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Saturday 18 Nov 2017

मेहरुन्निसा की रचनाओं में माटी की महक

 

  डॉ. रेशमी पांडा मुखर्जी    
2-ए, उत्तरपल्ली, सोदपुर
कोलकाता-700110
मो. 09433675671
सविता भार्गव लिखती हैं -
चांदनी जम गई है टहनी और पत्तियों पर
आंखों में घास की चमकीली नोक की तरह
नदी ठहर गई है दो किनारों के बीच
रेत से सनी हुई - कसकती देह की तरह1
जब समाज का सशक्त और समर्थ वर्ग माटी के नीचे दबे हुए कोयले की खानों को खोदने की दौड़ में अपने हाथ काले और जेबें गरम कर रहा है, आकाशचुंबी अट्टालिकाओं के निर्माणार्थ प्रमोटर वर्ग खुले मैदानों और जलाशयों को मिट्टी से पाटकर येन-केन प्रकारेन ज़ब्त कर रहा है, औद्योगीकरण की भूखी आंधी जंगलों को उनके बाशिंदों समेत लील रही है तब साहित्य के जागरूक सिपाही प्रकृति की पुकार, माटी की चाहत, जंगल की आवाज़, चांदनी के लावण्य और रजनीगंधा की सुरभि को समाज की सोच के केंद्र में लाने के लिए मुहिम छेड़ रहे हैं। प्रसाद ने झरना, पंत ने संध्या, प्रथम रश्मि और नागार्जुन ने घिरते हुए बादलों को साहित्य-प्रेमियों को उपहार स्वरूप दिया है। सदियों से साहित्यकार प्रकृति के प्रांगण में पाठक की अनुभूति को उभारता रहा है। पर आज का रचनाकार प्रकृति के वक्ष को चीरते हुए ध्वंसात्मक लीला करने वाले इस स्वार्थी अत्याधुनिक मानव समाज से वैचारिक मुठभेड़ के लिए कटिबद्ध है।
मेहरुन्निसा परवेज ने अपनी रचनाओं में प्राकृतिक तत्वों को गंभीरता से विश्लेषित किया है। जिन सभ्यताओं को प्रकृति ने अपनी गोद में संवारा है, उनकी सकारात्मक भूमिका आपके साहित्य की वाणी बनी है। मेहरुन्निसा मटकी की ठंडक में पसरी भूरी बिल्ली, पहाड़ के नीचे झांकते हरे-हरे खेत, ताज़ी माटी की गंध, कोठार में बकरियों की हेड़-की-हेड़, सावन का गीला-गीला वातावरण, जंगली घास, चिरौंटा के जंगली पेड़ को व्यक्तित्व प्रदान करती हुई अपनी रचनाओं को बुनती हैं। स्त्रीवाद एवं आदिवासी जीवन के सत्य को पुरज़ोर स्वर देने वाली परवेज़ की रचनाओं में प्रकृति ने इतनी जीवंत और अहम भूमिका निभाई है जिसे पढ़कर केवल अभिभूत होकर नहीं रहा जा सकता है। बस्तर और आस-पास की धरती की हरितिमा उनकी रचनाओं को महत्वपूर्ण दस्तावेज बनाती है। मेहरुन्निसा प्राकृतिक संपदा के अनूठेपन को आत्मसात करती हुई अपनी रचनाओं के द्वार पर उसके निरालेपन की रंग-बिरंगी रंगोली सजाती हैं। जिस तरह द्वार पर निखरी रंगोली घर के मंगल व सौंदर्य का सूचक होती है उसी प्रकार मेहरुन्निसा ने अपनी दर्जनों कहानियों का आरंभ प्राकृतिक दृश्यों से अभिमंडित किया है। पर्यावरण की विस्मित रूप-राशि को वे अपनी रचनाओं के आरंभ में ही उंड़ेल देती हैं जो उनकी रचना की मौलिक संरचना के लिए संजीवनी साबित होती है। ऐसी दर्जनों उत्कृष्ट रचनाओं में कुछ एक उदाहरण द्रष्टव्य हैं -
1-धान की खाली ढोली में भूरी बिल्ली ने बच्चे जन दिए थे। भूरे-भूरे गिलगिले-से थे ये।2 2- बांस की लटकी चादर पर छिपकली चिपक गई थी। जुम्मन लकड़ी से उसे भगाने की कोशिश कर रहा था।3 3- नीम के पेड़ के नीचे एक कौआ जमीन पर पड़ा फडफ़ड़ा रहा था। अन्य कौए फडफ़ड़ाते हुए इधर से उधर शोर करते हुए भाग रहे थे।4 4-बरसाती दोपहर अक्सर उदास और सूनी-सूनी होती है। नीम के हरे-भरे पेड़ पर कबूतरों का गुटर-गूं-गुटर-गूं और किसी छत के नीचे, भीगने से बचते हुए भिखमंगों के बच्चे होते हैं।5ठीक इसी तजऱ् में कई एक कहानियों के अंत में वे प्रकृति को सलाम करना नहीं भूलती। उदाहरणार्थ, चिडिय़ा अभी भी छटपटा रही थी।6
    भारतीय भूखंड के जंगल जितने विकराल और विस्तृत हैं उतने ही उपादेय, मनमोहक व उदार भी हैं। मेहरुन्निसा वन-प्रांतरों की संवेदना को सहेजना चाहती हैैं। जंगली बेल-बूटों व पशु-पक्षियों की सत्ता को बखूबी बयान करना चाहती हैं। उनके शब्दों में -
जंगल की वह गंध
मेरे भीतर पहुंचकर
मुझे जीने के लिए
 प्रेरणा देती है।
कोरजा उपन्यास में वे लिखती हैं- वनफूलों और तृणमूलों की भीनी खुशबू से लदी सुबह की हवा मस्त शराबी की मानिंद झूम रही थी। झाड़ी-झाड़ी डोलता-चहकता रंग-बिरंगी चिडिय़ों का झुंड किलोल कर रहा था। जंगली तोतों का झुंड नदी के उपर ताज़ी हवा में उड़ान भरता प्रसन्न भाव से चक्कर काट रहा था। जंगल की वह जादूगरनी वन-सुंदरी धीरे-धीरे आहिस्ता-से अपनी जादू की पिटारी खोल रही थी। 7
अकेला पलाश उपन्यास में जंगल की खूबसूरती को यों बयान किया है- जंगल जो हर मौसम में, हर उम्र में जवान होता है, उसका यौवन कभी फीका नहीं पड़ता, जीने के लिए कितनी प्रेरणा इससे मिलती है। 8
जिस प्रकार मानव शरीर के रोम-रोम उसके शारीरिक संतुलन को बनाए रखने का गुरु दायित्व निभाते हैं उसी प्रकार धरती पर पसरी हुई यह वन संपदा सभ्यताओं व जीवन-जगत का संतुलन बनाए रखती है। सदियों से बीहड़ प्रांतों में बसा जीवन जंगलों के आसरे अपने जीवन-संघर्ष को अंजाम दे रहा है। उदाहरणार्थ चरौटे की भाजी, छाती, बोड़ा, मुनगे की नई भाजी, बांस का बासता जहां जंगल अपने आप उगाकर देता है, वहीं हर छोटे-छोटे नाले में, खेतों में छोटी-छोटी मछलियां पैदा हो जाती थीं। सही बात तो यह थी कि जंगल के रहमो-करम पर ही बदनसीब गरीबों की गुजऱ थी। 9
षट्ऋतुओं के अनोखेपन से सुशोभित हमारा देश संसार में विरला है। कभी मेहरुन्निसा गर्मियों की चिलचिलाती धूप को वाणी देती हैं तो कभी बारिश की बौछारों में अपनी लेखनी के प्राण संचयन करती है। ग्रीष्मकाल उनकी रचनाओं को उष्मा और वर्षा की बूंदें उनकी रचनाओं में प्रवाह लाती है। अकव्वा के फल पक चले थे। तड़कती घाम में अकव्वा के फल फटने लगे थे और उनकी रुई उड़-उड़कर चारों तरफ उडऩे लगी थी। आम के पेड़ों पर कैरी आ गई थी और उनकी खट्टी महक हवा में घुल-मिल गई थी। 10
बारिश के दिनों में जब इमली के पेड़ पर फूल आते और पानी की फुहार से छितरे-बिखरे धरती पर पड़े रहते थे और उनकी खट्टी-सी महक बिखरी होती तो उसे बड़ा अच्छा लगता। 11
बरसात खत्म हो गई थी और जाड़े की धूप निकल आई थी। मंदिर की चारदिवारी में लगे कचनार के पेड़ पर सफेद फूल लग गए थे। 12
मुर्गियां हो या कबूतर, गौरैया हो या जुगनू, मेहरुन्निसा की रचनाओं में यथोचित स्थान के हकदार हैं। ये साधारण-से जीव उनकी रचनाओं में असाधारण भूमिका अदा करते हैं। इन पशु-पक्षियों के साथ जीनेवाला मानव-समाज लेखिका के कलम का लक्ष्य है। जो सभ्यता जीव-जंतुओं के साथ पलकर बढ़ी है लेखिका स्वयं को उन तथाकथित पिछड़ी हुई जातियों के बहुत करीब महसूस करती हैं।
सुबह की धुंध चारों तरफ फैली रहती, जिससे दूर-दूर का दृश्य भी धुंधला जाता। दो मुर्गियां सामने की खपरैल की छत पर चढ़ी उंची गर्दन को मटका-मटकाकर इधर-उधर चौकन्नी-सी हिल रही थी। 13
पेड़ों के झुरमुट में ढेर सारी चिडिय़ां बगीचे में फुदकती रहती थी। कोई टहल रही होती, कोई बतिया रही होती या आपस में छेड़-छाड़ कर रही होती। 14  
शहरी आपाधापी में व्यस्त जनजीवन अब पेेड़ों को केवल वृक्षारोपन दिवस पर गिनता है। इमली, हरसिंगार, गुलमोहर उसके आंगन और जीवन से दुत्कार दिए गए हैं। मल्टीप्लेक्सेज़ और गगनचुंबी इमारतों में परफ्यूम छिड़ककर कागज़ी फूलों की शोभा पर मन भटकता फिरता है। ऐसी विडंबनात्मक स्थिति पर झंाकते हुए मेहरुन्निसा की रचनाओं के पेड़ पाठक को भले-से लगते हैं। उसके बेकल मन को सुकून पहुंचाते हैं। उदाहरण, गाड़ी जब कवीथ के  नीचे से गुजरी तो कवीथ की सोंधी खुशबू मेरी नाक में समा गई।15  
गंाव की गाएं, बकरियां वापस आ रही थीं। हर्र-हर्र-हर्र चरवाहा मोटा-सा कंबल ओढ़े बड़ी-सी लकड़ी से उन्हें खेद रहा था। आसमान पर पक्षियों का झुंड जा रहा था। सामने नाले पर चिडिय़ों का शोर बढ़ गया था, मानो दिन भर की बातें बता रही हों। किनारे बड़ी-बड़ी घास के भीतर से सांप सर्र से निकल गया। एक झुंड कौओं का उड़ रहा था। 16
प्रकृति अपने नियमों का पालन कितनी पाबंदी से करती है। जहां पलाश के फूल झड़ गए नंगी टहनियां सूनी और बदरंग हो आयी - पलाश के फूल जहां खत्म हुए थे वहीं गुलमोहर के केसरिया ,सुंदर-सुंदर फूलों की बहार थी।17
मेहरुन्निसा परवेज ने अपनी रचनाओं के उर्वर क्षेत्र में प्राकृतिक सौंदर्य व लालिमा को मुखरित किया है। उन्होंने अपने पात्रों की मनोभूमि को तरल कर प्राकृतिक परिवेश में अंतर्विलीन कर दिया है। अपने वैचारिक आग्रहों को चरितार्थ करते हुए भी उन्होंने पेड़-पौधों व पशु-प़िक्षयों के स्वर को संयोजित किया है। वर्गीय चेतना, सामाजिक वंचना, सांस्कृतिक प्रदूषण, जीवन-विडंबनाओं की बहुत-सी सिलसिलेवार सूचना प्राकृतिक क्रियाकलापों के माध्यम से दी गई है। उनकी मानवीय रागात्मकता प्राकृतिक छवियों के कण-कण को समेटती-सी बही है। जीवन की प्रतिबद्धता और पक्षधरता को बनाई रखती हुई वे अपनी प्रतिवाद-धर्मिता को कभी भी पीछे नहीं छोड़ती। प्रकृति के प्रति अपने स्नेह, ममत्व व आंतरिकता को लेखिका के रूप में मेहरुन्निसा परवेज ने अभिव्यक्त करने की बेहद सधी हुई सामथ्र्य का प्रमाण दिया है।
संदर्भ-संकेत
1 -- आलोचना-अप्रैल,जून-2013 राजकमल प्रकाशन,नई दिल्ली ,पृ 67
2-त्योहार कहानी, आदम और हव्वा कहानी संग्रह, मेहरुन्निसा परवेज़, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली, 1972, प्रथम, पृ-1
3-सीढिय़ों का ठेका, वही, पृ-11
4-अकेला गुलमोहर,वही, पृ-84
5-बंजर दोपहर,वही,पृ-91
6-अयोध्या से वापसी, मेरी बस्तर की कहानियां, मेहरुन्निसा परवेज़, विद्यानिधि प्रकाशन, दिल्ली,प्रथम, 2006, पृ-65
7 कोरजा,वाणी प्रकाशन नई दिल्ली,द्वितीयसंस्करण, 2000,पृ- 164
8-अकेला पलाश, मेहरुन्निसा परवेज़, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2010, पृ-74
9-देहरी की खातिर, आदम और हव्वा कहानी संग्रह, मेहरुन्निसा परवेज़, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली, 1972, प्रथम, पृ-166
10-देहरी की खातिर, मेरी बस्तर की कहानियां, मेहरुन्निसा परवेज़, विद्यानिधि प्रकाशन, दिल्ली,प्रथम, 2006, पृ-121
11-जुगनू,वही, पृ-75
12-शनाख्त, वही,पृ-50
13-पत्थरवाली गली, वही, पृ-195
14- फाल्गुनी, वही,पृ-88
15-ओस में डूबा गुलाब, वही,पृ-103
16-जंगली हिरनी, वही,पृ-228
17-अकेला पलाश, मेहरुन्निसा परवेज़, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2010, पृ-218 ठ्ठ