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Tuesday 21 Nov 2017

मेघ की व्यंजना

नवल जायसवाल
प्रेमन, बी-201,
सर्वधर्म, कोलार रोड
भोपाल-462042,
फोन- 0755-2493840
वर्षा के विषय में वर्तमान समय में नई-नई मान्यताएं सामने आ रही हैं, क्यों न हो पानी की समस्या ने वर्षा के आदर्श मापदंडों को बदल डाला है।  पानी और जल विभिन्न धातुओं से रचे गए एक ही अर्थ के दो पर्याय हैं। इन दोनों शब्दों ने अपने-अपने अस्तित्व को सदैव बनाए रखा है। ये ही अस्तित्व कवियों के लिए उपयोगी हैं। यह बात अलग है कि दोनों शब्दों ने अपने-अपने आचरण को समय-समय पर विभिन्न प्रकार से उपयोग में लाने की सुविधा दी है। जल का जीवन से निकटतम और अभिन्न संबंध होते हुए भी कवि ने अपनी अभिव्यक्ति के लिए उसे मेघ के नाम से संबोधित करना उचित समझा। मेघ भी भारत में ऋतुओं का अभिन्न सदस्य है, भले ही इसकी उपस्थिति सम्पूर्ण वर्ष में कुछ ही माह के लिए होती हो किन्तु सृष्टि के प्रत्येक अंग के लिए अनिवार्य सहयोगी बन जाता है, फिर कवि क्यों कर वंचित रहेगा। त्रेता से लेकर कलयुग तक हर कवि ने मेघ की आत्मा को पहचाना है, चाहे वाल्मिकी हों या व्यास, तुलसी हों या कालिदास, कबीर हों या कोई अन्य। कालिदास और मेघ की मित्रता खासी प्रसिद्ध है। नवल नामक कवि कालिदास के आसपास घूमने का प्रयास करेगा।
आइए! चलते हैं रामटेक की ओर जहां कालिदास अपनी प्रेम-कथा मेघों के माध्यम से कर रहे हैं। यह तो स्वीकार कर लेना चाहिए कि जब कालिदास कुछ रच रहे हों तो वह सामान्य तो होगा ही नहीं। मान्य काव्य की धारा से ओतप्रोत ही सामने आएगा। काश! हम सब उस समय अपने जीवन में होते और यह सब देख पाते। आज के कलुषित वातावरण की कल्पना तक से दूर होते और शुद्ध साहित्य के ग्रहणकर्ता होते। यह भी संभव होता कि हमारी पहुंच उन तक हो भी नहीं पाती और एक शून्य से निकलकर दूसरे शून्य में चले जाते। उनका साहित्य आज के समय में स्यात अधिक मानसिक सुख देगा क्योंकि हम उस अतीत के लालित्य से कोसों दूर आ गए  हैं।
पावस, रिमझिम, फुहार, झड़ी, बौछार, वर्षा आदि अनेक भावमय व्यंजनाएं हैं जिससे बनता है एक पटल भीगा सा, प्रकृति का, सराबोर कर देने वाला, फूलों से लदा हुआ एक बूंदों का झुरमुट जिसकी अवधि होती है केवल, सालभर में, चार माह प्रकृति ने निर्धारित कर अपनी मान्यता को सार्थक किया है, निरुपित किया है। इस अवधि में अनेक अवसर हैं जब प्रेमी और प्रेमिका एक-दूसरे से दूर चले जाते हैं, विछोह भोगते हैं और अपनी प्रेम-कथा व्यक्त करने के लिए किसी माध्यम की आवश्यकता उनके सामने आ जाती है। यह अनुभव एक समूह बन जाता है जिसे प्रतीकों, विचारों, भावों आदि के माध्यम से कवि कह जाता है। संभवत: यही कारण रहा होगा कालिदास के लिए भी जिसने अपने नायक यक्ष को अपनी प्रेमिका से अलग कर दिया। स्यात यह भी अभिलाषा रही होगी कि अपनी उज्जयिनी का वर्णन कैसे करें। इस फलित भाव को मैं काव्य कह सकता हूं।
नायिका अपना मूल भाव त्यागकर रक्षा बंधन के लिए अतिरिक्त भावाव्यक्ति के अंतर्गत मायके आती है किन्तु अपने स्वयं के नायक की छवि भूल नहीं पाती है। वह चाहती है कि उसके हृदय में बसे सभी रंग अपने प्रेमी अर्थात् नायक तक पहुंच जाए। कभी दूब से कहती है। अपने शरीर पर पड़ी पानी या ओस की बूंद हाथ से झटक देती है और अनमनी सी हो जाती है। विचारों से वह कुछ नकारात्मक हो जाना उचित समझती है। कवि अपनी नायिका की पीड़ा को भी उतना ही महत्व देता है जितना अन्य विषयों को। वियोग में प्रेम और निखर जाता है. वह अचल जनों से अपने उद्बोधन पर विराम लगा देती है।  बादल घुमड़ते हैं, टकराते हैं और अपने अस्तित्व की चिंता किए बिना सागर से प्राप्त अपने धन को बूंदों में परिवर्तित कर देते हैं। बूंदें आकाश से सीधे नीचे आती हैं। उन्हें ऐसे समय में यह ज्ञात नहीं होता कि वे कहां गिरेंगी। हवा के झोंके उन्हें निर्गम स्थान से ले जाकर कहीं न कहीं गिरा ही देते हैं। बूंद कभी-कभी बहुत भाग्यशाली होती है जब वह किसी वृक्ष पर गिरती है और सरकते सरकते धरती पर आ जाती है, मानो किसी ने उसे झेल लिया हो। झेलकर अपने पास लिटा लिया हो। बूंद के साथ इसी प्रकार ऐसा अवसर तब भी आता है जब स्वाति नक्षत्र में किसी सीप में गिरने पर मोती के परिवार में प्रवेश कर जाती है। कई बार यही बूंद पहले से आए अपने साथियों से मिलती है, एक विशाल समूह बन जाता है। अब यह समूह वापस समुद्र में जाने के लिए तत्पर है, अपना कर्तव्य निभाने।
कालिदास की  बात कुछ और है, वह यक्ष जो स्वयं नायक है अपने इस मेघ से कहता है- तुम वहीं जाना, अर्थात् रामगिरी जाना जहां का शीतल जल सीताजी के स्नान से पवित्र हो गया है। यह अनुविनय इसलिए भी है कि यक्ष श्रापवश एक साल के लिए दंडित है और अपनी प्रिया से मिल नहीं सकता। समय बीतता है और यक्ष अपनी प्रेमिका के योग में दुर्बल होता जाता है जिसका परिणाम यह होता है कि एक बार यक्ष के हाथ का कंगन गिर जाता है। ऐसी स्थिति में स्पष्ट है कि उसे अपनी प्रेमिका का स्मरण सतायेगा और विवश होकर मेघों को अपना दूत बनाना पड़ेगा। पहले तो यक्ष को यह आभास होता है कि वर्षा का पहला मेघ पर्वत की चोटी को अपने सिर से मार रहा है। कवि की कल्पनाओं को केवल निराधार न माने, वे वास्तविकता के समीप होती हैं। कवि को प्रकृति के साथ ही साथ भौगोलिक व्यवस्था का भी ज्ञान होता है। इस बात को कालिदास ने विभिन्न अवसरों पर सिद्ध भी किया है। वे कहते हैं यक्ष ने मेघ से अपनी प्रिया तक संदेश पहुंचाने के लिए कुटज के फूलों से मेघों को अध्र्य दिया और प्रेमपूर्वक अपना आशय व्यक्त किया। मेघ की भौतिक संरचना धुएं, प्रकाश, जल, धूल, वायु आदि से मिलकर बनती है जिसे एक निर्जीव वस्तु माना है फिर भी यक्ष ने मेघ को जीवित मानकर संवेदनाएं पहुंचाने का प्रयास किया है क्योंकि उसका मानना है कि वह उसकी प्रिया एक का देवर है और अपनी भाभी तक संदेश पहुंचाना उसका कर्तव्य है। मेघ को अपना भाई  बनाने से पहले यक्ष ने मेघ की वंशावली का भी अध्ययन किया है। वह जानता है कि उसका मेघ इन्द्र का प्रधान दूत है। क्यों न हो, इन्द्र जल के देवता माने जाते हैं और मेघ का मुख्य दायित्व जल वृष्टि ही तो है। यक्ष को यहां तक मालूम है कि जिस मेघ को उसने अपने अंतरंग का सहभागी बनाया है वह पुष्कर आदि वंश का उत्तराधिकारी है। मेघों को स्वयं का स्वरूप बदल देने की क्षमता होती है। वे नाना प्रकार के रूप धर सकते हैं और मानव मन उसके नवगठित आकार में अपने अंदर अंकित छवि का साम्य पा लेता है। मेघ से स्तुति करने से भी वह नहीं चूकता और कहता है- ''आप गुणी  हैं अत: निराश नहीं करेंगे। यदि नीच के पास गया तो वह मेरी भावना का मान नहीं करेगा। परिणाम आप स्वयं जानते हैं। अपने परिचय में मैं इतना कह सकता हंू कि कुबेर के श्राप के कारण ही मैं अपनी प्रिया से विलग हुआ हूं। तुम्हें यक्षों के स्वामी कुबेर की निवास भूमि अलकापुरी में जाना होगा। अलकापुरी को लक्षित करने में असुविधा नहीं होगी। उद्यान में स्थित शिवजी के शिर की चंद्रिका से क्षेत्र आलोकित रहता है। प्रवासी जनों की पत्नियां लटों को उठाकर आपको देखने का प्रयत्न करेंगी। तुमसे इसलिए वार्ता करना श्रेयस्कर समझेंगी क्योंकि मैं एक व्यथित प्रेमी हूं। मेरी प्रेमिका भी विरहाकुल है।ÓÓ यक्ष ने अपने आपको नायक और अपनी पत्नी को नायिका मान लिया है। मेरे भाई मेघ! धीरे-धीरे बहने वाला पवन भी तुम्हें प्रेरणा देता रहेगा। ऐसी बातों का एक पुंज यक्ष अपने उद्गारों में संजोता है। मेघ यक्ष के वक्तव्यों के द्वारा निर्देशित होते हैं कि मेघ की गर्जना से पृथ्वी उर्वरा हो जाती है। मेघ का गर्जन सिंह के गर्जन के समान नहीं होता है। वह होता है कर्ण मधुर अत: मानसरोवर जाने वाले हंस मेघ के साथ जाने को उत्सुक हैं। इन हंसों के मुखों में कमल की डण्डियां होंगी। प्रिय मित्र! मेरे वर्तमान निवास वाले पर्वत से गले मिलकर विदा ले लो। इन पर्वत श्रृंखलाओं पर जगधन्य रामचंद्र के चरण अंकित हैं। विदाई के समय गर्म-गर्म आंसू बहाने वाले ये सब चिरविरह को व्यक्त करेंगे। पता नहीं क्यों यक्ष बादलों के समूह को राह दिखाता है। प्रश्न विचारणीय है कि क्या वे स्वयं अपने गंतव्य तक नहीं पहुंच पाते हैं। पहुंच क्यों नहीं पाते हैं, पहुंच सकते हैं किन्तु कवि की कल्पना का एक मापदंड यह भी है कि वह ग्राही हो। इसके बाद भी यक्ष कहता है कि वह जो भी कहेगा कर्णप्रिय होगा। बादलों से विनती कर वह कहता है कि यदि तुम थक जाओ तो विश्राम के बहाने अपनी क्षीणता दूर करने के लिए पर्वत शिखर के नीचे बहने वाली नदियों का पानी पी लेना। मेघों के उडऩे के अभिप्राय को कवि कालिदास यों व्यक्त करते हैं मानो वे कहना चाहते हों कि मेघ का उडऩा देखकर सिद्ध पुरुषों की स्त्रियां आश्चर्यचकित हो जाएंगी।
इस प्रकार कालिदास सम्पूर्ण वातावरण और संबोधन में आने वाले हर पात्र को अपनी अंतर्वेदना से रिझाना चाहते हैं और यह सब उनकी मनोभावना का सम्मोहित करने देना वाला आशय भी है। कालिदास अपनी रचना के शिल्प को संवारना नहीं भूलते। वे शब्दों का चयन और उसकी मर्यादा का निर्वाह स्वयं कर जाते हैं या किसी बाहरी प्रेरणा के वशीभूत होकर करते हैं इसे यदि हम जान लें तो काव्य की परिधि में प्रवेश करने का अवसर मिल सकता है। कालिदास ही क्या समस्त कवि समुदाय को निखारना है तो उसके मन को पढऩा आवश्यक है। यह वक्तव्य केवल कवि को जानने तक सीमित नहीं है बल्कि स्वयं के आचरण को संवर्धित करने का एक साधन भी है। हम जब परस्पर की बात करें तो यह केवल हमारे लिए ही अनिवार्य नहीं है, बल्कि कवि को भी सामाजिक उत्तरदायित्व से बंधना होगा। कालिदास ने इन सब आदर्शों का पालन किया है। मैं यह कह सकता हूं सच कहना उन्हें भी आता है किन्तु श्रृंगार की मिठास के साथ कहना वे सहर्ष जानते हैं। ये कुछ, बहुत ही कम कारण हैं जो थोड़ा सा आभास दे सकते हैं कि कालिदास कविता के नये मापदंड करने वाले रचयिता हैं।
 समय बीत अवश्य गया हो किन्तु स्पन्दन तो नहीं बदल सकता। आज भी हम उसी वेदना को संवार रहे हैं। भौतिक स्वरूप चाहे कितने ही बदल जाएं, हम कितने ही भौतिकतावाद समझौते कर लें वेदना और पीड़ा हमारी वही रहेंगी। हम अपनों की ओर उसी प्रकार झुकेंगे जिस प्रकार घुटना पेट की ओर ही मुड़ता है। और मनुष्य झुकता है अपनी संवेदनाओं की ओर ही। ये संवेदनाएं आगे आकर स्पन्दन बन जाती है। जब स्पन्दन सीमा पार करना चाहता है तो उसे व्यक्त करने के नाटक जैसा कुछ रच डालता है। उज्जैन के कालिदास ने अपनी समस्त रचनाओं में इसी प्रक्रिया को प्रतिपादित किया है।