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Wednesday 22 Nov 2017

किसी पत्रिका का पढऩा तभी सार्थक लगता है जब उसमें प्रकाशित कोई रचना या लेख मन को छू ले और वह देर तक गूंजता रहे।

डॉ. गंगा प्रसाद बरसैंया,

ए-7, फारचून पार्क
जी-3, गुलमोहर भोपाल-462039
किसी पत्रिका का पढऩा तभी सार्थक लगता है जब उसमें प्रकाशित कोई रचना या लेख मन को छू ले और वह देर तक गूंजता रहे। इस दृष्टि से अक्टूबर-15 अंक के कई लेख उल्लेखनीय हैं। तुमने अपने सम्पादकीय में प्रगतिशील विचारधारा से जुड़े जिन अलग-अलग संगठनों के एकत्व और अंतिम अंश में जो पांच-छ: सुझाव दिए हैं, उन्हें कुछ लोगों ने पहले भी कहा था किन्तु आश्चर्य है कि प्रगतिवादी-समानवादी सोच के संगठन की बातें तो आदर्श भी करते हैं किन्तु उसे व्यवहारिक रूप देने में एक कदम नहीं बढ़ते। क्या तुम्हें लगता है कि वे पांचों सुझाव निकट भविष्य में पूरे होंगे? असल में अलगाव और बिखराव का कारण अहं है। इससे मुक्त होना कठिन है।
रमेश उपाध्याय की भीष्म साहनी संबंधी वक्तव्य बहुत भावपूर्ण है। उनके वक्तव्य से ज्ञात होता है कि भीष्म जी श्रेष्ठ और महान रचनाकार होने के साथ ही अत्यंत उदार और सद्भावी स्वभाव के व्यक्ति थे। तभी तो विपरीत विचारधारा के थे। उनकी पत्नी ने कभी उपाध्याय से दूरी नहीं बनाई। मेरी दृष्टि में व्यक्ति का मूल्यांकन केवल उसके प्रवेश पर नहीं, अपितु उसके स्वभाव, आचरण और व्यवहार पर भी बहुत कुछ निर्भर करता है। वंदना अवस्थी का गया वर्णन पढ़कर भी अपनी गया यात्रा की याद आ गई। वहां के दृश्यों की याद करके आज भी मन वितृष्णा से भर जाता है और तब अनुभव होता है कि श्रद्धा सचमुच कितनी अंधी और विचार शून्य होती है।
गणपत तेली का मीरा पर माधव हाड़ा से साक्षात्कार बहुत महत्वपूर्ण है। 'मीरायनÓ आदि पत्रिकाओं अथवा मीरा संबंधी गं्रथों में जो पढऩे को मिलता है और जो जनमानस में प्रचलित है उससे अलग हटकर बातें की गई है। इन पर गंभीरता से तुलनात्मक चिंतन होना चाहिए ताकि सत्योद्घाटन हो सके। केवल लोक पिटाई न हो। राहुल राजेश की रामकिशोर मेहता के उपन्यास 'कैकेयीÓ की समीक्षा पढ़कर लगा कि उपन्यास परम्परा से हटकर अलग दृष्टि तथ्यों को प्रस्तुत करने वाला है। भले ही वे सर्वस्वीकृत हों, विवादास्पद हों। इसी प्रकार का एक उपन्यास 'दशाननÓ के बारे में भी पढ़ा था। 'कैकेयीÓ उपन्यास पढऩे की जिज्ञासा है। समीक्षा पढ़कर आज ही प्रकाशक को पुस्तक वी.पी. से भेजने को लिख दिया है। प्रभाकर चौबे के लेख जब भी, जहां भी पढ़ता हूं, सुख मिलता है। 'ज्यों बड़े की अंखियां निरख आंखिन को सुख होता।Ó इस प्रकार इस अंक में बहुत कुछ नया पढऩे को मिला। अच्छा लगा।