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Thursday 23 Nov 2017

हेरोडिऑस (1)

गुस्तेव फ्लाबेअर
अनु. इंदुप्रकाश कानूनगो
 282  रोहित नगर (प्रथम) गुलमोहर भोपाल  262039
मो. 09981014157
मृ-एक-तक सागर के पूर्वी तट माकएरस का सिटॅडॅल खड़ा था। ज्वालामुखी चट्टान बासाल्ट की किसी शंक्वाकार ऊँचाई पर निर्मित वह चार (एक एक इधर उधर की बाजू; एक सामने की, और चौथी पीछे की बाजू विन्यस्त) गहरी घाटियों से घिरा था। सिटॅडॅल के निकट पसरी भूमि पर, मिट्टी की ऊबड़-खाबड़ लहरियादार रूपरेखाओं में बनी किसी वृत्ताकार प्राचीर के भीतर एक-दूसरे से घिरे अनेकानेक घरों का झुरमुट था। चट्टानों को काट-काट तराशी हुई कोई आड़ी-तिरछी सड़क नगर को (किसी गर्त के भीतर लटक रहे पाषाणी मुकुट में जड़े आभूषणों समान अनेक कोनों और असंख्य बुर्जों से रची) एक सौ बीस हाथ ऊँची दीवारों से घिरे किसी किले से जोड़ रही थी।
उत्तंग दीवारों के भीतर, प्राय: पूरे के पूरे उत्कीर्णित मेहराबों से विभूषित एक महल था, कि जिसके चारों ओर निर्मित खुली छत अपनी एक बाजू (किसी तिरपाल को ताने ऊँचे-ऊँचे स्तंभों को थिगाये हुई) सामान्य काष्ट से निर्मित किसी खूब लंबी चौड़ी बालकनी में विस्तार पायी हुई थी।
किसी ब्राह्ममुहुर्त (सूरज उगने के पहले) राज्यपाल हेरोड एंटिपास टेट्राख नितांत अकेला बालकनी में आया। किसी एक स्तंभ से जा टिका वह चहुँदिश नजरें घुमाता गया।
महल के नीचे, घाटी में, उन पर्वतों, कि अथाह गहराई में निमग्न जिनकी नींवे अभी तक भी अंधकार ही में डूबी हुई होंगी, हाँ, उन पर्वतों के सिरों की चोटियाँ बस, भ्रामक भोर के उजाले में सिर्फ चीन्ही भर ही जा सकी होंगी। हवा में रिस आया हुआ हलका सा कोहरा, पल बीते न बीते, ऊपर उड़ा; उड़ा कि मृतक सागर का तट उघड़ आया। माकएरस के पीछे से उग रहे सूरज ने पाषाणी तटों को, टेकडिय़ों को, और मरूभूमि को, और जूडिआ के ऊबड़-खाबड़ तथा अलसुबह धूसर नज़र आ रहे दूरस्थ पर्वतों को झलकाते हुए, द्युलोक में उज्जवल लालिमा बिखेरी। काली स्याह परछाई बिछा रहा एन-गेडि श्रंृखला के बीचों-बीच होगा कि जिसकी पृष्ठभूमि में गुम्बद सा गोल शिखर उभारा हेब्रो दीख पड़ा; एस्काल पर अनार के पेड़ ही पेड़ बिछे थे; सोरेक पर अंगूर की लताएँ ही लताएँ ; कारमेल के ऊपर तिल के खेत पसरे होंगे; और उधर, जेरूसलेम की चरम शान बना हुआ अंतोनिआ का बुर्ज अपना विशालकाय घनाकार रूप दर्शा रहा था। टेट्रार्ख ने वहाँ से अपनी टकटकी दक्षिणावृत घुमा जेरिचो के खजूरों पर यों गड़ा दी कि अब उसके ख्याल अपने प्रिय गेलिली के अन्य नगरों (केपरनॉम, एंडोर, नाज़ारथ, ताइबेरिएस) पर घुमड़ पड़े, कि जहाँ वह अब कभी नहीं लौट पायेगा।
उसकी टकटकी में, अपने अनुर्वर मैदानों के जरिये बाधा डाल रहा जार्डन निर्मल आकाश तले इतना उज्जवल और चमकीला लगा कि उसने आँख को सूर्यकिरणों से चमकते बर्फ समान चौंधिया दिया।
मृत सागर अब जगमगाते खनिज (लेपिस लेजुलि) की चादर समान दिखाई पड़ा; कि जिसके दक्षिणी सिरे, यमन के तट, एंटिपास ने (अभी तक जो कुछ धुंधला नज़र आ रहा होगा, उसे) बिलकुल स्पष्टतया चीह्न लिया। वहाँ तने अनेक तंबू आँखों आगे साफ नज़र आये; घोड़ों के कतिपय झुंडों बीच भाला उठाये जवान आ जा रहे थे। बुझते जा रहे अलावों को सूरज की उष्माती रश्मिमालाओं के अनंतर नंगी आँखों देखा जा सकता था।
 ये फौजी टुकड़ी अरबों के उस शेख की थी कि जिसकी कन्या का, टेट्रार्ख ने, परित्याग कर, इटली में रह रहे (सत्ता की महत्वाकांक्षा से रिक्त) अपने ही भाई की पत्नी हेरोडिऑस से ब्याह रचा लिया था।
रोमनों से सहायता और कुमुक की बाट जोह रहा, लेकिन सीरिया के गवर्नर वाइटेलियस का अभी तक कहीं नामों निशान न देख वह धीरज खोता हुआ चिंता से घुला जा रहा था। कहीं एग्रिप्पा ने सम्राट के कान भर उसका मंसूबा ढेर तो नहीं कर दिया, वह सोचने लगा। बेटानिऑ का प्रमुख शासक, यानि उसका तीसरा भाई फिलिप अपनी फौजी ताकत गुपचुप मजबूत बना रहा था। उधर यहूदी समुदाय टेट्रार्ख की मूर्तिपूजाओं से खफा हो आपा खोते जा रहे थे, उसने जान लिया कि उसके शासन से बहुत लोग ऊबने लगे हंै, सो वह दो योजनाओं - अरबों को समझाबुझा उनकी निष्ठा पुन: हासिल करना या पार्थन के साथ संधि, इन दो में से किसी एक के चुनाव पर जा ठिठका। अपना जन्मदिवस मनाने के बहाने उसने एक विशाल भोज में अपनी सेनाओं के मुखियाओं, अपने राज्य के प्रबंधकों, और गेलिली के इलाके के अत्यंत महत्वपूर्ण शख्सों को आमंत्रित कर, उन्हें एकत्र करने की ठानी।
माकएरस की जानिब आ रही सारी सड़कों पर एंटिपास ने सिरे से सिरे पैनी नज़र फिरायी। वे सूनी थी। उसके सिर के खूब ऊपर ईगलें हवा चीरती तैर रहीं थीं; परकोटे के निकट (नपे हुए अंतरालों पर) निगरानी में तैनात सिपाही दीवालों से टिके-टिके सो या ऊँघ रहे थे; किले के भीतर कोई पत्ता तक नहीं खड़क रहा था।
सहसा उसे किसी सुदूरस्थ कंठ की- धरती की अनंत गहराइयों से आती लग रही- ध्वनि सुनाई दी। उसका चेहरा मुर्झा गया। पल भर ही झिझका न झिझका कि बालकनी के जंगले पर बेहद नीचे झुक खूब ध्यान से सुनने लगा, लेकिन स्वर डूब गया था। तत्क्षण- हालाँकि, इस दफा निस्तब्ध हवा में- फिर उभरा। जोर से ताली ठोक एंटिपास चिल्लाया, 'मैन्यूस!मैन्यूस!Ó
गुस्लखाने के किसी हम्मामी जैसा-सिर से कमर तक निर्वस्त्र - कोई आदमी तत्काल वहाँ आ खड़ा हुआ। काफी कुछ झुके हुए, काफी कुछ उमरयाफ्ता भी, तथापि भीमकाय कदकाठी के उस आदमी की कमर पर बंधी कांस्य म्यान में तलवार लटकी थी। किसी न किसी तरह के कंघे से एकत्र कर उसी के द्वारा ठीक ढंग से बंधे हुए खूब झबरे बाल, उसके विशालकाय सिर के लंबे चौड़े आकार की छवि को ज्यादा ही भड़का रहे थे। आँखें नींद से बोझिल लेकिन दाँत चमकते हुए; काष्ठ फर्श पर पड़ते कदम हलके; देह किसी वानर सी लचीली; जबकि उसका मुखड़ा किसी इजिप्शियन ममी सा निरावेग होगा।
''वो- कहाँ है?ÓÓ टेट्रार्ख ने इस विचित्र शख्स से पूछा।
कंघे पर अपना अंगूठा फिराते हुए मैन्यूस ने कहा:
''वहीं- वहीं का वहीं!ÓÓ
''मुझे तो उसके चीखने की आवाज सुनाई दी।ÓÓ
यह बोल गहरी साँस खींच एंटिपास ने लेओकानान - बाद के दिनों जो सैंट ज़ान दि बाप्टिस्ट कहलाया- के बारे में पूछताछ की। ''कुछ दिनों पूर्व कालकोठरी तक जा उससे मिलने की अनुमति माँगने आये दो लोगों से उसकी मुलाकात करा दी गयी क्या?- तब से अब तक तो यह पता लगा ही लिया गया होगा ना कि इस भेंट का क्या प्रयोजन होगा?ÓÓ
''उन्होंने उसके साथ,ÓÓ मैन्यूअस ने जबाव दिया, ''चौराहों पर षड्यंत्री मंत्रणा करते डाकुओं के रहस्यात्मक तेवर अख्तियार की हुई मुद्रा में छोटी सी चर्चा की होगी। फिर- यह कहते हुए कि अब वे महान समाचारों से लैस हैं- अपर गेलिली की ओर प्रस्थान कर गये।ÓÓ
एंटिपास ने पल भर सिर झुकाया न झुकाया कि ऊपर उठा, बेहद चिंतायुक्त कंठ से, आवाज निकाली:-
''पहरा कड़ा रखो! पूरी निगरानी रखो! किसी और को उससे अब मिलने न दो! सारे फाटक भिड़ा, साँकलें चढ़ा, कालकोठरी का प्रवेश कस कर बंद कर दो। जरा भी हवा न लगने दो कि वो जीवित है।ÓÓ
ये सारे बंदोबस्त पहले ही से पुख्ता किये हुए थे क्योंकि लेओकानान यहूदी था; और मैन्यूस, सभी समारियाइयों समान, यहूदियों से घृणा करता था। मोज़ेज़ द्वारा, इज़राइल के केन्द्र स्वरूप अभिकल्पित उनका- गेरिजि़म पर्वत पर निर्मित मंदिर महाराजा ह्रिकेनस के शासनकाल ही में नष्ट कर दिया गया था; और, जेरूसलेम का मंदिर समारियाइयों की आँख की किरकिरी बना हुआ था; उसे वे अपने सुकून में बेजा दखल, और सिरों पर काबिज़ चिरस्थायी नाइंसाफी मानते थे। तभी तो मैन्यूअस उसके भीतर - वेदी को मुर्दों की हड्डियों से कलुषित करने की मंशा से - बलात घुसा था। उससे जरा ही कमतर मज़बूत उसके कतिपय साथी धर लिये गये थे और उनके सिर वहीं के वहीं कलम कर दिये गये थे।
टेट्रार्ख की बालकनी पर खड़े हो, दो पहाडिय़ों के बीच की किसी दरार में से मंदिर को देखा जा सकता था। खासा ऊपर उग आया सूरज अब उसकी सफेद झक संगमरमरी दीवारों की और छत ढकी उसकी स्वर्णिम पट्टिकाओं की चकाचौंध करती भव्यता दर्शा रहा था। समूची इमारत किसी जगमगाते पर्वत समान लग रही थी; उसकी प्रदीप्त शुचिता के भीतर से - उसकी समृद्धि और शान तक को ढँाक देता हुआ- कुछ न कुछ नितांत अलौकिक झलक रहा था।
खूब तन कर सीधे खड़े हो मैन्यूअस ने, मुठ्ठी बाँधी अपनी शक्तिशाली भुजा ज़ाओन की जानिब तानी, और नगर को कोसती अत्यंत कटु कोई लानत ऐसे परिपूर्ण विशास- यँू कहें कि ऐसे फैथ को आत्मसात करते हुए प्रवर्तित की कि कैसे न कैसे उसकी भत्र्सना फलीभूत होना ही चाहिए।
अभिशापों की ताकत के प्रति अचंभा प्रगट करते किसी भी भाव से शून्य एंटिपास सुनता रहा।
जब वो समारियायी थोड़ा नरम पड़ा, तब वह बंदी के बाबत अपनी चर्चा पर पुन: घूमा।
वह कारा से भागने के लिए तरसता है, या फिर, अपनी यथाशीघ्र रिहाई की बातें करता है। अन्य क्षणों ऐसा मौन रहता है मानों कोई बीमार पशु हो, जबकि मैंने उसे अपनी मनहूस कालकोठरी में इधर-उधर घूम-घूम यों बुदबुदाते सुना: ''ताकि उसकी महिमा बढ़ती जाये, मेरी मिटनी ही चाहिए।ÓÓ
एंटिपास और मैन्यूअस की नजरें पल भर के मौन में जा अटकीं। लेकिन टेट्रार्ख इस तकलीफदेह मसले पर चिंतन करने से उकता गया।
महल घेरी - विशालकाय अश्मिभूत लहरों सी लग रही- पर्वतशिखरों की श्रृंखला, खड़ी चट्टानों के बीच स्याह गहराइयाँ, नीले आकाश का अनंत विस्तार, उभरता सूरज, और अतल विष्णण घाटी एंटिपास के मन को किसी धूमिल बैचेनी से भर रहे थे; मरूभूमि देख वह अवसाद के जबर्दस्त गहरे भाव से जा भरा कि जिसकी रेत के ऊबड़-खाबड़ पुंज चकनाचूर हो चुके एंफिथियेटरों या ध्वंसावशेष महलों का बस सुराग भर दे रहे होंगे। गंधक की बू फैलाती आ रही हवा यूँ लगी मानो अभिशापित, और, धीमी-प्रवाहित जार्डन के नदी तल से भी ज्यादा गहरी गहराई में निमग्र नगरों से लिपटती हुई चली आ रही हो।
देवताओं के कोप के(उसे अकुला रहे) मायावी संकेतों समान लग रही इन नैसर्गिक छवियों ने उसे दहला दिया, पल दो पल निश्चल वह आँखें फाड़ा, हाथों बीच माथा थाम बालकनी के जंगले पर खिन्न मन से जा टिका।
क्षण बीता न बीता कि उसे कंधे पर किसी की हलकी-सी छुअन महसूस हुई। घूमा, देखा कि सैंडल फँसी पगथली तक बैंजनी वस्त्र में लिपटी हेरोडिऑस खड़ी है। बड़ी फुर्ती में अपने कक्ष से बाहर आयी वह हीरे जवाहरात क्या कोई गहना तक नहीं पहनी होगी। खूब घने, लहरिया-केशों की जुल्फ कंधे से झूल वक्षों बीच जा गुम हो रही थी; उसके सौंदर्य के बरअक्स तनिक-से बड़े नथुने विजयोल्लास में कँपकपा रहे थे, और चेहरा खुशी से दमक रहा था। खूब प्रेम से टेट्रार्ख का कंधा हिला बेहद प्रसन्न मन चिल्ला पड़ी:
''सीजऱ हमारा मित्र है! एग्रिप्पा बंदी बना लिया गया है!ÓÓ
''तुम्हें कैसे मालूम?ÓÓ
''मुझे मालूम है,ÓÓ जवाब देती बोली, ''ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि उसने कैलिगुला के तखत पर लोभी नजर डाली थी।ÓÓ
एंटिपास और हेरोडिऑस की कृपा पर पल रहे एग्रिप्पा ने महाराजा का मुकुट - कि जिसके प्रति टेट्रार्ख भी उसके जितना ही उत्कंठित होगा- हासिल करने का षड्यंत्र रचा था। लेकिन, अगर ये खबर सच हो, तब तो एग्रिप्पा की किसी कुटिल चाल का अब कोई भय नहीं।
''ताइबेरिआस की कालकोठरियाँ खोली जानी आसान नहीं; बल्कि, कई बार तो उनमें जीवित ही बना रहना संदिग्ध है,ÓÓ अत्यंत सारगर्भी भाव दर्शाती हेरोडिऑस बोली।
एंटिपास उसे समझ गया; यद्यपि वह एग्रिप्पा की बहन थी तथापि उसके नृशंस गूढ़ार्थों को टेट्रार्ख ने न्यायोचित ही माना। राजनीतिक छलकपट की संयोजनाओं के अवांतर हत्या और अत्याचार अपेक्षित हैं ही, वे तो राजघरानों की अनिवार्य विरासत हैं; हेरोडिआस के परिवार में इस बात के अतिरिक्त और कुछ भी सर्वमान्य नहीं होगा।
फिर उसने टेट्रार्ख के समक्ष अपनी हाल की जिम्मेवारियों के भेदभरे वृत्तांत उघाडऩे के अवांतर यह बताया कि किन-किन लोगों ने रिश्वतें खायीं, कौन-कौन से खतों को रोका गया, और नगर के द्वारों पर कितने जासूस तैनात किये गये। वह अपनी इस कामयाबी को प्रगट करने में जरा नहीं झिझकी कि कैसे उसने न्यायाधीश इयूटिशस को लुभा उसे पथभ्रष्ट किया।
''क्यों नहीं करती?ÓÓ उसने कहा, ''इसमें मेरा कुछ नहीं बिगड़ा। आपकी खातिर, मेरे स्वामी, मैंने इन सबसे ज्यादा -कुछ भी तो किया है। अपनी बच्ची तक का त्याग किया है!ÓÓ फिलिप से तलाक के बाद वह अपनी लड़की - इस उम्मीद कि टेट्रार्ख की भार्या बन अन्य बच्चे होंगे- रोम ही में छोड़ आयी थी। अभी तक उसने एंटिपास को लड़की बाबत नहीं बताया था। ऐसी नज़ाकत की इतनी अचानक प्रस्तुति का क्या कारण हो सकता है-वह मन ही मन सोचने लगा।
उनके इस आकस्मिक वार्तालाप के चलते बालकनी में कतिपय परिचर आये; कोई गुलाम कई सारी लंबी चौड़ी मुलायम गद्दियाँ उठा लाया जिन्हें उसने, फर्श पर, किसी न किसी किस्म के अंतरिम मस्नद की सूरत में विन्यस्त कर मालकिन की पीठ से सटा दिया। हेरोडिऑस ने एंटिपास की ओर से चेहरा घुमा उन नरम तकियों में घुसा दिया; लगा वह गुपचुप सिसक रही है। कुछ क्षणों बाद आँसू पोंछ वचन दिया अब कोई भ्रम नहीं पालेगी, बल्कि सचमुच वह बेइंतिहा खुश है। उसने एंटिपास को: प्रांगण में अपनी पुरानी लंबी-लंबी दिलखुश बातों-ही-बातों के; कुण्डों निकट मुलाकातों के; दि सेक्रेड वे पर चहलकदमियों के, और, रोमन केम्पेग्रा ही के अंचल में - फूलों लदे उपवनों बीच निर्मित ग्राम्यभवन में- झरनों की मधुर छपछप सरसर सुनते हुए- झूले झूलने के : बीते क्षणों की याद दिलायी। उसकी चितवनें पुराने दिनों में रही आयी जैसी ही मनहर थी; निकट उसकी छाती पर सिर रख उसने बड़े स्नेह से उसे पुचकारा।
लेकिन उसने उसके ज्वार को झिड़क दिया। जिस प्रेम की लौ वह पुन: भड़का रही होगी वह कभी का मर चुका था। इसकी बनिस्बत वही अपनी सारी बदकिस्मतियों, और, युद्ध को जारी रखे हुए बारह वर्षों बाबत सोच रहा था। विलंबित चिंता ने टेट्रार्ख को वक्त से पहले बूढ़ा बना दिया था। बैंजनी चोगे के नीचे उसके कंधे नीचे जा लटके थे; उसके श्वेत हो रहे केशों के गुच्छे इतने जा बढ़े होंगे कि वे दाढ़ी से जा मिले थे, और धूप उसकी तो उसकी, हेराडिऑस की भी भौं के विचित्र रंगढंग उभार रही थी। स्त्री के कोमल लुभावन को टेट्रार्ख द्वारा ठुकरा दिए जाने के पल बीते, युगल ने - विष्णण मन- परस्पर नजरें मिलायीं।
पहाड़ी रास्तों में जीवन के चिह्न उभरने लगे। गड़रिये भेड़ों को घास चराने ले जा रहे थे; बच्चे भार उठाये गदहों को हाँकते ले चर रहे थे; जबकि शाही घुड़साल के साईस घोड़ों को महल बाहर ला पानी दिखाने नदी तट ले जा रहे थे। माकएरस के ऊँचे स्थानों से उतरते उतरते कुछ एक राहगीर किले के पीछे जा लोप हो गये; जबकि घाटियों से ऊपर चढ़े कतिपय लोग महल तक पहुँच प्रांगण में अपना माल - असबाब उतार रहे थे। उनमें कई एक टेट्रार्ख को रसद मुहैया करते लोग थे; तो कुछ एक अपने स्वामियों के पहुँचने के पेश्तर आ रहे उसके अपेक्षित अतिथियों के नौकर-चाकर थे।
छत के उतरते किनारे, बाँयी ओर, अचानक एक ईस्सेन दिखाई दिया, सफेद वस्त्र पहना, नंगे पैर; वह अपने हुलिये ही से स्टोइक दर्शन का अनुयायी लगा। कमर पर लटकी म्यान से तलवार खींच मैन्यूअस अजनबी की जानिब लपका।
''मार डालो,ÓÓ हेरोडॉइस चिल्लायी।
''नहीं, ठहरो!ÓÓ टेट्रार्ख ने फौरन टोका।
दोनों जवान पल भर निश्चल रहे, फिर छत से नीचे उतरे, हालांकि उनकी दिशाएँ विपरीत होंगी, तथापि नजरें एक दूसरे पर गड़ी हुई थीं।
''मैं उस आदमी को जानती हूँ,ÓÓ उनके ओझल होते हेरोडिऑस ने कहा। ''उसका नाम फैन्युअल है। वह लेओकानान को खोजने का जतन करेगा, क्योंकि जाने किस नादानी वश आपने उसे जिन्दा छोड़ दिया है।ÓÓ
एंटिपास ने कहा कि किसी दिन वो आदमी हमारे काम आ सकता है। जेरूसलेम पर अपने हमले के दौरान हमें शेष यहूदियों की निष्ठा मिल सकती है।
''नहीं,ÓÓ हेरोडिऑस बोली,''यहूदी किसी भी स्वामी को स्वीकार कर लेंगे, वे किसी भी तरह की सच्ची देशभक्ति की भावना के योग्य नहीं हैं।ÓÓ वह बोलती गई कि नेहेमिआह के युग से संजोयी उम्मीदों के द्वारा लोगों के दिलों में जज्बात भरने का उद्यम करते आदमी का तो दमन ही एकमात्र नीति है।
टेट्रार्ख ने कहा इसकी इतनी जल्दी नहीं; उसने तो ऐसा ख्याल भी व्यक्त किया कि मनोविनोद ही के अनंतर लेओकनान की ओर से किसी जोखिम का डर मन में बिठाना बेमानी है।
''खामखयाली में बैठे रह जाओगेÓÓ, हेरोडिऑस चिल्ला पड़ी। उसी क्षण उसने पहाड़ी गोंद खरीदने के इरादे उसके लिए विख्यात गिलीड की यात्रा के अनंतर अपने अपमान का जिक्र सुनाया।
''दरिया के तटों हुजूम के हुजूम जमा होंगे; या खुदा; कई सारे लोग तो अपनी-अपनी वर्दियाँ ही ताने हुए होंगे। किसी टीले पर खड़ा कोई विलक्षण आदमी भीड़ को संबोधित कर रहा था। ऊँट की खाल का टुकड़ा उसकी कमर पर लिपटा था। और उसका सिर सिंह समान लग रहा था। मुझे देखते ही वह पैगम्बरों के सारे के सारे अभिशाप उगल पड़ा। आँखें आग्नेेय, जबान थर्राती हुई; उसने हथियार यों ऊँचे उठाए मानो चमचमाते हुए मेरा सिर कलम कर दें। मैं उसके निकट से दूर नहीं भाग पायी; मेरे रथ के पहिए मिट्टी में आधे आधे धँस गये; अपने लबादे से सिर बचाती हुई, और आकाश से उतरते किसी बवंडर समान मूसलाधार बरस रहे अभिशापों से उत्पन्न आतंक से जड़ीभूत मैं बमुश्किल बस रेंग भर पायी!ÓÓ
वाणी को अविरत जारी रखी वह बताती गयी कि इतना ज्ञान अभी तक रखे हुए उस शख्स ने तो मेरे ही दिमाग को दूषित कर दिया था। गिरफ्तार किया जा कर जब रस्सियों से बाँधा गया तब चाकू ताने तैनात सिपाही इतने चौकन्ने होंगे कि जरा भी प्रतिरोध करे तो चीर फेकेंगे, लेकिन वह तो नितांत सौम्य और आज्ञापरायण बना रहा। कारा के भीतर धकेले गये उस आदमी की कोठरी में किसी ने विषैले सर्प उठा फेंके लेकिन कितना विचित्र! - पल बीते वे सब उसे जरा भी छुए बगैर, निष्प्राण हो गये। इस कदर विचारहीन इन मायावी हरकतों ने हेरोडिऑस को क्षोभ से भर दिया। और फिर, उसने तहकीकात की क्यों इस शख्स ने उस पर हाथ उठाया? ऐसी हरकतों के लिए मचलने के पीछे उसकी क्या दिलचस्पी होगी? हजारों लोगों के समक्ष, मेरे प्रति जिल्लत उगलते वचन, तत्क्षण दोहराये जाते हुए दूर तक फैला दिये गये; कि जो मुझे हर कहीं सुनाई दिये। सिपाहियों की किसी अक्षौहिणी के मुखालफत में तो मैं अपनी बहादुरी दर्शा सकती थी; लेकिन, तलवार से कहीं ज्यादा घातक और ताकतवर इस रहस्यात्मक ही नहीं बल्कि प्राय: अग्राह्य यह प्रभावशाली दबाव सिर चकरा दे रहा था! गला अवरूद्ध कर रहे भाववेगों की वजह आवाज न निकाल पा रही हेरोडिऑस छत पर एक से दूसरे सिरे कदम नापती गयी।
कोई भय उसके सिर मंडरा रहा था कि टेट्रार्ख किसी न किसी दिन सार्वजनिक मताग्रह के आगे झुक अपना मन समझा लेगा कि उसका फर्ज है कि हेरोडिऑस का परित्याग कर दो। तब सचमुच, हाँ, सचमुच सबकुछ डूब जायेगा! किशोरावस्था ही से स्वप्र संजोती आयी कि किसी दिन किसी विशाल साम्राज्य की हुकूमत अपने वश करेगी। इसी महत्वकांक्षा के तहत उसने अपने पहले खाविंद फिलिप को त्याग टेट्रार्ख का हाथ थामा जो अब उसे धोखा दे रहा है।
''आह! तुम्हारे परिवार में आ मुझे वाकई  मजबूत पाया मिला !ÓÓ व्यंग्य का पुट लिये वह बोली।
'' वह, कम से कम, तुम्हारे परिवार के बराबर तो है ही,ÓÓ एंटिपास ने जवाब दिया।
हेरोडिऑस को अपनी रगों में अपने पुरखों के (यानी, राजाओं और धर्माध्यक्षों के) खौलते खून का भास हुआ।
''तुम्हारा दादा आस्कालान के मंदिर पर तैनात मामूली परिचर था!ÓÓ उन्माद से भरी वह बोलती रही। ''तुम्हारे अन्य पुरखे चरवाहे, दस्यु, कारवाँ के राहनुमा- यानी, यँू कहें कि वे किंग डेविड को नजराने में चढ़ाये गये गुलामों के गिरोह होंगे! मेरे पुरखे तुम्हारे पुरखों को जीत लाये थे! मेकाबियों के मुखियाओं ने तुम्हारे लोगों को हेब्रान के बाहर जा धकेला था; ह्रिकेनस ने बलात उन्हें खतना करवाने को मजबूर किया!ÓÓ फिर, गँवारों के प्रति नरमी और हेरोडिऑस ही की ओर हिकारत दर्शाती नफरत भरी नजरें डालते लोगों के प्रति कायराना रूख रखने के लिए-भत्र्सना की।
''लगता है तुम भी उन्हीं के समान हो,ÓÓ वह चिल्लाती गयी, ''तुम्हें उस अरेबियाई लड़की का भी अफसोस नहीं जो फर्श की इन्हीं लंबाई-चौड़ाइयों में भटकती थी! उसे वापस अपना लो! चले जाओ उसके तंबू में- वहीं रहो! राख में पकी उसकी रोटी खाओ! भेड़ के दूध का जमा दही खाओ! उसी के स्याह गालों को चूमो- मुझे बख्शो!ÓÓ
टेट्रार्ख वाकई उसकी मौजूदगी को बिसरा चुका होगा क्योंकि उसके क्रोध पर जरा ध्यान न दे उसने तनिक ही दूर स्थित मकान के छज्जे पर हाल आयी किसी नवयुवती पर नजरें गड़ा रखी थी। उसकी बाजू लंबे-लंबे नाजुक सरकंडों का हत्था-जड़ी किसी अनोखी छतरी को युवती के सिर थामी कोई वयोवृद्ध कनीज़ खड़ी थी। बालकनी की छत पर पसारे हुए कालीन पर खुली पड़ी किसी बड़ी-सी यात्रावर्ती-मंजूषा क्या सफारी-डलिया में से निकली करधनियों, बुर्कों, और पगडिय़ों के अंबार के इर्द गिर्द स्वर्ण और रजत आभूषण यत्र-तत्र बिखरे पड़े थे। कोई एक तो कोई दूसरा आभूषण या शिरोवस्त्र समय-समय लखती मनमुदित वो- कुलीन रोमन स्त्रियों समान रत्नजडि़त फीतों से अलंकृत चुन्नटें डला लहराता अंगरखा तथा अन्य वस्त्रधारी वो नवयुवती-नीलेनीले रेशमी रिबिनों से बंधे अपने उर्वर-उर्वर प्रचुर-प्रचुर केशों के भारी-भारी गुच्छों को पीछे लहराती जा रही थी कि जो बार बार आगे उड़ आते। छाते से, किशोरी का चेहरा - एंटिपास की नजरों से - काफी कुछ छिपा हुआ होगा; तथापि, यदा कदा उसे उसकी मुलायम गरदन की, बड़ी-बड़ी आँखों की, उड़ती फिरती हँसी बिखेरते उसके नन्हे मुँह की झलक मिल जाती। एंटिपास ने देखा कि लड़की का बदन अत्यंत विलक्षण लचीली शान और रूतबे से झूल रहा है। उसकी आँखें भभकी और साँसें चलने लगीं। उसे सूक्ष्म नजरों परख रही हेरोडिऑस से यह अनदेखा नहीं रहा।
''वह किशोरी कौन है?ÓÓ अंतत: टेट्रार्ख ने पूछ ही लिया।
हेरोडिऑस ने कहा नहीं मालूम; गो उसका खँूखार आचरण एकाएक किसी सौम्य और भद्र सूरत में ढल आया।
किले के फाटक पर अनेक गेलिलियाई- यूँ कहें कि न्यायमीमांसा के पंडित, कारिंदों के मुखिया, नमक की खदानों के प्रबंधक, घोड़ों के जत्थों को खदेड़ता लाया हुआ कोई बेबिलोनियाई यहूदी - टेट्रार्ख की बाट जोहते खड़े थे। निकट आ रहे टेट्रार्ख का, अत्यंत सराहनीय उमंग से जा भरे झुंड ने स्वागत किया। अपना पूरा रूतबा बनाये रख अभिनंदन कबूलती गरदन हौले-हौले घुड़काता वह महल में दाखिल हुआ।
जैसे ही उसने किसी गलियारे में कदम रखा कि तत्क्षण किसी कोने से उछल फेन्यूअल ने उसकी राह रोक दी।
''अरे! तुम अभी तक यहीं हो?ÓÓ खिन्न होता टेट्रार्ख बोल उठा। '' तुम तो, बेशक, लेओकानान ही की तलाश में भटक रहे हो,ना?ÓÓ
''सिर्फ इतना ही नहीं; आपकी भी, मेरे स्वामी। आपको बताने की कोई अत्यंत गंभीर बात मेरे सिर मंडरा रही है।ÓÓ
एंटिपास का संकेत देख इस्सेन ने उसके पीछे पीछे किसी स्याह और विषण्ण कक्ष की देहलीज पर कदम रखे। खिड़की की किसी महीन जाली में से छन बेहद मद्धम प्रकाश भीतर रिसता आ रहा होगा। दीवारें इतनी गहरी लाल कि प्राय: स्याह ही होंगी। खूबसूरत चमड़े के फीतों द्वारा सज्जित एक आबनूसी पलंग कक्ष के कोने में रखा हुआ था। पलंग के सिरहाने (कक्ष की धुंधलाहट के किसी सिरे झलकते सूरज समान) एक सुनहरा कवच लटक रहा था। सोफे तक जा फुदका एंटिपास उसकी एक बाजू पर पीठ टिका, बैठक पर पैर पसार जा लेटा जबकि फेन्यूअल उसके समक्ष खड़ा रहा। अचानक उसने एक हाथ ऊँचा किया और दबंग मुद्रा बना बोला : ''कभी कभी, परमात्मा अपने किसी पुत्र के द्वारा संदेश भेजता है; लेओकानान उन्हीं में से कोई एक है। अगर तू उस पर अत्याचार करेगा तो सजा पाएगा।ÓÓ
''लेकिन असल तो वो ही है जो मुझे प्रताडि़त कर रहा है!ÓÓएंटिपास चिल्ला पड़ा, '' उसने मुझे किसी ऐसे काम के लिए बाध्य किया जो असंभव था। हालांकि वह कुछ कर नहीं पाया लेकिन खरी खोटी तो सुनाता रहा है। उसके द्वारा की जा रही मेरी भत्र्सना के बावजूद लेओकानान के साथ मैंने बेहतर रिश्ता ही बना रखा है। जबकि खासा उद्दंड व्यवहार बरतते हुए उसने, माकएरस से, कई लोगों को मेरे राज्य में विरोध और असंतोष भड़काने भेजा। उसे धिक्कार ! ऐसे वह मुझ पर आक्रमण करे तब तो मुझे अपनी सुरक्षा का ख्याल रखना ही होगा।ÓÓ
''निस्संदेह, उसने अपना रोष ज्यादा ही धीरज खो व्यक्त किया,ÓÓ फेन्युअल ने दिल थाम उत्तर दिया; ''तथापि ठीक सोचो; बेहतर होगा कि उसकी इस बेसब्री की अनसुनी करो। तुम्हें उसे मुक्त करना होगा।ÓÓ
''किसी खूँखार आदमी को छुट्टा घूमने दिया जाना तो उचित नहीं माना जा सकता ना?ÓÓ टेट्रार्ख ने पूछा।
''अब उससे डरने की जरूरत नहीं,ÓÓ ''वह फौरन, अरेबियाईयों, गॉल वासियों, और सायथियाईयों के पास जायेगा। उसका काम दुनिया के कोने-कोने तक फैलना चाहिए। ÓÓ
एंटिपास तनिक यों अनमनस्क हो गया मानो किसी ख्वाब में जा डूबा हो। फिर बोला:''उसमें बेशक आम लोगों के मन में जा बसने की खासी कूवत है। मेरे अपने ख्यालों को परे रखूँ तो मुझे उसे सराहना ही होगा।ÓÓ
''तब उसे छोड़ दो।ÓÓ
लेकिन टेट्रार्ख ने गरदन लहरा दी। उसे हेरोडिऑस के, और मैन्यूस के भी, और किन्हीं अन्य अनजाने खतरों का भी आभास हुआ।
फेन्यूअल ने, अपनी योजनाओं की ईमानदारी की किसी एक गांरटी के रूप में राजा के प्रति इस्सेनपंथयों के समर्पण का वचन देते हुए, उसे मनाने की कोशिश की। नाना तरह के लोभ, लालच, दंड के जरिये भी झुकाये नहीं जा सके ये लोग सितारों-नक्षत्रों केे प्रभाव समझने की शक्ति से सम्पन्न थे; थोड़ा बहुत सम्मान हासिल करने में भी किंचित कामयाबी उन्होंने हासिल कर ली थी।
''तुम तो मुझे कोई खास बात बताना चाहते थे; क्या है वह?ÓÓ एंटिपास ने कुछ न कुछ याद करते हुए सवाल किया।
फेन्युअल जबाव दे न दे इतने में कोई नीग्रो धड़धड़ाता हुआ भीतर आ घुसा। धूल से सना हुआ वह इस कदर हाँफ रहा होगा कि उसका मुँह एक ही शब्द उगल पाया:
''वाइटेलियस!ÓÓ
''क्या वह आ गया?ÓÓ टेट्रार्ख ने पूछा।
''मैंने उसे देख लिया है, स्वामी, वह तीन घंटे में यहाँ आ पहुँचेगा।ÓÓ
लोगों की आवाजाही से पूरे महल के दरवाजे खुलते-भिड़ते गये, तथा पर्दे इस तरह लहराने लगे मानों तेज हवा चल रही हो; आवाजों की फुसफुसाहट ऊपर उभर आयी; भारी भारी उपस्करों के खिसकाये जाने की तथा चांदी की तश्तरियों और रकाबियों के खडख़ड़ाने की आवाजें आने लगी। सबसे ऊँचे बुर्ज से किसी शंक्वाकार शिखर पर उभारे गये किसी जोरदार धमाके ने किले की चारों दिशा से सारे गुलामों को पुकार लिया।
-दो-
चहारदिवारियाँ लोगों से घिरी क्या घिरी कि अंतत: दुभाषिये की भुजा पर झुका वाइटेलियस किले के दरवाजों को पार कर भीतर आया। उनके पीछे मोरपंखों  और नाना दर्पणों से सज्जित अत्यंत आकर्षक एक लाल पालकी चली आयी। लेटिक्लेव से अलंकृत चोगा, और, पहनावे के आगे, खूब नीचे जो लटक, झूम-झूम अपने ओहदे की- हैसियत झलका रहा बैंजनी तमगा धारण किया हुआ प्रोकौंसल सामने था, कि जिसके पैर (कौंसिलो के बीच प्रचलित) ऊँ चे-ऊँचे तलों के जूते से कसे हुए थे। रोमन साम्राज्य के सैनिक उसकी घेराबंद सुरक्षा किये हुए थे। उन्होंने अपने बारह हथियार (यूँ कहें कि लाठियों के बंडल के बीच एक कुल्हाड़ी) दीवार से टिका दी। प्रतापी रोमन सत्ता के ध्वज के समक्ष खड़ी विशाल भीड़ में  कँपकँपी सरसरा गयी।
आठ पुरूषों द्वारा उठायी लायी भव्य पालकी आ रूकी। भीतर से एक नौजवान उतरा। उंगलियों पर अनेकानेक हीरे जड़ी अंगूठियाँ पहना था; लेकिन उसकी तोंद और सूरत मुहाँसे भरी थी। उसके समक्ष महकती मदिरा का एक प्याला पेश किया गया। उसे पी उसने दूसरे का इशारा किया।
प्रोकौंसल के पैरों साष्टांग जा गिरा टेट्रार्ख विनय की हद छूता बोलता गया कि इन इलाकों में उनकी उपस्थिति की उसे भनक तक नहीं लगी;  अगर उसे महामहिम के आगमन का जरा भी भास हो जाता तो वह हर शख्स को, तत्क्षण, राह किनारे जा पहुँच प्रोकौंसल की हुक्म अदायगी में खड़े होने का आदेश निकाल देता। बेशक प्रोकौंसल का कुटुम्ब ठीक देवी वाइटेलिया से उदित वंश परंपरा की क्रमश :