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Thursday 23 Nov 2017

रचनावार्षिकी के लिए प्रश्नावली

18वींसदी से लेकर 20वींसदी का काल मानव सभ्यता के इतिहास में बेहद खास रहा है। औद्योगिक, तकनीकी, वैज्ञानिक, आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षणिक, सामाजिक, सांस्कृतिक तमाम क्षेत्रों में विकास की अद्भुत गाथाएं इस काल में लिखी गईं। इसी कालखंड में उपनिवेशवाद का कू्ररतम रूप देखने मिला। दो-दो विश्वयुद्धों की विभीषिका से दुनिया गुजरी और व्यापक तौर पर यह समझ विकसित हुई कि विकास ही सभ्य होने की कसौटी नहीं है। दुनिया को बचाना है तो शांतिपूर्ण सहअस्तित्व की भावना को बढ़ाना होगा। संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना के अलावा अलग-अलग स्तरों पर अमन और शांति के लिए, दमित तबकों को मुख्यधारा में शामिल करने के लिए, अन्याय और शोषण को रोकने के लिए कोशिशें की गईं जो निरंतर जारी हैं। 21वींसदी के आगाज के साथ उम्मीदें बढ़ीं कि वक्त के आगे के बढऩे के साथ ही इंसान भी आगे बढ़ेगा, हर तरीके से, हर सलीके से। जो अद्भुत वैज्ञानिक प्रगति हुई है, उसे देखकर यह कहा भी जा सकता है कि सचमुच इंसान ने उन सारी कल्पनाओं को सच कर दिखाया, जिनका जिक्र पौराणिक कथाओं में होता था। लेकिन किस्से-कहानियों में जिन भयंकर जीवों, दैत्यों को बुराई का प्रतीक बनाकर पेश किया जाता था, वे भी 21वीं सदी में सच नजर आ रहे हैं। आतंकवाद ऐसी ही एक बुराई का नाम है और यह अकेले नहीं उपजी है। धर्म, धन, सत्ता, लालच इन सबके घातक घालमेल का परिणाम है आतंकवाद, जो अलग-अलग शक्लों और रूपों में हमारे सामने आ रहा है। केवल हथियारों से ही नहीं, विचारों से भी आतंक फैलाने की कोशिश देखी जा सकती है। 21वीं सदी की तैयारी में संयुक्त राष्ट्र संघ ने विकासशील देशों के लिए 2015 तक आठ लक्ष्य रखे थे, ताकि हाशिए पर पड़े समाज को भी मुख्यधारा में शामिल किया जा सके। 2015 बीत गया लेकिन ये लक्ष्य पूरे नहीं हुए, अब केवल विकासशील देश ही नहीं विकसित देशों में भी जनता का एक बड़ा वर्ग कई तरह की वंचनाओं से गुजर रहा है। एक ओर शिक्षा, रोजगार, भोजन, पानी, स्वास्थ्य का संकट, वैचारिक स्वतंत्रता पर खतरा,  दूसरी ओर आतंकवाद का भय। हमारा एक पैर 21वीं सदी में आगे बढ़ रहा है, दूसरा पैर अंधकार युग में वापस खींच रहा है। इस अंधेरे को दूर करने के लिए अब कौन से पत्थर आपस में रगडऩे होंगे कि मुक्ति की आग प्रज्ज्वलित हो। विश्व के वर्तमान परिदृश्य पर कुछ प्रश्न हमने तैयार किए हैं, जिनके जवाब हम इस आशा में पाने की उम्मीद रखते हैं कि शायद इनसे ही विचारों की चिंगारी निकले और आगे का मार्ग दिखलाई दे-
1. धर्मतत्ववाद (फंडामेंटलिज्म) और आतंकवाद के संबंध को किस रूप में देखा जाना चाहिए?
2. वैश्विक राजनीति और आतंकवाद का रिश्ता किस तरह बना और विकसित हुआ?
3. धार्मिक कट्टरता और धर्म के उदार मानवीय रूप पर चर्चा न करना, उसे महत्त्व न देना, क्या वाम राजनीति की गलती नहीं है?
4. धार्मिक ग्रंथों की कट्टरता को ईश्वरीय आदेश मानने का भ्रम फैलाया गया, उसे तोडऩे के क्या उपाय हो सकते हैं?
5. धर्म के सारतत्व को रूढि़वादिता बतलाकर इसे मानवाधिकार का विरोधी निरूपित किया जा रहा है, इससे मुक्ति कैसे संभव है?
6. आईएस जिस तरह का आतंकवाद धर्म के नाम पर फैला रहा है, वह दरअसल क्रूरता के अलावा कुछ नहीं है। सुन्नी और शिया को लड़वाने के खेल या सभ्यता के संघर्ष के नाम पर दो कौमों को मरने-मारने के लिए एक-दूसरे के सामने खड़े करने का षड्यंत्र दरअसल प्राकृतिक संसाधनों पर कब्ज़ा जमाने की पश्चिमी ताकतों की पुरानी चाल है। एक और आईएस के खात्मे की ललकार और दूसरी ओर उसे परोक्ष समर्थन ऐसी ही चाल है।  अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसे कैसे समझाया पर  सकता है, जबकि प्रचार प्रसार के साधन भी पून्जीवादी शक्तियों के कब्जे में हैं।
7. क्या आज के आतंकवाद को केवल कठोर नीतियों से ही खत्म किया जा सकता है, या इसके कोई और उपाय भी हैं?
8.  वर्तमान में भारत ही नहीं विदेशों में भी असहिष्णुता बनाम वैचारिक स्वतंत्रता का प्रश्न ज्वलंत है। क्या यह कहा जा सकता है कि इस वक्त धर्म ही नहीं, विचारों का भी आतंक फैलाया जा रहा है और इसे अस्मिता के साथ जोड़कर उग्रता को बढ़ावा दिया जा रहा है?
9. राजनीतिक सिद्धांतों में जिस तरह का कठमुल्लापन बढ़ रहा है, क्या उसे आतंकवाद की गतिविधियों से अलग मानना जायज है?
10. वर्तमान वैश्विक परिदृश्य को सुधारने में बुद्धिजीवियों की भूमिका को खारिज किया जा रहा है, इसके लिए आप किसे जिम्मेदार मानते हैं?
लेखकों, पाठकों से अनुरोध है कि इन प्रश्नों के यथोचित उत्तर 20 अप्रैल 2016 तक अक्षरपर्व को भेजें। चयनित उत्तरों का प्रकाशन जून में प्रकाश्य रचनावार्षिकी में किया जाएगा।
हमारा पता है- संपादक, अक्षरपर्व, 506 आईएनएस बिल्डिंग, रफी मार्ग, नई दिल्ली 110001