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Wednesday 22 Nov 2017

दु:ख का कुआं

देव नाथ द्विवेदी
। / 9 अशोक विहार, इस्माइलगंज, फैजाबाद रोड, लखनऊ- 226016
मो 099 198 99 827  
1
दु:ख का कुआं
कभी भरता नहीं
कभी छलकता नहीं
जो इसके अंदर झांके
क्या देखे
और क्या आंके !
इसीलिये मैं
बस चुप रहता हूं
जो सब कहें
वही कहता हूं
2
खम्भों पर टिकी रहेगी छत
तो बचे रहेंगे दोनों
छत और खम्भे
बची रहेगी मिट्टी भी
खम्भों के नीचे की
पीढिय़ों के साथ
पीढिय़ों तक
बची रहेगी कहावत
कि दूसरों की भलाई
अपनी भलाई से
अलग मत रखना
3
रोज सुबह
सुंदर साफ हाथों में पुरुषों के
औरतें सहेज देतीं हैं चुपचाप
रोटियों की पोटली
और रिश्तों की गरमाहटें  
वापस लौटते हैं वे
देर गए शाम
चुपचाप थके कदमों
खाली पोटली संभाले
रिश्तों के गरमाहटों में
तब उनके गंदे हाथ
और भी खूबसूरत लगते हैं !
4
कमरे में कुल तीन थे
औरत, मोमबत्ती और आदमी।
कमरे की हवा ने
औरत से पूछा
तुम कौन हो
औरत ने कहा - मोमबत्ती
फिर हवा ने मोमबत्ती से पूछा
तुम  कौन हो
मोमबत्ती ने कहा - औरत
अब हवा आदमी की तरफ  मुड़ी
वो माचिस सा गंधाता हुआ
मक्कारों वाली मुस्कराहट फेंक
रहा था !
हवा ने उससे
कुछ भी नहीं पूछा !
5
ट्रेन की एक खाली सीट पर
ऐन बैठते वक्त
सिपाही ने टांग अड़ाकर
मुझे बैठने से रोका !
मैंने तब गौर से देखा
वहां सिर्फ  एक खाकी वर्दी थी
जबकि मुझे हुआ था
किसी आदमी के होने का धोखा !
6
कहीं अचानक यूं ही
कोई पुराना दोस्त मिले
तो चाय पानी तक ही बात रखना
हाल चाल पूछ बैठे
तो तुम्हारा झूठा सच सुनने के बाद
तुम्हारा अपना दोस्त भी
पूरे इत्मीनान से
झूठ ही बोलेगा !