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Tuesday 21 Nov 2017

अक्षर पर्व कहानी विशेषांक के दोनों अंक संग्रहणीय हैं। पहला अंक तो बहुत ही जानदार है। भीष्म साहनी की वीरो ने बंटवारे के दर्द का यादगार अक्स एक बार फिर चस्पां कर दिया। कालावधि के यथार्थ का जीवन्त और सहज सम्प्रेषण।

कामेश्वर पांडेय
अक्षर पर्व कहानी विशेषांक के दोनों अंक संग्रहणीय हैं। पहला अंक तो बहुत ही जानदार है। भीष्म साहनी की वीरो ने बंटवारे के दर्द का यादगार अक्स एक बार फिर चस्पां कर दिया। कालावधि के यथार्थ का जीवन्त और सहज सम्प्रेषण। इस अंक में ख्यात कथाकारों को एक साथ देख कर मन मुग्ध हुआ। दूसरा अंक अपेक्षाकृत दूसरी पीढ़ी के कथा संसार से रू ब रू कराता है। अभी पढऩा जारी है।
ललित जी की प्रस्तावना मेरे लिए आकर्षण का केन्द्र रहता है। उसमें बहुत थोड़े से शब्दों में विषय की गहरी जानकारी तो मिलती ही है, बहुत सारी बातें दिमाग में सुलझती भी हैं।
अक्षर पर्व की इस अक्षर सेवा के लिए हम कृतज्ञ हैं!