सी भर कल्ले की दाढ़ी थी, जबकि वह उम्र में मुझसे साल-छ: महीने छोटे ही रहे होंगे! सज्जन नमाज की पाबन्दी की बड़ी हिदायतें देकर गये। मेरे ठाट-बाट को देखकर हज कर लेने और दाढ़ी बढ़ा लेने की बात भी कही। उनका कहना था कि यह फजऱ् अगर जिस्म में ताकत रहते ही पूरा कर लिया जाय तभी मजा आता है। बाधा यह थी कि मेरे ऊपर अभी बच्चों की जिम्मेदारियां थीं। छोटी बेटी अभी छोटी ही कक्षा में थी। बीच का बेटा एक महंगे प्राइवेट कॉलेज से बी.टेक के अन्तिम वर्ष में था। बड़ी बेटी एम. ए. के अन्तिम वर्ष की छात्रा थी। वह साधारण कद-काठी की साधरण शक्ल-सूरत की थी। पत्नी का कहना था कि,  बस एम. ए. करते ही हमें इसके विवाह की चिन्ता करनी आरम्भ कर देनी चाहिए! हालांकि वह पढऩे में कुशाग्र थी। आगे पढ़ाई जारी रखना चाहती थी। उसकी इच्छा उच्च शिक्षा के क्षेत्र में अपना भविष्य बनाने की थी। पहले तो हमारे धर्म वाले समाज में दहेज का दानव कम सक्रिय था, लेकिन अब तो दूसरे धर्म वाले समाज और हमारे धर्म वाले समाज में यह अन्तर मिटता ही जा रहा है। मैं अच्छी कमाई वाली नौकरी में था, इसलिए मुझसे लोगों की अधिक की आशा स्वाभाविक थी। मेरी पत्नी स्वयं जब बेटी की शादी की अपनी योजना बताने लगती तो मेरा दिमाग घूम जाता। मैं इतना धनवान नहीं था कि उसकी योजनाओं को सरलता से पूरा कर सकता। मुझे लगता कि अभी भी देर नहीं हुई है। मुझे संजीदगी से उसकी योजना को कार्यान्वित करने के लिए दूसरे विकल्पों पर भी विचार करना चाहिए।
जल्लू का फोन दुबारा पन्द्रह दिन बाद आया फिर हफ्ते-के-हफ्ते आने लगा। इधर तीन दिन बाद ही आ गया। एक बार जिस दिन जल्लू का फोन आया उसी दिन हलीम के बेटे का फोन आया कि चचा गांव के दो-एक लोग और हैं जो बेहद गरीब हैं, उनके यहां भी लड़कियों की शादियां हैं। आप का फोन नम्बर मांग रहे हैं। उस समय मेरी समझ में नहीं आया कि उससे क्या कहूं। मैंने कहने को कह तो दिया कि दो-एक दिन में बताऊंगा, लेकिन मैं बहुत उलझन में हूं। मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि, मैं उससे क्या कहूं और जल्लू की मदद के संबंध में मुझे क्या फैसला करना चाहिए।