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Tuesday 20 Feb 2018

कहानी विशेषांक के रूप में उत्सव अंक से पाठकों के घर-परिवार में जैसे आनंदोत्सव आ गया। सैकड़ों कहानियों में से अपने वक्त की तासीर व तस्वीर से रू-ब-रू कराने में सक्षम कहानियों का चयन करना निस्संदेह दुरूह कार्य है जिसे आपने सफलता की बुलंदी तक पहुंचा दिया है।

 

कहानी विशेषांक के रूप में उत्सव अंक से पाठकों के घर-परिवार में जैसे आनंदोत्सव आ गया। सैकड़ों कहानियों में से अपने वक्त की तासीर व तस्वीर से रू-ब-रू कराने में सक्षम कहानियों का चयन करना निस्संदेह दुरूह कार्य है जिसे आपने सफलता की बुलंदी तक पहुंचा दिया है। अंकस्थ प्राय: सभी कहानीकार समकालीन हिन्दी कथा साहित्य के शीर्षस्थ एवं सिद्धहस्त साहित्यकार हैं। मुझे विश्वास है कि अंकस्थ कहानियों को पढ़ते हुए सर्वमित्राजी के शब्दों में पाठक ध्रुपद की तान को महसूस करेंगे।
जनवरी अंक की प्रस्तावना में ललितजी द्वारा निरूपित गज़़ल विषयक बेबाक सामग्री पसंद आई। गज़़ल के साथ हिन्दी विशेषण की निरर्थकता को आपने सतर्क स्पष्ट करते हुए अलाव पत्रिका के गज़़ल विशेषांक की सकारात्मक किंतु तटस्थ समीक्षा की है। आपका यह विधान या विचार सर्वथा चिन्त्य है कि समाज में साहित्य की लोकप्रियता बढ़ाने के लिए गज़़लकारों को पत्रिकाओं के बजाए मंच सिद्ध करने पर ध्यान देना चाहिए। समीक्षाएं संतुलित एवं वस्तुनिष्ठ हैं। यश मालवीय के गीत, मुकुट सक्सेना की कविताएं और जीवन यदु की यथार्थबोधी गज़़लें प्रभावशाली हैं।
प्रो.भगवानदास जैन, अहमदाबाद