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Monday 20 Nov 2017

हेरोडिऑस (4)

प्रत्यय को मानें।
    इस वक्त, मण्डप के किसी सिरे, विवर्ण चेहरा और पसीना भरी भौं लिया हुआ ऑउलस अपनी तोंद पर दोनों हाथ पसारे पड़ा था।
        सैड्यूजि़यों ने यों चेहरा बनाया मानो उसकी पीड़ा के प्रति सहानुभूति दर्शा रहे हों, ताकि, शायद, अगले दिन, उनको राजकीय-याजक बना दिये जाने का ऐलान हो जाये। जबकि एंटिपास अपने मेहमान की यंत्रणा के बढऩे से हताश हुआ। बेशक, वाइटेलियस स्थिरचित्त बना रहा, यद्यपि उसे थोड़ी चिंता अवश्य हुई, क्योंकि पुत्र का अवसान अपना ऐश्वर्य गंवा देने समान होगा।
    हालँाकि ऑउलस, अतिभार से भरे उदर में से मलत्याग के जरिये तन्दुरूस्त हो, पहले ही जैसा, खाने-पीने को ललचा उठा।
    ''अरे कोई है?-थोड़ा मार्बल-डस्ट  ले आओ!ÓÓ उसने हुकुम फरमाया,''न हो तो क्ले आवॅ नेक्सस, या सी-वाटर कुछ भी ले आओ! नहा लूँगा तो ठीक लगेगा।ÓÓ
    उसने बड़ी मात्रा में किसा हुआ बर्फ निगला; तब भूख उभरी जि़बान ललचायी; वह, मसालेदार कीमे और ब्लेक बर्ड की रकाबियों में से किसी एक को चुनने के लिए मचला; फिर, आखिर में  उसने, कद्दू के- शहद मिले किसी व्यंजन को खाना पसंद किया। छोटे कद के एशियाटिक ने चकित हो अपने स्वामी की ओर सराहना भरी नजरों से देखा; भकोसने के इस प्रदर्शन को देख उसने उसे किसी उत्कृष्ट कौम का कोई अद्भुत प्राणी माना।
    दावत जारी रही। परिचारक मेहमानों को तरह-तरह के गुर्दे, डोरमाइस तथा नाइटएंगल्स के गोश्त के टुकड़े, और वर्क चढ़े मिन्स-मीट परोसते गये। पुजारी गण तथाकथित पुनर्जीवन के विषय पर परस्पर बहस करते रहे। फिलोन के शिष्य रहे प्लेटोवादी अमोनियस ने उन यूनानियों को उजबक और मूर्ख करार देते हुए कहा कि वह उनकी भविष्यवाणियों को हास्यास्पद मानता है।
    मार्सेलस और जेकब परस्पर सटे बैठे थे। मार्सेलस ने, मिथरा के बपतिस्मा के तहत महसूस हुए अद्भुत आनंद का विवरण दिया तो जेकब ने उससे ईसा का अनुयायी बन जाने का वचन लिया।
    साकेड और बेबीलोस से मंगवाई हुई खजूर की और टमरिस्क की मदिरायें दोहत्था-कलशों से चषकों में, चषकों से प्यालों में, और फिर प्यालों से मेहमानों के गलों में उतरीं। हर कोई बातों में मशगूल रहा, सभी के हृदय प्रफुल्लता से फूलते रहे। जासिम, यहूूदी होने पर भी ग्रह-नक्षत्रों की सराहना अभिव्यक्त करने में जरा नहीं झिझका। अफाका से आये हुये किसी व्यापारी ने, यायावरों के समक्ष हिएरापोलिस के मंदिर के अद्भुत वास्तुशिल्प का बखान किया! उसे सुन कईयों ने यात्रा का खर्च जानना चाहा। कई अन्य लोग अपने स्थानीय धर्म ही के सिद्धांतों पर अडिग रहे। किसी-प्राय: पूरी की पूरी दृष्टि खोये हुए- जर्मन ने कोई प्रार्थना गायी, जिसके अनंतर, स्केण्डिनेविया के अंतरीप का उत्सव मनाते हुए गीत में, श्रोताओं को 'अपने-अपने सिरों के इर्द-गिर्द आभा-चक्र धारे देवताओंÓ का दिखाई पडऩा आमफहम् था। साइचेम से आये हुए लोगों ने कछुए का गोश्त खाने से इंकार कर दिया क्योंकि पवित्र आत्मा एजि़मा के प्रति उनमें श्रद्धा का भाव था।     दावतखाने के बीचोंबीच खड़े कतिपय समूहों के बातें-करते मुँहों से निकली भाप मोमबत्तियों के धुएँ से मिल हल्की सी धुन्ध बना रही थी। इसी वक्त, फैन्यूअल, दीवार से सटे-सटे, गुपचुप, कमरे में फौरन लौट आया। कुछ क्षणों पूर्व वह खुले प्रांगण में, तारों-नक्षत्रों का दोबारा अध्ययन करने जा निकला था। वह टेट्रार्ख के मण्डप तक पहुँच कुछ पल ठिठका- उसे आशंका हुई कि अन्य मेजों से टकरा जायेगा तो तेल के कुछ बूँद उस पर छिटक जायेंगे-कि वैसा होना किसी ईसेन के लिए कलुषित होना माना जाता है।
अचानक किले के फाटकों पर बड़े जोरों से धड़धड़ाहट हुई। लेओकनान के बंदी बनाये जाने की खबर तेजी से फैल गयी थी, सो, ऐसा लगा कि आसपास की सारी आबादी महल पर चढ़ आयी है। मशाल उठाये लोग चारों दिशा से सड़कों पर लपके आ रहे थे; घाटी में लोगों के सिरों का स्याह हुजूम नजर आया; उनके गलों से आवाज उभरी:
''लेओकनान! लेओकनान!ÓÓ
''वह आदमी सबकुछ नष्ट कर देगा।ÓÓ जोनाथास ने कहा।
    ''अगर ऐसा ही चलता रहा तो हम ज्यादा पैसा नहीं उगा पायेंगे,ÓÓ फैरिजि़यों ने कहा।
    आरोप-प्रत्यारोप लगाए गये; अपराध स्वीकार-अस्वीकार किये गये।
    ''हमारी रक्षा करो!ÓÓ
    ''उन्हें पीछे हटने को बाध्य करो।ÓÓ
    ''तू धर्मभ्रष्ट है!ÓÓ
    ''सारे हेरोडों जैसा विधर्मी!ÓÓ
    ''लेकिन तेरे से ज्यादा नहीं,ÓÓए ंटीपास ने झिड़क कर जवाब दिया; ''मेरा पिता ही तो था जिसने मंदिर का निर्माण करवाया, नहीं क्या?ÓÓ
तब अवैध कबीलों-यूँ कहें कि माट्टाथिआस के समर्थकों-यानी फेरिजि़यों ने कुनबे के विरूद्ध किये गये सारे अपराधों के लिए टेट्रार्ख की खूब भत्र्सना की।
फेरिजि़यों की नुकीली खोपडिय़ाँ, छितरी हुई दाढिय़ाँ, दुबली-पतली भुजाएँ तथा बड़ी-बड़ी, गोल-गोल आँखें थीं; और उनके मुखड़े किसी बुलडॉग के चेहरे जैसे होंगे। पुजारियों के साथ संबद्ध ये दर्जन-भर उपदेशक और परिचारक कि जिनका जीवन 'वेदी की अग्रि पर चढ़ाई गई आहुतियोंÓ ('होलोकास्टÓ) के उच्छिष्ट पर निर्भर रहा आया, वे मंडप की दहलीज तक गये और उन्होंने अपने-अपने हथियारों से एंटिपास को धमकाया। वह उनसे मुकाबला करने खड़ा हुआ, हालाँकि वह थोड़े ही से सैड्यूजि़यों द्वारा किंचित मात्र सुरक्षित था। एकाएक उसने तनिक दूर खड़े मैन्युअस को देख उसे दौड़ आने का संकेत दिया। उधर, वाइटेलियस के चेहरे से ऐसा भाव व्यक्त हो रहा था मानो इस पूरी खलबली से वह जरा भी विचलित नहीं हुआ है।
    मण्डप से सटे खड़े फेरिज़ी अपना आपा खो दानवी उन्माद सेे जा भरे। उन्होंने तश्तरियाँ तोड़ फर्श पर दे मारी। परिचारकों ने उन्हें ऐसा कीमा ला परोसा था जो किसी गंदे पशु-खूँखार गधे-के माँस से बना था, सो, उनका गुस्सा सारे बंधन तोड़ उमड़ पड़ा। ऑउलस ने, गधे के सिर के संदर्भ में यह कहते हुए-कि वे तो उसका सम्मान करते आये-उन पर खिल्ली उड़ाती फब्ती कस उन्हें भड़का दिया। और भी आगे बढ़ते हुए उसने सूअर के गोश्त के प्रति उनकी नफरत को लेकर यह बताते हुए खूब ताने मारे कि बेशक उनकी वितृष्णा इस तथ्य से उभरी कि इस पशु ने उनके प्यारे बाकस (वाइन के देवता- यूनानी या रोमन) को मार डाला था; अधिक मजाक उड़ाते यह भी कहा कि थोड़ा खौफ खाओ, तुम तो वाइन के इतने दीवाने हो कि मंदिर ही में अंगूर की सुनहरी लता के फैले होने का पता चला है।
हँसी उड़ाते उसके शब्दों को पुजारी समझ नहीं पाये क्योंकि, गैलिलियाई वंश के फिनियाई उनका तरजुआ करने से मुकर गए। ऑउलस सहसा उखड़ पड़ा, कुछ ज्यादा ही इसलिए कि होहल्ले से भय खा नन्हा एशियाटिक वहाँ से खिसक भागा। अब शाही भकोसिये को दावत बेमजा लगने लगी; व्यंजन भद्दे मालूम दिये, उनमें स्वादिष्ट रस की मात्रा अपर्याप्त लगी। पल दो पल बीते, सुगंधित मसाले भरी-सीरियाई भेड़ की टाँगों के गोश्त से लबालब-रकाबी को देख उसकी वितृष्णा लोप हो गई।
यहूदियों के व्यवहार से वाइटेलियस किंचित सहम गया। उनका देवता मोलोच समान होगा, कि जिसे समर्पित कतिपय वेदियों को उसने अपने सफर के दौरान देखा है; तब उसे उस रहस्यात्मक यहूदी की कथाएँ याद आयीं कि जो छोटे-छोटे बच्चों को मोटा-तगड़ा कर उनकी बलि चढ़ाता। उन यहूदियों की असहिष्णुता, उनके मूर्तिभंजक रोष, उनके अड़ंगा डालते आचरण से वाइटेलिस का लेटिन स्वभाव उनके प्रति जुगुप्सा से जा भरा। वहाँ से चले जाने की मंशा से प्रोकौंसल उठ खड़ा हुआ। ऑउलस लेकिन साथ चलने से मुकर गया।
    लोगों का हर्षोल्लास बढ़ता गया। उन्होंने स्वतंत्रता के स्वप्नों में बह जाने की छूट ले ली। इजराइल की शान का पुनस्र्मरण किया, और किसी सीरियायी ने उन महान विजेताओं-एंटिगॅनी, केस्यूस, वेरूस- का जिक्र किया कि इजरायलियों ने जिन्हें हराया।
''कितने कम्बख्त हैं ये लोगÓÓ; कुपित प्रोकौंसल, सीरियाई की बात सुन चिल्ला पड़ा।
इस होहल्ले के चलते एंटिपास को हेरोडिऑस द्वारा प्रदत्त सम्राट के ताबीज का ख्याल आया; उसे बाहर निकाल क्षण भर नजरों आगे लाया; तनिक सिहरा, फिर उसे चित की सतह की ओर घुमा थामे रखा।
ठीक उसी क्षण, सुनहरे जंगले लगी बालकनी के पट पीछे खिसकाये गये; तब वहाँ से, मोमबत्तियाँ थामी हुई दासियों से घिरी हेरोडिऑस, अपनी टोपी के ऊपर-ठुड्डी पर रखी हथेली की उंगलियों से उपयुक्त जगह टिके- किरीट को थामी हुई अंदर आती नजर आयी। उसके काले स्याह केश, छोटी-छोटी अंगूठियों में से निकल, काटी तराशी आस्तीनों से युक्त चोली के सिंदूरी वस्त्र पर जा बिखरे थे। गैलरी में प्रवेश के दरवाजे की दहलीज के दोनों सिरे एक-एक भीमकाय: एट्राइडेस समान: पाषाणी दैत्य निर्मित थे कि जिनके बीच आती हेरोडिऑस यँू लगी मानों अपने सिंहों के साथ-साथ चली आ रही सायबेले हो। अपने हाथों वह कोई पटेरा - यूँ कहे कि मदिरा का प्रसाद अर्पित करने हेतु रोमनों द्वारा इस्तेमाल में लिया जाता कोई उथला रजत पात्र-उठाए हुई थी; और बालकनी के ठीक सामने, फिर, टेट्रा$र्ख की कुर्सी के एकदम निकट आ क्षण भर ठिठक चिल्ला पड़ी:
''सीज़र जिंदाबाद!ÓÓ
यह सम्मान वाइटेलियस, एंटिपास, और सभी पुजारियों द्वारा दोहराया गया। इस क्षण अचानक, दावतखाने के एकदम सिरे शुरू हुई-अचरज और सराहना से भरी -फुसफुसाहट समूची भीड़ में सरसरा उठी। कक्ष के भीतर कोई अत्यंत हसीन किशोरी बस आयी आयी और पल भर थमी ही होगी कि सारी नजरें रेंग गयीं। उसके सिर और गले को ढकी हुई महीन नीली जालीदार निकाब के पार उसकी मेहराबदार भौंओं, नन्हें कानों ,और आयवरी श्वेत त्वचा को साफ- साफ चीन्हा जा सकता था । रंगबिरंगे रेशम का कोई दुपट्टा उसके कंधों पर से झूम कमर पर , नक्काशीदार रजत कमरबंद में जा फँसा था । उसकी समूची रेशमी काली सलवार पर मेंड्रागोरा-पौधों की आकृतियाँ रजत तागों की कशीदाकारी से सिरजी हुई थीं,और, जैसे-जैसे वह अलसाये कदमों आगे चली, गुनगुनाते पक्षियों के परों से बने स्लीपरों में उछलते उसके पैरों  को देखा जा सकता था ।
    मण्डप के सामने पहुँच उसने निकाब हटा ली । अब देखो ! वह तो स्वयं हेरोडिऑस, हाँ, नवयौवन के दिनों जैसी दिखती वैसी हेरोडिऑस ही है ।         
तत्क्षण किशोरी टेट्रार्ख के समक्ष नाचने लगी। उसके  कोमल पैर किसी बाँसुरी की धुन और 'इंडीअॅन-घुँघरू की जोड़ीÓ की झंकार पर बड़ी अदा से थिरकने लगे । उसकी गोल-गोल गोरी -गोरी भुजाएँ उसके प्रलोभनों से छिटक भाग रहे किसी किशोर को इशारे तो इशारे और भी कलात्मक हलचलें कर-कर अपने मोहपाश में बाँधती नजर आयीं। वह, किसी तितली की फडफ़ड़ाहट समान फुदकती-फुदकती उसका पीछा करती लगी; उसका समूचा रंगढंग किसी जिज्ञासु मन, या किसी ऐसे तैरते-उड़ते प्रेत समान लगा कि जो किसी भी क्षण हवा में घुल व्योम में लोप हो-न हो जाये।
इस मुकाम गिंग्रास-यूँ कहें कि  फीनीशियाई मूल की छोटी सी बाँसुरी-की उदास धुन ने घँुघरूओं की झनझन को पीछे छोड़ दिया था। नाच रही परी के अंगविन्यास,अब अभिभूत करते अवसाद के सूचक जा बने थे। उसके वक्ष आहें निकालते हाँफ रहे थे; उसकी समूची हस्ती गहरी क्लांति व्यक्त कर रही थी , हालाँकि यह चीन्हना मुश्किल था कि क्या वह किसी अनुपस्थित जवान के लिए आहें भर रही है या कि उसके आलिंगन के अनंतर प्यार में भीगी साँसें ले रही है। अर्धमुदित आँखों और थिरकते अंगविन्यास ने  अत्यंत भेदभरी तरंगे-उमड़ती लहरों समान-सिर से पैर तक, उसके पूरे बदन सरसरा दी थी, जबकि चेहरा निरावेग बना रहा और झिलमिलाते पैर इत-उत घूमते डग भरते रहे ।
    वाइटेलियस ने उसकी तुलना प्रख्यात मूकाभिनय कलाकार मिन्स्तर से करी । सुध-बुध खो ऑउलस अत्यंत अभिभूत था । किसी विलासी दिवास्वप्र में डूबा टेट्रार्ख उसे ऐसा निहारता गया कि असली हेरोडिऑस ही को भूल गया। किसी स्वैरकल्पना के अवंतर उसे मन में यों उतारा मानो सैड्यूजि़यों के बीच रह रही लड़की लख रहा हो।
लेकिन आँखों समक्ष यह सुंदर युवती ख्याली नहीं असली थी। ये नर्तकी थी सलोमी, हेरोडिऑस की लड़की, जिसे कई-कई महीनों माँ ने नृत्य की और अन्य मनोहर कलाओं की दक्षता हासिल करने का प्रशिक्षण दिलवाया था तो इसी एकमात्र इरादे के तहत कि माकएरस बुलवा उसे टेट्रार्ख को पेश करे ताकि वह इस अभिनव युवा सुंदरी के प्रेमपाश और तिरिया-चरित्र में जा बँधे । योजना सफल हुई -ऐसा लगा; वह  प्रगटतया मोहित हुआ मालूम दिया, और तब हेरोडिऑस को महसूस हुआ कि अब उसके ऊपर अपना वश कायम रखना, बेशक निश्चित है ।
तत्क्षण, चित्ताकर्षक नर्तकी प्रेम और मनोवेग ही के उन्माद में आनंदविभोर होती मालूम दी। वह हिन्दुस्तान की पुजारिनों समान, या यूँ कहें कि महाजलप्रपातों के निकट थिरकती न्यूबियनों समान, या फिर लीडिया के पादरी बकान्टियो समान नाची। वह, किसी तूफान द्वारा तेजी से बहाये गये किसी फूल समान घुमड़ायी। कानों लटके आभूषण झिलमिलाये, बड़े फुरतीले अंगसंचालन ने उसके वस्त्रों के रंगों को एक दूसरे में घुलामिला दिया । भुजाएँ क्या, पैर क्या, पहनावे तक से चुम्बकत्व की ऐसी धाराएँ फूट पड़ी कि जिन्होंने दर्शकों का खून गरमा दिया।
अचानक किसी हार्प के तार समूचे प्रासाद में झनझना उठे, और समूची सभा में जयजयकार की ध्वनि गूँज उठी। सारी नजरें सलामी पर जा थिगीं कि जिसने अपने लयात्मक नृत्य को पल भर थाम पैरों को खूब फैला, घुटनों को जरा न नमा, अपनी लचीली देह को, सहसा, इतना कि ठुड्डी फर्श छूने लगे , नीचे झुका दिया; तब उसके सारे दर्शक-परहेज और अभाव का जीवन जीते खानाबदोश, व्यभिचारों में माहिर रोमन सिपाही, धनलोलुप पटवारी, यहाँ तक कि चिड़चिड़े वयोवृद्व पुजारीगण भी फूले नथुने उठा टकटकी लगा उसे देखने लगे।
अब वह बड़ी प्रचण्डता से एंटिपास दि टेट्रार्ख की मेज के चारों ओर घुमड़ पड़ी। वह उड़ती आकृति की जानिब घूमा और किसी उन्मादी कामना के तहत उभरी विलासी आहों से किंचित अवरूद्ध आवाज में ललक उठा: ''इधर........, इधर तो आओÓÓ! लेकिन वह घुमड़ती रही , जबकि डल्सिमरों का  संगीत धमाधम करता जोर शोर से बजता ही बजता गया,और उत्तेजित दर्शकों ने अपनी वाहवाही बेहद ऊंची-ऊंची आवाजों में गुंजा दी।
टेट्रार्ख ने दोबारा-पहले से  ज्यादा ही ऊँची आवाज लगा-उसे पुकारा: ''इधर, इधर आओ! तुम्हारे नाम केपरनॉम करता हूँ , ताइबेरियस का पूरा मैदान ! मेरे सारे सिटेडॅल  ! हाँ,हाँ , मेरा आधा साम्राज्य !ÓÓ
नर्तकी पुन: पल दो पल थमी; फिर किसी कौंध के समान उसने अपनी हथेलियों पर भार दे अपने पैरों को ऊपर हवा में लंबवत उछाल दिया। ऐसी अनोखी अंग मुद्रा बना वह, किसी विशालकाय कीट समान, हाथों से फर्श पर,कुछ दूर चल, निश्चल खड़ी हो गयी।
उसकी रीढ़ गरदन के पिछले भाग पर समकोण बना ऊँची जा उठी थी । पैरों खड़ी मुद्रा में उसके अंगों को ढक रहे पीले-पीले रेशमी लहंगे अब कंधों पर जा गिर उसके चेहरे को - किसी इंद्रधनुष समान - घेर रहे थे। उसके ओंठ बैंजनी आभा लिये हुए गहरे लाल रंगे थे , मेहराबी भौंएँ  काली स्याह थी, उसकी चमकती आँखों में से अद्भुत् दीप्ति प्रस्फुटित हो रही थी ;  और पसीने की अत्यंत महीन बूंदों से जा  भरा हुआ माथा,ओस से आच्छादित श्वेत संगमरमर लग रहा था ।
उसने  कोई आवाज नहीं  निकाली; उधर जनसमूह की सभी नजरें उस पर गड़ी रहीं।
मण्डप के ऊपर निर्मित दीर्घा से आयी किसी चुटकी के बजने की ध्वनि सुन , तत्क्षण पक्षी समान फुर्तीली किसी गतिविधि के द्वारा सलोमी सीधे पैरों उठ खड़ी हुई। अगले ही क्षण , हवा की मानिंद सरसराते हुए, आनन फानन, दीर्घा के समक्ष पहुँच, गरदन झुका, टेट्रार्ख की जानिब नजर उठा, मुस्करा, शिशुवत सहजता दर्शाते हुए उसने बड़े अदब से मुँह खोला : ''हुजूरे -आला से एक ही दरख्वास्त है, कि मुझे ,किसी रकाबी पर रखा, एक शख्स का सिर, बतौर इनाम, दिया जाये, कि जिसका नाम -। ÓÓ वह पल भर यों झिझकी मानो भूल तो नहीं रही ; फिर बोल पड़ी, ''जिसका नाम है लेऑकनान!ÓÓ एकदम भौचक टेट्रार्ख कुर्सी में गहरा जा धँसा ।
नर्तकी को दिये गये वचन से बद्ध एंटिपास की सूरत पर लोगों की निगाहें यह देखने जा अटकीं कि अब वह क्या करेगा! तत्क्षण उसे, उसी रात किसी विशिष्ट शख्सियत की मौत बाबत फैन्यूअल की भविष्यवाणी का ख्याल आया - अपने ऊपर मंडराते 'पे्रतÓ को अन्य किसी पर खिसका देने से वह निस्संदेह बेखटके हो जायेगा, एंटिपास ने सोचा। अगर लेऑकनान सचमुच ही बहुचर्चित इलियास होगा तो उसमें स्वयं की रक्षा की ताकत होगी - वह अपने को बचा लेगा; अगर, सिर्फ  सामान्य आदमी ही होगा तो उसके वध का कोई महत्व नहीं है। उसके आसन निकट खड़े मैन्यूअॅस ने अपने स्वामी के खयाल भाँप लिये । वाइटेलियस ने उसे नजदीक बुलवा -कालकोठरी पर तैनात सिपाहियों के पास - सर कलम करने का हुकुम पहुँचाने के  लिए उसके हाथों थमा दिया। इस प्राणदण्ड  से उसे बड़ी  राहत मिलेगी, उसने सोचा। कुछ ही क्षणों में सब खत्म हो जायेगा ! लेकिन मैन्यूअॅस ने पहली  दफा अर्पित कार्य  उपयुक्त ढंग  से निष्पादित नहीं किया। कक्ष छोड़ बाहर जा फौरन लौट आया - वह बेहद व्याकुल हो गया था ।
पिछले चालीस वर्षों से वह राजकीय जल्लाद का कार्य संपन्न करता आ रहा था। उसी ने पानी में डुबा एरिस्टोबुलस को मारा, अलेक्जेंडर का गला घोंटा, मट्टाथियास को जिंदा जलाया, जोइमस का, पाप्पस का, जोसेफस का, और आर्टिपेटर का सिर काटा; लेकिन लेऑकनान को मारने की हिम्मत नहीं जुटा  पाया! उसके दाँत कटकटाने लगे और सारा बदन काँप उठा ।
उसने कहा, उसे कालकोठरी के सामने अनेकानेक घूमती आँखों से प्रतिरक्षित, बड़ी भारी किसी तलवार को भाँजता हुआ ,किसी लौ समान दमकता और फड़कत - समारियाईयों का फरिश्ता नजर आया। कक्ष में  साथ आये दो पहरेदारों से उसने अपने वचनों की पुष्टि का आग्रह किया। जबकि उसकी बात मुकरते उन्होंने अपने ऊपर तलवार उठाते किसी यहूदी कप्तान का जिक्र किया कि जिसके वार से बच उसे वहीं का वहीं ठिकाने लगा दिया गया ।हेरोडिऑस का उन्माद भीड़ के खिलाफ धाराप्रवाह उगली गयी भत्र्सना द्वारा व्यक्त हुआ। उसने बालकनी की रेलिंग इतने कस कर पकड़ी कि अपने नाखून ही तोड़ लिये  ; उसकी पृष्ठभूमि में खड़े दोनों प्रस्तर सिंह उसके कंधों  को छूते और उसकी में अपनी दहाड़ गुंजाते मालूम दिये ।
एंटिपास ने उसके सुर में अपना सुर मिला दिया; सारे पुजारी, सिपाही और फेरिज़ी प्रतिशोध की मुद्रा बनाये एक साथ चिल्लाने लगे , कि जिनसे शेष भीड़ आवाज मिलाती लगी , कि जो इस बात से कुद्ध हुए कि एक मामूली गुलाम हुकुम- अदायगी में हीला-हवाला कर उनकी मस्ती में खलल डाल रहा है।
हथेलियों में सिर छिपा मैन्यूअॅस पुन: कक्ष से बाहर चला गया ।
दोबारा किया गया विलंब कुछ ज्यादा ही लंबा खिंच जाने की वजह हर किसी की बेहद उबाऊ लगा । इस क्षण ,बाहरी गलियारे में से भारी कदमों के चलने की कोई ध्वनि कानों पड़ी; तब कक्ष में पुन: साँस थामा सन्नाटा आ बसा। दुविधा, असमंजस, प्रलम्बन से धीरज टूटता जा रहा था। सहसा दरवाजा धड़ाम से ख्ुाला कि जिसमें से मैन्यूअस भीतर दाखिल हुआ। वह भुजा लंबी रख, हथेली में केश पकड़, लेओकनान का कटा सिर लटकाया हुआ था। उसके इस रूप में प्रकट होने का इतनी जबर्दस्त वाहवाही से स्वागत हुआ  कि जिसने उसमें रौब और पुनरूज्जीवित-हौसला भर दिया ।
किसी सुनहरी रकाबी मेें सिर रख उसने उसे सलोमी को पेश किया कि जिसने सीढिय़ाँ उतर 'पुरस्कार Ó ग्रहण किया। हलके कदमों फुदकते वह पुन: बालकनी में जा चढ़ी ; तत्क्षण - टेट्रार्ख द्वारा आज सुबह किसी पड़ोसी मकान  में नजर आयी, बाद में दोबारा हेराडिआस के कक्ष में आंशिक रूप में झलकी- किसी प्रौढ़ दासी के हाथों आ थमी रकाबी एक से दूसरी मेज तक फिरायी गयी। दारूण भार उठायी वह जैसे ही टेट्रार्ख के निकट आयी उसने देखना टाल गरदन घुमा ली। वाइटेलियस ने उसकी ओर विरक्ति से भरी सरसरी दृष्टि डाली।
मण्डप से नीचे उतर मैन्यूअॅस ने स्त्री के पास से रकाबी अपने हाथों  ले रोमन कप्तानों के, तत्पश्चात कक्ष की अपनी बाजू बैठे सभी अतिथियों के समक्ष प्रदर्शित की।सभी ने कुतूहल भरी नजरों उसे देखा। पलक झपकते नीचे उतरती तलवार की पैनी धार ने जबड़े पर से धड़ काट सिर अलग कर दिया था। मुँह  के  किनारे-मानों किसी ऐंठन से-खिंचे हुए थे। दाढ़ी पर खून के थक्के जमे थे । बंद पलकों में कैसी-न-कैसी सीपी नुमा पारदर्शिता थी , और , हर ओर दीप्त मोमबत्तियों ने भाजन के वीभत्स पदार्थ को रेशा -रेशा उजियार दिया था ।
घूमता-फिरता  मैन्यूअॅस उस मेज पहुँचा जहाँ पुजारी बैठे थे । उनमें से किसी एक ने रकाबी को पूरा गोल घुमा सिर को चारों ओर से देखा। तब ,समूचा साहस हासिल किये हुए मैन्यूअॅस ने ,पल भर की झपकी ले बिलकुल इसी क्षण जागे  ऑउलस के समक्ष रकाबी जा रखी ; फिर अंतत:, पुन: एंटिपास के आगे  पसरी मेज पर ठीक से जा उतारी। आखिर, फडफ़ड़ाती-फडफ़ड़ाती  मोमबत्तियाँ बुझने लगी । मेहमान लौट गये ; अब ,अंतत: बड़े भारी कक्ष में  कोई न बचा सिवाय एंटिपास के कि जो हथेलियों पर अपना माथा झुकाया  लेओकनान का सिर लखता बैठा रहा ;  और ,कक्ष के मध्य , स्तंभों के बीच बनी सबसे लम्बी सरणी में हाथों को ऊपर उठाया फे न्यूअल जोर-जोर से प्रार्थना गा रहा था। सूरज के उदय होते-न-होते, लेऑकनान द्वारा किसी मिशन पर भेजे गये दो आदमी ,बहुप्रतीक्षित और संभावनायुक्त किसी समाधान के साथ महल लौटे । उन्होंने फेन्यूअल के कानों उस संदेश को बताया,जिसने उसे बड़े हर्ष के साथ सुना। फिर उसने, दावत के अवशेषों के बीच अभी तक भी रकाबी में रखे अवसाद भरे 'सिरÓ को उन्हें दिखाया । कोई एक आदमी बोला : ''हिम्मत न हारो ! मृतकों बीच वह इसीलिए जा पहुँचा है ताकि क्राइस्ट के आगमन की घोषणा करे!ÓÓ
ठीक उस क्षण इसेन के जेहन में लेऑकनान के ये शब्द उतरे  : ''ताकि उसकी महिमा में वृद्धि हो , मेरी  क्रमश :