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Saturday 18 Nov 2017

वक्त से आगे कृष्णा सोबती

सर्वमित्रा सुरजन
इस बार पुन:पाठ में विभाजन की त्रासदी के अनछुए पहलू को बयां करती कहानी सिक्का बदल गया, प्रकाशित की गई है। कृष्णा सोबती की यह कहानी आज भी उतनी ही प्रासंगिक है, भले ही वक्त और हालात बदल गए हों। 18 फरवरी को कृष्णाजी अपने जीवन के 91 वर्ष पूर्ण कर रही हैं। लेकिन जो सक्रियता उनकी लेखनी और व्यक्तित्व में है, वह न उम्र की मोहताज लगती है, न परिस्थितियों की। समाज में हो रहे बदलावों, राजनीतिक परिदृश्य और परिस्थितियों पर उनकी पैनी नजर है। हाल ही में जब देश में बढ़ती असहिष्णुता के विरोध में पुरस्कार और पद वापसी का सिलसिला प्रारंभ हुआ तो उसमें एक नाम कृष्णा जी का भी था।
कृष्णा जी उन चंद लोगों में से हैं जिन्होंने भारत के आधुनिक इतिहास से लेकर वर्तमान को जिया और भोगा है। वे देश की आजादी के आंदोलन की साक्षी रहीं, विभाजन के दर्द को महसूस किया, संविधान को बनते और संवरते देखा और बाद में संवैधानिक मूल्यों का हस होते हुए भी। उनका यह विपुल अनुभव उनके उपन्यासों, कहानियों, आलेखों में बखूबी झलकता है और कहा जा सकता है कि उनका लेखन वक्त से आगे है।
भारतीय साहित्य संसार में कृष्णा सोबती एक ऐसा नाम है, जो हमेशा अपने अनूठेपन के लिए जाना जाएगा। यूं स्त्री और उसकी रचनात्मकता हमेशा अनूठी ही होती है। उसके सृजन संसार के आयाम को जितना समझा जाए, कम ही लगता है। लेखन कार्य भी इसका अपवाद नहींहै। हिन्दी साहित्य जगत में महादेवी वर्मा, सुभद्रा कुमारी चौहान, मन्नू भंडारी जैसी लेखिकाओं ने अपने साथ की और बाद की महिलाओं को निरंतर प्रेरणा दी कि विपरीत परिस्थितियों में भी लेखन कार्य किया जा सकता है। आज पाठक इनके लेखन को स्त्री विमर्श के दायरे में रखकर देख सकता है, लेकिन सच यह है कि स्त्री विमर्श जैसे शब्दों से बहुत आगे जाकर इन लेखिकाओं की कलम चली। यही वजह है कि आज भी उस लेखन में उतनी ही ताजगी और नयापन नजर आता है।
कृष्णा सोबती की रचनाएं भी इसी ताजगी और नएपन से भरपूर हैं।  जिंदगीनामा, दिलोदानिश, मित्रो मरजानी, समय सरगम, यारों के यार ऐसी अनेक कृतियां कृष्णाजी की हैं, जिसमें जिंदगी के अलग-अलग रंग, बहुआयामी तस्वीरें देखने मिलती हैं। सहज, सरल शब्दों का इस्तेमाल, बिना लाग-लपेट और लफ्फाजी के मानव हृदय के अंतस को खोलकर रख देना, कृष्णाजी के लेखन की विशेषता है। अपने लेखन की शुरुआत और रचना संसार के बारे में एक बार उन्होंने कहा था- जिस माहौल में मैंने होश सँभाला वो पाबंदियों से रचा-बसा था। आज़ादी पूरी थी लेकिन पाबंदियों के दायरे में। रात नौ बजे हम बच्चे अपने बिस्तरों पर होते थे। कमरे की बत्ती गुल और दूसरे कमरे से पिता ज़ोर-ज़ोर से कोई किताब पढ़ कर हमें सुना रहे होते थे। रात के अंधेरे में शब्दों का प्रभाव तिलिस्म की तरह होता था। फिर पता नहीं कब शब्दों की बाँह पकड़कर मैं रचना-संसार में दाखि़ल हो गई और जब मेरी पहली रचना आई तो न मुझे अचंभा हुआ और न ही घर में किसी को अचरज। सब कुछ सहज और सरल। मेरी पहली कहानी 'लामाÓ सन 1950 में छपी थी। दरअसल घर में लिखने की ट्रेनिंग मिल गई थी। हमसे कहा जाता था कि अपनी बीमारी के बारे में ठीक-ठीक लिख कर दो। यानी हम बीमारी को बढ़ा-चढ़ा कर लिखें तो दवा भी ज्यादा पीनी पड़े और बीमारी के बारे में ग़लत लिखें तो दवा भी ग़लत मिले। इस तरह लिखने के साथ व्यवहार में संतुलन रखने की भी आदत पड़ गई। लेखन में संतुलन की यह सीख रचनाकारों के लिए बड़े काम की है और व्यवहार में संतुलन की सीख समाज अपना ले तो असहिष्णुता जैसे मुद्दे ही न उठें।
आधी सदी से अधिक समय तक कृष्णाजी ने लेखन कार्य किया और अब भी एक लेखक की जिम्मेदारी को पूरी प्रतिबद्धता से निभा रही हैं। साहित्य के द्वारा समाज को आईना दिखा रही हैं। उनकी लेखकीय सक्रियता प्रणम्य है, अनुकरणीय है। अक्षरपर्व की ओर से कृष्णाजी को जन्मदिन की शुभकामनाएं।