Monthly Magzine
Wednesday 14 Nov 2018

जुलाई अंक की चारों कहानियां, विशेषकर \'जिदÓ बहुत पठनीय है, \'जिदÓ में कथाकार वीरा चतुर्वेदी ने एक बहुत ही सामान्य विषय को यूनिवर्सल अपील के क्लासिकल स्तर तक उठा दिया है,

पूरनचंद बाली 'नमन'

 सी-1606, ओबेराय स्पैलण्डर
जीवीएल रोड, जोगेश्वरी (पूर्व), मुंबई-400060)
जुलाई अंक की चारों कहानियां, विशेषकर 'जिदÓ बहुत पठनीय है, 'जिदÓ में कथाकार वीरा चतुर्वेदी ने एक बहुत ही सामान्य विषय को यूनिवर्सल अपील के क्लासिकल स्तर तक उठा दिया है, इसी तरह 'मुर्गा लड़ाईÓ में बस्तर में जनजीवन की झांकी में स्थानीय भाषा का विपुल इस्तेमाल पाठक के लिए बाधा नहीं बनता, वह कथानक में इतना रम जाता है, रजनी शर्मा के इस प्रयास को मैं रेणु की श्रेष्ठ रचनाओं के समकक्ष रखना चाहूंगा... 'मुनियप्पा का मैन पावर सप्लाईÓ में कथाकार बी.एम. हनीफ ने वनांचलों और गांवों के जनजीवन पर समीपवर्ती महानगरों के प्रभाव का बड़ा ही मार्मिक चित्र प्रस्तुत किया है। अंत में 'खिच्याकÓ कहानी का केन्द्र कैमरा है जो शादी-ब्याहों पर छाया रहता है। हेमेन्द्र पाण्डे अपने आलेख, रस्पूतिन (पेज 45) में बताने में सफल हुए हैं कि रचनाकार क्या कह रहा है और पाठक उसे क्यों पढ़े। इन दो मूल मुद्दों पर पंकज सुबीर (पेज 65) ने भी समाधानकारक चर्चा की है। परन्तु इसी क्रम में परिचय दास (अर्थ का आलोक) ने जटिल शैली में अपनी एक तरफ तारीफ के पुल बांधे हैं, मानो परीक्षा में प्रश्न का उत्तर लिख रहे हों। घर बैठे क्रान्ति का बिगुल बजा रहे हैं कविगण आजकल। किसी काम लायक बनने की क्रांति इनके अपने ही जीवन में आनी शेष हैं।
अंत में राजेन्द्र उपाध्याय का प्रेमचंद पर आलेख प्रवचन प्रतीत होता है और बड़बोलेपन से परिपूर्ण है, राजेन्द्र जी को इस अंक की चारों कहानियों को पढऩा चाहिए जिनमें प्रेमचंद के बाद की रौशनी है।