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Friday 24 Nov 2017

विषम के बरक्स सम की उम्मीद जगाती कविताएं

 

संदीप राशिनकर
11, बी राजेंद्र नगर
इंदौर-452012
मो.09425314422
खटरपट खटरपट/गूंज रही है पूरे गांव में
गांव सो रहा है/जुलाहा बन रहा है
जुलाहा शताब्दियों से बुन रहा है / एक दिन तैयार कर देगा
गांव भर के लिए कपड़ा...
जुलाहे के गांव, समाज व मानवता के प्रति अभिव्यक्ति इन्हीं सरोकारों को सार्थक स्वर देती कविताओं का संग्रह है प्रदीप मिश्र का 'उम्मीद!Ó बावजूद तमाम विपरीतताओं, कठिनाई और विषय में रचनाकार की उम्मीद न हताश होती है न परास्त, तभी तो सिर्फ जागृत अवस्था में ही नहीं नींद में देखे हुए उन स्वप्नों पर भी उसे विश्वास है जो नींद के टूटने के बाद भी बने रहते हैं आंखों में। प्रदीप की कविताओं में अपने समय, अपने परिवेश का निष्ठुरता से किया गया आकलन है तो तीव्र संवेदनक्षमता के चलते देखा गया वह सच भी है जिसे बाजार की चकाचौंध से ढांकने का जतन आज चहुंओर उपस्थित है। वह बहुत हौले से विषम पर न सिर्फ प्रहार करता है वरन् सम के लिए अपेक्षित उम्मीद को भी जिलाए रखता है। तभी वह कहता है-
जिस तरह से / मृत्यु के गर्भ में होता है जीवन
अच्छे दिनों की तारीखें भी होती हंै
बुरे दिनों के कैलेण्डरों में!
इसी सकारात्मकता इसी उम्मीद को अपनी ताकत बनाते हुए प्रदीप अपनी उम्मीद कविता में कहते हैं-
उम्मीद की इस परम्परा को/हमारे समय की शुभकामनाएं
उनको सबसे ज्यादा/जो उम्मीद की इस बुझती हुई लौ को
अपने हथेलियों में सहेजे हुए हैं
संग्रह की कविताओं में एक सजग संवेदनशील रचनाकार की दृष्टि अपने समाज, अपने परिवेश को खंगालती नजर आती है। इस दृष्टि के वितान में छी•ाते सामाजिक मूल्यों की आहटें हैं, तो निर्दयी राजनीति के षड्यंत्र भी है। साम्प्रदायिकता पर प्रहार है तो मध्यवर्गीय सरोकारों के परिप्रेक्ष्य में दरकते संबंधों, मूल्यों की पीड़ा भी है।
स्कूटर चलाती हुई लड़कियां में कवि जहां कहता है-
समय को लगाम की तरह पकड़ी हुई/इन लड़कियों को देखना
 हमारे समय का सबसे सुन्दर दृश्य है
वहीं रैम्प पर चलने वाली लड़कियां में आधी दुनिया की विडंबना, विवशताओं को मुखर स्वर देते वह कहता है-
जज की निगाहों से बाजार तक
रैम्प पर चलने वाली लड़कियां
चलते-चलते कहीं नहीं पहुंच पाती
हर बार ग्रीन रूम से निकलकर/ग्रीन रूम में पहुंचने वाली इन
लड़कियों को/आम की गुठली समझता है बाजार
बाजार सदियों से आम का शौकीन रहा है।
लड़कियों की मासूमियत, सपनों, क्षमताओं/संवेदनाओं तथा उन पर आरोपित बंधनों/विडंबनाओं को बरसात में भीगती हुई लड़की-एक और दो में बहुत ही सार्थक व समर्पक रूप से रूपायित किया गया है। कुछ दृश्य देखें-
वह दुपट्टे की तरह लपेट रही है/बरसात की बूंदों को अपने बदन पर
या- बरसात में भीगती हुई लड़की / जब तक अकेली भीगती रहती है
फैलकर आकाश हो जाना चाहती है
कमल की तरह खोल देना चाहती है
मन और जीवन की गांठे
या- इस भीगती हुई लड़की के हृदय से निकलता है/हरा रंग
जिसे ओढ़ लेती है धरती
बरसात में भीगती हुई लड़की को देखना
हरी-भरी धरती को देखने जैसा है।
या- बरसात में भीगती हुई लड़की/ठंड से कम
उस पर पडऩे वाली निगाहों से/ज्यादा सिकुड़ रही है
कांपती और सिकुड़ती हुई लड़की को देखना
थरथराती हुई धरती को देखने जैसा है
कवि की भेदक दृष्टि बाजार के चकाचौंध के पार फैले उस घटाटोप को न सिर्फ चिन्हित करती है वरन उसके खतरों के प्रति सौम्यता से पाठकों को सचेत भी करती है। प्रदीप की कविताएं पाठक को जगाती जरूर हंै किन्तु उसे झकझोर कर उठाने का उपक्रम नहीं करती क्योंकि ये कविताएं अपने समय के यथार्थ को पहचानने का माद्दा देती है, उसके खिलाफ नारेबाजी नहीं करती। प्रदीप अपनी कविताओं में अपने सूक्ष्म आकलन व संवेदना को बिना किसी शाब्दिक आडंबर या अलंकारिक पहनावे के सहजता के साथ पाठक से साझा करते हैं।
रंग मेरे साथ होली खेल रहे थे, कविता एक चित्रकार का मनोहारी वक्तव्य बन जहां सराबोर करती है, वहीं स$फेद कबूतर की कल्पना अभिभूत करती है और इतने वर्षों पश्चात भी आजादी की सुबह का इंतजार अंतर्मुख करता है।
कवि के सरोकारों की वृहदता संग्रह में समाहित कविताओं की विषयवस्तु से अवगत होती है। इसमें बाजार के आसन्न खतरों से आगाह करती ग्लोब... ग्लोब... ग्लोबलाइजेशन, विज्ञापन-एक, दो, तीन जैसी कविताएं हैं तो वैज्ञानिक दृष्टि से आज की विडंबना की विवेचना करती है वायरस, हमारे समय का विज्ञान एक /दो और अंतरिक्ष जैसी कविताएं भी है। राजनीतिक छद्मों/षड्यंत्रों को बेनकाब करती हस्तक्षेप, स्थगित सदन जैसी कविताएं हैं तो साम्प्रदायिकता/धर्मांधता पर प्रहार करती इस जगह का पता, आओ वक्रतुंड, ईश्वरी सत्ता पर शोध पत्र या अंगूठा भर है नन्हें मियां जैसी कविताएं कवि की सोच व उसकी सशक्त मानवीय पक्षधरता को बेबाकी से रेखांकित करती हैं।
संग्रह की कविताओं में प्रदीप की विशिष्ट दृष्टि, उसका  आकलन व प्रस्तुतिकरण पाठकों को कहीं चौंकाता है, कहीं अभिभूत करता है तो कहीं अंर्तमुख करता है। ठीक समय, नाले, इस जगह का पता, फाउण्टेन पेन से कविता जैसी कुछ कविताएं अपनी विषयवस्तु व उसके अभिव्यक्तिय निर्वाह की अभिनवता से विशिष्ट प्रभाव छोड़ती हंै। कवि की दृष्टि में कोचिंग सेंटर है, काठ की अलमारी की किताबें हैं, नींद है, नहीं बने शब्दकोष है तो डूबते हुए हरसूद की श्रृंखला में विस्थापन की त्रासदियों का साक्षात्कार है।
प्रदीप अपने समय की रचनात्मकता व वरिष्ठ रचनाकारों के अवदान के सम्मान में अपनी रचनाओं का सृजन कर उनकी रचनात्मकता को सम्मानित करते हैं। इस संग्रह में नागार्जुन, चित्रकार मकब़ूल फिदा हुसैन, वरिष्ठ हिन्दी कवि चंद्रकांत देवताले और वरिष्ठ मराठी कवि वसंत राशिनकर को समर्पित कविताएं संग्रहित है।
दीपक-एक, दो और तीन तथा दीवाली ये कविताएं अंधेरे से उजास के संघर्ष और परिश्रम की महत्ता को साथ ले विलोम के खिलाफ मुस्तैदी से खड़ी नजर आती हैं। वह लिखते हैं-
दीपकों में/तेल की जगह पसीने भरे होंगे
और बाती की जगह हौसले जल रहे होंगे
इस रोशनी में दिखाई देंगे/दिपदिपाते चेहरे
जब चेहरे दिपदिपाते हों/भले ही अमावस्या हो
दीवाली आती है / और मनती भी धूमधाम से!
धार्मिक उन्माद व राजनीतिक षडयंत्रों को अनावृत करती इस जगह का पता में मानवीय सरोकारों के समर्थन में कितनी सहजता से कविता खड़ी होती है और कहती है-
हर जगह जाती है / यहां से राहें / कोई भी राह घर नहीं जाती
यहां से / सब कुछ दिखाई देता है साफ-साफ
नहीं दिखता है तो सिर्फ अपना घर
सबको पता है इस जगह का पता
फिर भी इस पते पर कोई नहीं लिखता
एक लम्बी चिट्ठी कि
अब बस भी करो
हमें अपने घरों में चैन से रहने दो
टहलने दो चांदनी रात में बेखौफ!
भूमंडलीकरण, बाजार, मूल्यहीनता तथा आस्थाओं के विखंडन के घटाटोप तथा विषम, विलोम, विपरितताओं के इस कठिन व भयावह समय में प्रदीप की कविताएं न सिर्फ अच्छे दिनों की तारीखें चिन्हित करती है वरन् उम्मीद की लौ को हथेलियों में सहेजे चांदनी रात में बेखौफ टहलने की जिजीविषा, जज्बा व हौसला पैदा करती है। विषम के बरक्स सम की उम्मीद जगाती इन रचनाओं का स्वागत होना चाहिए। संग्रह पर ख्यात चित्रकार प्रभु जोशी की कलाकृति अर्थपूर्ण, प्रभावी व आकर्षक है।