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Friday 24 Nov 2017

संबोधन

संबोधन
डॉ. राजेश्वर सक्सेना

छत्तीसगढ़ प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन द्वारा मायाराम सुरजन स्मृति लोकचेतना अलंकरण की स्थापना की गई है। प्रथम वर्ष 2015 के लिए यह सम्मान जाने-माने समीक्षक, प्राध्यापक एवंं समाज चिंतक डॉ. राजेश्वर सक्सेना, बिलासपुर (छग) को दिया गया है।
17 जनवरी रायपुर में आयोजित अलंकरण समारोह के अवसर पर डॉ. सक्सेना ने जो विस्तृत वक्तव्य तैयार किया था वह यहां समग्रता में प्रस्तुत है। यह चार अंशों में है। वे मायाराम सुरजन के व्यक्त्वि का अपने नजरिए से अध्ययन करते हैं। दूसरे और तीसरे खंड में बाबूजी के आदर्श द्वय महात्मा गांधी व जवाहर लाल नेहरू के विचारों का परीक्षण भारत के वर्तमान संदर्भ में वे करते हैं। और चौथे खंड में वे हमारा ध्यान वर्तमान वैश्विक व्यवस्था की ओर आकर्षित करते हैं।

मायाराम सुरजन की चित्त-रचना

बाबूजी का कालखंड स्वयं में एक फैनामिना है। यह कालखंड अद्भुत और विलक्षण इस अर्थ में है कि एक पराधीन देश में या एक गुलाम देश में मुक्ति का संघर्ष पूरे जोर में दिखाई देता है और 1947 में एक स्वतंत्र राष्ट्र का उदय होता है। बाबूजी के कालखंड में भारत के संवैधानिक प्रजातंत्र की नाम्र्स का गठन होता है। उल्लेखनीय है कि आजादी के संघर्ष में बाबूजी की भागीदारी रही है और आजादी के बाद वे एक कांग्रेसी कार्यकर्ता के रूप में जीवनपर्यन्त सक्रिय रहे हैं।
उनके कालखंड की समझ और उसका एहसास आज की नई पीढ़ी को कितना है, यह एक बड़ा प्रश्न है।
तो बाबूजी की सक्रियता के उस समय को याद करते हुए उल्लेखनीय यह है कि- बैलगाड़ी और साइकिल युग की गति से लेकर अणु-विस्फोट की गति में आ जाने तक, इसी तरह घनघोर सामंती पिछड़ेपन के समय से लेकर नवउदारवादी कारपोरेट्स के विकास और समृद्धि की अवधारणा वाले अर्थशास्त्र के समय तक, इसी तरह खड़ी बोली (हिन्दी) के विकास के शुरुआती अध्यायों से लेकर सिलीकान चिप्स टैक्नालॉजी के प्रयोग तक, और सबसे ज्यादा उल्लेखनीय यह है कि बाबूजी का कालखंड भारत के जीवन संबंधों में नई संवेदना के उन्मेष वाला भी था और संवेदनहीनता के दौर की सूचना देने वाला भी था। बाबूजी के इस फैनामिनल कालखंड का थोड़ा सा एहसास मुझे भी है।
मैं यहां पर बाबूजी के कालखंड के भारतीय समाज के उस बड़े हिस्से की बात नहीं कर रहा हूं जो आजादी के हिस्सों के संघर्ष से बेखबर था और कभी-कभी एक विरोधी की भूमिका में भी दिखाई पड़ता था। यह समाज का वह हिस्सा था जो जीवन के आद्यरूपात्मक गठन के विचारों में आश्वस्त दिखाई देता था।
 राष्ट्रीय आन्दोलन में सक्रिय व्यक्ति, वह चाहे अवयस्क हो, छात्र हो, कर्मचारी हो या फिर एक सामान्य नागरिक ही क्यों न हो, उसकी चित्त रचना में थोड़ा-थोड़ा गांधी और थोड़ा-थोड़ा नेहरू मौजूद दिखाई पड़ता है। जहां तक बाबूजी का सवाल है सो उनकी चित्त-रचना में भी गांधी थे, ईमानदारी, सहज सादगी, सदाशयता, दया और करुणा का भाव गांधियन चरित्र का था। इसी तरह उनकी चित्त-रचना में नेहरूभी थे, वे आधुनिक तर्क और विवेक के व्यवहार में थे, वे लोकतांत्रिक स्वभाव वाले धर्मनिरपेक्षतावादी और समाजवादी विचारों में विश्वास करते थे।
तो इस तरह, बाबूजी की चित्त-रचना का गठन पूरे देश की, प्रांत-प्रांत की, नगर-नगर की, गांव-गांव की, आदिवासी क्षेत्रों से लेकर गिरिजनों के क्षेत्र तक उगती हुई और स्पंदित होती हुई राजनीतिक चेतना से हो रहा था। सच तो यह है कि आजादी के संघर्ष में भारतीय लोकचित्त का जो राजनीतिकरण हो रहा था, जो आधुनिकीकरण हो रहा था, नये-नये रैफ्लैक्शन्स पैदा हो रहे थे, वह उनकी सक्रियता को विविधतापूर्ण संदर्भों वाला बना रहे थे।
ऐसे परिदृश्य में वर्धा में पढऩे वाला एक छात्र (बाबूजी 1940-42) गांधी और नेहरू के भाषणों को सुनता हुआ आजादी के आन्दोलन की तड़प से भर जाता है। उसका छात्रचित्त राजनीतोन्मुख होने लगता है। वह वर्धा साहित्य परिषद् की स्थापना करता है और \'प्रदीपÓ नाम की एक हस्तलिखित पत्रिका निकालता है। इस पत्रिका के विचारों की वजह से वह अंग्रेजी शासन की निगाह में आ जाता है। नतीजा यह होता है कि प्राचार्य की सलाह पर पढ़ाई छोड़कर गांव चला जाता है। अपने इसी वयस्क होते हुए दौर में बाबूजी ने कविताएं और गीत लिखे जिन्हें उन्होंने \'अपयशÓ के नाम से छपवाया। हिन्दी, अंग्रेजी और फारसी में उनकी समान गति थी।
बाद में बाबूजी का कार्यक्षेत्र पुराना मध्यप्रदेश (सेन्ट्रल प्राविन्स एण्ड बरार) और बाद में नया मध्यप्रदेश हो गया। बाबूजी पहले नवभारत ग्रुप (भोपाल, जबलपुर) से संबद्ध रहे। 1959 में उन्होंने अपने दैनिक पत्र \'देशबन्धुÓ का प्रकाशन शुरु किया। देशबन्धु, वास्तव में उनकी रचना-धर्मी पत्रकारिता का एक नमूना है। \'देशबन्धुÓ दैनिक उस स्थापत्य की तरह है जो अपनी उसी विचार परम्परा को नये युग के अनुरूप रूपांतरित करता हुआ आज भी निकल रहा है, कई-कई संस्करणों में निकल रहा है। आज का पाठक वर्ग बहुत चटपटी रुचियों वाला है, वह अपने इतिहास की स्मृति को एक बोझ समझता है और उससे मुक्त हो जाना चाहता है। \'देशबन्धुÓ की यह कोशिश दिखाई देती है कि मुक्त बाजार और पत्रकारिता के समीकरण के दबावों में होते हुए भी यथासंभव अपनी वैचारिकी के अनुकूल बना रहे।
तो बाबूजी के सम्पादकत्व में निकलने वाला दैनिक पत्र \'देशबन्धुÓ नेहरूवियन नवजागरण के विचार का था। यह वह दौर था जब संस्कृति, साहित्य और पत्रकारिता एक प्राण थे। जहां तक देशबन्धु का सवाल है वह पत्रकारिता का एक ऐसा नमूना था जो साहित्य और संस्कृति को दिशा-ज्ञान देता था। देशबन्धु की भूमिका पत्रकारिता के एक स्कूल की तरह थी। देशबन्धु तो पूरे मध्यप्रदेश में लोक जागरण के ट्रेनिंग सेन्टर की  तरह था।
कौन नहीं जानता कि मध्यप्रदेश का यह छत्तीसगढ़ भू-भाग तो जैसे देशबन्धु के द्वारा वितरित विचारों का गढ़ हो गया था। देशबन्धु में छपने वाले परसाई कालम पर बहसें होती थीं। परसाई कालम को पढऩे की होड़ सी लगी रहती थी। परसाई कालम तो जैसे लोकचेतना की बौद्धिक व्याख्या की तरह था। बाबूजी को यह भी चिन्ता बनी रहती थी कि परसाई जी के लेखन में कोई व्यवधान उपस्थित न हो सके। परसाई जी कुछ समय तक बाबूजी के साथ रायपुर में भी रहे।
एक दौर था जिसका साक्षी यह लेखक भी है कि देशबन्धु प्रगतिशील लेखक संघ, मप्र हिन्दी साहित्य सम्मेलन और परसाई जी का लेखन एक पूरी रचना-संस्कृति, एक पूरी बौद्धिक-संस्कृति की भूमिका के रूप में थे।
यहां पर यदि मप्र हिन्दी साहित्य सम्मेलन में उसकी सक्रियता को रेखांकित न किया जाए तो उनकी शख्सियत को नहीं समझा जा सकता।  बाबूजी ने 1958 में नवगठित मप्र हिन्दी साहित्य सम्मेलन का प्रथम आयोजन किया था जिसमें मुख्य अतिथि नेहरू जी थे और उसकी अध्यक्षता पं. कुंजीलाल दुबे ने की थी।
1976 में मप्र हिन्दी साहित्य सम्मेलन के विदिशा आयोजन में उन्हें अध्यक्ष चुना गया। तब से वे जीवनपर्यन्त अध्यक्ष पद पर बने रहे।
हम देखते हैं कि उनके अध्यक्ष बनने के बाद सम्मेलन की पूरी गतिविधि रूपांतरित हो जाती है। साहित्य की समस्त विधाओं में, खासकर, कविता, कहानी और नाटकों में आलोचना में प्रगतिशील मूल्यों को बढ़ावा मिलने लगता है। पूरे हिन्दी जगत में साहित्य सम्मेलन की एक अलग पहचान बनने लगती है। इसके कार्यक्रमों में पूरे देश के रचनाकार, कथाकार और आलोचक भाग लेते थे, गैर हिन्दी भाषा-भाषी भी इसके आयोजनों में भाग लेते थे।
कह सकते हैं कि मप्र हि.सा.स. के माध्यम से पूरे प्रदेश की रचना-संस्कृति मुखर हो गयी थी। यह सच है कि मप्र हि.सा. सम्मेलन के आयोजन में हिस्सा लेने वाले अनेक युवा रचनाकार हो गये। सम्मेलन के द्वारा आयोजित शिविरों, रचना-शिविरों, नाट्य-शिविरों और विचार गोष्ठियों ने न जाने कितने संवेदनशील युवकों को साहित्य, शिक्षण दिया, साहित्यकार और नाट्यकर्मी के रूप में एक पहचान दी। सच यह भी है कि कमलाप्रसाद और ललित सुरजन दोनों एक संगठनकर्ता के रूप में मप्र साहित्य सम्मेलन और प्रगतिशील लेखक संघ की देन हैं। मप्र हि.सा.सम्मेलन के शिविरों और उसकी विचार गोष्ठियों में हिस्सा लेने के बाद अनेक युवा प्रगतिशील लेखक संघ के सदस्य बने।
इस टिप्पणी का लेखक स्वयं कमलाप्रसाद और ललित सुरजन के द्वारा किये गये आयोजनों से शिक्षित-प्रशिक्षित हुआ है। कमलाप्रसाद और ललित सुरजन के द्वारा आयोजित शिविरों और गोष्ठियों की वजह से पूरा छत्तीसगढ़ अंचल साहित्यमय, आलोचनामय हो गया था। छत्तीसगढ़ अंचल पूरे देश का एक साहित्यिक केन्द्र जैसा हो गया था।
बाबूजी मेरे परम आदरणीय थे। उनसे तीन बार भेंट हुई। मुझे कभी नहीं लगा कि यह व्यक्ति कोई ऐसा विशेष है जो सामान्य से अलग दिखाई देता हो। मैं तो यहां तक कहूंगा कि उनका एक सहज ग्रामीण जैसा स्वभाव था। थोड़ा-थोड़ा गांधी उनके आचरण में झलकता दिखाई देता था। जबकि बाबूजी स्वयं में एक संस्था की तरह थे। इस लेखक के लिए बाबूजी उसके बीते हुए कल के एक प्रेरणादायक विशेष थे।
कुछ लोग ऐसे होते हैं जो अपनी उपस्थिति दर्ज करना नहीं भूलते। कुछ ऐसे भी होते हैं जो सामने नहीं आते किन्तु उनकी उपस्थिति का एहसास सबको बराबर होता रहता है।
तो इस दूसरी तरह के लोगों में एक थे बाबूजी मायाराम सुरजन।
मैं, उनको और उनके योगदान को अपनी स्मृति में लाता हंू और उनकी स्मृति को पुन: प्रणाम करता हूं।  ठ्ठ