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Tuesday 21 Nov 2017

मेरी भाषा

 

कुलजीत सिंह
एम-117, गोपबंधु नगर,
छेड़ कॉलोनी,
राउरकेला- 769015 (ओड़ीसा)
मो. 09437341577
फोन- 0661248108
मेरी भाषा

एक औरत का वात्सल्य
हुआ मेरी मातृभाषा
पहला शब्द बना
उसका दुलार
उसकी सुन्दरता थी
पूरा वाक्य

और मेरी पहली कविता
उसकी आंखों में आया
एक आंसू

मैंने कहा

मैंने तुम्हें चांद कहा
फूल कहा
बसंत की बयार
चांदनी का वितान भी कहा,
पहाडिय़ों में उठती हुई तान
मखमली घास वाली ढलान भी कहा
कभी गुनगुनी धूप, कभी बारिश की झीनी फुहार

शक्ति और देवी और जगत्जननी कहा
फिर पांव की जूती और नर्क का द्वार

जब भी चाहा
कोहरे में लुक-छिप गाती हुई नदी,
झील या सागर कहा
जब चाहा रेत कहा
मीन कहा, खेत कहा

कभी तुम्हारा नाम विष की गागर रहा
कभी तुम्हीं में मोह का जाल देखा
कभी निरा कंकाल देखा

पर शायद कभी नहीं समझा तुम्हें
जीती-जागती एक पूरी औरत की तरह
नहीं
तुम्हें औरत कभी नहीं कहा!

मेरी बिटिया

मेरी छोटी-सी बिटिया को बहुत दुख है
अभी तक छोटी होने का
बड़ी हो जाने के लिए वह
मौका पाते ही फ्रॉक की जगह
लपेटने लगती है मां की साड़ी
बिना यह सोचे
कि एक दिन यही साड़ी
उसे ऐसे लपेट लेगी अपनी कुण्डली में
कि वह कितना ही छटपटाए उससे छूट नहीं पाएगी

नन्हें कम•ाोर हाथों में
बमुश्किल उठाकर झाड़ू
वह चल पड़ती है
घर भर की सफाई करने
उसे नहीं पता कि इसी झाड़ू से उड़ती धूल
उसकी मां के फेफड़ों में जम कर
अब किस तरह रूंधने लगी है उसकी सांसें
और वह क्यों खांसती रहती
जागती रात-रात भर

बड़ों की तरह वह चाहती है कपड़े भी धो डालना
जिन्हें धोते-धोते उसकी नानी की रीढ़ के जोड़
ऐसे हिले, टकराए और घिसे
कि अब बन गए हैं लाइलादर्द के सिलसिले

सिर पर लादकर कोई भी गठरीनुमा चीज
वह बन जाती है कुछ भी बेचने वाली
इस बात से बेखबर कि उस जैसी कितनी बच्चियां
बेची जा रहीं हर दिन
जाने कहां-कहां, कैसे-कैसे बाजारों में
किन-किन उपयोगों के लिए

नन्हीं बिटिया मेरी
दोपहर को, आराम करती मां की नर बचाकर
चली जाती है घर से बाहर
खेलकूद की आ•ााद दुनिया में

वह क्या जाने
अपनों की मौत और जल कर $खाक हुए घरों से
हमेशा के लिए आ•ााद हो चुके कितने ही
डगमगाते शिशु-कदम

इस बेमुरौवत वक्त में
भटक रहे कितने देशों की सरहदों के आरपार
बम बरसाते विमानों की छांह में
दनदनाती गोलियां, धमाकों, 'लैण्ड माइनोंÓ के बीच
बिना समझे अपने-पराए देश का $फ$र्क

ऐसे शरणार्थी जिन्हें
शरण मांगनी भी नहीं आती

नबी जमीनों पर सहते
अनजाने अनसुने अत्याचार
अपनी उम्र से कहीं बड़े, कहीं बड़े काम
करने को म•ाबूर, बेगाने बेदर्द घरों में
बचपन के खेल के शौक से नहीं
असहनीय यातनाओं से, दहशतों से बचने के लिए
थोड़ा ही सही पेट भरने के लिए
बस किसी तरह
जीते रहने के लिए अगले दिन तक।

मेरी मां की भाषा में

मैं हैरान हुआ
जब मैंने देखा कि
मेरी मां ने जो भाषा सिखाई मुझे
उसमें 'छिनालÓ के लिए
कोई नहीं पुल्लिंग शब्द
न ही 'रखैलÓ और 'वेश्याÓ के लिए

इतना ही नहीं
'आत्माÓ तो स्त्री है
किन्तु 'परम आत्माÓ होते ही
हो जाती है पुरुष
क्या मेरी मां की
चेतना में बसी स्त्री
रच सकती थी
ऐसी भाषा?
या वह बाध्य थी
किसी पिता की दी हुई भाषा को अपनाने
और वही मुझे सिखाने के लिए?

अकेली वह

बहुत छोटी-छोटी, निष्पाप
इच्छाएं जनमती हैं
उसके दिल में, कभी-कभार

जैसे झुलसाती गरमी के लम्बे दौर के बीच
अचानक होने वाली बारिश में
खुली सड़क पर भीगते हुए चलना
गहरी उदास शाम में
शहर के बाहर पहाड़ी की ढलान पर
सूरज को डूबता देखते और उसके बाद भी
देर तक बैठे रहना चुपचाप

किसी रात की रूपहली लय में तल्लीन
नदी किनारे रेत पर टहलना नंगे पांव
या औंधी पड़ी रहना किसी सूनी नाव की तरह
नदी की रागिनी सुनते

आसपास तन जाने वाली भौंहों
उठने वाली उंगलियों
तानाकशी की तेसुइयों की आशंका से
उसके गुब्बारे पिचक जाते हैं
फूलने के पहले ही
मन को समझाती है-
औरत का अकेलापन अभिशप्त होता है
बदनामी के लिए
बिना किसी तमन्ना को पूरा किए भी...

दिन-दिन भर वह पड़ी रहती है
बेतरतीब बिस्तर या सीलन भरे सोफे पर
नीम अंधेरे कमरे में
पेड़ का बेडौल, कटा हुआ तना बनकर

अकेलेपन से दबती-घुटती
इंत•ाार करती कि काश! कोई आता
कुछ देर बैठता, दो बातें करता, साथ चाय पीता
और डरती हुई भी कि कहीं कोई आ न जाए

रातों को उसकी देह के वीरान खंडहर में
बांहों की सूखी डालों
और रूखे बालों से आकर झूलते हैं चमगादड़
अबाबीलें बनाती हैं घोंसले
उसकी देह की संधियों में
गर्भाशय में बच्चों की जगह
पलते हैं
रक्त के ऊतकों के दुखते हुए अर्बुद

खंडहर में कैद-सी हवा
र्द चांदनी के वीराने में भटकती दिशाहीन
उलटती पुलटती झरे सूखे पत्ते
भूले-बिसरे अतीत के चंद धुंधलाए हुए $खत
और युगों पुरानी धूल की परत
जिस पर कोई निशान नहीं
किसी के कदमों का

किसी भीतरी ताल में खड़ा जल
सूखता रहता है हर दिन
अवसाद के गाढ़ेपन में और भी सिमटता

बदबूदार कीचड़ में लोटते दैत्याकार भैंसे
कुण्डली में उसे कसकर
दम घोंटते हुए अजगर
रौंदते, धमाधम भागते अनगिनत थुलथुलाते सांड़

हर दिन जीने में कुछ और असमर्थ होती
वह मौत की बेस्वाद जुगाली में
गुरती है दिन।