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Thursday 18 Jan 2018

जनवरी अंक में ललित सुरजन जी की प्रस्तावना हमेशा की तरह ही बेहतरीन है ! हिन्दी कविता में गज़़ल विधा आज एक स्थापित और विशिष्ट विधा है !

नवनीत कुमार झा, हरिहरपुर

जनवरी अंक में ललित सुरजन जी की प्रस्तावना हमेशा की तरह ही बेहतरीन है ! हिन्दी कविता में गज़़ल विधा आज एक स्थापित और विशिष्ट विधा है ! इस विधा के संबंध में ललित जी का यह कथन- मुझे लगता है कि अगर हिंदी गज़़लकार हिन्दी गज़़ल की जगह सिर्फ  गज़़ल संज्ञा का प्रयोग करें तो उर्दू अदब में भी वे साथ-साथ स्वीकृति हासिल कर सकेंगे। अनुकरणीय है, क्योंकि हिन्दी गज़़ल और उर्दू गज़़ल की अनावश्यक सीमारेखा का लोप होगा तो गज़़ल विधा का ज्यादा भला होगा ! गाँव देहात का पाठक हूँ इसलिए चाह कर भी हिन्दी पत्रिकाओं के समृद्ध संसार से अपरिचित और अछूता हूँ। इसलिए अक्षर पर्व के जनवरी माह की प्रस्तावना मेरे लिए महत्वपूर्ण है कि इसमें अलाव पत्रिका के हिन्दी गज़़ल पर केन्द्रित विशेषांक की चर्चा की गई है! गज़़ल सुनने और पढऩे की पुरानी आदत है सो न ही रामकुमार कृषक से अनभिज्ञ हूँ और न बड़े गुलाम अली से, पर अहमद हुसैन और मुहम्मद हुसैन मेरे पसंदीदा गज़़ल गायक हैं! अलाव पत्रिका के गुण-दोष को अपनी आँखों से देखने की उत्सुकता जगाने वाले प्रस्तावना को ध्यानस्थ सा पढऩे लगा और एक संकल्प ने आकर लेना शुरू कर दिया कि यह अंक कैसे भी हो प्राप्त करना है ! अंत में संपादक-प्रकाशक का नाम और पता देकर बहुत ही बड़ा उपकार कर दिया है ललित जी ने !!