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Saturday 18 Nov 2017

इक खिलौने सा वो उठायेगा,तोड़ कर फिर मुझे बनायेगा

 

प्रेम रंजन अनिमेष
एस-3/226, रिज़र्व बैंक अधिकारी आवास, गोकुलधाम, गोरेगाँव (पूर्व), मुंबई 400063,         
 दूरभाष: 09930453711  

इक  खिलौने  सा   वो  उठायेगा
तोड़  कर  फिर  मुझे  बनायेगा

रात  आधी  है आ गया उठ कर
मुझको बिखरा के फिर सजायेगा

अपने पीछे वो दर्द रखता जा
जो  जगायेगा और सुलायेगा

तुझपे मरता हँू  क्यँू मेरे क़ातिल
जान  लेकर न जान पायेगा

वो जो  होंठों से था कभी छूटा
अपनी पलकों पर अब उठायेगा

दूर  के  देस  याद  की  चादर
कोई  ओढ़ेगा और बिछायेगा

प्यार  पहला  है  पीर  है  पहली
भूल  कर  भी   न  भूल  पायेगा

इक  मुहब्बत  का  दर्द  है  काफ़ी
फिर  क्यूं  दामन  कोई  बढ़ायेगा

सांस   रोके   हुए   हैं   सन्नाटे
कोई   'अनिमेषÓ अब तो  आयेगा

           1111
किससे   छूटेगा  कहाँ  हाथ  
तुझे क्या मालूम
कोई  कब  तक है तेरे साथ  
तुझे क्या मालूम

उससे भी अच्छी तरह मिल
जो नहीं है अच्छा
उससे फिर होगी मुलाक़ात
तुझे क्या मालूम
आज  जिन बातों पे थकते नहीं,
हँसते हँसते
कल  रुलायेगी  वो हर बात  
तुझे क्या मालूम

आ कि फूलों की तरह भीग लें इस शबनम में
अब कहाँ होगी ये बरसात
तुझे क्या मालूम

नींद में देर तलक ख्वाब धड़कते  जागे
उसने दिल पर था रखा हाथ
तुझे क्या मालूम

कितना आसान है इलज़ाम
किसी  को देना
उसकी मजबूरी-ए-हालात
तुझे क्या मालूम

जोड़ कर रख सको जितना रखो इन रिश्तों को
खोयी कितनों से ये सौग़्ाात
तुझे क्या मालूम

तू  तो  बस  जायेगा  वीरान कहीं  हो जायेगा
दिल के  भीतर का  ये देहात  
तुझे क्या मालूम

तुम थे जब सोये हुए जागी
लिये सुखऱ् आँखें
भोर  को  बुनती  हुई  
रात तुझे  क्या मालूम

कैसे लग जातीं अभी दिल
को ज़रा सी  बातें
कल  रहेगी  भी  कोई
बात तुझे क्या मालूम

काम जिससे चले बस वो ही हुनर चलता है
दुनियादारी के तिलस्मात तुझे क्या मालूम

दुश्मनी दोस्ती कुछ भी तो यहां दिल से नहीं
काँच के सारे खय़ालात तुझे क्या मालूम

खिलता इक फूल हो या चलता कोई अफ़साना
किस जगह ख़त्म की शुरुआत तुझे क्या मालूम

चालें तो चलते बिसात अपनी मगर क्या 'अनिमेषÓ
कहाँ  शह  होगी  कहाँ  मात  तुझे क्या मालूम                     

1111
     
इतने पे  छोड़  जा  कि  किनारा  दिखाई दे
जब रात हो  तो  राह का  तारा  दिखाई दे

इक सच्ची आशिक़ी की ये दुनिया मिसाल है
फिर कैसे इसको जिसने सँवारा दिखाई दे

दिल घर ही ऐसा है कोई पहरे दे कितने ही
खिड़की  कहीं  खुले तो  ये सारा दिखाई दे

निकला है चाँद जो उसे भर लो निगाह में
क्या ठीक है कि कल वो दुबारा दिखाई दे

ठिठकी रहीं इक उम्र तलक कितनी कश्तियाँ
कब उस तरफ़  से कोई इशारा दिखाई दे

दिल जानता है अब वो नहीं पहले जैसी बात
पर  दूसरों  को  क्यों  ये नज़ारा  दिखाई दे

खंजर छुपा के हाथ ज़रा इस तरह बढ़ा
जो देखते हों उनको  सहारा दिखाई दे

पलकों पे होंठ रख के अज़ल ले के जाये जब
हर पल जो हमने साथ गुज़ारा दिखाई दे

कैसा है ये झलकता हुआ हुआ रूप आर पार
भीतर जो चढ़ रहा है वो पारा दिखाई दे

आँखों की ये खऱाबी या 'अनिमेषÓ और कुछ
पीने  से  पहले  पानी  ये  खारा  दिखाई दे