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Tuesday 21 Nov 2017

समकालीन प्रवासी महिला लेखन की बानगी है इतर

 

डॉ. रमेश तिवारी
64-बी, फेस-ढ्ढढ्ढ
डीडीए फ्लैट
कटवारिया सराय
नई दिल्ली - 110016
मो. 09868722444
राष्ट्रीय पुस्तक न्यास (नेशनल बुक ट्रस्ट) नई दिल्ली ने प्रवासी महिला कहानीकारों की कहानियों को इतर शीर्षक से प्रकाशित करने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया है। डॉ.सुधा ओम ढींगरा ने संग्रह के लिए कहानियों का चयन, संपादन के साथ भूमिका लिखने का महत्त्वपूर्ण और उल्लेखनीय कार्य किया है।
इस संग्रह में भारत से दूर अपने ह्रदय में एक लघु भारत को जीवित रखे हमारे भारतवंशी समाज के लोग हैं जो बहुत पहले अपनी निजी जरूरतों के लिए अपनी धरती अपने देश को छोडऩे के लिए मजबूर हुए और उस देश में जाकर बस गए थे जिसे सुषम बेदी अपनी कहानी अवसान में भली भांति प्रस्तुत करती हैं। अमेरिका में ही रह रहीं पुष्पा सक्सेना की कहानी उसके हिस्से का पुरुष में प्रेम संबंधों में किसी तीसरे की उपस्थिति मात्र से उत्पन्न तनाव को जीया गया है। ऐसे प्रेम संबंधों की जटिलताओं को लेखिका ने बड़ी ही बारीकी से समझते हुए पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किया है। जैसा अक्सर कहा-सुना जाता है कि साहित्य अपने समय और समाज से निरपेक्षता में नहीं बल्कि सापेक्षता में ही रचा जाता है। इसके प्रमाणस्वरुप हम अंशु जौहरी की कहानी को देख सकते हैं। अमेरिका में अल्जायमर के मरीजों की बढ़ती संख्या ने कहानीकार अंशु जौहरी को इतना द्रवित और विचलित किया है कि इन्होंने एक निर्विकार शीर्षक कहानी रचकर इस रोग से प्राप्त होने वाली पीड़ा और त्रासद स्थितियों को ही अपनी रचनात्मकता का विषय बना डाला है और न सिर्फ  विषय बनाया बल्कि बड़ी ही बारीकी से उसके एक-एक पक्ष को पाठकों के समक्ष रखने में सफल भी रही हैं। यों ही चलते हुए पूर्णिमा वर्मन द्वारा शारजाह के प्राकृतिक सौंदर्य और जीवन पर केन्द्रित कहानी है तो पश्चिमी देशों की सभ्यता-संस्कृति को केंद्र में रखकर ब्रिटेन की नीना पॉल की कहानी आखिरी गीत रची गयी है। आखिरी गीत कहानी में रिश्तों और हमारे संबंधों के साथ-साथ संगीत, आनुवंशिकता आदि की परतों को भी लेखिका ने कहीं-कहीं स्पर्श करने की कोशिश की है। जकिया जुबेरी की कहानी साँकल पश्चिमी दुनिया के परिवेश में माँ-बेटे के संबंधों की पड़ताल करती है। रंग, जाति, क्षेत्र, धर्म, भाषा के आधार पर आधारित समाज हमारे पिछड़े होने अथवा परम्परावादी होने के प्रमाण हैं। शैल अग्रवाल की कहानी विच और अर्चना पेन्यूली की कहानी कठिन चुनाव महत्त्वपूर्ण हैं। परंपरा-आधुनिकता जब आमने-सामने एक दूसरे का रास्ता रोक लें तो तनाव स्वाभाविक है। इसी तनाव को लेखिकाओं ने अपनी कहानियों में बुनते हुए रचनात्मकता के सहारे प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया है। थोड़े-थोड़े परिवेशगत अंतर के बावजूद इन दोनों कहानियों के पीछे की मूल भावना लगभग एक जैसी ही प्रतीत होती है। इसी प्रकार एक माँ जब अपने बच्चों के लिए पूरी पितृसत्तात्मक व्यवस्था से लोहा लेने के लिए खड़ी हो जाती है तो शैलजा सक्सेना की कहानी उसका जाना की रचना संभव होती है। सुधा ओम ढींगरा का नई लकीरें खींचती कहानियाँ शीर्षक के अंतर्गत यह कथन उल्लेखनीय है कि इस संग्रह की कहानियां विदेश की भूमि से उपजे अनुभव और यथार्थ को समेटे हैं, ये कहानियाँ किस्सागोई से भरपूर हैंं , कथ्य, शिल्प और बुनावट में बेजोड़ हैं।
संग्रह की कहानियों में मुझे जिस कहानी ने सर्वाधिक बेचैन किया, उसका शीर्षक है आन्त्रेप्रेन्योर। उषा राजे सक्सेना की यह कहानी मेरी दृष्टि में अत्यंत मर्मस्पर्शी कहानी है। मुझे इस कहानी को पढ़ते हुए अनायास मुंशी प्रेमचंद याद आते रहे हैं। मुंशी प्रेमचंद की बड़ी ही महत्त्वपूर्ण कहानी है बड़े घर की बेटी और उस कहानी का आखिरी वाक्य है बड़े घर की बेटियां ऐसी ही होती हैं। बिखरता घर भी टूटने से बचा लेती हैं। हो सकता है वाक्य बिलकुल यही ना हों किन्तु भाव बिलकुल यही है। इस कहानी में भी ऐसा ही कुछ घटित होता है। यह कहानी एक चलचित्र की तरह पाठकों के समक्ष दृश्यमान हो जाती है। जब इस कहानी की नायिका तिश अपने पति के दुर्घटनाग्रस्त होने की खबर अपने ससुर (नायक के पिता जो विदेश में पत्नी के साथ रह रहे हैं और बहू तिश को बहुत पसंद नहीं करते हैं) को देते हुए उन्हें मुंबई आ जाने के लिए कहती है और उनकी यात्रा संबंधी सारी आवश्यक व्यवस्था पहले ही कराते हुए पर्याप्त दृढ़ता और सूझबूझ के साथ अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाह करती है, उस वक्त ऐसा लगता है जैसे इस कहानी को रचते हुए प्रेमचंद की बड़े घर की बेटी कहानी का प्रभाव निश्चय ही लेखिका के मन-मस्तिष्क पर रहा होगा।
आन्त्रेप्रेन्योर और बड़े घर की बेटी कहानी में कई समानताएं हैं। दोनों में पात्र कम हैं। दोनों ही कहानियों में कसावट है। यह कहानी आज के सन्दर्भों में नए जमाने के युवक-युवतियों के प्रेम-प्रसंग से पाठकों को बांधती चलती है। एक खूबसूरत युवती के बम (नितम्ब) के आकर्षण से शुरू हुई यह पश्चिमी जनजीवन की सामान्य सी प्रेमकथा की परवर्ती भारतीय परिणति को पढ़ते हुए पाठक उसमें डूबता ही चला जाता है। शादी-विवाह, समयाभाव, नोंक-झोंक, दुर्घटना और विभाजन के मुहाने तक जाकर यह कहानी जब बहू के द्वारा सास-ससुर को बेहद सधी और संतुलित आवाज में अपने पति और उनके बेटे रोनू के दुर्घटनाग्रस्त होने का समाचार देती है तो सहृदय पाठक के आँसू निश्चय ही उसके आँखों से बाहर छलक आयेंगे। इस प्रसंग को पढ़ते हुए आँखों के आँसू पोंछने का काम इन पंक्तियों के लेखक ने भी किया है। बड़े घर की बेटी की तरह ही यहाँ भी परम्परागत भारतीय संयुक्त परिवार की संकल्पना की ही जीत होती है। यही इस कहानी की सार्थकता है और सफलता भी। इस एक कहानी के लिए मैं उषा जी को बार-बार बधाई देना चाहूँगा और शुभकामना दूंगा, अल्लाह करे जोर-ए-कलम और भी जियादा।
इस संग्रह की कहानियों में नई सोच, नए सामाजिक सरोकार हैं, नई चुनौतियाँ हैं। भारत से इतर दुनिया के समाज में कौन-कौन से संघर्ष हैं जिन्हें जीवन-संघर्षों से आगे बढ़ाकर साहित्यिक रचनाओं में पिरोते हुए पाठकों को परोसा गया है यह सन्देश इस संग्रह की कहानियाँ भली-भांति देती हैं। महिलाओं के साहित्य में स्त्री-विमर्श भी एक बड़ी चुनौती की तरह गुंथी रहती है। संग्रह के आरंभ में ही सुधा ओम ढींगरा लिखती हैं विश्व में लेखिकाओं द्वारा लिखा जा रहा साहित्य स्वतंत्र महिला के शोषण, चिंतन देह की आजादी के बाद की चुनौतियां, विदेशी समाज के सरोकार, विद्रूपताओं, विसंगतियों को चित्रित करता संवेदनशील प्रवासी भारतीय महिला की मानसिकता को उकेरता, दो संस्कृतियों के टकराव में टूटते जीवन मूल्यों, रिश्तों की बारीकी को बुनता, प्रवास के अकेलेपन से जूझता हिंदी साहित्य के समीक्षकों और आलोचकों की अवहेलना झेलता तथा हिन्दी साहित्य में स्वयं के लिए भूमि तलाशता साहित्य है। पाठकों, समीक्षकों, आलोचकों की इन स्वरों से परिचय और पहचान हो सके, यही इस संग्रह का उद्देश्य है।
सुधा ओम ढींगरा की एक महत्वपूर्ण कहानी को भी इस संग्रह में शामिल किया गया है जिसका शीर्षक है बेघर सच। इस कहानी में स्त्री-पुरुष संबंधों और उन संबंधों में स्त्री के अस्तित्व, अस्मिता और समता की जाँच-पड़ताल की गयी है। इस कहानी की कथा मात्र इतनी सी है- रंजना नामक एक स्त्री के चरित्र के प्रति सशंकित पति संजय नाराज होकर कटु वचन बोलते हुए उससे सच जानना चाहता है। यहीं से कथा का आरंभ दिखाया गया है बीच-बीच में कथा में अतीत की घटनाएँ भी प्रस्तुत की जाती हैं कभी संवादों के सहारे कभी परोक्ष रूप में। इस कथा में दादी, नानी, चाची और रंजना के बहाने स्त्री जाति की तीन पीढिय़ों की वैचारिक भिन्नता को भी भली-भांति दिखाया गया है। दादी, नानी जहाँ परिवार में बेटियों को बेटों के बराबर स्थान देने के खिलाफ हैं वहीं माँ ने इन मान्यताओं से असहमत होकर भी शील संकोचवश कभी मर्यादा नहीं तोड़ी है। जब बेटी रंजना इन मान्यताओं को कुतर्क कहती है तो उसे जवाब मिलता है-यह कुतर्क नहीं वेदों-पुराणों में लिखा है। (पृ. 80) बुजुर्ग स्त्रियों की नजर में बेटियाँ पराया धन हैं। माँ इस मुश्किल घड़ी में रंजना को ढांढस बंधाते हुए कहती है-पहले पढ़-लिखकर अपने पाँव पर खड़ी हो जाओ फिर हक की लड़ाई लडऩा। (पृ. 80)
आज के विकसित और 21 वीं सदी में भी स्त्री का सच यह है कि उसका कहीं कोई घर नहीं है। पहले घर पिता का, भाई का और बाद में विवाह के उपरांत ससुर का या पति का। स्त्री का पूरा जीवन घर के बिना ही बीत जाता है। इसलिए यह कहानी स्त्री को बिलकुल ठीक ही बेघर सच के रूप में दिखाती है। मेरी दृष्टि में यह कहानी उनके लेखन की एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि भी है। अंतत: मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचता हूँ कि इस संग्रह की कहानियों को पढऩा हमें हर्ष और स्फूर्ति देता है।