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Friday 24 Nov 2017

सिक्का बदल गया : रब्ब तुम्हें सलामत रक्खे

पल्लव
393 डीडीए, कनिष्क अपार्टमेंट्स
ब्लाक सी एंड डी
शालीमार बाग़,
दिल्ली-110088
कहानी की विशेषताओं में एक है उसका क्षिप्र होना और एक झटके से वह कह देना जो और किसी तरह कहना संभव ही न हो। वहाँ बहुत लंबा विश्लेषण-विवेचन बहुधा अनुपयुक्त हो जाता है। कोई एक बात हो जीवन से जुड़ी, वही पर्याप्त है। कहानी पूरे जीवन का बयान नहीं बनती। अगर कहानी ही सब कह सकती होती तो भला उपन्यास क्यों लिखे जाते? कहानी को कमजोर का हथियार भी इसलिए कहा गया, अपना दु:ख-दर्द, बेचैनी-पीड़ा कह दिया और बस। उपन्यास दर्शन की गहरी तड़प और एक नए संसार की रचना की आकांक्षा लिए होते हैं। लेकिन कभी कभी कुछ कहानियाँ ऐसी भी होती हैं जो विधा का अतिक्रमण करती हैं जैसे 'राम की शक्तिपूजाÓ कविता होने पर भी बड़े महाकाव्य की उदात्तता और ऊँचाई का निर्वहन कर सकी है। कृष्णा सोबती की प्रसिद्ध कहानी 'सिक्का बदल गयाÓ इसी श्रेणी की रचना है। ऐसी कहानी जो मनुष्यता को सबसे ऊपर स्थापित करती है और इस गरिमा के साथ सारी चीजें बौनी हो जाएँ।
भारत विभाजन हमारे समय के बड़े नासूरों में रहा है। अब साठ-पैंसठ सालों बाद भी उसकी टीसें यहाँ-वहाँ मौजूद हैं। घर छोडऩा, बेघर होना एक बात है लेकिन अपनी पहचान के कारण बेवतन हो जाना दूसरी बात। कहानी बड़ी संक्षिप्त है और पाठ यही है कि शाहजी गाँव के बड़े रसूखदार थे, मुसलमानों के गाँव के अकेले गैर मुस्लिम परिवार। वे नहीं रहे, अब केवल वहाँ शाहनी (उनकी पत्नी) है। गाँव ने तय कर लिया है कि शाहनी को गाँव से बाहर निकाल दिया जाए और उसकी हवेली की दौलत बाँट ली जाए। यही होता भी है। कहानी बनती है जब यह सब हो जाता है और शाहनी इस तरह जाती है, 'जैसे हम तो यहाँ के थे ही नहींÓ कोई मलाल, रंज या विद्वेष नहीं है। मिट्टी छोडऩे का सहज दु:ख तो है लेकिन इतना बड़ा नहीं कि घृणा में तब्दील हो सके। यही कहानी की शक्ति है जैसे कोई क्राइस्ट हो जो सूली पर चढ़कर भी मुस्कुराए। बड़ी बात यह है कि शाहनी क्राइस्ट नहीं है, उतना बड़ा व्यक्तित्व-कद न होने पर भी वह सारा संकट स्वीकार कर रही है। कहते हैं कि मनुष्यता की सबसे कठिन परीक्षा भी ऐसे संकटों में ही होती है। यहाँ पूरा गाँव अनुत्तीर्ण हो गया है। जिस पर रक्षा की जिम्मेदारी है वह थानेदार दाऊद खाँ कह रहा है, कुछ साथ रखना हो तो रख लो। कुछ साथ बाँध लिया है? सोना-चाँदी.., शाहनी का उत्तर देखिए-सोना-चाँदी! बच्चा, वह सब तुम लोगों के लिए है। मेरा सोना तो एक-एक जमीन में बिछा है। फिर भी दाऊद खाँ की जिद है-शाहनी, तुम अकेली हो, अपने पास कुछ होना जरूरी है। कुछ नकदी ही रख लो। वक्त का कुछ पता नहीं...वक्त? शाहनी अपनी गीली आँखों से हँस पड़ी-दाऊद खाँ, इससे अच्छा वक्त देखने के लिए क्या मैं जिंदा रहूँगी।
साम्प्रदायिकता और असहिष्णुता में गहरा सम्बन्ध है। कोई साम्प्रदायिक रास्ते पर चल कर ही असहिष्णु हो सकता है। यहाँ धार्मिक कट्टरता से उपज रही साम्प्रदायिकता शाहनी के पाले हुए शेरा का मन किस तरह विकृत कर रही है - और शेरा सोच ही रहा है, क्या कह रही है शाहनी आज! आज शाहनी क्या, कोई भी कुछ नहीं कर सकता। यह होके रहेगा क्यों न हो? हमारे ही भाई-बन्दों से सूद ले-लेकर शाहजी सोने की बोरियां तोला करते थे। प्रतिहिंसा की आग शेरे की आंखों में उतर आयी। गंड़ासे की याद हो आयी। लेकिन कुछ है जो शेरा को रोक रहा है। यह और कुछ नहीं मानवीय सम्बन्ध है जो शेरा को गंडासा लेने से रोक रहा है - शाहनी की ओर देखा। नहीं-नहीं। शेरा इन पिछले दिनों में तीस-चालीस कत्ल कर चुका है पर वह ऐसा नीच नहीं... कृष्णा सोबती की कला देखिए। ठीक इस संकट की घड़ी में जब शेरा शाहनी को देखता है उसकी आँखों में शाहनी के ममता भरे हाथ दूध का कटोरा थामे हुए तैर जाते हैं -शाहनी के झुर्रियां पड़े मुंह की ओर देखा तो शाहनी धीरे से मुस्करा रही थी। शेरा विचलित हो गया। आखिर शाहनी ने क्या बिगाड़ा है हमारा? शाहजी की बात शाहजी के साथ गयी, वह शाहनी को जरूर बचाएगा। साम्प्रदायिकता घृणा के सहारे फैलती है शेरे को रात वाला मशवरा याद आता है - वह कैसे मान गया था फिरोज की बात! सब कुछ ठीक हो जाएगा सामान बांट लिया जाएगा! शेरे को समझाया गया है कि हमारे आर्थिक -सामाजिक हित शाहनी के साथ पूरे नहीं हो सकते। उसकी हत्या जरूरी है। यह और बात है कि शेरे मारता नहीं शाहनी को लेकिन बताता भी नहीं कि क्या होने वाला है। घृणा का असर जो है।  
यह मनुष्यता की असमाप्त विजय की महागाथा है जब आप इतनी ऊँचाई पर पहुंचें और कोई क्षोभ साथ न हो। हाँ, आप तब भी मनुष्य ही हैं, पुरुषोत्तम नहीं बन गए हैं, ईश्वर नहीं हो गए हैं। कृष्णा सोबती की कला का सार यह है कि वे जीवन में आ जाने वाले ऐसे नाजुक संकटपूर्ण स्थल की सूक्ष्म पहचान करती हैं और उसे उसकी संपूर्ण जीवंतता के साथ चित्रित कर देती हैं। अफसोसनाक है यह बात कि 1948 में लिख दिए जाने के बावजूद मनुष्यता को ऐसे संकट फिर-फिर देखने पड़े। मोहन राकेश की 'मलबे का मालिकÓ और स्वयं प्रकाश की 'क्या तुमने कभी कोई सरदार भिखारी देखा है?Ó ऐसे संकटों की फिर नयी प्रस्तुतियाँ ही तो हैं।
आखिर में इस्माइल भारी मन से कह रहा है कि शाहनी कुछ कह जाओ। तब उठती हुई हिचकी को रोककर रुँधे-रुँधे गले से शाहनी का कथन है- रब्ब तुम्हें सलामत रक्खे बच्चा, खुशियाँ बख्शे...। शाहनी जैसे चरित्र साहित्य में कभी-कभी ही आते हैं। विराट और अप्रतिम। जिन्हें बाधाएँ तोड़ नहीं सकतीं, जो दीन होना नहीं जानते, जो अपने व्यक्तित्व की समूची बुलंदी तो थामे रख सकते हैं। कहानी का सबसे मार्मिक अंश है। लोगों की भीड़ शाहनी की हवेली के बाहर खड़ी है, ट्रकें हवेली लूटने आ पहुँची हंै और उसे सुनाते हुए शेरा पुलिस वाले खां साहिब को कहता है कि देर हो रही है। यहाँ शाहनी को देखिये - शाहनी चौंक पड़ी। देर! मेरे घर में मुझे देर! आंसुओं के भँवर में न जाने कहाँ से विद्रोह उमड़ पड़ा। मैं पुरखों के इस बड़े घर की रानी और यह मेरे ही अन्न पर पले हुए...नहीं, यह सब कुछ नहीं। ठीक है देर हो रही है पर नहीं, शाहनी रो-रोकर नहीं, शान से निकलेगी इस पुरखों के घर से, मान से लाँघेगी यह देहरी, जिस पर एक दिन वह रानी बनकर आ खड़ी हुई थी। अपने लडख़ड़ाते कदमों को संभालकर शाहनी ने दुपट्टे से आंखें पोछीं और ड्योढ़ी से बाहर हो गयी। बड़ी-बूढिय़ाँ रो पड़ीं। किसकी तुलना हो सकती थी इसके साथ! खुदा ने सब कुछ दिया था, मगर दिन बदले, वक्त बदले... शाहनी ने दुपट्टे से सिर ढाँपकर अपनी धुंधली आंखों  से हवेली को अन्तिम बार देखा। शाहजी के मरने के बाद भी जिस कुल की अमानत को उसने सहेजकर रखा आज वह उसे धोखा दे गयी। शाहनी ने दोनों हाथ जोड़ लिए यही अन्तिम दर्शन था, यही अन्तिम प्रणाम था। शाहनी की आंखें फिर कभी इस ऊंची हवेली को न देखी पाएंगी। प्यार ने जोर मारा सोचा, एक बार घूम-फिर कर पूरा घर क्यों न देख आयी मैं? जी छोटा हो रहा है, पर जिनके सामने हमेशा बड़ी बनी रही है उनके सामने वह छोटी न होगी। इतना ही ठीक है। बस हो चुका। सिर झुकाया। ड्योढ़ी के आगे कुलवधू की आंखों से निकलकर कुछ बून्दें चू पड़ीं। शाहनी चल दी ऊंचा-सा भवन पीछे खड़ा रह गया। बड़ा क्या है मनुष्य या सम्पदा? जीवन का सबसे भारी संकट खड़ा है और शाहनी अविचल है। अडिग है। वह रोकर हार नहीं जाना चाहती। उसका रोना साबित करता है कि वह मनुष्य विरोधी विचार के समक्ष पराजित हो गई है। कहानी के अंत में उसकी आँखें गीली हैं लेकिन वह सिक्का बदलने की बात को उड़ा देती है। होगा तुम्हारे लिए वह महत्त्वपूर्ण, शाहनी उसे छोड़ आई है। एक छोटी सी कहानी और जाने क्या क्या कह जाने का हौसला लिए कहानी खड़ी है।
कहानी में आए छोटे-छोटे पात्र अकारण नहीं हैं, वे अपनी सिद्धि अपने स्वार्थों और संकटों से कर रहे हैं। आश्चर्य नहीं कि उन्हें भी लेखिका ने शिकारी नहीं शिकार के रूप में ही देखा है। कहानी की पंक्ति है -वह छोटा-सा जनसमूह रो दिया। जरा भी दिल में मैल नहीं शाहनी के। और हम शाहनी को नहीं रख सके। शाहनी को वे नहीं रोक सके और हम भी चिरागदीन को रक्खे पहलवान के हाथों दिए पाकिस्तान से उसे न बचा सके (मलबे का मालिक), चलिए वह तो विषादपूर्ण दौर था। दो मुल्क बन रहे थे-बँट रहे थे। 1984 में जब एक निरपराध बूढ़े सरदार को नंगा कर लहूलुहान किया जा रहा था तब भी हम चुप ही थे। सवाल यही है कि साझी संस्कृति की सदियों पुरानी रवायत को चुनौती देने वाली ताकतें आखिर कैसे ऐसे कृत्य को अंजाम दे सकती हैं जो हमारे सीने में हमेशा के लिए घाव दे जाएँ। भारत पाक विभाजन के बाद भी दोनों मुल्कों में हुए दंगे और समुदायों के बीच नफरत-विद्वेष की जड़ें कहाँ हैं? क्या उनसे लड़ा नहीं जा सकता? इसी गहरी साम्प्रदायिक घृणा के कारण गांधीजी को जान गंवानी पड़ी। अंग्रेज हम पर तंज ऐसे ही नहीं करते हुए गए थे कि अंग्रेजों के सबसे बड़े विरोधी जिस गांधी को गुलाम भारत में हमने सुरक्षित रखा उसे आजाद भारत में हिन्दुस्तानी छह महीने भी नहीं रख सके। तो हम भी गांधी को नहीं रख सके। समस्या यही है कि घृणा का कोई अंत नहीं होता। वह अंतहीन प्रक्रिया है जो सम्पूर्ण विनाश का काम करती है। धर्म की राजनीति इस प्रक्रिया को लगातार हवा देती है। उसके लक्ष्य सीमित होते हैं और इस प्रक्रिया से बहुधा पूरे भी हो सकते है लेकिन इससे सामुदायिक भावना का नाश हो जाता है और तब राष्ट्र का भारी नुकसान होता है। अकारण नहीं कि भारत विभाजन को प्रत्यक्ष देखने वाले कलाकार-साहित्यकार साम्प्रदायिकता के विरुद्ध संघर्षों में आगे रहे हैं। भीष्म साहनी, कृष्णा सोबती, यशपाल, मंटो और अनेक नाम इसमें जोड़े जा सकते हैं। ये लोग जानते थे कि घृणा को रोकने का एक ही तरीका है और वह सामुदायिकता है, सद्भावना है, पारस्परिक सौहार्द्र है और सहजीवन है। इस विचार को फैलाना ही साम्प्रदायिकता से लडऩा है कि दो पृथक आस्थाओं वाले समुदाय साथ रह सकते हैं और उनके हित विरोधी नहीं हैं।  
साहित्य इन घावों को दिखाकर चुप नहीं हो जाता बल्कि वह हमारे भीतर वह चेतना भरता है कि हम इन घावों के होने के कारणों को देख-जान सकें। हमारे भीतर वह विवेक पैदा हो सके कि हम शिकार को शिकारी न समझने लगें अपितु हम शिकारी में भी छिपी हुई ममता का संधान कर सकें, उसे मनुष्यता के मार्ग पर ला सकें। साम्प्रदायिकता के कारणों को देख-जान पाने में हम थोड़े भी सक्षम हैं तो फिर इन घटनाओं को रोकने का उपक्रम भी जरूर रचेंगे। एक कहानी इससे ज्यादा भला और कर भी क्या सकती है, शाहनी को सुनिए जो जाते हुए सबको आशीष दे रही है - रब्ब तुम्हें सलामत रखे।