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Monday 20 Nov 2017

नीलकांत का सफऱ : जीवन से जुड़ी कथाएं


ऊर्जा श्रीवास्तव

ए.403, ऋषभ प्लैटिनम अपार्टमेंट, अहिंसा खंड, 2  इंदिरापुरम
ग़ाजियाबाद.  201014 मो.9811201181
कहानीकार स्वयं प्रकाश का कहानी संग्रह नीलकांत का सफऱ जीवन से जुड़ी कथाओं का झुरमुट है। इनको पढऩा ऐसा सहज है जैसे ये कहानियां नहीं किस्से हों, जैसे रोज़मर्रा की जिंदगी का कोई किस्सा एक मित्र दूसरे मित्र को सुना रहा हो। कहानी पढ़ते-पढ़ते लगता है कि मन की कोई भावना अक्षरों के रूप में सामने नाचने लगी हो। संग्रह में कथाकार स्वयं प्रकाश की ग्यारह कहानियां संकलित हैं। रोज़मर्रा की जि़ंदगी में हमारे मन में आते जाते भाव जिन्हें हम याद भी नहीं रखते उनको स्वयं प्रकाश न सिर्फ  पकड़ लेते हैं बल्कि बड़ी खूबसूरती से बयां भी कर देते हैं। मन की अनकही अनसुलझी उथल-पुथल को शब्दों के धागों में सुंदरता से पिरोने में स्वयं प्रकाश सफल रहे हैं।
कहानी पार्टीशन और क्या तुमने कभी कोई सरदार भिखारी देखा इन दोनों कहानियों में कौम के नाम पर हुए बंटवारे और दिलों में आई दूरियों का ऐसा चित्रण है कि पाठक का मन करने लगता है कि कहानी में खुद प्रवेश कर किसी तरह विक्षिप्त मानसिकता वाले दंगाइयों को रोक ले। बंटवारा तो वर्षों पहले हो गया लेकिन उसकी प्रतिक्रियाएं अब भी शेष हैं। संभवत: यह बंटवारा कभी पूरा नहीं होगा, इसका समापन सदैव लंबित ही रहेगा।
स्वयं प्रकाश कहानी लिखते वक्त यह चिंता नहीं करते कि उनके शब्दों का जाल एक कड़वे यथार्थ की रचना कर रहा है। और यही उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि है। रेलगाड़ी का सफर तो हम सब करते हैं। सफऱ के दौरान तमाम भाव हमारे अंदर रेल के इंजन की गति से ही आते-जाते रहते हैं और गाड़ी से उतर कर हमें कुछ भी याद नहीं रहता कि इस बीच मस्तिष्क की सड़क पर विचारों का कितना ट्रैफिक जमा हो गया। ट्रेन से उतरते ही मानो विचारों को हरी बत्ती मिल गई और वो अनंत आकाश के रास्ते पर निकल लिए। नीलकांत का सफर कहानी में जनरल डिब्बे में किए गए सफऱ के दौरान मन-मस्तिष्क के ऐसे-ऐसे भाव पढऩे को मिलते हैं कि पाठक को लगता है कि अरे! यही तो मैं सोचा करता था।
कहानीकार स्वयं प्रकाश का कहानी कहने का अंदाज़ ऐसा है मानो कथाकार स्वयं सामने बैठकर अपने अनुभव साझा कर रहा हो। कहानी कहने का यह नितान्त देशी ढंग महान कथाकार प्रेमचंद की याद दिला देता है। चरित्रों और परिवेश का वर्णन वे उसी परिपाटी पर करते हुए दिखते हैं। संभवत: इसी वजह से चरित्र और परिवेश पाठक के मन में उतर जाता है और वह कहानी से जुड़ता चला जाता है। चरित्र ऐसे जो हमारे इर्द गिर्द या शायद हम में ही मिल जाएं और परिवेश भी ऐसा जिनसे रोज़ ही आमना-सामना होता रहता है।
कहानियां सिर्फ  यथार्थ की कटुता और सच्चाई या खूबसूरती का वर्णन नहीं करतीं, उनमें सवाल भी उठाए गए हैं। अपरोक्ष नहीं परोक्ष सवाल। परिस्थितियों का सीधा सा वर्णन जिनमें हज़ारों सवाल छिपे हुए हैं। सांप्रदायिकता, कभी न खत्म होने वाली धर्म और जाति की लड़ाई, सामाजिक आर्थिक भेदभाव और लड़कियों की स्वछंद सोच पर समाज और परिवार द्वारा लगाई गई लगाम पर कहीं कटाक्ष है तो कहीं सवाल है। इस तरह कहानियां केवल ज्वलन्त मुद्दों को उठाती हों, ऐसा नहीं है। संधान और एक खूबसूरत घर में मध्यवर्गीय परिवारों का चित्र बखूबी खींचा गया है जहां परिवार का पूरा दिन इस समीकरण को बैठाने में गुजऱ जाता है कि रोज़मर्रा की ज़रूरतों को कैसे पूरा किया जाए लेकिन रात को सोते समय प्रेम और सामंजस्य से महकता घर एक घर है, सिर्फ  मकान नहीं। एक खूबसूरत घर की ये पंक्तियां हमेशा याद रहेंगी कि हां यह घर था। हमारी दुनिया में जो कुछ सुंदर बातें रह गई हैं, उनमें से एक खूबसूरत बात यह भी है कि यह था। वहीं बड़े घरों में काम करने वाली लड़कियों की मनोदशा को जैसे करीब से देखकर कहानीकार ने बड़े जतन से अपनी कलम के हाथों में सौंप दिया हो और आदेश दिया हो कि हूबहू ऐसा ही चित्र उतरना चाहिए। बलि नामक कहानी में एक नौकरानी के मन की बातें चित्रित करते हुए लेखक ने स्त्री मन की अनकही बातें भी कह डाली हैं। क्या आम जीवन में भी ऐसा ही नहीं होता कि किसी ऐसे परिवार की लड़की जो अपने परिवार की परंपराओं से मुक्त होकर किसी प्रकार या किसी वजह से पढ़ लिख कर दुनिया को जान समझ लेती है, अपने अस्तित्व को पहचानने लगती है, लेकिन अंत में उसे अपने परिवार में ही वापस आना होता है, जहां सब उसे अजनबी से लगते हैं। और फिर उसे बिलकुल ही अजनबी परिवार में ब्याह दिया जाता है जहां अंजान चेहरे डराते हैं। लड़की की स्थिति ऐसी होती है कि मन खुले आकाश में उडऩे को जितना व्याकुल होता है उतनी ही भारी बेडिय़ां उसके पैरों में डाल दी जाती हैं, उतनी ही बेदर्दी से उसके पंख कुचल दिए जाते हैं। इससे तो अच्छा है वह सदा उसी परिवेश में रहती जिसमें पैदा हुई थी, काश उसे दुनिया को जानने समझने का मौका न मिलता।
अगले जनम को पढ़कर यह भ्रम दूर होता है कि पुरुष कथाकार स्त्री मन की गहराइयों में नहीं झांक सकता। अगले जनम किताब की आखिरी कहानी है, जो आसन्न प्रसवा स्त्री की मनोदशा का सटीक वर्णन करती है। यूं तो किताब की हर कहानी किसी न किसी मनोदशा को खूबसूरती से चित्रित करती है लेकिन अगले जनम में मनोभावों को रंगों की तरह उभारा गया है। ये प्रशंसायोग्य है कि जिस पीड़ा को लेखक अनुभव ही नहीं कर सकता उसे इतनी बारीकी से उकेरने में वो सफल हो जाए। विज्ञापनों में दिखाए जाने वाले तथाकथित फस्र्ट टच और मदर्स लव की भावनाएं तो स्त्री मन में बहुत बाद में पनपती हैं, जब यथार्थ का दर्द और कष्ट कम होने लगता है और नवजीवन की कोमलता की अनुभूति होने लगती है। प्रसव के समय तो अधिकतम मांओं की भावनाएं सुमि जैसी होती हैं -जानलेवा तकलीफ का कारण है। यह बाहर निकले किसी तरह, बस! बस्स! यह अलग बात है कि भारतीय सभ्यता में लाज और सहनशीलता का तमगा पहने महिलाएं आसानी से इस बात को सबके सामने स्वीकार नहीं करेंगी। एक मनुष्य का जन्म होना और उसके लिए स्त्री का घनघोर कष्ट सहना इस कहानी में जिस तरह आया है वह सचमुच दुर्लभ है।
समाज के प्रति एक लेखक के दायित्व को अपनी कहानियों से कथाकार स्वयं प्रकाश पूरा करते हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि कहानी संग्रह नीलकांत का सफर विविधताओं से परिपूर्ण है। हंसी-ठिठोली, व्यंग्य के भाव से भरी कहानियां भी हैं और अपनी कमियों को अपनी विशिष्टता बना लेने की ताकत देने वाले किस्से भी। कड़वा यथार्थ है, खूबसूरत सच है और अगल-बगल के घरों में बैठे चरित्रों का मनोविश्लेषण है। हां कहीं-कहीं भाषा में एक मोनोटोनस टच आ जाता है। लेकिन शायद यही कथाकार की ताकत भी है। बतकही की सरल भाषा में रोज़-रोज़ नए शब्द नहीं आते। वो तो बस कभी-कभी किसी झरोखे से घुस जाते हैं, हम भी तो दोस्तों-यारों से एक ही अंदाज़ में बतियाते हैं। कथाकार स्वयं प्रकाश ने भी कहानी लिखी कहां हैं वो तो मानो सामने बैठकर अपने अनुभव बांट रहे हैं। और किस्सागोई के बहाने जि़ंदगी की हक़ीकत से रूबरू कराते जा रहे हैं।  ठ्ठ