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Tuesday 21 Nov 2017

अनुभव की सच्चाई को जीवन्त करती रचनाएं

परमानंद 'अश्रुज'
जूनियर एल.आई.जी 396
मानसरोवर कालोनी माधव नगर
कटनी 483501
मो. 9303819360
'अल्लाखोह मचीÓ कवि रामकिशोर दाहिया का दूसरा नवगीत संग्रह है। एक ईमानदार कवि ने जो करीब से देखा महसूस किया है, भीतर बहुत भीतर जिन घटनाओं की संवेदना उसके भीतर उतर गई है उस सच का बयान है यह नवगीत संग्रह अल्लाखोह मची। सहज सरल लेखन पं. भवानी प्रसाद मिश्र की याद दिलाता है। रामकिशोर ने शायद उनकी इसी भावना को जीवन्त किया है-
जिस तरह तू बोलता है /उस तरह तू लिख
और उसके बाद भी  /सबसे अलग तू दिख।
अपनी आंचलिक बोली भाषा से पगी संग्रह की सभी रचनाएंँ पूर्णत: नवगीत हैं। नि:संदेह रामकिशोर दाहिया इसके लिए बधाई के पात्र हैं।
सोना खरा तपा हो निकला
चमका जितना झीले माँजे।
ग्रामीण जाति व्यवस्था, दलित, गैरदलित, अल्पसंख्यक, बहुसंख्यक, समाज के बीच जो सदियों का फासला है वह जातिगत स्तर पर कम दिखाई देता है, कवि पर बचपन का प्रभाव ज्यादा दिखाई देता है।
मल्ल महाजन द्वार अड़ा है / लिये दुहथी ल_ खड़ा हैं
मूल नहीं तो ब्याज चुका दे /चाहे खुद को बेच के ला दे।
इस व्यवस्था में आज बदलाव है पर नहीं बदली तो गरीब की बेटी पर अमीर की गंदी नजर -
बेटी हुई जवान कुवांरी
चले नींद पर जैसे आरी
ये एक आम बात तो हो सकती है पर खास नहीं। कवि ने जो देखा महसूस किया शब्द देने का प्रयास उनकी विलक्ष्णता का परिचायक है -
राजकुंवर की ओछी हरकत/ सहती जनता भोली
बेटी का सदमा ले बैठा / पागल हुआ रमोली।
देह गठीली सुन्दर आँखें / दोष यही अघनी का।
खाना खर्चा पाकर चुप है / भाई भी मँगनी का।
और भी लुभावने चित्रण संग्रह में देखने को मिलते हैं। सबको उद्धृत कर पाना मेरे लिए संभव नहीं है। लेकिन कुछ तो उदाहरण देने ही होंगे।
भाजी, महुआ, लकचा, खिचरी/खाकर टूटे दांत दूध के।
बालक पेट बड़ों का भरता/और भला बोलो क्या करता।
बसंत ऋतु पर राई के खेत को देखकर कवि उसे अपने शब्दों में कुछ इस तरह बांधता है जो लाजवाब है-
हरदी तेल का उबटन करके / पीरी पहना रही खेत में
हवा लगे उसकी भौजाई/ राई पियर पियर पियराई।
नि:संदेह मानना होगा, रामकिशोर के इस कथन को, कि उनका निजी संघर्ष रंग लाया। नवगीत संग्रह के पृष्ठ-पृष्ठ पर अनगिनत बिम्ब हैं यही रामकिशोर की साधना की सिद्धी है।
मेरी शब्द साधना/मोती
तह दर तह भीतर से लाती। विशुद्ध आंचलिक शब्दों से पगे समस्त नवगीत अत्यन्त मार्मिक एवं मनमोहक बन पड़े हैं। रामकिशोर दाहिया इसके लिये बधाई के पात्र हैं।
गर्दन से कब सिर उतार दे / पैनी खडग़ व्यवस्था इतनी।
सात परत के नीचे गाड़ा/ताकत डर में पाया जितनी
जिन शब्दों को आज के ग्रामीण बच्चे भी नहीं जानते, उन शब्दों के सहारे नवगीत लिखे गए हैं। घिनौंची बिजगाहिंद चाउर, सैला, सिकहर, चिंगुरे, कुनैता, नांधी, और जहां जरूरी है वहां अंग्रेजी शब्दों का उपयोग भी किया है-
बोकारो स्टील उड़ाता
मस्ती मौज अकेले।
यह दृश्य भी देखते चलें-
धरे ट्रकों की धूल कछारी
हुई प्रदूषित सांधी।