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Saturday 18 Nov 2017

किस मुंह से

के.पी. सक्सेना 'दूसरे'
सामुदायिक भवन मार्ग
टाटीबंध, रायपुर
(छ.ग) 492099
मो. 09584025175
बात उन दिनों की है जब मोबाइल तो क्या, घर में एक टेलीफोन का होना भी स्टेटस सिंबल माना जाता था। तब दूसरे शहर या गांव में बात करने के लिए लोग टेलीफोन एक्सचेंज नहीं ऑपरेटर की मेहरबानी अथवा उस रसूखदार के मोहताज होते थे, जिनके यहां टेलीफोन हुआ करता था। मैं अपने गांव से साढ़े सात सौ किलोमीटर दूर शहर में नौकरी करता था। दो कमरों का एक सरकारी क्वार्टर था जिसमें पत्नी और दो बच्चों को ठीकठाक स्कूल में पढ़ाता हुआ अपनी पत्नी की  फरमाइश भी यदा-कदा पूरी कर सकने की सामथ्र्य जुटा ली थी।
गांव में पिता जी, बड़े भाई-भाभी, उनके बच्चे और मुझसे छोटा एक जवान भाई रहते थे। वे सब गांव की खेती पर ही आश्रित थे। पिता जी की उम्र हो गई थी और वे अक्सर बीमार रहते थे। पिछले वर्ष पक्षाघात के बाद जब उनका खाट से 24 घंटे का नाता जुड़ गया तो गृहस्थी और खेती का सारा भार बड़े भइया पर आन पड़ा क्योंकि छोटा, जब ग्रेजुएट होने के बाद कई वर्ष नौकरी की तलाश में चप्पलें चटका चुका, तो हताश होकर गांव के उन्हीं निठल्लों की सोहबत में बैठने लगा, जिन्हें कॉलेज जाते समय वह स्वयं बड़ी हिकारत से देखता था। धीरे-धीरे उसने ऐसे ही चंद शोहदों की एक टोली बना ली और सिर्फ आवारागर्दी करने लगा। घर के सदस्यों की बढ़ती संख्या और आमदनी के सीमित साधन के कारण गांव के अन्य आम किसानों की तरह यह परिवार भी विपन्नता की ओर अग्रसर हो चला था। नहर वाला खेत पिछले वर्ष बिक गया था और अब उतनी ही जमीन शेष थी जिससे सालभर खाने के लिए अनाज व बीज ऊपरवाले की मेहरबानी से ही मिल पाता था। यह सब समाचार मुझे गांव से आई चिट्ठियों से ही ज्ञात हो पाते थे, क्योंकि मुझे गांव छोड़े दस वर्ष से अधिक हो गया था और वहां आना-जाना यदा-कदा ही हो पाता था।
गांव न जाने के कई कारण थे। मसलन दूरी, समय, छुट्टी, खर्च और विपरीत परिस्थितियों से बचे रहने की सुविधा। हालांकि जब बड़े भइया का पत्र आता था तो उस दिन मन बहुत बोझिल हो जाता था, किन्तु वह सब भी बस श्मसान वैराग्य जैसे ही, कुछ समय बाद तीन तेरह के चक्कर में जाने कहां काफूर हो जाता था। भाभी के पत्र अक्सर पत्नी के नाम आते थे। उसमें गांव का सारा पुराण रहता था। घर की बातों में बाबूजी का गिरता स्वास्थ्य, दवा-दारू का खर्च, उधार का बीज, चार-आना फसल, बैल का मरना, भतीजी का बांस की तरह बढऩा,  भइया के पांव की चोट का ठीक न होना, छोटे की घर के कामकाज से बेरुखी और अंत में समापन इस बात पर कि कुछ दिनों के लिए बाबूजी को अपने पास शहर में रखकर इलाज कराओ, हमारा हाथ बड़ा तंग है, के अलावा कोई नई बात नहीं होती थी।
मैं इन बातों को ज्यादा तवज्जो नहीं देता था। जानता था कि मेरी पत्नी सीधी-सादी भावुक किस्म की औरत है। उसे यह सब बातें लिखकर इमोशनली ब्लैकमेल किया जा रहा है। भाभी को ईष्र्या थी कि हम लोग शहर में मौज कर रहे हैं और उनका परिवार गांव में खट रहा है। पिता की सेवा-सुश्रुषा हमें भी समान रूप से करनी चाहिए जो हम नहीं कर रहे हैं।  भाभी अपनी चाल में सफल हो जाती थी क्योंकि अक्सर मेरी पत्नी चुपचाप उन्हें मनीआर्डर कर दिया करती थी।
जब यह बात मुझे भइया के पत्र के माध्यम से पता चली तो मुझे पत्नी की नादानी पर तरस आया। क्रोध करने से  बात बिगड़ती अत: मैंने उसे दुनियादारी का सबक देने की कोशिश की। मैंने कहा- ''देखो, गांव के खेत-मकान में हम सबका हिस्सा है। मैं वहां की आय का एक पैसा नहीं लेता और यहां अपनी कमाई से अपनी गृहस्थी चला रहा हूं तो भइया का भी फर्ज बनता है कि वे बाबूजी की दवा-दारू का खर्च उठाएं और जैसे मैं अपना परिवार चला रहा हूं वे अपना चलाएं। खेत में इतना अन्न तो हो ही जाता है कि वे भूखों नहीं मरेंगे, और वहां खर्च ही क्या है? यहां, शहर में रोज कोई न कोई खर्च बढ़ जाता है- यह तो तुम देख ही रही हो। तुम इस फिजूलखर्ची में मत पड़ो।ÓÓ
पत्नी को मेरी  बात कितनी पल्ले पड़ी यह तो मुझे नहीं मालूम- हां, उसके बाद रुपए भेजने का जिक्र कभी भइया के पत्र से नहीं मिला और भाभी के खत तो मैं शुरू से ही नहीं पढ़ता था। उन्हें मैं सीधा पत्नी को थमा देता था। एक तो गिचपिचरी हैंडराइटिंग और दूसरे काम की एक बात खोजने में कई पृष्ठों को खंगालना, बडा जीवट काम था। ऐसे ही एक शाम जब ऑफिस से घर पहुंचा तो पत्नी ने रूआंसी सूरत बना रखी थी। कारण पूछने पर उसने धीरे से पल्लू में बंधा कागज मुझे पकड़ाया और अंदर भाग गई।
यह एक टेलीग्राम था। उन दिनों टेलीग्राम का आना लगभग 'शोक संदेशÓ का आना, माना जाता था। घर की औरतें तो बिना पढ़े-सुने ही रोना पीटना शुरू कर देती थीं। खैर! मैंने तार पढ़ा। लिखा था ''बाबूजी का आखिरी समय लगता है। सूरत देखना हो तो शीघ्र आओ भाइया।ÓÓ मैं तार पढ़कर वहीं कुर्सी पर बैठ गया। थोड़ी देर बाद पत्नी चाय और पानी का गिलास लेकर आई। मैं समझ गया कि इस बीच वह कई बार मुंह धो चुकी है। मुझे संजीदा देखकर वह भी भावुक हो उठी, फिर धीरे से बोली- ''चलिए, दो दिन के लिए हो आते हैं क्या पता...Ó
''तुम वहां जाकर क्या करोगी? बच्चों का क्या होगा। मैं ही हो आता हूं। भइया का क्या... हो सकता है बुलाने के लिए यूं ही लिखवा दिया हो।ÓÓ मैं उसकी बात काटकर एकदम से चीखा।
झिड़की सुनकर पत्नी तो अंदर चली गई किन्तु मैं सोचने लगा कि इस बार कोई बहाना करना उचित होगा कि नहीं। कहीं कोई ऊंच-नीच हो गई तो! भइया तो यह कहकर बच लेंगे कि मैंने तो समय से तार भेज दिया था।
मैंने घड़ी देखी- ठीक 1 घंटे बाद मेल है जो सुबह 9 बजे कटनी पहुंचा देगी और वहां से बस पकड़कर 12 बजे तक गांव पहुंच जाऊंगा। ज्यादा सामान का बखेड़ा न कर मैंने पत्नी को ब्रीफ केस में दो जोड़ी कपड़े डालने को कह दिया। घर से निकलते समय पत्नी ने एक पैकेट थमाते हुए कहा ''ये पांच हजार रुपए हैं। भइया को खर्च के लिए दे देना और अगर लाने की स्थिति हो तो बाबूजी को ले आना। किसी अच्छे डॉक्टर को दिखाएंगे। कुछ दिन आप भी अपने पास रखकर उनकी सेवा करेंगे तो लोगों को कहने को भी नहीं रहेगा।ÓÓ
ट्रेन में बैठते समय मैं मन-ही-मन पत्नी के भोलेपन पर हंस रहा था। वो भाभी की चाल को नहीं समझ रही थी। भइया, माना कि खेत में काफी परिश्रम करते हैं और भाभी गृहस्थी संभालती है, पर ये तो सभी करते हैं। इसमें हमसे किस बात की ईष्र्या? अब ये ससुरा 'छोटाÓ जरूर आवारा हो गया है। 'काम का न काज का, ढाई मन अनाज का।Ó इस बार इसकी खबर लेनी पड़ेगी। अरे, नौकरी नहीं लगी तो क्या! भइया के साथ खेत में हाथ नहीं बंटा सकता! कोई छोटी-मोटी दुकान नहीं कर सकता! कुछ नहीं तो ट्यूशन ही कर सकता है। आजकल उसी में लोग न जाने कितनी कमाई कर रहे हैं। पर उसे तो हरामखोरी का चस्का लग गया है। सुना है आजकल छोकरों के साथ रंगदारी वसूलने लगा है। एक बार तो तहसीलदार को ही घेर लिया था... देखता हूं... इस बार कुछ तो करना ही पड़ेगा। सोचते-सोचते नींद आ गई।
घर के दरवाजे पर घड़ी देखी तो ठीक साढ़े बारह बजे थे। दरवाजा उढ़का हुआ था। धीरे से धक्का देकर अंदर गया तो देखा कि चारों ओर अजीब सी शांति है बस थप-थप की एक हल्की सी आवाज आ रही थी। जब उस तरफ बढ़ा तो देखा कि आंगन के एक कोने में भाभी कंडे थाप रही हैं।
''राम-राम भौजी! कैसी हो?ÓÓ अचानक आई आवाज से भौजी चौंकी। उन्होंने आवाज की ओर निहारा और आश्वस्त होकर बाल्टी में हाथ धोए, पल्लू से पोंछा और रसोईघर की ओर बढ़ गई।
मैंने बरामदे में पड़े तखत से ब्रीफकेस टिका कर अंदर की टोह लेनी चाही तभी भाभी एक तश्तरी में गुड़ की डली और लोटे में पानी लिए सामने आ खड़ी हुई। गौर से उन्हें देखा तो लगा कि भौजी शब्द अब मात्र संबोधन में रोमांचित करने लायक रह गया है। चेहरे में समय से पूर्व आ पड़ी झुर्रियों और बालों में चढ़ आई चांदी ने उन्हें बहुत पहले प्रौढ़ बना दिया है। उनकी आंखों में घिर आई नमी मुझे साफ दिखाई दे रही थी। मैंने झुककर पैर छुए और पूछा- ''भइया कहां है?ÓÓ
''भइया त रोज भुनसारे से खेत चले जात हैं अब संझा से पहिले थोरे अइहैं।ÓÓ
''और बाबूजी!ÓÓ
''ऊँ! आपन कोठरी छोड़ के कहां जइहैं! चला देखा कईसन हाल है।ÓÓ
मैं भाभी के पीछे हो लिया। कोठरी का दरवाजा खुलते ही टट्टी-पेशाब का मिला-जुला भभका बाहर की ओर निकला। मेरा हाथ तुरंत पैंट की जेब में गया किन्तु कुछ ख्याल आया और रूमाल निकालते निकालते झिझक गया।
मैं पैर छूने ही जा रहा था कि भाभी ने इशारे से मना कर दिया और अचानक मुझे भी याद आ गया। मां ने एक बार समझाया था कि लेटे हुए जीवित इंसान के पैर नहीं छुए जाते।
''बाबूजी, पैर छूता हूं।ÓÓ मैंने आवाज दी।
उनके शरीर में कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई। तब भाभी ने कान के पास झुककर जोर से कहा- ''मंझले आए हैं।ÓÓ
इस बार चेहरे पर हल्की सी झुरझुरी आई और यूं लगा कि वे शरीर की सारी शक्ति लगाकर आंख खोलने का प्रयास कर रहे हैं किन्तु असफल ही रहे। यह मुझे तब और पक्का हो गया जब बंद पलक की कोर से आंसू की एक बूंद रिसती दिखी। भाभी मुझे वहीं छोड़कर चली गई थी। मैं आसपास कोई और बैठने की जगह न पाकर उनके पैताने, खाट के पाये से टिककर बैठ गया।
और जब मैंने गौर से उनकी पूरी काया को निहारा तो लगा कि बस जो कुछ है चेहरे में ही बचा है जिसे देखकर लगता है कि इस ढांचे में अभी जीवन का कुछ अंश शेष है। बिना संवाद के आखिर कोई कितनी देर वहां बैठा रह सकता था जहां हवा और रौशनी के नाम पर केवल एक छोटा-सा झरोखा हो और वह भी ऐसा जो जानवरों के कोठे की ओर खुला हो। मैं धीरे से उठकर बरामदे में आ गया। भाभी शायद मेरी टोह में थीं। रसोई से बोली- ''अंगने में पानी धरा है। हाथ मुंह धोय के आये जा टठिया परसी है।ÓÓ
''और भइया... छोटू! मैंने उत्सुकता के साथ पूछा।ÓÓ
''उनकर कउनौ ठिकाना है! आय जइहीं तो खाय लेहीं।ÓÓ
मुझे  भी जोर की भूख लग आई थी अत: भाभी की बात मानकर भोजन किया और बरामदे में पड़े तखत पर लेट गया।
नींद खुली तो भइया आ चुके थे। मैंने उठकर पैर छुए तो उन्होंने गले से लगा लिया। अब तक कहीं से खबर पाकर छोटू भी आ गया था। कई साल बाद उसे देखा- अच्छा खासा गबरू जवान हो गया था। भाभी सबके लिए चाय बनाकर ले आई और स्वयं भी एक पीढ़ा डालकर वहीं बैठ गई। चाय का स्वाद और कपों की हालत देखकर मुझे समझ में आ गया कि इनका उपयोग विशेष अवसरों पर ही होता है।
चंद औपचारिक बातों के बाद बरामदे में मौन पसर गया। यूं लगा कि हर व्यक्ति कहना तो बहुत कुछ चाहता है पर शुरूआत नहीं कर पा रहा है। आखिर भइया ने मौन तोड़ा- ''देख मंझले, हमसे जितनी सेवा टहल हो सकती थी हमने की। अब यहां के तो बैद-डॉक्टर जवाब दे चुके हैं। इसीलिए तुमको तार भेजा था कि तुम भी अपनी तसल्ली कर लो। सरपंच कह रहे थे कि शहर में किसी बड़े डॉक्टर को दिखाने से हो सकता है हालत में कुछ सुधार आए।ÓÓ
''शहर का इलाज कउनौ मजाक है का ! 4-5 हजार से कम थोड़़ी न लगी। हिंया अनाज के कुठला ठांय-ठांय करत है, नोट कहां से पउबै?ÓÓ भाभी ने यह कहते हुए मुंह भले ही भइया की ओर कर रखा किन्तु इशारा किस ओर था, सब समझ रहे थे।
''रुपया दो तो हम कलई बाबूजी को शहर ले जावें। प्रायवेट में दिखाओ तो जांच भी ठीक हो और दवा दारू भी। अभी बाबूजी की उमर भी इतनी नई भई कि...ÓÓ छोटू ने इतना कहते-कहते अपनी आंखें पोंछना शुरू कर दिया था।
मैं जानता था कि इससे कुछ फायदा नहीं होने वाला। अन्य रोग बिस्तर में पड़े-पड़े बढ़ गए और वे अब जाने से रहे। इस उम्र में पक्षाघात भला ठीक होता है! अब ये लोग मिलकर मुझसे पैसे हथियाने के चक्कर में हैं लेकिन मैं इस तरह पैसा पानी में फेंकने से रहा। चूंकि बॉल मेरी कोर्ट में फेंकी जा चुकी थी, मैंने उसे सुरक्षात्मक ढंग से खेलना उचित समझा, अत: बोला- ''मुझे तो कल शाम ये टेलीग्राम मिला और मैं तुरंत ट्रेन में बैठ गया। रुपये पैसे का इंतजाम इतनी जल्दी संभव ही नहीं था। ऐसा ही भागा-भागा देखने चला आया।ÓÓ
यह सुनकर तीनों के चेहरे बुझ गया। छोटा ''आता हूंÓÓ कहकर अंदर चला गया। भौजी फिर उपले थापने लगीं और भइया उसी तखत पर ऊंघने लगे, जहां मैं सोया था।
सभा बगैर किसी निर्णय के समाप्त हो गई। वहां का वातावरण अचानक दमघोंटू लगने लगा। मैंने कमरे में जाकर लेटने की सोची। खूंटी में कोट टांगकर ज्यों ही जमीन में बिछी चटाई में लेटने को हुआ तो देखा छोटू दीवाल से पीठ टिकाए एकटक मेरी ओर देखे जा रहा है। मैंने लेटने का इरादा बदल दिया और बाबूजी के कमरे की ओर बढ़ा। तभी दोपहर वाली गंध की याद आ गई और मेरे कदम अनायास बाहर की ओर निकल पड़े।
गांव की गलियों में जहां बहुत से नए चेहरे दिखे वहीं कुछ पुराने भी। दुआ-सलाम के बाद प्राय: हर परिचित चेहरा यही सलाह देता कि अब आए हो तो जरा पुत्रधर्म भी निभा लो। कुछ दिन बाप की सेवा कर लो और घर की जुम्मेवारी भी उठाओ। छोटे को रास्ते से लगाओ वगैरह-वगैरह। सुन-सुनकर कोफ्त होने लगी। छुट्टियां तो शेष थीं पर लगा कि इस माहौल में अब और न रह पाऊंगा।
घर लौटा तो भौजी ने खाना लगा दिया पर बोलीं कुछ भी नहीं। मैंने भइया को आवाज दी। वे तखत में लेटे-लेटे  बोले- ''तुम खा लो, मेरा पेट कुछ गड़बड़ है।ÓÓ
छोटू अपनी कोठरी से निकला और मुझे अनदेखा कर बाबूजी की कोठरी में घुस गया। भाभी ने बताया कि वह जब भी घर आता है बस बाबूजी की कोठरी में घुसा रहता है। मैं समझ गया कि सब को रुपए का लालच था जो न मिलने से नाराज हो गए हैं। बोझिल वातावरण को थोड़ा हल्का करने की गरज से मैंने सबको सुनाते हुए कहा- ''भइया, मैं आया तो था यही सोचकर कि कुछ दिन रहकर बाबूजी की सेवा और आपकी मदद करूंगा, लेकिन यहां की परिस्थिति देखकर मुझे लगता है कि रुपयों का इंतजाम ज्यादा जरूरी है अत: मैं कल की ट्रेन से वापस जाकर वहां से कुछ व्यवस्था बनाता हूं।ÓÓ
बिना किसी उत्साह के भइया ने ''जैसा ठीक समझोÓÓ कहकर करवट  बदल ली।
सुबह अभी आंख ठीक से खुली भी न थी कि छोटे की आवाज सुनाई दी- ''भइया, मैं बाबूजी को शहर ले जा रहा हूं, इलाज के लिए।ÓÓ
''अरे! अकेले इस तरह कैसे ले जाएगा।ÓÓ भइया अंदर से चिल्लाए।
''अकेले नहीं भइया। बिरजू, रमेसरा और नब्बन भी है।ÓÓ
''और रुपया! उसका इंतजाम है?ÓÓ उन्हें तसल्ली नहीं हो रही थी।
''कुछ होइगा है, कुछ कर लेब। अब ट्रैक्टर का जुगाड़ होइगा है तो मौका न छोड़ै चाही।ÓÓ छोटे ने तसल्ली दी।
इस सारे वार्तालाप के बीच मैं जानबूझकर कुछ न बोला था। मुझे लग रहा था कि टारगेट मैं ही हूं। छोटू का क्या! रात को कोई सपड़ाई में आ गया होगा। अब घर में हलचल बढ़ गई थी। मैं समझ गया कि भइया ने हामी भर दी है। मैं उठकर आंगन में आया। हम तीनों ने बाबूजी को उठाया और ट्रॉली में बिछे गद्दे में लेटा दिया। छोटू के दोस्त वहां मौजूद थे।
मैंने छोटू से पूछा- ''मैं भी साथ चलूं?ÓÓ
''आप नाहक हलाकान होंगे। करना तो सब डॉक्टर को ही है- और मदद के लिए ये सब हैं ना।ÓÓ छोटू ने दोस्तों की ओर मुझसे कहीं अधिक भरोसे से देखते हुए, मेरा धर्मसंकट दूर कर दिया। भाभी ने आकर रास्ते के लिए छोटू को खाने की पोटली पकड़ाई और फफककर रो पड़ीं।
जब मुझे लगा कि अब ये लोग मुझ पर कोई अस्त्र नहीं चलाएंगे और ट्रैक्टर स्टार्ट होने लगा तो मैंने रिश्ते की फर्ज अदायगी करते हुए छोटू से कहा- ''छोटू तू कुछ रुपए रख ले मैं अंदर से लाता हूं।ÓÓ इस पर छोटू ने मेरा हाथ पकड़ लिया और बोला- ''भइया आप फिकर न करें। सब हो जाएगा और फिर आपने बताया तो था कि जल्दी-जल्दी में आप कुछ इंतजाम कर भी नहीं पाए।ÓÓ
भले ही उसने यह बात सहज भाव से कही हो लेकिन मुझे ताने सी लगी और मैं नजरें फेरकर भइया भाभी की ओर देखने लगा जो सिर्फ जाते हुए ट्रैक्टर की उड़ती धूल देखते खड़े थे।
मेरी ट्रेन 11 बजे दिन की थी। गांव से स्टेशन दूर था। चलते समय मैं बाबूजी के कमरे में पैर छूने के लिए गया तो अचानक खाली बिस्तर देखकर चौंक गया। फिर सुबह की घटना याद आते ही मन ही में एक हूक सी उठी। कमरे से बाहर निकाला तो दरवाजे पर दो जोड़ी उदास आंखें उसी तरह मुझे ताक रही थी जैसे सुबह ट्रैक्टर को। मुझे मेरा मन कचोटने लगा। मैंने तय किया कि पांच हजार भइया के हाथ में रख दूं। मेरा हाथ कोट के भीतर वाली जेब में पहुंचने को ही था कि ख्याल आया कि ऐसा अब कैसे कर सकता हूं। कल ही तो रुपए नहीं ला पाने की बात कही थी। मैं फौरन बिना भइया-भाभी से नजर मिलाए और पैर छूकर सीधा स्टेशन को ओर तेजी से चल पड़ा।
जाड़े की कुनमुनी धूप थी। रास्ते के दोनों ओर खेतों में हरियाली पसरी पड़ी थी। पेड़ों से छन-छन कर आती सूर्य की किरणें और ठंडी हवा के झोंके, भारी मन को धीरे-धीरे आल्हादित करने लगे थे। ऐस में एक सिगरेट पीने की तलब हुई। जब से गांव आया मौका ही नहीं लगा। कल शाम बाहर निकला था तो कोट घर में ही टांग आया था। और सुबह से भइया सामने थे। हालांकि उन्हें पता था लेकिन लिहाज भी कोई चीज होती है! ऐसे आनंददायक माहौल में सिगरेट पीने का मजा ही और होगा यह सोचकर ज्यों ही कोट की जेब में हाथ डाला तो एकदम डंक सा लगा। जेब में सिगरेट का पैकेट तो था लेकिन नोट के पैकेट गायब था। मुझे अच्छी तरह याद था कि उसे सिगरेट के पैकेट के साथ ही रखा था और गांव पहुंचने के पहले जब सिगरेट पी थी तब भी वो पैकेट जेब में थी। फिर रुपए कहां गायब हो गए। कोट तो मैंने भीतर की कोठरी में टांगा था जहां छोटू बैठा था।
मैं तुरंत पलटा। निश्चित ही यह छोटू की कारस्तानी है। तभी बड़ी अकड़ से कह रहा था- ''रुपयों का इंतजाम हो गया है और मुझे टांट मार रहा था कि तुम तो लाए ही नहीं, तुम कहां से दोगे!ÓÓ अभी भइया के पास जाकर उसकी पितृभक्ति की पोल खोलता हूं। चोर कहीं का।
लेकिन तभी मेरे पैर एकदम से जकड़ गए। भइया से मैं ''किस मुंह सेÓÓ कहूंगा कि छोटू ने मेरे रुपए निकाले हैं! मैं बोझिल कदमों से स्टेशन की ओर बढऩे लगा। अब मुझे दूसरी चिंता खाए जा रही कि पत्नी से भी यह सब ''किस मुंह सेÓÓ कहूंगा।