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Monday 21 May 2018

अक्षरपर्व प्राप्त होते ही सबसे पहले तमाम काम छोड़कर उपसंहार पढऩे की आदत सी बना ली है।

डा. दरवेश भारती
5451 शिव मार्केट, न्यू चंद्रावल, जवाहर नगर
दिल्ली-110007

अक्षरपर्व प्राप्त होते ही सबसे पहले तमाम काम छोड़कर उपसंहार पढऩे की आदत सी बना ली है। कारण यह है कि आप इसमें विचार और संवेदना के आधार पर खुलकर चर्चा करती हैं और इसकी प्रस्तुत इस प्रभावी ढंग से होती है कि मुझ जैसा पाठक उसकी गहराई को सहजता से समझ जाता है। आपके इस संक्षिप्त आलेख पर श्रीहर्ष की उक्ति मितं च सारं च वचो हि वाग्मिता पूर्णत: चरितार्थ होती है।  पत्रिका में प्रकाशित ललितजी की प्रस्तावना में हर बार किसी सामयिक विषय को लेकर उस पर गंभीर मंथन किया जाता है। नवंबर-दिसंबर के दोनों अंकों ने मुझ जैसे काव्य पसंद शख्स  को भी कहानी पठन की ओर प्रवृत्त कर दिया।  अक्षरपर्व के नानाविध स्तंभ आकर्षित करते ही हैं, जिन पर यदा-कदा दृष्टि डाले बगैर नहींरहा जा सकता है। संपादन के इस श्रमसाध्य कार्य के सफल निष्पादन  के लिए साधुवाद। इस कार्य पद्धति को सुचारु रूप से चलाए रखें, यही हार्दिक कामना है।