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Saturday 18 Nov 2017

मेहनत और जय


- अंकुश्री
पूरे इलाके की नदियां सूख गयी थीं, तालाब सूख गये थे। कुओं में भी पानी की जगह दरारें दिख रही थीं। पानी के लिये हाहाकार मचा हुआ था। लोग जायें तो कहां, पानी लायें तो कहां से !
समस्या आने पर समाधान भी दिख जाता है। मीलों दूर के एक स्थान का नाम लेकर किसी ने बताया कि वहां जमीन के नीचे पानी है। भू-गर्भ जलाण्वेषक ने भी इस पर सहमति व्यक्त की। अब समस्या थी कि वहां से पानी निकाला और लाया कैसे जाये। गांव के सरपंच जी के पास ट्रैक्टर और खुदाई मशीन भी थी। लोगों के अनुरोध पर उन्होंने कहा, ''आप लोग जाकर काम शुरू करें, मैं आता हूं।ÓÓ
लोगों ने काम शुरू कर दिया। सूखी मिट्टी, प्यासे लोग ! मिट्टी खोदने में बहुत परेशानी हो रही थी। लेकिन लोगों का विश्वास था कि समस्या का समाधान मिल गया है। वे इसी विश्वास से लगे हुए थे। उनके हाथ में फफोले उठ गये थे, शरीर में खरोंचें आ गयीं, लोग थक कर चूर-चूर हो गये। लेकिन घुटी हुई सांस आस पर लटकी हुई थी और लोग खटे जा रहे थे। मेहनत रंग लायी। खुदाई के बाद वहां पानी निकल आया। पानी निकलने की बात सुन कर लोगों में खुशी की लहर दौड़ पड़ी। लोग दुगुने उत्साह से कुंआ की खुदाई करने लगे। सरपंच जी से लोगों ने फिर अनुरोध किया कि वे अपने संसाधनों का उपयोग कर गांव में पानी लाने की व्यवस्था में सहयोग करें। सरपंच जी ने कहा, ''आप लोग काम करें।ÓÓ
महीनों खटने के बाद जब कुंआ में पानी आ गया तो लोग घड़ा-बाल्टी लेकर टूट पड़े। तभी सरपंच जी के आदमी ट्रैक्टर पर बड़ी-बड़ी टंकिया लाद कर वहां आ गए। टंकियां देख कर लोगों का उत्साह और बढ़ गया। लोग दुगुने उत्साह से कुंए से पानी निकाल-निकाल कर टंकियों में भरने लगे। जब ट्रैक्टर की सभी टंकिया भर गयीं तो उसे सरपंच जी के आदमियों ने उनके अहाते में लगा दिया। कुंए के पास की भीड़ ट्रैक्टर के पीछे-पीछे सरपंच जी के यहां पहुंच गयी। सभी बहुत खुश थे कि पानी से भरी टंकियां बिना परिश्रम के ही गांव तक पहुंच गयीं हैं। घड़ा-बाल्टी ले-लेकर लोग ट्रैक्टर के पास पहुंचने लगे। लेकिन सरपंच जी ने गांव वालों को पानी लेने से मना कर दिया। उन्होंने कहा, ''देखो भाई ! हमारे आदमी ट्रैक्टर लेकर उतनी दूर गये और पानी लेकर यहां तक आये। पानी कुंए से यहां तक लाने में मुझे डीजल खर्च करना पड़ा है। ऐसा नहीं है कि खर्च कर लाया गया पानी गांव वालों को मुफ्त में दे दिया जाये। यह उचित भी नहीं है। ÓÓ
सरपंच जी गांव वालों पर गरज पड़े, ''जाओ, रुपये लेकर आओ और पानी ले जाओ।ÓÓ सभी गांव वाले एक-दूसरे का मुंह देखने लगे। ग्रामवासी इस स्थिति में नहीं थे कि वे रुपये देकर सरपंच जी से पानी ले सकें। हार कर गांव वाले फिर दूर के उस कुंए तक गये। लेकिन वहां सरपंच जी के आदमी लाठी लेकर खड़े थे, ''खबरदार! इतनी दूर से पानी ले जाकर कोई भी अपनी मेहनत बरबाद नहीं करेगा। जिसे भी पानी चाहिये, सरपंच जी के अहाते से ले जाये।ÓÓ सरपंच जी का यही फरमान था। सरपंच जी ने गांव वालों से कहा, ''मैं तो हर बात आप सब की भलाई के लिये ही करता हूंÓÓ। गांव वाले सरपंच जी की बातों से और तड़पने लगे।  वे कई दिनों से भूखे तो थे ही, प्यास से उनकी जान जा रही थी. सरपंच जी गांव वालों के मसीहा माने जाते थे. उन्हें फिर गांव वालों पर दया आ गयी। वे गांव वालों को पानी पिलाने के लिये राजी हो गये। लेकिन शर्त यह थी कि पानी का हर चुल्लू उनके नाम पर कर्ज के रूप में दर्ज हो जायेगा। लाचार भूखे-प्यासे ग्रामवासियों को सरपंच जी की शर्त माननी पड़ी। वे सरपंच जी की बही में अपना-अपना नाम दर्ज करा कर चुल्लू-चुल्लू गिन कर पानी पीने लगे।  जब सभी ग्रामवासियों ने अपना नाम दर्ज करा कर पानी पी लिया तो सरपंच जी के आदमियों ने जोर से चिल्लाया, ''बोलो सरपंच जी की जय !ÓÓ ग्रामवासियों ने भी उनकी बातें दुहराते हुए कही, ''सरपंच जी की जय !ÓÓ
सिदरौल, प्रेस कॉलोनी,
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