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Sunday 19 Nov 2017

सम्मन


मनीष वैद्य
11 ए, मुखर्जीनगर, पायनियर चौराहा,
देवास-455 001
मो. 98260 13806
मुझे खेत बचपन से ही ललचाते। कितना कुछ है वहां खेतों में। पूरी एक दुनिया। धरती कैसे हल की नोक सहते हुए अपनी छाती में जगह देती है बीजों को, ताकि सृजन का संगीत गूँज सके बंजर धरती में भी। साल दर साल किस तरह बाना बदलते रहते हैं खेत भी। कैसे हरहराने लगता है वहां किसान का सपना। कैसे धरती का मीठापन उतर आता है पौधों में। कैसे हरा और पीला रंग उतर आता है और ढँक लेता है पूरी पृथ्वी को। कैसे किसान अपने बच्चे की तरह जुड़ जाता है अपनी फसल से। कैसे उसकी सारी उम्मीदें बंध जाती हैं उस छोटे से खेत से। कैसे वह जमीन का छोटा सा टुकड़ा उसके लिए माँ की ममता समेट लाता है। अनायास मैं दौडऩे लगता हूँ अपने बचपन में लौटकर गाँव की गलियों से खेतों की मेड़ तक। तभी कुछ भूरे और पीले कागज उड़ते हुए इस तरह मेरे आसपास भर जाते हैं जैसे पतझड़ में सूखे पत्तों का ढेर। इन कागजों पर कोरट की सरकारी मोहरें लगी है और लिखी है सरकारी इबारतें। मैं जी भर कोशिश करता हूँ उससे बाहर आने का। पर नहीं निकल पा रहा उन कागजों की दलदल से। पैर धंसते जा रहे हैं। बेडिय़ों की तरह वे भूरे और पीले पड़ चुके कागज मेरे पैरों को जकड़ रहे हैं। वे मुझे आगे बढऩे ही नहीं दे रहे। मैं खेतों की ओर जाना चाहता हूँ पर रोक रही है मुझे वे बेडिय़ाँ।
कुछ ही देर में भूरे और पीले सम्मनों का ढेर बढ़ते-बढ़ते पूरी धरती को ढंक रहा है। तमाम खेतों में कागज ही कागज फैल गये हैं। अब कहीं फसलें या पौधे नजर नहीं आ रहे, सिर्फ और सिर्फ सरकारी मोहर लगे कागज ही कागज। जैसे बाढ़ सी आ गई है इनकी। इन कागजों के बीच से निकल रही है द्वीप की तरह सड़कें, रेल पटरियां, बाँध, बाजार, मॉल, बिल्डिंगे, बंगले और फैक्टरियाँ। कहीं नहीं दिखाई दे रहा अब कोई खेत। जैसे लील गया हो कोई अजगर उन्हें हमेशा के लिए ।
कोई दृश्य कौंधता है भीतर से। कई साल पुराना। सुभाष वल्द गोवर्धन का घर यही है। तहसील के मुलाजिम ने ऊंची और वजनदार आवाज में पूछा था। नीम के पेड़ के करीब आकर। नीम का पेड़ हमारे आँगन में ही था। अंदर से कोई जनाना आवाज थी। हाँ भैया, घर तो उन्हीं का है। क्या बात है। कहते हुए माँ घर से बाहर निकली थी हाबरी-काबरी सी। माँ ने पल्लू की ओट से अजनबी मातहत को देखा था। शायद पहली बार था कि कोई सरकारी मुलाजिम इस तरह उनके घर के बाहर खड़ा होकर नाम पुकार रहा हो पिता का। क्या बात है भैया। माँ की आवाज में घबराहट पलपल बढ़ रही थी। कोरट का सम्मन है उसके नाम। कोरट। माँ के कलेजे पर जैसे सन्नाता पत्थर पड़ा था कोई। माँ करीब-करीब रिरियाते हुए बोली थी, क्या बात हो गई भैया। कोरट से हमारा क्या वास्ता? आपको कोई गलतफहमी हो गई होगी शायद। मुलाजिम ने अजीब सा मुंह बनाते हुए पिता का नाम दोहराया, सरकारी मोहर दिखाई थी उस पर लगी हुई। उसने फटकारते हुए कहा था- कोरट का सम्मन है, कोई हंसी मजाक नहीं है। मेरी जिन्दगी गुजर गई लोगों को सम्मन तामिल कराते-कराते। कोरट का कागज पत्तर गलत कैसे हो सकता है भला। अपने पति को बुलवाओ जल्दी, मुझे पास के गाँव में भी जाना है। माँ ने आँगन में चारपाई बिछा दी। मुलाजिम उस पर बैठकर सुस्ता रहा है। पड़ोस की लछमी काकी और राधा बुआ भी आ गई है माँ को ढांढस बंधाने। मुलाजिम के लिए माँ चूल्हे पर चाय बना रही है। मैं दौड़ गया हूँ पिता को बुलाने खेत की ओर।
पिता लौट रहे हैं तेज कदमों से घर की ओर। उनके पीछे मैं दौड़ रहा हूँ। पिता के माथे पर चिंता की लकीरें खिंच गई है। पसीना बह रहा है उनके चेहरे से। उनका मन ठिकाने पर नहीं है। न जाने कहाँ-कहाँ भटक रहा है मन इस वक्फे में। आँखों में कोई अजाना सा डर है। जैसे किसी अपराध बोध से दबे जा रहे थे वे।  अपने आप से छुपते हुए। किसी के सामने पडऩे से बचते हुए।
पिता बैठे थे किसी अपराधी की तरह चारपाई के एक कोने में। किसी गठरी की तरह अपने आप में सिकुड़ते हुए। तुम्हारे नाम का सम्मन है। अगले बुधवार को तहसील आ जाना। तुम्हारे काका ने दावा जताया है तुम्हारे खेत पर। पिता के पैरों के नीचे से जैसे धरती खिसक रही थी या आसमान आ गिरा था सिर पर। पिता के लिए खेत उनकी आत्मा से हिलगे हुए से थे। पुरखों की जमीन उन्हें अपनेपन के एहसास से भर देती। वे इसे पुरखों की गोद मानते थे। काका ऐसा कैसे कर सकते हैं। उन्हें तो पिता ने पहले ही तालाब से लगा हुआ 11 बीघा खेत दे दिया था। अब इस खेत पर भी उनकी नजर है। पिता ने गहरी सांस छोड़ी जैसे कोई शब्द फूटे थे उनके मुंह से, लालच की कोई हद नहीं। अब इस सूखी 6 बीघा जमीन पर भी कब्जे की बात। पिता कहा करते थे यह खेत जमीन का टुकड़ा भर नहीं है हमारे लिए यह माँ है, धरती माँ। इसे हमारे पुरखों ने बिसाया है हमारे लिए और हम छोड़ जायेंगे आने वाली पीढिय़ों के लिए। खेतों के रहने तक न तो कभी किसान भूखा रहेगा और न ही दुनिया में किसी को रहने देगा। इन खेतों की मिट्टी का ही सत है कि गाँव अब तक आबाद हैं और लहलहाते भी हैं। इनसे ही जीवों- पखेरुओं का बसेरा है। किसानों की जीवटता और जिजीविषा मिट्टी से ही तो है। ये हैं तो किसान हैं, नहीं तो खत्म हो जायेंगे लोग। उजाड़ होकर बीहड़ बन जायेंगे गाँव। कुछ नहीं बचेगा। खेत से ही जीवन है। यहाँ जीवन का राग इन्हीं से है। इन्हीं के बीच से पनपता है
 मुलाजिम चला गया था उनसे अंगूठा निशानी लेकर। जैसे अंगूठे के साथ उनकी जीभ भी ले गया हो अपने साथ। वे देर तक बैठे रहे उसी तरह गुमसुम, अकेले और उदास। उनके हाथ में भूरे रंग के सम्मन का कागज देर तक फडफ़ड़ाता रहा। उनकी आँखों में रेत का बवंडर था। मन में बेबसी और दर्द का समन्दर घुमड़ रहा था। उनकी देह तप रही थी गुस्से से या अपनी कमजोरी से। बीते दिन बिखरे पन्नों की तरह उड़ रहे थे उनके चारों तरफ। माँ बड़बड़ा रही है उनकी तरफ पीठ किए। पहले 11 बीघा सोने जैसी जमीन और अब ये भी। आदमी है कि राखस। हमारे बच्चे कहाँ जायेंगे। उन्होंने कभी खेतों में कोई काम भी किया है। काकाजी तो हमेशा चौपाल पर ताश पत्ती फेंटते रहे और खेतों में खटते-जुटते रहे हम घानी के बैल की तरह। जैसा वी वसोज उनको छोरो भी। कदी फली फोड़ी ने दो नी करी उनने। क्या हम अपने बच्चों के गले पर नाखून रख दें। क्या करेंगे हम। खेत नहीं होंगे तो हम कहीं के नहीं रहेंगे। कहीं के नहीं। पहले ही कहा था, कोरट-कचेरी से बराबरी का हिस्सा-बांटा करा लो। आज सेठ बजते गाँव भर में। साढ़े 5 बीघा पीवत की मिलती तालाब किनारे और 3 बीघा यहाँ की। साढे आठ बीघा में तो दलिद्दर ही दूर हो जाते हमारे। पर कौन सुनता मेरी। औरत को अक्कल कहाँ। सारी अक्कल तो आदमियों में ही भरी पड़ी है न। घर-घर में ही बाँट लिया, लो अब लड़ो सालों साल तक कोरट-कचेरी। कहाँ से पूरा करोगे कचेरी का खर्चा। कोई सेज है कोरट लडनो। अच्छा-अच्छा से नी लडाय फिर हमारी कायं औकात। माँ उबली जा रही थी चूल्हे पर चढ़ी भरतिये की दाल की तरह और पिता बर्फ  की तरह ठंडे। दोनों के गुस्से की अभिव्यक्ति का अपना-अपना ढंग था।
फिर तो तहसील और जिले की कोर्ट के सम्मन कई-कई बार आते रहे पिता के नाम। कुछ बरसों तक वे जाते रहे किसी उम्मीद की आस में। भूरे और पीले पड़ चुके कागजों से पिता की संदूक भर गई पर पिता न्याय की लड़ाई हारते जा रहे थे। वकीलों की फौज थी वहां। गवाह थे वहां। अफसर थे वहां। पर वे कहीं नहीं थे इस पूरे सिस्टम में। वे सिस्टम के घेरे से बाहर थे। इसलिए उनका सच भी झूठ ही रह गया हमेशा के लिए। धीरे-धीरे जमीन उनके हाथ से फिसलती चली गयी। वे अपने ही पुरखों की जमीन से बेदखल कर दिए गए थे। उनके हाथ कुछ नहीं लगा था। युद्ध हार चुके सैनिक की तरह लौटे थे वे उस दिन कचहरी से। जैसे अपना वजूद वहीं छोड़ आये हों, पर वे टूट कर भी बिखरे नहीं थे। कहते थे, हिम्मते मरदा तो मदद्दे खुदा। सुबह से दूसरों के खेतों में काम करने निकल जाते तो सूरज के डूबने पर ही घर लौटते। वे काट रहे थे बुरे दिनों का जाल अपनी धारदार हंसिया से, वे निकाल रहे थे अपने हिस्से का अनाज अपनी नोकदार कुदाली से। वे सच पर पड़ी मिट्टी हटा रहे थे अपने फावड़े से। उनकी तगारी में सुस्ताते थे सूरज, चाँद और धरती। पिता कहते थे, सब कोरट के सम्मन के इन्तजार में हैं। सारे छोटे किसान। आज नहीं तो कल। कोई मुलाजिम उनका सम्मन लेकर आता ही होगा।  जमीनें अब उनकी होकर भी उनकी नहीं रह गई हैं। एक दिन चारों तरफ सिर्फ कागज ही कागज होंगे। सरकारी मोहरें लगे कागज। तब धरती नहीं बचेगी किसी खेत के लिए।
इस बीच काका के बेटों ने जमीन बेच दी और वे शहर चले गए। जिस सेठ ने खरीदी थी यह वहां खाद और कीटनाशक का गोदाम बना रहा था। यह उनके लिए बड़ा झटका था। जमीन हाथ से चले जाने से भी बड़ा। पिता टूटते जा रहे थे अब बुरी तरह। वे उदास और अपने में ही खोये रहने लगे थे। जैसे जिन्दगी की जंग जीतने का कोई माद्दा ही नहीं बच गया था अब उनके भीतर। पिता रात के अँधेरे में चुपचाप निकल पड़ते और उस खाली जमीन पर भटकते रहते। जैसे उस अतीत को जी रहे हों फिर से। जैसे उस जमीन पर स्मृतियों के हल चलाते और ऐसी ही एक अँधेरी रात पिता वहीं पास के कुंए में डूब गए। सुबह कुछ नहीं बचा था, निर्जीव देह के सिवा। पिता तैरना जानते थे फिर कैसे डूब सकते हैं। शायद वे तैरना ही भूल गए हों या तैरना ही नहीं चाहा हो उन्होंने।   
पिता के जाने के बाद हमारे हाथ कुछ नहीं था। दो रोटी की उम्मीद में गृहस्ती की गठरी बांधे आ गए थे हम भी शहर। कई साल गुजर गए पर कभी गाँव जाने की इच्छा ही नहीं हुई।