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Monday 20 Nov 2017

बहुत समय से मेरी यह तमन्ना थी की कोई तो मेरी इस बात से इत्तेफाक करे कि हिन्दी-उर्दू के नाम पर गज़़ल को न घसीटा जाय वो अब आपका सम्पादकीय पढ़कर पूरी हुई।

 

के पी सक्सेना दूसरे , 09584025175
बहुत समय से मेरी यह तमन्ना थी की कोई तो मेरी इस बात से इत्तेफाक करे कि  हिन्दी-उर्दू के नाम पर गज़़ल को न  घसीटा जाय वो अब आपका सम्पादकीय पढ़कर पूरी हुई। इसके लिए आपका साधुवाद।
अब बात किस्सागोई की। तो  वन्दे मातरम का  इतना खूबसूरत विश्लेषण न भूतो न भविष्त्त सा लगता है, मन प्रसन्न हो गया। चंद्रकांत जी की मार्मिक कहानी लली गई किस देस और निर्मला डोसी की अपने अज्ञान को.. तथा बूढा दरख्त, सुधा गोयल बहुत सम सामयिक एवं मर्माहत करने वाली कहानियां साबित हुर्इं।
कविताओं में यश मालवीय, मुकुट सक्सेना तथा जीवन यदु की गज़़लों ने अत्यधिक प्रभावित किया साथ ही  डॉ त्रिभुवन राय  का मंटो पर प्रेषित आलेख अविस्मरणीय है।
और भी बहुत कुछ है एक पाठक की हैसियत से कहने को, पर फिलहाल इतना ही।