Monthly Magzine
Tuesday 24 Apr 2018

अच्छे दिन

 

 गोविन्द माथुर
 क्षितिज 82/115 नीलगिरि मार्ग,
मानसरोवर,
जयपुर- 302020
अच्छे दिन
वो मेरे बुरे दिन
जो गुजरे दोस्तों के साथ
अच्छे दिन लगते हैं

किसी भी समय
कोई भी दोस्त
आ टपकता घर
अनचाहे ही
मिल जाता राह में
दिख जाता
चौराहे पर खड़ा हुआ

कई बार बातों बातों
कट जाता पूरा दिन
घर से भूखे पेट निकले हों
या भर पेट
इतनी भूख हमेशा रहती
किसी दोस्त के घर बैठे हों
दोस्त के साथ खा लिया करते

सड़क पर रहे हों तो
किसी प्याऊ पर
ठंडा पानी पी कर
ठहाके लगा लिया करते
गर किसी की भी
जेब में होती एक चवन्नी
किसी थड़ी पर, चाय पीते हुए
घन्टों बिता लिया करते

विश्वास से भरे भरे
जेब से रीते रीते
प्रतीक्षा करते, अच्छे दिनों की
गुनगुनाते रात के तीसरे प्रहर
शहर की सुनसान सड़कों पर
रफी, तलत, मुकेश गीत

कितने अच्छे थे वो दिन
जब नहीं थी ईष्र्या
नहीं था अहंकार
न ही कोई
अपेक्षा थी किसी से

कितने लम्बे लगते थे
उम्मीद से भरे वो दिन
कितने मुश्किल, लेकिन
कितने अच्छे लगते हैं
आवारगी के वो दिन