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Sunday 21 Oct 2018

सवाल हैं सामने

 

मलय
शिवकुटीर, टेलीग्राफ गेट नं., 4, कमला नेहरू नगर,जबलपुर-2
मो. 9424367507
घर में खड़े रहकर
देखते हैं
ललकारने की लाल आभा
जहां से सूरज उगता है
गायब है
दिन अपनी भौंहे चढ़ाता है
लेकिन
पुतलियों के सामने के
अवरोधों के पहाड़ों को
क्या दृष्टि
भेद नहीं पातीं?

ऊंचे हिमालय सा मस्तक
क्या ठंड में जकड़ा है
दिमाग में
क्या वाणी की गंगा में
रेत उड़ रही है?

अधूरे हैं हमारे
स्नान
केवल कीचड़ की पर्त
त्वचा को सांस लेने से
रोकने में लगी है

क्या एक बातूनीपन
बुद्धि की जड़ें उखाड़कर
उसे फेंकने में
कामयाब हो सकता है?
उन्माद की नदी में
क्या बहेगा देश?
होश के अंदर
हाहाकार का बीज बोया जा रहा है
अधूरा और अंधापन
एक साथ खड़े हैं
मत का मतान्धपन
अपने मौन में
जाने क्या करेगा?

इस कहने में
आशंका की आग से
झुलसता हूं
हुलास के पंख
और आशा को
बचा पाने में लगा हूं
आगे के आकाश में
उड़ पाने के लिए
क्या कैसा होगा?
सवाल है सामने।

 आग

शब्दों के
अनसुने विस्फोट की
चिनगारी से / जन्म लेकर
और अपने परिवेश की
रुई में धधक कर
आग हो जाता हूं

इस उजाले के बढ़ते
आयतन से ही
मेरा जीवन
खुलता आया है

तो क्या मैं
लिखकर
एक खुली हुई पोथी की
आग हूं
जो आपको जलाने के बजाय
बढ़ते अंधेरे के हाथों में
कैद होने से बचाती है
और कुछ नहीं तो
फिलहाल ताकत के लिए
आपके पेट की
भूख को पाटने का
पुल हो जाती है।

 नदी होकर रहेगी

समय का
कोई सिंहासन नहीं होता
वह रुककर
कभी नहीं बैठता

उसमें
पुकार कैद नहीं होती
रोकी जाए, अवरोध हो
तो गूंजती हुई
अजीब हरकत होकर
अधिक डरावनी हो जाती है

इसी तरह नदी भी
बंधना पसंद नहीं करती
और बांध ही दी जाये
तो जानते हैं!
उसके गुस्साने पर
केवल
केदारनाथ को भी
अपनी छाती अड़ाती
शिला बचा पाती है
नहीं माने
तो आगामी पीढिय़ों को
तबाह किये बिना
न छोड़ेगी
वह बंधन तोड़कर
और छूटकर बहेगी
नदी फिर नदी हो जाएगी
नदी होकर ही रहेगी

बड़ी-बड़ी बातों के
शीशे के सामने होकर
बड़े वहम आकार लेते हैं
और हम गाल फुलाते हैं
पर थोड़ी ही देर में
अपने कटे हुए बाल
ओढ़े हुए कपड़े से बनी
गोदी में आ बैठते हैं।