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Tuesday 21 Nov 2017

आलोचनाकर्म अंक अक्तूबर 2015

 

 हरदर्शन सहगल, 5-ई-9, डुप्लेक्स कॉलोनी
बीकानेर-334003

 माननीय मधुरेशजी ने फोन पर, मेरी आत्म कथा 'डगर डगर पर मगर' को 'बहुत अच्छी लगने वाली कृति बताया था; लेकिन जब इस पर लिखने बैठे तो 'ढीली ढाली गठरी' लगी। दूसरी तरफ  कई विद्वानों और अनेक पाठकों को अपनी ही तरह की अक्रमबद्वता में से अदभुत कलात्मक क्रमबद्वता लिए हुए ईमानदार आत्मकथा लगी।
मेरे हिसाब से समीक्षक को, पुस्तक में, यदि पाठक को देने को, (525 प्र.) में से कोई, सकारात्मक पक्ष ही न दिखाई दे, तो उस पर लिखने से परहेज़ कर देना चाहिए। पाठक भ्रमित तो न हो। वह इतनी ज़्यादा और महंगी किताबें तो खरीद नहीं सकता। अधिकतर, समीक्षक पर विश्वास कर लेेते हैं। मेरे रूझान को हिन्दुत्ववादी बताया है। लंबे अर्से से सुनता पढ़ता आ रहा हूं, कि यदि लेखक, समीक्षक की विचारधारा, गुट का न  हो। आप का हित अहित न कर सकता हो तो उसकी खबर लेने में कोई कसर न छोड़ो। ऐसी ओछी बातें तो मधुरेशजी जैसे सरल स्वभाव के धनी, के विषय में सोची भी नहीं जा सकती ; फिर क्या कारण रहा कि कम महत्वपूर्ण बिन्दुओं को अनावश्यक विस्तार दिया गया; जब कि महत्वपूर्ण अंशों को नजरअंदाज कर दिया गया।
ऐसे ही कुछ कारण हैं जिस से आलोचना (समालोचना) से लोगों का विश्वास उठ गया है। कई पत्रिकाओं ने तो समीक्षाएं छापना ही बंद कर दिया है। कुछ 'पुस्तक परिचय' तक सिमट गए हैं।