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Friday 24 Nov 2017

कैलाश वनवासी के आलेख ; कहानी का गंतव्य में विचारों की स्वतंत्रता के दुश्मनों, नव आर्थिक साम्राज्यवाद और फासिस्ट संस्कृति द्वारा किए जा रहे

नवनीत कुमार झा,
हरिहरपुर, दरभंगा 847306

कैलाश वनवासी के आलेख ; कहानी का गंतव्य  में विचारों की स्वतंत्रता के दुश्मनों, नव आर्थिक साम्राज्यवाद और फासिस्ट संस्कृति द्वारा किए जा रहे दमन, शोषण और हत्याओं के ऊपर विचार किया गया है तथा किस प्रकार से हमारी समकालीन कथा और रचनात्मकता शहर केन्द्रित हो रही है तथा निम्नवर्गीय समाज तथा आदिवासियों के श्रम, जीवन, सुख-दुख की कहानी को हाशिये की चीज बनाने की कोशिश हो रही है उस पर भी चिन्ता प्रकट किया है! आज कहानी सजावटी, बनावटी और लुभावनी हो गई है और तथाकथित बोल्डनेस के नाम पर अश्लीलता को बेहिचक परोसा जा रहा है ! अपवाद स्वरूप ही कुछ हैं जो गाँव, गंवइत के टूटे-बिखरे और दबे-कुचले लोगों पर लिख रहे हैं, क्योंकि विकृत अभिरुचि वाले लोगों को रिझाने का गुण ऐसी कथाओं में आ नही सकता! इसलिए अपच कटु यथार्थ को त्याग कर  फैशनेबल और नकली रंग-रोगन वाली कहानियों का प्रचलन बढ़ रहा है, क्योंकि बाज़ार द्वारा प्रायोजित मायालोक की मायावी तिलिस्म में लेखन भी पोपुलर कल्चर का ही एक अंग होता जा रहा है ! एक ऐसे समय में जब लेखन को बाज़ार के खिलाफ  और मजदूर, किसान के पक्ष में खुल कर सामने आने की बहुत जरूरत है हमारे हिन्दी के लेखक कलावाद के नाम पर देहवाद में लिप्त हैं और समष्टिवाद कि जगह व्यक्तिवाद जड़ें जमा रहा है और लेखक बस आत्ममुग्ध सा लिख रहा है! कैलाश वनवासी का यह आलेख निस्संदेह कहानीकारों को सुसुप्ति से जगाएगा !
   हमारा देश त्याग, तप, अहिंसा, सत्यनिष्ठा और इन्द्रिय. निग्रह को विशेष महत्व देनेवाला सुसंस्कृत और आदर्शवादी देश था, वो देश आज भोगवाद के सामने घुटने टेक रहा है ! अपने आलेख ; भोगवाद की व्यापकता में सदाशिव श्रोत्रिय ने भोगवाद के बढ़ते वर्चस्व के लिए जो पूंजीवाद और तकनीकी विकास की अहम भूमिका को रेखांकित किया है वो चिन्तनीय है ! मानवता के रक्षार्थ मनुष्य को आत्मिक उन्नति के लिए प्रेरित करता सदाशिव श्रोत्रिय का यह आलेख भीतर तक झकझोरने वाला है ! राजेन्द्र सिंह गहलोत ने हल्कू कोल की विचित्र विक्षिप्त हालत के वर्णन के बहाने से यथार्थ का मार्मिक प्रतिबिम्ब खींचा है ! इस कहानी में वर्णित कड़वी हकीकत के कड़वे घूंट से जैसे मेरे पूरे अस्तित्व में एक कड़वाहट पसरती चली गई !! खाए, पीए, अघाए सम्पन्न वर्ग की सम्पन्नता यूं ही आदिवासियों के स्वपनों, आकांक्षाओं और जीवन को अपनी जहरीली जीभ से चाटती रहेगी और हम अपने विफल लोकतंत्र के विरुदगान में लगे रहेंगे !! सुधा गोयल की कहानी में एक अकेली औरत की कहानी है, जो विधवा है पर सशक्त, समर्थ, निडर और आत्मविश्वास से लबालब !! समाज कितना निष्ठुर है कि वह अकेली औरत के लिए बहुत तरह की समस्याएं पैदा करता है, इसकी एक झलक भी मिलती है इस कहानी में ! अपने अज्ञान को जानने के लिए भी बड़े ज्ञान की जरूरत है। ज्ञान का रास्ता दिखाने वाली निर्मला डोसी की कहानी अद्भुत है