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Friday 24 Nov 2017

आखिरी चिट्ठी


कस्तूरी दिनेश
रामलीला मैदान, रायगढ़ 496001
मैंजान रहा हूँ, शायद यह मेरा अंतिम पत्र है। यदि मैं जीवित रहा तो अगले महीने मेरी उम्र अस्सी साल की हो जायेगी। शरीर अब मन का साथ नहीं देता। घूमना चाहता हूँ पर दस कदम चलने में ही टांगें पीपल के पत्ते की तरह कांपने लगती हैं। साँसें हैं कि थोड़ा उठने-बैठने में ही छाती फाड़कर बाहर आना चाहती हैं। बोलना चाहता हूँ तो मुंह से बच्चों जैसी तोतली अस्पष्ट वाणी निकलती है। बिस्तर पर पड़े रहो तो कमर में दर्द से हूक सी उठती है। लगता है जैसे एक साथ कोई सैकड़ों सुइयां चुभो रहा हो। बिस्तर से उठने की चाह में पूरी ताकत नींबू की तरह निचुड़ जाती है। शरीर के जोड़ों में पीड़ा ने स्थायी मुकाम बना रखा है। मोतियाबिन्द के आपरेशन वाली आंखों का दृष्टि ने साथ छोड़ दिया है। मेरे चश्मे के पावर ग्लास और साधारण कांच में कोई फर्क नहीं रह गया है। सुबह बाथरूम तक जाना और नित्यकर्म से निपटकर, स्नान आदि के बाद बिस्तर तक आना एवरेस्ट फतह जैसा महसूस होता है।
दस साल हो गये जब मेरी कैंसरग्रस्त पत्नी चंदा मुझे अकेला छोड़ गई थी। जाते-जाते उसने तन्हाई का हाथ मेरे हाथों में दे दिया था। बड़ा बेटा गोपाल अमेरिका में कम्प्यूटर इंजीनियर है। छोटा जगदीश बड़ोदरा में प्रोफेसरी करता है। बहुत दिनों तक गाँव का पुश्तैनी घर छोड़कर मैं प्रोफेसर पुत्र के पास रहा। शुरू-शुरू में तो बहू का व्यवहार ठीक-ठाक था। बाद में किसी तानाशाह की तरह निरंकुश हो गया। बात-बात में वह सुबह से रात तक मुझे कोसती रहती। आखिर-आखिर में तो अस्फुट स्वर में गन्दी गालियां भी बकने लगी थी। कई बार उसने अपने पति से मुझे वृद्धाश्रम छोड़कर आने के लिए भी कहा। पुत्र था कि लोकलाजवश मुझे वृद्धाश्रम पहुँचाने में आनाकानी करता रहा। हालांकि धीरे-धीरे उसे भी मैं बोझ महसूस होने लगा था। नारकीय अपमान से त्रस्त एक दिन मैंने थक-हारकर अपने पुत्र से कुछ दिनों के लिए गाँव जाने की बात की। मैंने कहा- जग्गू, कुछ दिनों के लिए मैं गाँव हो आऊँ..तेरी मां की बड़ी याद आ रही है। गाँव के घर में उसकी यादें बसी हैं। वहां जाऊंगा तो थोड़ा मन बहल जाएगा। उसने दिखावटी ना-नुकुर के बाद मुझे इजाजत दे दी। सात हजार का मासिक पेंशन मेरे लिए काफी था। बहू हर दो तारीख को पेंशन के सात हजार में से पांच हजार लेते वक्त बेहद आह्लादित रहती थी परन्तु बाद में यह आह्लाद मुझे कोसने और गालियों में तब्दील हो जाता था। जगदीश की एक सुंदर तीन साल की प्यारी सी बिटिया थी तारिका। हम उसे घर में प्यार से तारू कहते थे। मैं उसे बहुत प्यार करता था। तारू हूबहू अपनी दादी जैसी दिखती थी। वह मेरी गोद में आने के लिए हुमकती रहती थी। मेरे पास रहती तो मेरे गालों को छू-छूकर तरह-तरह के प्रश्न करती। हंसती-खिलखिलाती साथ खेलती रहती थी। जब वह पास होती तो लगता जैसे मेरे जीवन में वसंत उतर आया है। हंसते-बतियाते, उसकी तोतली बातें सुनते समय कैसे बीतता पता ही नहीं चलता परन्तु बाद-बाद में बहू ने तारिका के मेरे पास आने पर प्रतिबन्ध लगा दिया। शुरू-शुरू में दादा-दादा पुकारकर वह बहुत रोती थी पर बाद में उस बच्ची ने भी परिस्थितियों से जैसे समझौता कर लिया। वह जंगल की दुखिया विरहिन हिरनी सी दूर से मेरी तरफ टुकुर-टुकुर निहारती रहती थी।
गाँव आए कितना समय बीत गया,पता नहीं। यहाँ मेरा सहारा फत्तू है। हमारे घर का पुराना नौकर। उसे मैं उसके इन्कार के बाद भी हर महीने हजार रूपये देता हूँ। वह मेरे लिए भोजन बनाता है कपड़े धो देता है और घर की साफ-सफाई कर देता है। जरूरत पड़ती है तो दवा-दारू भी ला दिया करता  है। उसकी भी उम्र पचास के उपर हो गई है। उसकी पत्नी चंदा के पहले ही, भगवान को प्यारी हो गई थी। कभी बाहर जाना हुआ तो मैं फत्तू के आसरे ही घर छोड़कर जाया करता था। जहां होता वहीं से उसे पांच सौ रूपिया बराबर भिजवाया करता था। इधर फत्तू मुझसे आठेक दिनों की छुट्टी लेकर अपने गाँव गया है, परन्तु करीब एक महीने हो गया लौटकर नहीं आया। पता नहीं उसे क्या हुआ। उसके गाँव से अभी तक कोई समाचार भी नहीं आया। फत्तू चंदा के मायके के गाँव का ही है। चंदा को वह दीदी और मुझे जीजा जी कहा करता था। जब चंदा जीवित थी तब हमारा घर साक्षात बैकुंठधाम था। मेरा बड़ा पुत्र गोपाल और छोटा जगदीश फत्तू को मामा जी कहते ही नहीं थे, पूरा आदर भी देते थे। तब मैं गाँव के मिडिल स्कूल में प्रधान अध्यापक था। बच्चों को स्कूल लाने-ले जाने की जिम्मेदारी फत्तू की ही थी। गाँव के मेले-ठेले में वह उन्हें काँधे पर उठाये घुमा लाता था। चंदा उसे हर वर्ष प्यार से राखी बांधती और वह हर साल चंदा की रक्षा के वचन के साथ उसे अपनी कमाई से ग्यारह रूपये भेंट देता था। जब चंदा उसे राखी बांधती तो फत्तू की आँखें प्यार से डबडबा आया करती थीं, जिसे वह अपने कुरते के पल्लू से पोंछता। दोनों बच्चे मामा-मामा कहते हर वक्त अपनी फरमाइशें लिए उसके पीछे पड़े रहते। क्या दिन थे वे, न लौटकर आने वाले! शाम दोनों बच्चे फत्तू के साथ खेलते। रात उतरती तो मैं उन्हें अपने पास पढ़ाने बैठा लेता। फत्तू उधर धौरी गाय का दूध निकालता, इधर चंदा भोजन बनाने में व्यस्त हो जाती। खाली होते तो अपने गुजरे माता-पिता, रिश्ते-नातों की प्यारी यादों के किस्से-कहानियों में गुजर जाता। सब कुछ तिरोहित हो चुका था। एक सपने की तरह। चंदा का वह माथे पर बड़ा लाल टीकावाला गौरवर्ण मुस्कुराता मुखड़ा। फत्तू की बड़ी-बड़ी मूँछोंवाला हंसता चेहरा गोपाल और जगदीश का उछल-उछलकर उसके काँधे पर चढऩा, धौरी गाय का हम्मा-हम्मा चिल्लाते संध्या घर में प्रविष्ट होना और बछड़े से मिलने के लिए व्याकुलतापूर्वक कोठे की ओर दौड़ लगाना। लगता है सब कल की ही घटना है। महसूस होता है जैसे अभी-अभी चंदा साड़ी के पल्लू से हाथ पोंछती, मुस्कुराती मेरे सामने खड़ी हो जायेगी। चेहरे का उसका लाल टीका उसके साथ खिलखिला उठेगा। दोनों बच्चे कहेंगे-बाबा चलिए न, आज नहीं पढ़ायेंगे क्या? पहले गाँव के कुछ पुराने लोग मुझसे मिलने के लिए आ  जाया करते थे। अब वे इस दुनिया में रहे नहीं। खाट पर पड़े-पड़े अंदर से बंद दरवाजे की तरफ  कान लगा रहता है कि शायद अचानक सांकल खड़के और दरवाजा खोलूँ तो फत्तू सामने हंसता-मुस्कुराता खड़ा हो जाए। पर कुण्डी है कि खड़कती नहीं। शरीर बेहद कमजोर हो गया है। बिस्तर से उठने की ताकत नहीं तो भोजन-पानी क्या बना पाऊंगा! आज तो ले-देकर बाथरूम से खाट तक, दीवार का सहारा लेकर आ पाया। बिस्तर गीला-गीला लगा तो हाथों के स्पर्श से जान गया कि फिर से मेरा बचपन लौट आया है, जब मैया नाराज होकर चिल्लाती थीं। इस लड़के ने आज फिर बिस्तर गीला कर दिया जी। कमरे में सीढन और बदबू है। बिस्तर से भी गन्दी बू आ रही है। फत्तू होता तो साफ-सफाई, धोना-पोंछना करके, भगवान के पास अगरबत्ती जला देता। अब तो शरीर में इतना भी दम नहीं कि बिस्तर से उठ सकूं। कुछ दिनों तक ही ले-देकर भोजन बना पाया। इधर चार-पांच दिन तो पानी से भीगा चिवड़ा खाकर बीत गया। अब वह भी खत्म हो गया है। फत्तू होता तो चूल्हा सुलगाता। आज छटवां दिन है। लगता है भूख प्राण लेकर रहेगी। फत्तू था तब प्रोफेसर पुत्र के पास चि_ी भिजवाई थी परन्तु उधर से कोई जवाब नहीं आया। लगता है, यही दशा रही तो आठ-दस दिनों से ज्यादा जी नहीं पाऊंगा। शरीर का मोह अजीब है! चंदा के साथ धीरे-धीरे सब सुख बिदा हो गये परन्तु देह है कि मरना नहीं चाहती। मेरे मरने के बाद यह पत्र जो भी पढ़े तो यह मत समझे कि मैंने मृत्यु के लिए संथारा या संलेखना की पवित्र धार्मिक वृत्ति अपनाई है। सच कहूं तो मैं अभी मरना नहीं चाहता। मैं अपनी नातिन तारू के साथ खेलना चाहता हूँ। उसकी तोतली बातें सुनना चाहता हूँ। उसकी भोली खिलखिलाहट का साथ देना चाहता हूँ। उसे अपनी गोद में बैठाकर, अपलक उसके भोले चेहरे को निहारते रहना चाहता हूँ। वह चंदा ही तो है, माथे पर लाल बड़ी सिंदूरी टीका वाली!
यह पत्र फत्तू को गाँव से लौटने के बाद मिला था। घर अंदर से बंद था, दरवाजा तोडऩा पड़ा। अंदर मास्टर जी की भूखी-प्यासी कंकालनुमा, सड़ती-गंधाती लाश बिस्तर पर पड़ी थी। आंखें भर खुली थीं, जैसे किसी का इन्तजार कर रहीं हों।