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Monday 20 Nov 2017

दूसरे दिन जब चन्दर डॉ. शुक्ला के यहां निबंध की प्रतिलिपि लेकर पहुंचा तो आठ बज चुके थे। सात बजे तो चंदर की नींद ही खुली थी और जल्दी से वह नहा-धोकर साइकिल दौड़ता हुआ भागा था कि कहीं भाषण की प्रतिलिपि पहुंचने में देर न हो जाये।....

दूसरे दिन जब चन्दर डॉ. शुक्ला के यहां निबंध की प्रतिलिपि लेकर पहुंचा तो आठ बज चुके थे। सात बजे तो चंदर की नींद ही खुली थी और जल्दी से वह नहा-धोकर साइकिल दौड़ता हुआ भागा था कि कहीं भाषण की प्रतिलिपि पहुंचने में देर न हो जाये।.... चन्दर की साइकिल जब अन्दर दीख पड़ी तो सुधा ने उधर देखा लेकिन कुछ भी न कहकर फिर अपनी क्रोशिया बुनने में लग गई। चन्दर सीधा पोर्टिको में गया। और अपनी साइकिल रखकर भीतर चला गया डॉ. शुक्ला के पास। (गुनाहों का देवता, पृष्ठ 43, संस्करण 1981)
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साइकिल खड़ी कर, तारवाला लॉन पर चला गया और तार दे दिया। दस्तखत करके उसने लिफाफा फाड़ा। तार डॉक्टर साहब का था। लिखा था कि अगली ट्रेन से ही फौरन चले आओ। स्टेशन पर सरकारी कार होगी स्लेटी रंग की। उसके मन ने फौरन कहा चन्दर हो गये तुम केन्द्र में ! उसकी आंखों से नींद गायब हो गई। वह उठा, अगली ट्रेन सुबह तीन बजे जाती थी। ग्यारह बजे थे। अभी चार घण्टे थे। उसने एक अटैची में कुछ अच्छे से अच्छे सूट रखे, किताबें रखीं, और माली को सहेजकर चल दिया।.... मोटर को स्टेशन से वापस लाने की दिक्कत होती, ड्राइवर अब था नहीं, अत: नौकर को अटैची देकर पैदल चल दिया। राह में सिनेमा से लौटता हुआ एक रिक्शा मिल गया। (गुनाहों का देवता, पृष्ठ 335)
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बाइसिकल दिल्ली में आम आदमी की सवारी है। फेरीवाले, दूधवाले, सब्जी वाले, दफ्तरों के कर्मचारी, विद्यार्थी, शिक्षक, दुकानदार और अन्य अनेक प्रकार के लोग अपने दैनिक जीवन में बाइसिकल का सहारा लेते हैं। कभी-कभी तो परिवहन के इस सस्ते साधन का उपयोग एक पूरे परिवार, जिसमें बच्चे और चारपाई तक शामिल होती है, को ले जाने के लिए किया जाता है। साइकिल का कैरियर तरह-तरह के परिवहन-कार्यों के लिए बहुत सुविधाजनक होता है। अगर किसी को लगभग 5 मील के दायरे में या आध घंटे की यात्रा करनी हो तो दिल्ली में आज बस या ट्रेन या किसी भी वाहन की अपेक्षा साइकिल परिवहन का अधिक सस्ता साधन सिद्ध होगी। (भारत का गजेटियर: दिल्ली, 1976, पृष्ठ 408)
यह बात जितनी उन दिनों के लिए सच थी, उतनी आज भी। (साइकिल गाथा, भूमिका )
मैं अपनी बात आखिरी उद्धरण से प्रारंभ करता हूं। साइकिल गाथा के संपादक राजेन्द्र रवि ने भारत के गजेटियर में दिल्ली में साइकिलों के उपयोग का उल्लेख करते हुए उपरोक्त टिप्पणी की है। मैं उनके स्वर में अपना स्वर मिलाकर कहता हूं कि यह बात जितनी उन दिनों के लिए सच थी उतनी ही आज भी है।
दिल्ली स्थित इंस्टीट्यूट फॉर डेमोक्रेसी एंड सस्टेनेबिलिटी (आईडीएस) ने 2005-06 से 2008-09 के बीच दिल्ली और आस-पास के इलाकों में साइकिल और साइकिल रिक्शों पर एक वृहद अध्ययन किया जिसकी रिपोर्ट 2014 में दो किताबों के रूप में सामने आई। पहली साइकिल गाथा और दूसरी साइकिल रिक्शे का साम्राज्य। इन दोनों पुस्तकों का संपादन राजेन्द्र रवि ने किया है। सबसे अच्छी बात है कि आईडीएस ने अपने इस शोध कार्य का प्रकाशन हिन्दी में करना उचित समझा ताकि इस विषय पर अधिक से अधिक लोगों तक जानकारी पहुंच सके।
हमारा ध्यान इस दिलचस्प तथ्य पर जाता है कि राजेन्द्र रवि अपनी भूमिका में 1976 के गजेटियर को उद्धृत करते हंै याने इस बात को चालीस साल हो गए। यह अध्ययन भी 2006 के आस-पास होता है याने उसे भी दस साल पूरे होने आए और आज 2016 में मैं उनसे सहमत होता हूं कि बाइसिकल आम आदमी की सवारी है और यह कि भविष्य तो साइकिलों का ही है। मैंने प्रारंभ में धर्मवीर भारती के अत्यंत लोकप्रिय उपन्यास ''गुनाहों का देवताÓÓ से दो उद्धरण लिए हैं जिनमें क्रमश: साइकिल व साइकिल रिक्शे का जिक्र आया है। मैंने इस पुस्तक को ही क्यों चुना? इसका कोई खास कारण नहीं है सिवाय इसके कि अपने दौर की एक लोकप्रिय कृति होने के कारण इसके कुछ दृश्यों और संवादों की धुंधली स्मृति मन में बनी हुई है। किन्तु उल्लेख करने का मुख्य कारण यह दर्शाना है कि एक दौर था जब हमारे कथा साहित्य में साइकिल और रिक्शे घूम-फिर कर आ ही जाते हैं। अब हमारे पात्र न तो अमूमन साइकिल पर चलते, न रिक्शा पर बैठते।
यही बात हिन्दी फिल्मों के बारे में भी कही जा सकती है। मुझे ध्यान आता है बी.आर. चोपड़ा की फिल्म एक ही रास्ता में सुनील दत्त साइकिल से अपने ऑफिस जा रहा है तब ट्रक के नीचे कुचल कर उसकी हत्या कर दी जाती है। पेईंग गेस्ट में भी देवानन्द और नूतन को हम साइकिल चलाते हुए देखते हैं। जानी-मानी हस्त अभिनेत्री शुभा खोटे तो साइकिलिंग की चैम्पियन ही थीं और इसी कारण उन्हें फिल्म में काम करने का पहला ऑफर मिला था। ये कुछ उदाहरण हैं। आपको भी ऐसे बहुत से दृश्य इतनी देर में याद आ गए होंगे। साहित्य और फिल्मों के इस उल्लेख से यह प्रमाणित होता है कि दो पहिए की यह सवारी किस तरह हमारे जीवन का लगभग अनिवार्य अंग थी। यह दृश्य 1970 के आसपास बदलना शुरू हुआ। मुझे तब के नवनीत का एक लेख ध्यान आता है जिसमें वर्णन था कि लूना आ जाने के बाद महिलाओं को किस तरह स्वतंत्रता का अहसास हो रहा है।
हमें इसमें शक नहीं कि लूना आ जाने के बाद न सिर्फ कामकाजी महिलाओं बल्कि गृहणियों को भी एक सुविधा का अनुभव अवश्य हुआ और आज भी न सिर्फ महिलाएं बल्कि अनेक उम्रदराज नागरिक भी स्कूटीनुमा वाहन चलाकर अपने दैनंदिन काम का बोझ हल्का कर लेते हैं, लेकिन साइकिल की बात ही कुछ अलग है।  मैंने अपने प्रदेश छत्तीसगढ़ में देखा है कि दूरदराज के इलाके में लड़कियों को सरकार द्वारा साइकिल देने के बाद स्कूलों में उनकी आमद बढ़ गई हैं। अगर स्कूल पांच किलोमीटर दूर है तो पैदल आने-जाने में जो समय लगता था उसमें बचत होने के अलावा शाम को स्कूल छूटने के बाद घर लौटते समय अंधेरे का डर भी कम हुआ है और अब तो पूरे प्रदेश में छात्राओं को बिना भेदभाव के साइकिलें दी जा रही हंै। मेरी जानकारी है कि अन्य प्रदेशों में भी इस तरह की योजना चल रही है। सुबह-शाम साइकिल पर स्कूल आती-जाती छात्राओं के दल देखकर इस भाव की पुष्टि होती है कि भविष्य तो साइकिलों का है।
मुझे इस बारे में सोचते हुए एल्विन टॉफ्लर की बहुचर्चित पुस्तक ''फ्यूचर शॉकÓÓ का भी ध्यान आता है। लेखक ने सभ्यता के क्रम में टेक्नालॉजी के विकास पर चर्चा करते हुए लिखा था कि पहिए के आविष्कार के बाद बैलगाड़ी/ घोड़ागाड़ी बनाने में मनुष्य को हजारों साल लगे, वहां से साइकिल तक पहुंचने में दो हजार साल, साइकिल से कार तक आने में दो सौ साल से भी कम, और कार से वायुयान का आविष्कार होने में कुछ दशक ही लगे। यह कथन सोचने पर विवश करता है कि जिस साइकिल ने मनुष्य की इतनी सेवा की क्या हमें इसका परित्याग मात्र दो सौ साल में ही कर देना चाहिए? बैलगाड़ी अथवा भैंसागाड़ी अथवा घोड़ागाड़ी की उपयोगिता अगर दो हजार साल तक सेवा करने के बाद लगभग समाप्त हो गई है तो इसमें कोई दुख की बात नहीं है। वैसे भी इन बोझा ढोने वाले पशुओं के साथ हमारा संबंध बना ही हुआ है। लेकिन गति, स्वतंत्रता और सुरक्षा इन सबका अहसास कराने वाले आधुनिक समय के आविष्कार से नाता तोडऩे की इच्छा किस आधार पर सही ठहराई जाए?
पिछले दिनों दिल्ली में वाहन प्रदूषण की समस्या को लेकर कई दिनों तक गर्मागर्म बहसें होती रहीं। इसमें कुछ ऐसी बातें उभरकर सामने आईं जिन पर सामान्यत: समाज ध्यान नहीं देता। जैसे- 1. कारें सड़क का बहुत बड़ा हिस्सा घेरती हंै जिस कारण जाम की स्थिति उत्पन्न होती है। 2. स्थिति को सुगम बनाने के लिए सड़कों को चौड़ा किया जाता है तथा फ्लाईओवर आदि के निर्माण की आवश्यकता पड़ती है। 3. इस कार्य में धनराशि के अलावा निर्माण सामग्री की अंतहीन आवश्यकता होती है। 4. इतनी रेत, गिट्टी, डामर, सीमेंट की आपूर्ति क्या अनंत समय तक जारी रह सकती है? 5. इसके लिए पहाडिय़ां तोडऩे और खदानें खोदने की आवश्यकता पड़ती है, जिनका दोहन एक सीमा तक ही संभव है। 6. जब सड़कों पर तेज गति वाहन चलते हैं तो उनसे सड़क का क्षरण होता है और वही रेत, गिट्टी. धूल बनकर प्रदूषण उत्पन्न करती है। 7. इन वाहनों के लिए पेट्रोल, डीजल चाहिए और वह अस्सी प्रतिशत विदेशों से आयात करना पड़ता है। 8. तेज गति के कारण जो दुर्घटनाएं होती हैं वह भी एक गहरी चिंता का मुद्दा है।
इनके मुकाबले साइकिल और साइकिल रिक्शा को देखना चाहिए। जैसा कि आईडीएस के अध्ययन में बतलाया गया है:-
० सड़कों पर ट्रैफिक जाम की समस्या से राहत मिलेगी। लोग कम समय में अपने गंतव्य स्थान पर पहुंचेंगे।
० शहरी वायु-प्रदूषण, ध्वनि-प्रदूषण इत्यादि में कमी आएगी; अनुकूल वातावरण मिलेगा।
० पेट्रोलियम पदार्थों और अन्य वाहन-ईंधनों की चिंता में भारी कमी आएगी। हम आवागमन के मामले में ज्यादा आत्मनिर्भर होंगे।
० ईंधन पर खर्च होने वाली विदेशी मुद्रा की बड़ी राशि की बचत होगी। इस पैसे से रोजगार-सृजन और लोगों की जीवन-दशा सुधार के क्षेत्र में काम किया जा सकता है।
० भयंकर व जानलेवा सड़क-दुर्घटना का ग्राफ एकदम नीचे आ जाएगा। मानव-संसाधन की क्षति रुकने से आवागमन एक आनंददायक क्रिया होगी।
० गरीब से गरीब आदमी तक यह संदेश जाएगा कि 'लोकतंत्र में सचमुच जनता सर्वोपरि है। अमीर-गरीब एक व्यक्ति के रूप में बराबर हैं; संपत्ति की कमीबेशी के कारण उनमें कोई भेदभाव नहीं है।Ó
इसके अलावा यह अध्ययन हमें साइकिल की लोकप्रियता के बारे में भी कुछ जानकारियां देता है। 1. सबसे पहले तो साइकिल सस्ता वाहन है जो निम्न वित्त परिवार भी खरीद सकता है। 2. इसके लिए ईंधन की चिंता नहीं करना है। विदेशी मुद्रा की भी बचत और घरेलू बजट में भी बचत। 3. इनकी मरम्मत करना आसान है। 4. स्वास्थ्य के लिए उत्तम है। 5. पर्यावरण मित्र है। 6. दुर्घटनाओं पर अंकुश लगाने में सहायक है। इसमें हम जोड़ें कि 1. साइकिल मरम्मत के काम से बड़ी संख्या में रोजगार के अवसर उत्पन्न होते हैं। 2. इनसे नगर की मूल संरचना पर विपरीत प्रभाव नहीं पड़ता। 3. साइकिल पाइंट-टू-पाइंट पहुंचा देती है। साइकिल में ऐसे और बहुत से गुण हैं जिसके कारण विश्व के अनेक देशों में साइकिल की लोकप्रियता बरकरार है तथा साइकिल चालक को समाज में हीनता की दृष्टि से नहीं देखा जाता। नीदरलैंड निवासी लेखिका पुष्पिता तो यह भी बताती हंै कि यूरोप में पेट्रोल के दाम बहुत ऊंचे हैं इसलिए वहां साइकिल का चलन अधिक है। यह बिन्दु भी गौरतलब है।
साइकिल गाथा 188 पेज में सिमटी हैं, लेकिन साइकिल रिक्शा का साम्राज्य- इस पुस्तक में साढ़े चार सौ पृष्ठ हैं। बुनियादी तौर पर साइकिल व रिक्शा दोनों में एक समानता है कि दोनों मनुष्य चालित व ईंधनमुक्त वाहन है। फर्क इतना अवश्य है कि रिक्शा चालक एक मजदूर है। वह समाज की सेवा करता है और उसे अपनी मेहनत का उचित परितोष मिलना चाहिए। यहां सिर्फ रिक्शा किराए की बात नहीं है; उसके आवास, विश्रामस्थल, विपरीत मौसम में सुरक्षा- इन सब बातों की ओर भी ध्यान जाना चाहिए। जबलपुर के श्रमिक नेता और वकील लक्ष्मण सिंह चौहान रिक्शे पर नहीं बैठते थे कि आदमी आदमी को खीचें यह मंजूर नहीं। किन्तु उनकी जीवनसंगिनी सुभद्रा कुमारी चौहान (जिनके परिचय की आवश्यकता नहीं) रिक्शे में बैठती थीं और चार आना बनता हो तो आठ आना देती थीं। उनका कहना था कि रिक्शावाले को भी घर चलाना है और उसके साथ सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार होना चाहिए। सुधा अमृतराय ने अपने माता-पिता की जीवनी ''मिला तेज से तेजÓÓ में इसका वर्णन किया है। जैसे साइकिल वैसे रिक्शे के लिए भी हमारे साहित्य में जगह थी। लगभग साठ साल पुराना वह फिल्मी गीत मुझे अभी भी याद है- मैं रिक्शा वाला, मैं रिक्शावाला, है चार के बराबर ये दो पांव वाला। हमारे नगरों में रिक्शे आज भी चल रहे हैं, लेकिन उनकी तरफ हमारा ध्यान अब नहीं जाता। यद्यपि उनकी ईमानदारी के किस्से कभी-कभी पढऩे मिल जाते हैं कुछ ऐसे शीर्षकों के साथ जैसे ईमानदारी आज भी जिन्दा है, रिक्शे वाले ने पर्स लौटाया। ऐसे समाचार में यह दबा-छुपा मनोभाव कहीं रहता है कि रिक्शेवाला गरीब है तो वह ईमानदार नहीं हो सकता।
बहरहाल पुस्तक के संपादक राजेन्द्र रवि भूमिका 1 और 2 में अपने शोध कार्य की अवधारणा से हमें परिचित कराते हैं-
''हमने वर्षों-वर्षों के अपने उद्योग से साइकिल रिक्शे से जुड़े अनेक मॉडलों और सामग्रियों का संचय किया था; रिक्शा चालकों की जिंदगी से जुड़े पहलुओं का रेखांकन कराया था और रिक्शा की सवारी करते हुए राष्ट्रीय नेताओं के चित्र इकट्ठे किए थे। हमने रिक्शा पर लिखी अनेकानेक किताबों का संग्रह किया था और रिक्शा को सजाने वाली चीजों का भी। इन सभी के सहयोग से हमने विभिन्न शहरों में रिक्शा-प्रदर्शनियां आयोजित की हैं। इन प्रदर्शनियों का सिलसिला अभी थमा नहीं है।ÓÓ
''राष्ट्रीय राजधानी परिक्षेत्र का 'रिक्शाÓ महज परिवहन का एक साधन या गरीब आदमी की रोजी-रोटी का अंतिम सहारा भर नहीं है, बल्कि आज के संदर्भ में यह ऐसा प्रतीक है जिसके इर्द-गिर्द भारत के लोकतांत्रिक विकास की पूरी कहानी अपने यथार्थ रूप में विद्यमान है। रिक्शे के साथ न्याय करके न केवल गरीब आदमी को रोजगार और सम्मान प्रदान किया जा सकता है, बल्कि इससे एक स्वस्थ समाज की रचना का आधार भी तैयार होगा। रिक्शा हमारे पर्यावरण की रक्षा करता है, यह हमारी अर्थ-व्यवस्था में योगदान करता है और अपनी तमाम बदहाली के बावजूद यह रिक्शा चालक के आत्म-सम्मान की रक्षा में मदद पहुंचाता है। रिक्शा और इस व्यवसाय से जुड़े लोगों पर केंद्रित हमारा यह अध्ययन इस अवधारणा की पुष्टि करता है।ÓÓ
मैं इस शोध के निष्कर्षों से भी स्वयं को सहमत पाता हूं। यह अध्ययन दिल्ली से लगे हरियाणा, उत्तरप्रदेश और राजस्थान के कस्बों तक जाकर किया गया था और इसमें रिक्शा मालिक, रिक्शा चालक, रिक्शे की सवारियां- इन सबको शामिल किया गया है। रिक्शा रोजगार का साधन तो है ही, लेकिन चालकों की जीवन परिस्थितियां क्या हैं, सड़क पर चलते हुए उन्हें क्या परेशानियां होती हैं, इनका उनके स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ता है, पुलिस का उनके प्रति व्यवहार कैसा है, सवारियों का उनके प्रति क्या नजरिया है- ऐसे तमाम मुद्दों पर इस पुस्तक में चर्चा की गई है। पुस्तक के अंत में बहुत सारी अनुशंसाएं भी की गई हैं जिनमें से कुछ निम्नलिखित हैं-
1. रिक्शा को सार्वजनिक परिवहन-व्यवस्था का अभिन्न अंग माना जाए।
2. रिक्शा के साथ-साथ अन्य गैर-मोटर वाहनों के विकास के लिए प्राधिकरण बनाया जाए।
3. रिक्शा से जुड़े तमाम कायदे-कानूनों की नए संदर्भ में समीक्षा की जाए और उसमें परिवर्तन किया जाए।
4. 'एकल रिक्शा मालिक पद्धतिÓ के साथ-साथ 'बहुसंख्यीय रिक्शा मालिक पद्धतिÓ भी लागू की जाए।
5. रिक्शा के लिए 'सड़कों पर लगी पाबंदीÓ हटाई जाए। चूंकि यह समाज के कमजोर वर्ग के व्यवसाय का हिस्सा है और पर्यावरण की रक्षा करता है, इसलिए इसे बढ़ावा देने की दिशा में प्रयास किया जाना चाहिए।
6. पार्किंग एवं प्रत्येक बस स्टॉप के नजदीक रिक्शा स्टैंड का निर्माण किया जाए।
7. रिक्शा चालक, मालिक मिस्त्री एवं उत्पादक के लिए बैंक ऋण एवं बीमा (इंश्यारेंस) की सुविधा दी जाए।
8.  अंशकालिक रिक्शा चालकों के हितों की रक्षा के लिए 'रिक्शा सहकारी समितिÓ योजना लागू की जाए एवं इनके लिए आवास, शौचालय, स्नानागार जैसी मौलिक सुविधाओं का प्रबंध किया जाए।
9. रिक्शा जब्त करके तोडऩे की प्रक्रिया बंद की जाए।
10. रिक्शा को लघु एवं घरेलू उद्योग की श्रेणी में रखकर रिक्शा मालिकों और उत्पादकों को इसकी सारी सुविधाएं दी जाएं।
11. लाइसेंस की प्रथा समाप्त करके रिक्शे के पंजीकरण की व्यवस्था हो, जैसा कि मोटर चालित वाहनों के मामलों में होता है।
12. शहर की आबादी के अनुपात के हिसाब से टैक्सी नेटवर्क की तरह 'पड़ोसी रिक्शा नेटवर्कÓ योजना बनाई जाए।
13. रिक्शा को प्रदूषण रहित सार्वजनिक और व्यक्तिगत वाहन का दर्जा देकर इसे हर प्रकार के टैक्स में छूट दी जाए।
14. रिक्शा मिस्त्रियों के लिए अलग-अलग जगहों पर ठीहा उपलब्ध कराया जाए।
15 रिक्शा चालकों को स्वास्थ्य संबंधी सुविधा उपलब्ध कराने के लिए सरकारी अस्पतालों एवं स्वास्थ्य केंद्रों में व्यवस्था की जाए।
ये दोनों किताबें पुस्तक दुकान पर शायद सामान्य तौर पर उपलब्ध न हो। शायद आपकी रुचि भी इतने विस्तार में जाने की न हो, लेकिन हमें मिलजुल कर यह विचार तो करना ही होगा कि इन दोनों वाहनों को हमारी यातायात व्यवस्था में प्राथमिकता कैसे दें क्योंकि वह सभी दृष्टियों से हमारे हित में होगी। जो पाठक इस बारे में अधिक जानकारी चाहते हैं वे संस्था से संपर्क कर सकते हैं। उनके संपर्क पुस्तक विवरण के साथ दिए गए हैं)।  
पुस्तक: साइकिल रिक्शे का साम्राज्य: राष्ट्रीय राजधानी परिक्षेत्र में साइकिल रिक्शे का अस्तित्व और संघर्ष
संपादन : राजेन्द्र रवि
प्रकाशक : इंस्टीट्यूट फॉर डेमोक्रेसी एंड सस्टनेबिलिटी (आईडीएस)
मकान नं.7, गली नं.-1,
ब्लॉक-ए, हिमगिरी इन्क्लेव,
पेप्सी रोड, मेन बुराड़ी रोड,
नई दिल्ली-110084
मूल्य : 580 रुपए
मोबा. +91-98682 00316
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पुस्तक : साइकिल गाथा : शहर में साइकिल की दशा और दिशा
संपादन : राजेन्द्र रवि
प्रकाशक : इंस्टीट्यूट फॉर डेमोक्रेसी एंड सस्टनेबिलिटी (आईडीएस)
मकान नं.7, गली नं.-1,
ब्लॉक-ए, हिमगिरी इन्क्लेव,
पेप्सी रोड, मेन बुराड़ी रोड,
नई दिल्ली-110084
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ललित सुरजन