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Sunday 19 Nov 2017

शरणदाता : विडम्बना का यथार्थ

पल्लव
393 डीडीए, कनिष्क अपार्टमेंट्स
ब्लाक सी एंड डी
शालीमार बाग़
दिल्ली 110088
रफीकुद्दीन का आश्वासन पाकर देविन्दरलाल रह गये। शरणदाता का यह वाक्य जैसे सारे त्रास को पैदा कर रहा है। यहीं रुक जाने का उनका मन न हो यह हरगिज नहीं था लेकिन भारत विभाजन का समय और लाहौर में बचे खुचे गैर मुस्लिम। अज्ञेय की कहानी उन बचे खुचों में से एक देविन्दरलाल की कहानी है। जो अपने अजीज मित्र रफीकुद्दीन के इस तर्क के आगे लाजवाब हैं कि कोई बात है भला कि आप घर-बार छोड़कर अपने ही शहर में पनाहगर्जीं हो जाएँ। हम तो आपको जाने न देंगे बल्कि जबरदस्ती रोक लेंगे। मैं तो इसे मेजारटी का फर्ज मानता हूं कि वह माइनारिटी की हिफाजत करे और उन्हें घर छोड़-छोड़कर भागने न दे। हम पड़ोसी की हिफाजत न कर सकें तो मुल्क की हिफाजत क्या खाक करेंगे! तब यही होना था कि रफीकुद्दीन का आश्वासन पाकर देविन्दरलाल रह गये।  
अज्ञेय स्वयं इस दौर की कहानियों के बार में लिखते हैं -ये कहानियाँ भारत-विभाजन के विभ्राट और उससे जुड़ी हुई मन:स्थितियों की कहानियाँ हैं। एक बार फिर ये कहानियाँ आहत मानवीय संवेदन की और मानवमूल्यों के आग्रह की कहानियाँ हैं, और मैं अभी तक आश्वस्त हूँ कि जिन मूल्यों पर मैंने बल दिया था, जिनके घर्षण के विरुद्ध आक्रोश व्यक्त करना चाहा था, वे सही मूल्य थे और उनकी प्रतिष्ठा आज भी हमें उन्नततर बना सकती हैं। भारत का स्वतंत्र होना जहाँ एक राष्ट्र राज्य का चिर स्वप्न पूरा होना था वहीं इसके साथ मिले विभाजन ने स्वतंत्र होने की खुशी को जैसे फीका कर दिया। विभाजन केवल एक देश का बँट जाना यही नहीं था बल्कि भारत की सदियों पुरानी सामासिक संस्कृति को जोरों से धक्का देना था। जो समुदाय सदियों से साथ-साथ रह रहे थे वे एकाएक नफरत और हिंसा की आग में उबलने लगे। यह ठीक है कि 1857 की क्रान्ति के बाद अंग्रेजी नीतियों में आए परिवर्तन और दोनों समुदायों के अतिवादी समूहों ने इस नफरत की आग को फैलाया लेकिन 1945 से 1948 का लंबा दौर बेहद अशांत और रक्तरंजित है। कहानी बताती है रात को जहाँ-तहाँ लपटें उठने लगीं और भादों की उमस धुऑं खाकर और भी गलघोंटू हो गयी, रफीकुद्दीन भी आंखों में पराजय लिए चुपचाप देखते रहे। केवल एक बार उन्होंने कहा, यह दिन भी था देखने को और आजादी के नाम पर! या अल्लाह! लेकिन खुदा जिसे घर से निकालता है, उसे फिर गली में भी पनाह नहीं देता। अज्ञेय जैसे इस माहौल को ठीक-ठीक चीन्हते हुए शब्द दे रहे हैं। विषाक्त वातावरण, द्वेष और घृणा की चाबुक से तडफ़ड़़ाते हुए हिंसा के घोड़े, विष फैलाने को सम्प्रदायों के अपने संगठन और उसे भड़काने को पुलिस और नौकरशाही ! देविन्दरलाल को अचानक लगता कि वह और रफीकुद्दीन ही गलत हैं जो कि बैठे हुए हैं, जबकि सब कुछ भड़क रहा है, उफन रहा है, झुलस और जल रहा है और वे लक्ष्य करते कि वह अस्पष्ट स्वर जो वे रफीकुद्दीन की बातों में पाते थे, धीरे-धीरे कुछ स्पष्ट होता जाता है एक लज्जित-सी रुखाई का स्वर। यह रुखाई केवल देविन्दरलाल और रफीकुद्दीन के बीच ही नहीं आ रही अपितु दोनों समुदायों में आ रही है।
प्रकारांतर में कहानी ऐसे कुछ प्रसंग भी सुनाती है जहां विश्वास के खत्म होने और हिंसा की तरफ  जाने के उदाहरण हैं। प्रत्यक्षत: कहानीकार हिंसा के पक्ष में नहीं है ;वह हो भी क्यों? और तभी वह ऐसे भी उदाहरण खोजता है जहां विषम स्थितियों के बावजूद मनुष्यता की जीत हुई है। नफरत की एक न चली। सिखों के एक गाँव में कई सौ मुसलमानों के पनाह लेने की भी एक घटना है। जिसे सुनाकर रफीकुद्दीन ने कहा, आखिर तो लाचारी होती है। अकेले इनसान को झुकना ही पड़ता है। वहाँ तो पूरा गाँव था, फिर भी उन्हें हारना पड़ा। लेकिन आखिर तक उन्होंने निबाहा, इसकी दाद देनी चाहिए। उन्हें पहुँचा आये, देविन्दरलाल ने हामी भरी। क्या यह नियतिवाद है? अज्ञेय यथार्थ की कहते कहते नियति की तरफ  मुड़ रहे हैं? अपनी सम्पूर्ण कहानियों की पुस्तक की भूमिका में उन्होंने लिखा है- यथार्थ वैसा (इकहरा) कभी नहीं होता और उसकी एक ही तह या सतह को देखना ही उसे अयथार्थ कर देना है। यथार्थ बहुस्तरीय, जटिल और गुथीला भी है, इसके अनुरूप उसका बहुविध दर्शन, साक्षात्कार, निदर्शन और निर्वचन भी संभव है। हमारी धारणा है कि ठीक यही कहानी में भी कवि का योग हो सकता है। कवि-दृष्टि से देखा गया यथार्थ ही कदाचित ऐसा साक्षात्कार कर सकती है। कवि दृष्टि से देखा गया यथार्थ अधिक गहरे अर्थ में प्रत्यक्ष होता है। तो स्वयं अज्ञेय के शब्दों में यह कवि दृष्टि से देखा गया यथार्थ है। इस कहानी में आगे देविन्दरलाल जी का जिक्र है -वे आंगन में खड़े होकर आकाश देखने लगे। आजाद देश का आकाश! और नीचे से, अभ्यर्थना में जलते हुए घरों का धुऑं! धूपेन धापयाम:। लाल चन्दन रक्त चन्दन। आजाद देश का आकाश ऐसा ही होता हो। जब आजादी के बाद इसे झूठी कहा गया तब ;और अब भी। अनेक विचार सरणियों को मानने वालों ने इसे तोहमत माना। अज्ञेय की कहानी इस झूठी आजादी का दृश्य प्रस्तुत कर रही है और दुर्भाग्य यह है कि देविन्दरलाल जी की त्रासद स्थिति का यह अंत नहीं है।
कहानी में देविन्दरलाल जी को जान बचाने के लिए रफीकुद्दीन साहब अपने एक मुस्लिम परिचित प्रभावशाली व्यक्ति शेख अताउल्लाह के घर में छिपा देते हैं जहां उन्हें एक बड़े घर के बगीचे में खड़े पेड़ों के झुरमुट की आड़ में बने गैराज में रहना होता है। जहां वे अकेले हैं और कोई बात तक करने वाला नहीं। यहीं उनके सामने यथार्थ का भयावह सच आता है। होता यह है कि कुछ दिन की मेजबानी के बाद एक दिन दिन उन्हें रोज के ढर्रे से हटा हुआ खाना मिलता है। वे खुश होते हैं। तभी रोटियों के बीच एक कागज की पुडिय़ा मिलती है और उसमें यह इबारत -खाना कुत्तों को खिलाकर खाइएगा। खाने में जहर था। देविन्दरलाल जी एक बिलार को यह खाना खिलाकर देखते हैं और जहर साबित हो जाता है। आखिर वे वहां से भाग छूटते हैं। यहाँ यथार्थ की बहुस्तरीयता द्रष्टव्य है। बिलार को देविन्दरलाल कई दिनों से पाल रहे थे। उसे रोटी इत्यादि देते थे। विडम्बना यह है कि देविन्दरलाल को उनके शरणदाता शेख अताउल्लाह ने जहर दिया जिससे वे बच गए और बिलार को उसके शरणदाता ने जहर दिया जिससे वह बच न सका।  
कहानीकार का व्यंग्य और विडम्बनाबोध इन वाक्यों में प्रकट हुआ है- देविन्दरलाल फिर खाने को देखने लगे। वह कुछ साफ-साफ  दीखता हो सो नहीं, पर देविन्दरलाल जी की आंखें निस्पन्द उसे देखती रहीं। आजादी। भाईचारा। देश, राष्ट्र, एक ने कहा कि हम जोर करके देखेंगे और रक्षा करेंगे, पर घर से निकाल दिया। दूसरे ने आश्रय दिया और विष दिया। और साथ में चेतावनी, कि विष दिया जा रहा है। यह विडम्बना राष्ट्र की आजादी से जुड़ी विडम्बना है और व्यक्ति के निजी जीवन से भी। तीसरी विडम्बना कहानीकार की है कि यथार्थ के प्रचलित उपकरणों से ही वह इसका उदघाटन कर सकने में समर्थ हुआ है। भूमिका में ही उन्होंने यथार्थवाद के उपकरणों को लक्षित करते हुए लिखा था- मेरी धारणा है कि इसका प्रभुत्व स्थाई बना रहा तो कहानी साहित्य दुर्बलतर ही होगा। सतह की चमक और बुनावट को पकडऩे और प्रतिबिंबित करने की उसकी दक्षता बढ़ती जाएगी, पर अभ्यान्तर वस्तु की पहचान छूटती जाएगी और उस पहचान को दूसरे तक पहुंचाने की क्षमता भी मिटती जाएगी। इस कहानी की सफलता और सार्थकता, यदि है तो, उसके यथार्थवादी उपकरणों से यथार्थ के उद्घाटन में ही है। दूसरी बात कहानी में विभाजन के कारण पैदा हुए सामाजिक विभेद के वर्णन की है, अज्ञेय इस कहानी में देविन्दरलाल के प्रति इन दोनों मुस्लिम परिवारों में क्रमश: आई झुंझलाहट को दिखा सके हैं और अगर शेख अताउल्लाह का परिवार देविन्दरलाल की हत्या कर देने की स्थिति में आ गया है तो इसका कारण वातावरण में फैला सांप्रदायिक जहर ही है। इस लिहाज से विभाजन पर लिखा गया भारतीय भाषाओं का साहित्य गहरा मूल्यवान है क्योंकि वह मनुष्यता पर आ गए ऐसे संकट की पहचान करने की सामथ्र्य रखता है, जो मनुष्यजनित है और जिसे सुलझाया जा सकता है।  
कहानी का अंत इस तरह हुआ है जब देविन्दरलाल अपना पता देकर दिल्ली रेडियो से अपनी जायदाद इत्यादि के सम्बन्ध में अपील करवा रहे थे तब एक दिन उन्हें लाहौर की मुहरवाली एक छोटी सी चि_ी मिलती है जिसमें लिखा था, आप बचकर चले गये, इसके लिए खुदा का लाख-लाख शुक्र है। मैं मनाती हूँ कि रेडियो पर जिनके नाम आपने अपील की है, वे सब सलामती से आपके पास पहुँच जाएँ। अब्बा ने जो किया या करना चाहा उसके लिए मैं माफी माँगती हूँ और यह भी याद दिलाती हूं कि उसकी काट मैंने ही कर दी थी। अहसान नहीं जताती। मेरा कोई अहसान आप पर नहीं है सिर्फ यह इल्तजा करती हँ कि आपके मुल्क में अकलीयत का कोई मजलूम हो तो याद कर लीजिएगा। इसलिए नहीं कि वह मुसलमान है, इसलिए कि आप इनसान हैं। खुदा हाफिज। देविन्दरलाल जी इस चि_ी को पढ़कर किसी रोमानी ख्याल में नहीं डूबते अपितु उन्हें वह स्मृति आती है, गैराज की छत पर छटपटा कर धीरे-धीरे शान्त होने वाले बिलार की वह दर्द-भरी कराह, जो केवल एक लम्बी साँस बनकर चुप हो गयी थी। और आखिर में वे चि_ी की छोटी-सी गोली बनाकर चुटकी से उड़ा देते हैं। उनका चि_ी को चुटकी से उड़ा देना क्या कहता है? क्या ये वे ही आहत मानवीय संवेदन और मानव-मूल्यों के आग्रह, भावनाएँ हैं जिनका आग्रह अज्ञेय कर रहे थे? विडम्बनाबोध कहानी के जटिल यथार्थ को अभिव्यक्त कर रहा है लेकिन इस विडम्बनाबोध की चपेट में कथाकार खुद भी आ गया है।  इस कवि दृष्टि से कथाकार अपने को बचा पाते तो क्या बात होती।