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Wednesday 22 Nov 2017

इस चमकदार समय में : दो कविताएं 1- विश्व ग्राम

 

लक्ष्मेन्द्र चोपड़ा
एच-1, यूनिक टावर्स,
एनआरआई कॉलोनी के पास,
जगतपुरा, जयपुर-302017 (राजस्थान)
मो. 07665006649
विश्व ग्राम

न तुरही, न मांदर की थाप,
न कलम, न कूंची की छाप।
न चिट्ठी न तार
फिर  भी तैर रहे हैं
हवाओं में संदेशे करोड़ों हजार।
पाठशाला की छत
बनी पीपल की छांव।
पीपा पुल टूट चुका
वर्षों पहले की बाढ़ में,
इकलौती डोंगी भी
भीषण सूखे में हो गई नीलाम।
गिनती, पहाड़े, अक्षर
सीखने की चाह में,
पहुंच रहे हैं बच्चे
रस्सियां पकड़-पकड़
सरसतिया नदी की राह में।
गुरुजी के गांव की
पाठशाला के द्वार,
पीपल, इमली, नीम की
ऊंची फुनगियों के पार;
विशाल बर्बरीक सा,
सीना ताने खड़ा हो रहा है,
सल्फी वृक्ष के सिर पर
मोबाइल टावर का अवतार।।
गुरुजी बताते हैं,
ये हैं आसमानी तरंगों का विस्तार।
देख रहे हैं
पूरे गांव के नैना,
प्रचलित हो रहा है,
नया लोकगीत गांव में
'इस्कूल आसो, आसो टावर हवा पकड़े बैना।Ó
गांव देख रहा है
चील गाड़ी के बाद,
कुछ और नया
कुछ और विशाल;
आ गया है
उनके गांव में
चुपचाप,
दबे पांवों,
बन गया है जीवन का
नया खटराग!
गुरुजी कहते हैं
ये है चमकदार समय की पहचान,
कहते हैं इसको मोबाइल टावर,
गांव रहेगा यहीं चुपचाप बैठा;
बस संदेश, दृश्य उड़ेंगे, तैरेंगे,
गांव के आसमान में करोड़ों हजार।

गुरुजी अभी ज्यादा नहीं जानते,
गूगल खोज को भी नहीं पहचानते।
उन्हें नहीं पता;
टूटे पीपा पुल का
रस्सी गांव
नेट के नक्शे पर
बन गया है विश्व ग्राम।।
समय विषम
जनवरी 2016
गणतंत्र की शपथ का
एक और वर्ष,
राजपथ पर
अनुशासित कदम ताल,
लेकिन नववर्ष की
विषम शुरूआत।

तीन घटनाएं
एक पड़ताल।

एक विदूषक
कड़क खाकी,
मुस्कान बंद
हंसी रहे न बाकी।

सम-विषम के खेल में,
युवा भावनाएं जेल में।
मीडिया की बहसें,
नेतृत्व के प्रहसन,
प्रचार की स्याही,
कहीं भी काम न आई।

एक समाजशास्त्र का
शोध छात्र
निष्कासित हो गया
जीवन से।

आरोप-प्रत्यारोप,
तर्कों के महारथी,
नहीं जानते समाजशास्त्र
के पाठ का मूल?
हर आत्महत्या के लिए
जिम्मेदार केवल,
सामाजिक उपेक्षा,
सामाजिक एकांत,
सामाजिक दमन,
समाज के अपमूल।

तीन घटनाएं,
तीनों का एक ही अपराध।
तीनों ही ने
इस विषम समय में,
लोकतंत्र के कुहासे में;
आमजन का गण बन
दुस्साहस किया;

सर्वशक्तिमान, सर्व-सम्पन्न
सत्ता से आंख मिलाने का।