Monthly Magzine
Wednesday 22 Nov 2017

हमारा समय और गांधी-नेहरू होने का अर्थ

डॉ. राजेश्वर सक्सेना
कांग्रेस मुक्त विचार की मांग में गांधी होने का अर्थ
भारत के राष्ट्रीय आंदोलन में अनेक प्रकार के विचार और अनेक प्रकार की विचारधाराएं सक्रिय थीं। ये सभी विचार और विचारधाराएं आ•ाादी पाने के उद्देश्य से एकजुट थीं।
प्रश्न है कि वे कौन सी और कैसी प्रणालियां और पद्धतियां थीं जिनके द्वारा आंदोलन की इस सक्रियता और एकजुटता में संतुलन बनाए रखा जा सका? इस छोटी सी टिप्पणी में हमारा ध्यान राष्ट्रीय आंदोलन की दो मुख्य पद्धतियों पर केन्द्रित है।
गांधी सिद्धांतवादी नहीं थे, वे एक प्रैग्मैटिस्ट थे। जबकि नेहरू प्रैग्मैटिस्ट नहीं थे, वे एक सिद्धांतवादी थे। दोनों भारत के राष्ट्रीय आंदोलन से जन्मे जननायक और महानायक थे।
इस चर्चा को शुरू करने से पहले दो बुनियादी सूत्रों को स्पष्ट कर देना बहुत जरूरी है। पहला यह कि अंग्रेजी साम्राज्यवाद से मुक्ति का विचार ही स्वयं में नवजागरण के (प्रबोधन) अर्थ वाला है। दूसरा यह कि भारत के समूचे राष्ट्रीय आंदोलन की वस्तु में इम्पीरिकल मैथाडालाजी या अनुभववादी पद्धति का विविध रूपों में प्रयोग होता दिखाई देता है।
यह कहा जा सकता है कि भारत की दीर्घकालीन सामाजिक संबंधों की परंपरा में, शायद पहली बार अनुभववादी, तथ्यों और संदर्भों आदि का एक तर्कसम्मत आधार बनता दिखाई देता है। मतलब यह कि भारतीय जीवन में पहली बार एक स्पष्ट राजनीतिक विचार, वस्तुपरक राजनीतिक विचार का एक ढांचा तैयार होता दिखाई देता है, जिसके तहत इस भूभाग की राष्ट्रीयता के तर्क को इतिहास सम्मत अर्थ में लाने की सुविधा हासिल हो सकी है।
मूल और मुख्य बात यह है कि पहली बार, एकदम पहली बार यहां के अतीत की परम्पराओं के भाष्य वैज्ञानिक आख्यानों और पाठों को, हरमैन्युटिकल पाठों को दिक्-काल सापेक्ष अर्थ में प्रतिबिंबित होने, एक वस्तुपरक अर्थ में परावर्तित होने और इस तरह रूपांतरण की प्रक्रियाओं में आने का अवसर प्राप्त होता है।
यह भी कि इस तरह यहां के जीवन-संबंधों के अनुभववादी तर्क में आ जाने से भारत में और भारतीय परंपरा में आधुनिक, आधुनिकता और आधुनिकीकरण का एक नया अध्याय जुड़ जाता है।
चूंकि, संदर्भ गांधी और नेहरू का है, इसलिए, पहले से ही यह स्पष्ट कर देना ठीक है कि इस टिप्पणी में 1857 की पूरी पृष्ठभूमि को तथा 19वीं सदी की साम्राज्यवाद विरोधी गतिविधि को छोड़ दिया गया है। जबकि यह स्पष्ट है कि गांधी और नेहरू दोनों के विचारों में उक्त पृष्ठभूमि की क्रिया-प्रतिक्रिया देखने को मिलती है।
तो पहले मोहनदास करमचंद गांधी पर विचार करते हैं। 'गांधी अराजकतावादी थेÓ, 'नैतिक अराजकतावादी थेÓ ऐसा मानने वालों की संख्या कम नहीं है। शायद, इस वजह से देश और विदेश के अनेक उत्तर आधुनिकतावादी और उत्तरउपनिवेशवादी गांधी के बारे में मनमाने पाठों को गढ़ते हैं, विखंडनवादी पाठों को गढ़ते हैं।
1909 में प्रकाशित गांधी की पुस्तिका 'हिन्द स्वराजÓ भारत के आधुनिक इतिहास-लेखन में अपनी जगह इसलिए बना पाती है कि उसमें पश्चिम की शैतानी सभ्यता के, शैतानी ज्ञान और शक्ति के डिस्कोर्स की आलोचना और स्वराज के निमित्त यहां के धर्माचरण और नैतिक विचार के अनुरूप एक नया प्रयोग करने 'सत्य के साथ प्रयोगÓ करने की प्रेरणा है।
सच तो यह है कि 'हिन्द स्वराजÓ पुस्तिका गांधी की प्रैग्मैटिक एप्रोच के भारतीय न•ारियों को पेश करती है। इस तरह यह पुस्तिका एक प्रैग्मैटिस्ट होकर, एक इंस्ट्रूमेंटलिस्ट (इंस्ट्रूमेंटलिज़्म जान डेवी का पद है जो प्रैग्मैटिज़्म का पर्याय है) होकर स्वराज के विचार और स्वराज की क्रिया के क्षेत्र में उतर जाने का संंदेश देती है। हम देखते हैं कि गांधियन प्रैक्टिकलिज्म (प्रैक्टिकलिज्म भी प्रैग्मैटिज़्म का ही दूसरा नाम है) में यह पुस्तिका उनकी उद्देश्यता के प्रस्ताव की तरह दिखाई देती है।
उल्लेखनीय यह है कि इस पुस्तिका की प्रेरणा में और उसके हर संदेश में उपयोगिता का विचार जितना महत्वपूर्ण है, उतना मूल्य का विचार नहीं है।
हमारा मानना है कि गांधी एक पक्के प्रैग्मेटिस्ट थे, इसलिए, वे हमेशा ही अपने निजी विचार या अपने आत्मगतिक विचार से तथ्यों और संदर्भों की उपयोगिता को आंकने में निपुण थे। अवसरों के अनुकूल उपयोगिता पर ध्यान रखने की वजह से वे तदर्थ और तात्कालिक विचार और उसके प्रयोग में तत्पर दिखाई पड़ते थे। इस वजह से गांधी निरंतरता में विकसित होने वाली प्रक्रियाओं के अनुरूप कभी नहीं हो सके। गांधी तो हमेशा परिणामोन्मुख विचार और क्रिया पर भरोसा करते दिखाई पड़ते हैं। (रि•ाल्ट ओरिएन्टेशन पद भी प्रैग्मेटिज़्म का पर्याय है)। इस तरह की गांधियन प्रवृत्ति की वजह से उन्हें निरंकुश होते हुए, अपनी बात को मनवाने के लिए निरंकुशता का व्यवहार करते हुए भी देखा जा सकता है। कई बार, गांधी को हां या ना में उत्तर पाने की जिद में देखा जा सकता है। यहां तक कि अवसरानुकूल समझौता करने की नीति और विरोध करने की नीति में उलट जाते हुए देखा जा सकता है। अपने उठाए गए कदमों को सहसा ही वापस लेते हुए देखा जा सकता है। कह सकते हैं कि गांधी अवसर की तलाश की राजनीति करते दिखाई देते हैं। सविनय-अवज्ञा, सत्याग्रह और अहिंसक विचार को, उनके द्वारा चलाए गए आंदोलनों को विकास की किसी प्रक्रिया में नहीं देखा जा सकता। यदि 1919-1921, 1930-32 और 1942-43 के 'सविनय अवज्ञाÓ, 'असहयोग आंदोलनÓ और 'करो या मरोÓ के रैडीकलिस्टिक आंदोलनों की परीक्षा करें तो यह तीनों विच्छिन्न होते दिखाई पड़ते हैं, बिखरते हुए से दिखाई देते हैं। किन्तु उक्त तीनों की राष्ट्रीय आंदोलन में उपयोगिता सर्वाधिक महत्व वाली रही है। इन तीनों ने 'एक बड़ी मास अपीलÓ, 'राष्ट्रव्यापी जन अपीलÓ पैदा की। इस तरह, इस नतीजे पर पहुंचा जा सकता है कि गांधियन न•ारिया और आंदोलनों में उनकी सक्रियता के स्वभाव को देखते हुए यह मानना गलत नहीं होगा कि वे हर समय अवसर, उपयोगिता और लाभप्रद विचार की एक मानसिकतावादी (व्यक्ति केन्द्र की, हृदय या आत्मा की आवा•ा की) राजनीति करने में विश्वास करते थे। इसीलिए गांधी की आत्मगततावादी पद्धति के साथ निरंतरता में विकसित होती हुई वस्तुनिष्ट राजनीति में एक गहन अंतर्विरोध दिखाई देता है कि प्रक्रियाओं में होने का अर्थ परिवर्तन और विकास की सापेक्षिक गति के अनुकूलन में होने से होता है। इसीलिए प्रक्रियाओं का संबंध वस्तुनिष्ठता के आग्रह में होता है। जहां तक गांधी का सवाल है सो ऐसा प्रतीत होता है कि उन्होंने कभी भी आंदोलन की वस्तुनिष्ठ गति का कोई संज्ञान नहीं लिया जबकि, उस दौर के चौथे और पांचवें दशाब्द तक भारत का राष्ट्रीय आंदोलन उस वस्तुनिष्ठ अवस्था में पहुंच चुका था कि कोई भी एक व्यक्ति और उसका आत्मगतिक विचार, वह चाहे गांधी का ही क्यों न हो, डिगा नहीं सकता था। इस अवस्था तक पहुंचे हुए राष्ट्रीय आंदोलन को किसी करिश्मेटिक विचार की जरूरत नहीं रह गई थी। इस समय तक राष्ट्रीय आंदोलन की गति बहुत निर्वैयक्तिक हो चुकी थी। इस समय तक अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का नेतृत्व भी बहुत निर्वैयक्तिक विचारों की क्रियाओं की गति में आ चुका था। अब, व्यक्ति पीछे छूट गया था, आंदोलन की गति स्वयं में, उसका नेतृत्व स्वयं में निर्णायक हो चुका था।
गांधियन न•ारिये और गांधियन पद्धति पर इतना कुछ कहने के बाद, अब यहां पर गांधी होने का अर्थ को मूल्यांकित करना चाहेंगे। गांधी की राष्ट्रीय आंदोलन में महान ऐतिहासिक भूमिका और उसके महान योगदान पर कुछ कहना चाहेंगे। गांधी एक कर्मवादी थे। वे एक प्रयोगवादी थे (एक्सपैरीमेंटलिज़्म, विलियम जेम्स के लिए प्रैग्मेटीसिज़्म ही है)। इसीलिए उनकी महानता उनके किए धरे का फल या परिणाम थी।
अब, अपने विश्लेषण में एक नया मोड़ लेते हुए यह प्रतिपादित करना चाहते हैं कि गांधी अपनी भूमिका में अभूतपूर्व क्यों है? उनका योगदान मूलभूत क्यों है? गांधी के बगैर भारत की आजादी मुमकिन नहीं थी, ऐसा कहने का क्या आशय है?
तो फिर पहले एक सवाल उठा रहे हैं कि राष्ट्रीय आंदोलन में, साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष में गांधी का एक प्रैग्मैटिस्ट होना ही क्या उनकी सफलता और महानता का कारण है? इस सवाल का उत्तर हां में है। हां में है तो क्यों और कैसे?
जैसा कि ऊपर कहा गया है कि गांधी परिणामोन्मुख विचार के एक प्रयोक्ता थे। यदि थोड़ा संदर्भ से हटकर देखें तो परिणामोन्मुखन का यह विचार भारत को नया नहीं  है। वह एकदम भारतीय है। परिणामोन्मुख कर्म का विचार हमारे धर्मशास्त्रों में और कर्मकाण्ड के विधि विधानों में है। वह पुरुषार्थ के विचार में, मोक्ष और पुण्य लाभ के विचार में, हमारी नैतिकता के हर कथ्य-कथन में मौजूद है। सच तो यह है कि भारत की हर परम्परा में सब कुछ व्यक्ति-केन्द्र का है, आत्मव्यूहन का है। ध्यान, योग, आध्यात्म, वेदान्ती भाव सब कुछ आत्मगतिक व्यूहन में है।
तो क्या गांधी ऐसी धार्मिक पृष्ठभूमि में होने की वजह से महान थे? उत्तर है, बिल्कुल नहीं। तो गांधी होने का अर्थ कहां खुलता है?
एक बार गांधी कुंभ के मेले में सैकड़ों और ह•ाारों की भीड़ में गंगा स्नान करते हुए तर्पण कर रहे थे। संयोग से लुई $िफशर भी वहां मौजूद थे। वह सब देख रहे थे। लुई $िफशर ने गांधी से पूछा- क्या आप ऐसी भीड़ को आ•ााद कराना चाहते हैं? गांधी ने जवाब दिया, हां। $िफशर, मैं इसी भीड़ को आ•ााद कराना चाहता हूं। $िफशर, यह बन्दूक नहीं चला सकती है।
गांधी का संकेतार्थ यह है कि भारत आधुनिक नहीं है। भारत आधुनिक शैतानी सभ्यता में नहीं है। भारत, आज भी एक परामनोविज्ञानी चित्तदशा में जीता है। वह सहजातिक या अन्तर्जातिक गठन (इन्नेटलीस्ट्रक्चर्ड) वाली नैसर्गिक चित्तदशा में पैदा होने वाली वाणी को, पश्यंतीवाक् को जीता है। लगता है कि भारत के जीवन संबंधों में किसी नये रैफ्लैक्शन की •ारूरत नहीं पड़ी। यदि कहीं कोई नया रैफ़्लैक्शन, नया प्रतिबिंब उभरता हुआ न•ार भी आता है तो उसके प्रति उपेक्षा का भाव या बेखबरी का भाव दिखाई पड़ता है कि भारत अनुभव जगत और अनुभव की भाषा में नहीं दिखाई देता या बहुत कम दिखाई देता है।
''सबै भूमि गोपाल कीÓÓ इसी तरह ''कोऊ नृप होय हमें का हानीÓÓ का भाव आज भी लोकव्यापी है। आस्था, विश्वास, श्रद्धा और भक्ति भाव से यहां के जीवन का हर उच्चारण काव्यात्मक सा दिखाई देता है। कहने का आशय यह है कि गांधी को एक मिथ-जीवी भारत मिला था। समर्पणवादी स्वभाव वाला भारत मिला था।
तो, गांधी होने का अर्थ यहां से खुलता है। पहला सवाल यह कि अपने दक्षिण अफ्ऱीकी अनुभव के साथ भारत में अंग्रेजी साम्राज्यवाद विरोधी मुहिम कैसे चला सके? भारत में उपलब्ध साम्राज्य विरोधी गतिविधि के साथ उनका कैसा संबंध बना? इस बारे में गांधी की सोच यह थी उसमें आधुनिकता की गंध आती है।
तो क्या विरोध, प्रतिरोध और विकल्प का उन्होंने कोई अपना रास्ता बनाया?
गोखले के सुझावों से प्रेरित होकर उन्होंने देश भर का भ्रमण किया। यहां के ग्रामीणों, किसानों और मजदूरों के संपर्क में आए, आत्मीय संबंध बनाए। चम्पारण, खेड़ा और अहमदाबाद के किसानों, मजदूरों के बीच गए और उन्हें अंग्रेजी कानूनों को तोडऩे के लिए एकजुट किया। गांधी सीधे जन-कार्रवाई में उतर गए। 1915-1919 तक स्थानीय स्तर पर अपने सत्याग्रही विचारों का प्रयोग किया। 1920-22 में असहयोग आंदोलन शुरू किया। चरखा, स्वदेशी, सेवा और उपवास आदि के द्वारा गांधी ने पूरे भारत में अपनी और अपने कांग्रेसी नेतृत्व की एक लोकव्यापी, राष्ट्रव्यापी मुखर पहचान बनाई। 1942 में पूरे देश की जनता को स्वत:स्फूर्त ढंग से किए गए 'करो या मरोÓ आंदोलन में अंग्रेजी साम्राज्यवाद के विरोध में हल्ला बोल दिया। इस तरह गांधी ने पूरे देश की जनता को साम्राज्यवाद विरोध की प्रैक्टिस में ला खड़ा किया। हम देखते हैं कि गांधी का प्रैक्टिकलिज़्म और जनता का प्रैक्टिकलिज़्म एक रूप और एक प्राण थे।
एक प्रैग्मैटिस्ट जानता है कि उसके प्रयोग तदर्थ और तात्कालिक लाभ पहुंचाने वाले होते हैं। गांधी के द्वारा किए उक्त सभी प्रयोग हर बार विच्छिन्न से होते दिखाई पड़ते हैं। लेकिन जैसा कि ऊपर उल्लेख किया गया है कि वे पूरे देश की जनता की लामबंदी करने में, उसे गतिशील बनाने में और संघटित करने में कामयाब रहे हैं। जनसमूहों ने हमेशा उनमें अपना अटूट विश्वास जताया है।
गांधी की सकारात्मक और रचनात्मक पहचान और उनकी ऐतिहासिक भूमिका इस तथ्य में है कि गांधी ने पहली बार जनसमूहों को नये रैफ्लैक्शन्स में उतार दिया और सजगता प्रदान की। मतलब यह कि जनसमूहों को पहली बार वस्तुपरक अर्थ का प्रत्यक्ष कराया। इस तरह गांधी ने पहली बार राष्ट्रव्यापी जनता की राजनीति के विचारों को पैदा किया।
प्रसंगवश यह भी कि एक प्रत्यय के अर्थ में 'राजनीतिÓ, 'राजनीति-विचारÓ, वह चाहे जिस परिस्थिति में और चाहे जिस रूप में अंकुरित होता दिखाई पड़े, उसका हर सम्प्रेषण, वह चाहे अभिधागत हो या लक्षणागत और व्यंजनागत हो, वह चाहे प्रतीकार्थगत क्यों न हो, वह हमारे प्रत्यक्षबोध की वस्तुपरकता का परिचायक होगा। राजनीति-विचार का प्रत्यय अपनी हर आत्मगतिता में क्रियागतिक संकेतों वाला ही हो सकता है। यहां तक कि अराजनीति या गैर राजनीति की राजनीति का विभ्रम भी क्रियागतिक होता है।
हम देखते हैं कि गांधी के सभी तरह के विरोधी, विरोधी विचारधाराओं वाले भी उनके साथ संवाद में आ गए थे। अधिकांश ने तो उनके नेतृत्व को स्वीकार कर लिया था। ऐसी हालत में अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस भी गांधी के प्रैक्टीकलिज़्म का विषय हो गई थी।
उल्लेखनीय है कि उक्त प्रकार के गांधियन योगदान की पृष्ठभूमि में आए बगैर कांग्रेस के क्रियाकलापों को न तो सिद्धांत के धरातल पर लाया जा सकता है और न राष्ट्रीय आंदोलन का कोई ज्ञानमीमांसीय अर्थ-निरूपण किया जा सकता है।
अंत में यह कि 'पैराडाइम शिफ़्टÓ के विचार में रहना गांधी की $िफतरत थी। गांधी स्वयं यह समझने में असमर्थ रहे कि उन्होंने ही अपने आंदोलनकारी प्रयोगों से भारत की वस्तुपरक राजनीति को, भारत के आधुनिक कलेवर को बनाने वाली राजनीति को एक स्वतंत्र अस्तित्व प्रदान करा दिया है।
कांग्रेस मुक्त विचार की मांग में
नेहरू होने का अर्थ

कांग्रेस मुक्त भारत की मांग के इस उत्तरआधुनिकतावादी दौर में, तथ्य नहीं पाठ के, शब्द नहीं संकेत के तथा एकता, संगति और समन्वय नहीं, विषमांगता (हैटिरोजीनिटी) अपखंडन और विखंडन के इस दौर में नेहरू पर कलम चलाना या उन पर कुछ बोलना क्यों खतरनाक हो गया है?
वैसे तो इस सवाल का उत्तर, एक हद तक ही सही, कांग्रेस से ही पूछना चाहिए। मनमोहन सिंह का नवउदारवादी अर्थशास्त्र, जो कि भूमंडलीकरण, निजीकरण और पुनर्नियोजन के विचार में था, जो कि वाशिंगटन आमराय के विचारों के अनुरूप था, मुक्त बाजार तंत्र के काम्प्लैक्स औपिरेशन की यांत्रिक प्रक्रियाओं को बढ़ावा देने वाला था, उसने भारत की आधुनिकता को तहस-नहस करके रख दिया, उसने भारत की आधुनिक ज्ञानमीमांसा को न केवल ध्वस्त कर दिया, बल्कि भविष्य में किसी भी तरह की अनुभववादी ज्ञान-पद्धति के प्रयोग की हर संभावना को ही समाप्त कर दिया।
लगता है कि मनमोहन सिंह कांग्रेस पार्टी में होते हुए भी कांग्रेसी विचार में नहीं थे। कांग्रेसी विचार की परम्परा को वे बीत गए समय का सच मानते थे। मनमोहन सिंह भूमंडलीय मुक्त बा•ाार के नवाचारी विचार में थे। वे कारपोरेट व्यवस्था के पक्षधर थे। अत: यह स्वीकार करने में संकोच नहीं होना चाहिए कि कांग्रेस मुक्त भारत की मांग में कांग्रेस भी शामिल है।
कह सकते हैं कि आज का भारत कारपोरेट भारत है। भारत में देशी और विदेशी वित्तीय पूंजी के उन्मुक्त रूप से प्रवाहन का, पंूजी के 'खेल सिद्धांतÓ का मनमाने ढंग से प्रयोग होता दिखाई देता है। ऐसे में यह कहा जा सकता है कि भारत आज मुना$फा कमाने के विचार में है। भारत आज पूरी दुनिया में दुकानदारी करने वाला दुकानदारों का एक राष्ट्र है। ऐसे में अब एक भारतीय की पहचान, एक उद्यमी, एक व्यापारी और एक उपभोक्ता के रूप में होने लगी है। ऐसे में नागरिक समाज का कोई विचार बाकी रह गया नहीं दिखाई देता, सब कुछ एक उपभोक्ता समाज के लिए होकर रह गया है। आज की भारतीय संस्कृति एक उपभोक्ता समाज की संस्कृति है। उन्मुक्त बाजारतंत्र की संस्कृति है। कारपोरेट प्रबंधन की संस्कृति है। ऐसी संस्कृति में ज्ञान की अनुभववादी तर्कपद्धति की कहीं कोई जरूरत ही नहीं बची है। इतिहास की, विवेक और तर्क की हर स्मृति विलुप्त हो गई है। बल्कि यह कहना अधिक ठीक लगता है कि तर्क और विवेक की हर परम्परा को विलुप्त कर दिए जाने की एक रैडीकल रणनीति तैयार कर ली गई। मतलब यह कि जीवन संबंधों की हर वस्तुपरकता को, वस्तुपरक विचारशीलता को भंग कर दिया गया है। विखंडित कर दिया गया है। ऐसा लगता है अब किसी भी तरह के नये रेफ्लैक्शन का संज्ञान लेना बंद सा हो गया है।
     यह टिप्पणी अधूरी सी दिखाई देगी यदि नेहरू और मनमोहन सिंह को आमने-सामने करके न देखा जाए।
   यह कहना कि मनमोहन सिंह तो नेहरू की एन्टीथिसिस हैं, यह सोच तब तक ठीक नहीं है जब तक यह न समझ लिया जाए कि मनमोहन की एन्टीथिसिस की अंतिम परिणति कहां होती है? चूंकि, यह एन्टीथिसिस पद द्वन्द्ववादी प्रक्रिया का है, जो अन्तर्विरोध को बतलाता है, इसलिए अन्तर्विरोध किस दिशा में जा रहा है, कैसी शेप में ढल रहा है, एन्टीथीसिस में अन्तर्विरोध की ऐसी दिशा और शेप अन्तर्निहित होती है। इसीलिए एन्टीथीसिस का कोई अर्थ सिन्थीसिस की संरचना के विचार तक पहुंचे बगैर नहीं खुल सकता। मनमोहन सिंह नेहरू की एन्टीथीसिस थे जिसकी सिंथीसिस् प्रैग्मैटिज़्म/नव्यप्रैग्मैटिज़्म के विचार में आने से खुल पाती है।
कि नेहरू भारत में औद्योगिक पूंजीवाद के विकास के दौर में थे, जबकि मनमोहन सिंह औद्योगिक पूंजीवाद के विखंडन और वित्तीय पूंजीवाद के दौर में हैं। नेहरू का अर्थशास्त्र उत्पादन केन्द्र का था, जबकि मनमोहन सिंह का अर्थशास्त्र उपभोक्ता केन्द्र का है। नेहरू ने राष्ट्र राज्य के विचार को बहुविध म•ाबूती प्रदान की, जबकि मनमोहन सिंह ने मुक्त बा•ाार तंत्र की अर्थव्यवस्था का गठन किया। मनमोहन सिंह ने प्रजातांत्रिक मूल्यों वाली संस्थाओं को उद्योगोन्मुख, व्यापारोन्मुख और रोजगारोन्मुख किया। इस तरह की नई राजनीतिक संरचनाओं का गठन किया जो मुक्त बा•ाार के विचार के अनुकूल हैं, आदि। कि नेहरू का अर्थशास्त्र ज्ञान की अनुभववादी पद्धति वाला था, जबकि मनमोहन सिंह का अर्थशास्त्र गणितीय/सांख्यिकीय डाटाबेस्ड प्रणाली वाला है। नेहरू के अर्थशास्त्र में जीवन-संबंधों की जैविक गति का निरूपण होता दिखाई देता है, जबकि मनमोहन सिंह का अर्थशास्त्र यांत्रिक गतियों वाला है। वह तकनीकी जटिलताओं वाला है।
नेहरू क्या थे, उन्होंने क्या किया, यह सब तो एक बहुत बड़े फलक का विषय है। उनके किए धरे को वर्गीकृत करना ही एक पूरी किताब की मांग करता है। अत: हम नेहरू की विषयवस्तु के बहुविस्तृत और बहुआयामी क्षेत्र पर कुछ नहीं कह रहे हैं।
तो हमारी दृष्टि में नेहरू होने का अर्थ, मूलत: और मुख्यत: ज्ञान की अनुभववादी पद्धति से संबद्ध है। ज्ञान की यह अनुभववादी पद्धति, तर्कपद्धति क्या है, इसके इतिहास पर और इसके प्रकार भेदों पर नहीं जाएंगे। एक अर्थ में यह आधुनिक युग की औद्योगिक क्रान्ति के ज्ञान-सिद्धांत से, जीवन की नई वस्तु के नये-नये रैफ़्लेक्शन्स के संज्ञान-गठन से संबद्ध दिखाई देती है। यह आधुनिक युग के प्राकृतिक विज्ञानों और समाज विज्ञानों के, मानविकी के हर नये शोध और उसके नवगठन में पहलकारी दिखाई देती है। सामाजिक विज्ञानों का तो अस्तित्व ही ज्ञान की अनुभववादी तर्कपद्धति के प्रयोगों वाला रहा है। एक मोटे से अर्थ में इसे तथ्यगतिक के वस्तुपरक अर्थग्रहण की तर्क पद्धति भी कहा जा सकता है। इस तर्कपद्धति के द्वारा, पहली बार, स्वर्ग का विचार धरती के लौकिक क्रियाकलापों के सामने स्वप्निल सा दिखाई पडऩे लगता है। इसी तरह धर्म का विचार कानून के सामने और धर्मशास्त्र का विचार राजनीति के सामने पीछे छूटता हुआ सा दिखाई पडऩे लगता है।
ज्ञान की यह अनुभववादी पद्धति अपने विकास की गति में अनेकार्थी रही है, अनेक प्रकार के सकारात्मक और नकारात्मक प्रभावों को पैदा करने वाली रही है। इसे अनुभववाद, प्रत्यक्षवाद और तर्कीय प्रत्यक्षवाद के पारिभाषिक पदों में व्याख्यायित किया जाता है।
हमारा कहना यह है कि ज्ञान की यह अनुभववादी तर्कपद्धति यदि द्वन्द्ववादोन्मुख नहीं है, मूल्यों को पैदा करने वाले एजेंडे में नहीं है, तो वह एक प्रकार के मूल्यतटस्थ का मूल्य-मुक्त तथ्यों, तथ्य की गतियों की आकृतिमूलकता का विषय या तर्क होकर रह जाती है। ऐसी अनुभववादी तर्क पद्धति का वस्तुपरक या वस्तुनिष्ठ आकृतिमूलक, संरचनामूलक होकर रह जा सकता है। वह तथ्य जो अपने अनुसंधान और विश्लेषण में मूल्यतटस्थ है, मूल्यमुक्त है, वह प्रत्यक्षवाद और तर्कीय प्रत्यक्षवाद (पा•िाटिविज़्म और लाजीकल पाजिटिविज़्म) के विषय क्षेत्र का होकर रह जाता है। किन्तु यदि तथ्य और मूल्य की द्वन्द्वात्मकता में वस्तुपरक या वस्तुनिष्ठ अर्थसृष्टि होती है तो वह प्रत्यक्षवादी और 'आम रायों की गठनÓ वाला नहीं हो सकेगा।
जहां तक नेहरू के अनुभववादी तर्क का सवाल है, वह द्वन्द्ववादोन्मुख था, वह मूल्यबोध या मूल्यचेतना वाला था। और जहां तक मूल्य-रचना का सवाल है, वह दिक्-काल सापेक्ष तथ्य गति की दिक्-काल सापेक्ष, जीवन-संबंधों के तथ्यगतिक की चेतना, चैतन्य के अर्थ वाला होता है।
नेहरू एक सिद्धांतवादी थे। यदि अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अपनी कोई स्वतंत्र ज्ञानमीमांसा हो सकती है, अपनी कोई स्वतंत्र विचारधारा हो सकती है, तो उसकी रचना में नेहरू का योगदान सर्वाधिक दिखाई देता है। जिसे हम भारत का संविधान कहते हैं उस संविधान में जो 'उद्देश्यों का प्रस्तावÓ (प्रीएम्बल) है, वह नेहरू की रचना है। विशेष यह है कि ''संविधान सभा की ग्यारह बैठकों में छ: बैठकें 'उद्देश्यों का प्रस्तावÓ को समर्पित थीं।ÓÓ
कौन नहीं जानता पूरे भारत के विविधतापूर्ण जीवन-संबंधों को एक लोकतांत्रिक कानून के शासनतंत्र में लाने की चिंता इस 'उद्देश्यों के प्रस्तावÓ में मूलभूत है। आ•ाादी के बाद संविधान की भावना और विचार के अनुरूप जो दर्जनों नई संस्थाएं अस्तित्व में आयीं, ज्ञानानुशासनों के जो नये पाठ्यक्रम निर्धारित हुए, विज्ञान और तकनालाजी की शिक्षण व्यवस्था पर जोर दिया गया तथा भारत के स्वतंत्र औद्योगिक विकास की नींव रखी गई- यह सब संवैधानिक प्रजातंत्र के ढांचे में था। संविधान के ऐसे ढांचे से भारत की आधुनिकता का प्रत्यक्ष संबंध है।
कह सकते हैं कि ऐसे संवैधानिक ढांचे के अंतर्गत जो आधुनिक क्रियाकलाप दिखाई देता है, सिद्धांतबद्ध और योजनाबद्ध क्रियाकलाप दिखाई देता है, नीतिबद्ध क्रियाकलाप दिखाई देता है, उससे देश और विदेश में विश्वसनीयता हासिल हुई। अन्तरराष्ट्रीय जगत में भारत की अपनी एक महत्वपूर्ण पहचान बन सकी। स्वतंत्र भारत की एक स्वतंत्र विदेश नीति का नक्शा तैयार हो सका। कि नेहरूवियन ज्ञान की अनुभववादी पद्धति से यहां की दीर्घकालीन परम्पराएं नये-नये रैफ़्लैक्शन्स का विषय होने लगीं। परम्पराएं प्रक्रियागत होने लग गईं, वे रूपांतरित होने लग गर्इं। उल्लेखनीय है कि इस तरह भारत की आधुनिकता का, भारत के- आधुनिक का एक परिदृश्य बनने लगा, नवजागरण के मूल्यों वाला परिदृश्य बनने लगा।
ऐसे नये परिदृश्य में यदि कोई आधुनिक गति के वस्तुपरक अर्थग्रहण की अनदेखी करता हुआ यह कहता है कि औद्योगक क्रांति और उसका ज्ञान-सिद्धांत पश्चिम का है, उससे पैदा होने वाली आधुनिकता पश्चिम की है, वह इस या उस राष्ट्र की है, पूरब की नहीं, भारत की नहीं है तो उसके ऐसे अस्वीकार या नकार का विचार तो जीवन की गति के प्रति अबोधता, अज्ञानता और मतांधता के सिवाय और क्या हो सकता है? नवोन्मेष और रूपांतरण की प्रक्रिया के अस्वीकार-नकार के अलावा और क्या हो सकता है।
विशेष यह भी है कि भारत के संविधान का पूरा मसौदा ही नेहरूवियन ज्ञान की अनुभववादी पद्धति के क्रियान्वयन का विषय है। इससे भारत के आधुनिकीकरण और राजनीतिकरण का सीधा संबंध है। इससे यहां की जनता के वैज्ञानिक स्वभाव (बोध, चेतना) में आने, मानवीय गरिमा के विचार में आने का संबंध है।
अंत में यह कि नेहरू की धर्मनिरपेक्षता को समझाने के लिए देश-विदेश के विद्वानों द्वारा रची-गढ़ी गई व्याख्याओं की कोई रूरत नहीं है। नेहरू की धर्मनिरपेक्षता के विचार का ज्ञानमीमांसीय आधार स्पष्ट है जो राज्य और राजनीति के वस्तुपरक अर्थग्रहण वाला है।
आप धर्मनिरपेक्षता, स्वतंत्रता और प्रजातंत्र की व्याख्या में वस्तुपरकता के विचार को निकाल दीजिए, तब देखिए कि धर्मनिरपेक्षता का विचार कैसे 'सूडोÓ होकर रह जाता है। तब फिर स्वतंत्रता और प्रजातंत्र के विचार में धर्म और धर्मशास्त्र का प्रक्षेपण स्वत: ही होता हुआ दिखाई देने लग सकता है।
अत: कांग्रेसमुक्त भारत का संकेतार्थ है नेहरू, नेहरूवाद और नेहरूवियन वि•ान से मुक्त भारत। नेहरू के ऐसे विलोप की मांग क्या यहां के संवैधानिक प्रजातंत्र के विलोप वाली नहीं है? यह क्या भारत के आधुनिक और आधुनिकता के अर्थात विवेक और तर्क की परम्परा के विलोप की मांग नहीं है?
ओह! यह कैसी विडम्बना है , यह कैसी विरोधाभास है- कि संविधान के ढांचे में कारपोरेट और प्रैग्मैटिज़्म/नव्य प्रैग्मैटिज़्म- जो कुछ भी 'ठोस है, मूत्र्त है, वह पिघल गया है, हवा हो गया है।Ó आज भारत अपने पूरे जीवन संबंधों के साथ एक 'रेशनल च्वाइस थ्योरीÓ के प्रैग्मैटिज़्म/नव्य प्रैग्मैटिज़्म होकर रह गया है।
सामाजिक चित्त के विक्षेप और सामाजिक सन्निपात के दौर में
इस निबंधनुमा वक्तव्य में दो मूलभूत बिन्दुओं को छोड़ दिया गया है। पहला है अमेरिकी आर्थिक और सांस्कृतिक साम्राज्यवाद के आक्रमण का। दूसरा है इंटरनेट के ब्रम्हाण्ड में- सूचना प्रौद्योगिकी के विकास के उन्नत रूपों का अर्थात आज की आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का-
आज के कारपोरेट भूमंडलीकरण के दौर में 'तर्कपरक हिंसाÓ और उत्तरराष्ट्रवाद, जैसी संदिग्ध अवधारणाओं के संदर्भ में निवेदिता मेनन की यह स्थापना कि-
'भारत में राजनीतिशास्त्र को पढऩे-लिखने का नैतिक रूप से सही तरी$का यह है कि एक अनुशासन के रूप में राजनीतिशास्त्र और अध्ययन की वस्तु के रूप में भारत को रैडीकल तरीके से अस्थिर करने की आवश्यकता है।Ó
-सी.एस.डी.एस. की पत्रिका प्रतिमान-अंक-2 पृष्ठ-525
इसी तरह प्रतिमान एक में धीरूभाई शाह के दो साक्षात्कार हैं। पहले साक्षात्कार में जे.पी. आंदोलन के बाद के समय-संदर्भ को तथा आज के उत्तरऔपनिवेशिक भारत को, खासकर अन्ना हजारे के आंदोलन को ध्यान में रखते हुए यह कहा है-
भारत में 'एक नये अर्थ वाला नागरिक समाज पैदा हुआ है जिसमें 'गैर दलीय राजनीतिÓ और 'गैर दलीय राजनीतिक संगठनÓ की जरूरत को स्पष्ट किया गया है। नई राजनीति संरचनाओं की जरूरत को स्पष्ट किया गया है।Ó
स्पष्ट है कि दोनों विद्वानों के उक्त विचार सि$र्फ आज की ग्लोबल कारपोरेट व्यवस्था और कारपोरेट संस्कृति के नये एकादमिज़्म को रचने-गठन की एक पृष्ठभूमि तैयार करने के वास्ते ही नहीं है, बल्कि वे हमारे वर्तमान की और आज की रो-बरोज की दिनचर्या में रैफ़्लैक्ट होने वाले दिशा-निर्देशक भी हैं। उक्त दोनों मंतव्य नवउदारवाद, भूमंडीलकरण और निजीकरण के 'पैराडाइम-शिफ़्टÓ की तरह हैं और आज की 'वल्र्ड सिस्टम थ्योरीÓ के अनुकूलन में हैं, जो पूरी तरह से अनऐतिहासिकता के विचार की है और व्यक्ति के प्रैग्मैटिक व्यवहार की पोषक है।
इसी तरह, सी.एस.डी.एस. (विकासशील समाज अध्ययन पीठ) के अभयकुमार दुबे का 'पहलÓ पत्रिका के सौवें अंक में एक लेख छपा है जिसका शीर्षक है- 'चुनौतियों का समय और हिन्दुत्व की अर्थव्यवस्था।Ó अर्थशास्त्र में हिन्दुत्ववादी अर्थव्यवस्था से क्या आशय हो सकता है? क्यों ऐसे पारिभाषिक पद का प्रयोग किया गया है जबकि सब जानते हैं कि अर्थव्यवस्था तो कारपोरेट की ही है जिस पर हिन्दुत्व का प्रभुत्व कायम हो गया है। हिन्दुत्व की अर्थव्यवस्था क्या आज के भारत में राजनीति के विचार की कोई एक नई संरचना है? क्या ऐसी नई संरचना भारत के आधुनिकतावादी विचार के विखंडन में नहीं है? क्या यह अर्थशास्त्र की वैज्ञानिकता को धर्मशास्त्रीय आवरण में लाने जैसा नहीं है? क्या ऐसी नई संरचना से वर्ग और वर्ण के भेद को भ्रमित नहीं किया जा सकता है? हमारा मानना यह है कि चुनौतियों के राजनीतिक स्पेस को धर्मशास्त्र के स्पेस में ले आना भारत की ज्ञानोदयी परम्परा का उत्तरआधुनिकीकरण है। ऐसे में आर्थिक ज्ञान की कोटियां धर्म-जाति और सम्प्रदाय आदि के आवरण में अपनी वस्तुनिष्ठता गंवा देती है या गंवा दे सकती है।
कहने का आशय यह है कि आज के विश्व-कारपोरेट (जो 'एक नये देश की तरह हैंÓ, फिल्मी संवाद) प्रबंधन की संस्कृति में उत्तर-आधुनिकतावादी और उत्तरउपनिवेशवादी विचार को प्रोजेक्ट किया जाने लगा है। नतीजतन मानव-समाज की  जिंदगी तथ्यों में नहीं खुलती है, वह पाठों की, आख्यानों की होकर रह गई है। ऐसी हालत में आधुनिक वस्तुपरकतावादी विश्लेषण ध्वस्त हो गए हैं।
यह भी कि नई राजनीतिक संरचनाएं भूमंडलीय बाजारतंत्र और उपभोक्तावाद के भाषा-तंत्र को खड़़ा करती हंै, आज के 'भाषा-विज्ञानी मोड़Ó से प्रेरित होती हैं। ऐसी नई राजनीतिक संरचनाएं किसी नागरिक समाज के विचार को उद्घाटित नहीं करतीं। आज के परिदृश्य में हमें 'नागरिक समाजÓ और 'उपभोक्तावादी समाजÓ के अन्तर्विरोध को ध्यान में रखना जरूरी है। नागरिक समाज के मिथ और उपभोक्ता समाज के यथार्थ को ध्यान में रखना जरूरी है।
जो कोई आज के ऐसे उत्तरउपनिवेशवादी अध्ययनों की रीति-नीति से वाकिफ नहीं है, विखंडन और फूटन की वक्तृता या रैथरिक से वा$िकफ नहीं है, उसे यह समझने में दिक्कत हो सकती है कि किस तरह कानून की सत्ता को धर्म की सत्ता से और राजनीति की सत्ता को धर्मशास्त्र की सत्ता से भ्रमित किया जाने लगा है। क्या यह तरीके से भ्रमित किए जाने की रैथरिक की कोई वैचारिकी भी है? उत्तर है, हां है। यह वैचारिकी प्रैग्मैटिक उसूलों वाली है। निजी लाभ के अवसरों के वास्ते हर मूल्य को निरस्त कर देने वाली है। ऐसी वैचारिकी में ही तर्कहीनता के तर्क का और अराजनीति की राजनीति का बोलबाला बना रहता है। ऐसी वैचारिकी के तहत पूरा माहौल अबौद्धिक होकर रैडीकल व्यवहार करने की छूट में दिखाई देने लगता है। कानून नामक पद अपना हर अर्थ खो देता है। ''कानून तोडऩेÓÓ की वक्तृता लोकप्रिय होने लगती है। ऐसे में ही संविधान भी एक 'धर्मग्रंथÓ की तरह होकर रह जाता है। सहिष्णुता और असहिष्णुता का विचार गडमड हो जाता है। कहने का आशय यह है कि उक्त प्रकार की वैचारिकी का निहितार्थ है कि तर्कवादी/विवेकवादी शक्तियां जल्दी से अपना स्वत्व खो बैठे और एग्•ाहास्ट होकर रह जाने को विवश हो जाएं। स्पष्ट है कि ऐसे अबुद्धिवादी माहौल में हर तर्क और हर विवेक को प्रैग्मैटिकली विखंडित किया जाने लगा है।  सोचने की चिता करने की बात यह है कि ''भारत को रैडीकल तरीके से अस्थिर करनेÓÓ और ''गैर दलीय राजनीति का संगठनÓÓ के विचारों से किस तरह की सोशल साइको की निर्मिति हो सकती है? कहीं यह ''क्राउड रिसोर्सÓÓ का मामला तो नहीं बन रहा है? आज के हालात कुछ इस तरह के हैं कि जिसमें एक व्यक्ति, हर व्यक्ति अपने मनोविज्ञान के स्तर पर चित्तविक्षेपी सा, शि•ाोफ्ऱेनिक सा होकर रह गया दिखाई देता है।
चूंकि, मैं अपने उक्त प्रकार के विचारों का विश्लेषण करने में सक्षम हूं, इसलिए पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूं कि ईश्वर का उत्तरआधुनिकतावादी उच्चारण सन्निपातिक है।  ठ्ठ