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Saturday 18 Nov 2017

सारा घर ले गया, घर छोड़ के जानेवाला

सर्वमित्रा सुरजन
मनचाही चीज नहींमिली, कोई ख्वाहिश अधूरी रह गई तो एक शेर याद आ जाता कि कभी किसी को मुकम्मल जहां नहींमिलता, कहींजमींतो कहींआसमां नहींमिलता। विदेश में परिजनों की याद के साथ-साथ जगजीत सिंह की आïवाज गूंज उठती- मैं रोया परदेस में भीगा मां का प्यार, दुख ने दुख से बात की बिन चिट्ठी बिन तार। पूजा पाठ के नाम पर आडंबर देखा तो बरबस याद आया शेर कि घर से मस्जिद है बहुत दूर, चलो यूं कर लें , किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाए। कभी किसी को संघर्ष कर आगे बढऩे का ज्ञान देना हो तो कह दिया सफर में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो, सभी हैं भीड़ में तुम भी निकल सको तो चलो। जीवन के फलसफे का बखान करना हो तो, दुनिया जिसे कहते हैं बच्चे का खिलौना है, मिल जाए तो मिट्टी है खो जाए तो सोना है, जैसे सटीक शेर का इस्तेमाल किया। सीधे-सादे शब्द, जो आसानी से जुबां पर चढ़ जाएं, जिनमें गीत भी है, लय भी, छंद भी और सबसे अधिक खूबसूरत बात यह कि छोटी-छोटी इन पंक्तियों में जिंदगी के तमाम पहलू समाए हुए हैं। आज जब निदा फ़ाज़ली साहब हमारे बीच नहींहै, तो उनके कद्रदान, उनके प्रशंसक उनकी कमी महसूस करेंगे ही, देश-विदेश के वे लाखों हिंदुस्तानी भी इस शायर को याद करेंगे, जिनका साहित्य से कोई बहुत सीधा सरोकार नहींहै, लेकिन जरूरत पडऩे पर निदा फ़ाज़ली की रचनाओं का इस्तेमाल वे गाहे-बगाहे करते रहे। हिंदी और उर्दू के जानकार कविता और शायरी की कसौटियों पर किसी की रचनाओं को परख सकते हैं, लेकिन आम आदमी के लिए तो सबसे बड़ा पैमाना सीधे संप्रेषण करने की क्षमता का होता है। निदा फ़ाज़ली इस कसौटी पर बखूबी सफल रहे। उन्होंने जितनी आसानी से शायरी में अपनी बात रखी, उतनी ही आसानी से दोहों में और उतनी मधुरता से फिल्मी गीतों में। उनकी नजरों में दुनिया का सबसे बड़ा कवि या शायर बच्चा होता है, जिसकी निश्छल मुस्कुराहट को वे ताउम्र अपनी रचनाओं में स्थान देते रहे। शायद उनकी रचनाओं की सरलता का यही राज है। जिंदगी की पेचीदगियों पर कई गीत लिखे गए, लेकिन निदा फ़ाज़ली ने जिंदगी को सरल बनाने का कितना नायाब तरीका सुझाया कि छोटा कर के देखिए जीवन का विस्तार, आँखों भर आकाश है बाँहों भर संसार।  विगत 8 फरवरी को 76 वर्ष की आयु में निदा साहब का निधन हुआ। तमाम तरह के लोगों ने अपने-अपने तरीकों से उन्हें याद किया, श्रद्धांजलियां दींऔर सोशल मीडिया में भी निदा फ़ाज़ली को खूब याद किया गया। उनकी सैकड़ों रचनाएं इंटरनेट पर डाली गईं, उन्हें पढ़ा गया, सराहा गया। एक शायर, गीतकार के लिए इससे बड़ी सफलता क्या हो सकती है, कि आम जनता उसके नाम से ज्यादा उसकी रचनाओं को जानती है। कन्हैयालाल नंदन ने उनके बारे में लिखा कि निदा फ़ाज़ली की शायरी के अनेक रंग हैं। उनका कलाम उनके ढंग से किया गया जिन्दगी का सफऱ है जिसमें शहर-गाँव, धूप-छांव, बिजली-आँधी-तूफान, नाते-रिश्ते, बादल-बरसात-बसन्त, तिथि-पर्व-त्यौहार...गरज़ यह कि एक भटकते हुए बन्जारे का मंजऱनामा है निदा की शायरी जो रवायत से अपनी ताकत बटोरती है और आधुनिकता से अपनी निदा के बिना अधूरी है। सचमुच निदा फ़ाज़ली की शायरी में जिंदगी के तमाम रंग मिलते हैं और उनका वर्णन कुछ इस तरह से होता है कि पाठक को वे अपने अंतर्मन की अभिव्यक्ति लगते हैं।
आज बारंबार इस बात पर चिंता व्यक्त की जाती है कि साहित्य आम जनता से दूर हो रहा है। लेकिन निदा फ़ाज़ली को याद करने वालों को देखकर लगता नहींकि यह पूरा सच है। साहित्य आम जनता से दूर नहींहोता, साहित्यकार होते हैं। सदियों बाद भी कबीर, रहीम, तुलसी, सूर और गालिब को आम जनता ने याद रखा है और आज के युग में निदा फ़ाज़ली जैसे शायरों, गीतकार को याद किया जाता है, तो आम जनता साहित्य से, कविता से कैसे दूर हो सकती है। साहित्य के मौजूदा माहौल पर निदा साहब ने क्या खूब कहा कि क्रिकेट, नेता, बॉलीवुड, हर महफिल की शान, स्कूलों में कैद है गालिब का दीवान।
जिन निदा फ़ाज़ली ने आम आदमी की भावनाओं को अभिव्यक्ति दी, उनके विछोह को किन शब्दों में अभिव्यक्त किया जाए? पुन: उन्हीं के शेर का सहारा लेना पड़ रहा है कि उसको रुखसत तो किया था, मुझे मालूम न था, सारा घर ले गया, घर छोड़ के जानेवाला।