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Friday 17 Nov 2017

जनशक्ति सम्बलित नैतिकता का प्रतिरोध

अमीर चन्द वैश्य
चूनामण्डी बदायूं
पिन- 243601,
मो. 9897482597
जनपथ के पथिक अनन्त कुमार सिंह मूलत: कहानीकार हैं। अब तक उनके छह-सात कहानी संकलन प्रकाश में आ चुके हैं। उनकी कहानियाँ इस बात की साक्षी हैं कि वह जनोन्मुखी लेखक हैं। अपने गांंव की जमीन से जुड़े हुए। आज के गांव की समस्याओं से सुपरिचित भी हैं और उनके समाधानों से भी। उन्हें इस बात की चिन्ता है खेती पर निर्भर ग्रामीण समाज आज तक सम्पन्न क्यों नहीं हुआ है।
अनन्त कुमार का सम्बन्ध बिहार से है। बिहार में आज भी बहुत से किसान ऐसे हैं जिनके पास बहुत कम जमीन है। खेती करने के लिए। इसके विपरीत ऐसे किसान अधिक हैं जो बड़े-बड़े जमींदार हैं। आजादी के बाद आज तक बिहार में कृषि सम्बन्धी भूमि सुधार नहीं हुए हैं। यही कारण है कि वहाँ घनघोर विषमता है। अन्याय और शोषण है। अपहरण और लूटमार है। ऐसे परिदृश्य वाले बिहार के ग्राम समाज की खेती सम्बन्धी समस्याओं का निरूपण करने के लिए अनन्त कुमार सिंह ने ताकि बची रहे हरियाली शीर्षक उपन्यास की रचना करके यह संदेश दिया है कि बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के चक्रव्यूह से किसानों को कैसे बाहर निकाला जाए। शीन हयात ने उनके बारे में ठीक लिखा है-'वरिष्ठ कथाकार अनन्त कुमार का प्रस्तुत उपन्यास ताकि बची रहे हरियाली भारतीय कृषि संस्कृति पर मंडराते संकट और उसकी जद्दोजहद में छटपटाते संघर्षरत पात्रों की जीवन-गाथा है।Ó
अतएव लेखक ने यह उपन्यास उन लोगों का समर्पित किया है जो जन मन और जमीन की हरियाली के लिए संघर्ष कर रहे हैं। हम सभी जानते हैं कि खेती-बाड़ी में रासायनिक खादों और हानिकारक कीटनाशकों के अधिक प्रयोग से धरती की उर्वराशक्ति धीरे-धीरे कम हो रही है। रासायनिक खादों से उत्पन्न अनाज के प्रयोग से लोग नाना प्रकार के रोगों से ग्रस्त हो रहे हैं। अपने प्रयोजन की कलात्मक अभिव्यक्ति के लिए लेखक ने विश्वसनीय ढंग से कथा का वर्णन किया है। उपन्यास के केन्द्र में प्रमुख पात्र नवीन कुमार है। वह कृषि वैज्ञानिक है। वह अपने उत्साही साथियों के साथ किसानों को यह समझाने का प्रयास करता है कि उन्हें अपनी उपज बढ़ाने के लिए वर्मी कम्पोस्ट खाद का प्रयोग करना चाहिए और कीटनाशक भी स्वंय तैयार करना चाहिए।
नवीन और उसके साथियों के सतत प्रयत्नों से आस-पास के ग्रामों में खेती देशी ढंग से होने लगती है। उसका एक सहयोगी रवि वर्मा अपने प्रयासों की उपलब्धियों के बारे में बताते हुए कहता है कि जिले में हमें अभूतपूर्व सफलता मिली है। रासायनिक खाद की बिक्री अब आधी है। कीटनाशक दवाओं का भी यही हाल है। (पृष्ठ 13) रवि वर्मा यह भी बताता है कि वीरमपुर गांव के किसान स्वयं वर्मी कम्पोस्ट खाद के ढांचे तैयार करने लगे हैं। अन्य लोग भी उत्साहित दीख रहे हैं।
उपन्यास के नायक नवीन कुमार का कार्य क्षेत्र जिला भोजपुर है। संयोग से उसे अपने आई ए एस मित्र अभिषेक के पिता जगतपति तिवारी का वह तीन एकड़ वाला भवन प्राप्त हो जाता है जिसके चारों ओर बाग है। यह आवास आरा में अवस्थित है। नवीन अपने परिवार के साथ इसी भवन में रहता है। वर्मी कमोस्ट खाद तैयार करता है और कीटनाशक भी। उसके ऐसे प्रयासों से सरकारी तंत्र और उसके समर्थक उसके विरूद्ध हो जाते हैं। उसके खिलाफ  यह प्रचार किया जाता है कि आज के औद्योगिक युग में वह किसानों को अवैज्ञानिक सलाह देता है। उसके खिलाफ  मुकदमे भी दायर किए जाते हैं। इन सब बातों से नवीन परेशान हो जाता है। लेकिन हिम्मत नहीं हारता है। उसकी पत्नी तो इतनी क्षुब्ध हो जाती है कि वह पति के स्वभाव की आलोचना करने लगती है। उसका मन आशंका ग्रस्त हो जाता है। नवीन की प्रतिकूलताएँ इतनी अधिक बढ़ती हैं कि स्थानीय विधायक संकटा प्रसाद उसके लिए संकट उपस्थित कर देते हैं। वह चाहते हैं कि सरकारी कृषि फार्म का अस्तित्व समाप्त कर दिया जाए। उसके स्थान पर कन्या स्कूल की स्थापना की जाए। अत: इसके लिए फर्जी कागज तैयार किए जाते हैं। इस काम में उनका सहयोग करते हैं जगधर राय और गणेश यादव। वह जगधर राय के पार्टनर हैं। तीसरे हैं शिवमंगल प्रसाद, जो संकटा प्रसाद के रिश्तेदार हैं। इस प्रकरण में जगधर राय के विधायक भाई शिवजगराय भी संलिप्त हैं। साथ ही साथ गणेश यादव के सम्बन्धी निदेशक महोदय ने भी विरोध के लिए कमर कस ली है।
लेकिन धैर्यवान नवीन इस संगठित विरोध से हतोत्साहित नहीं होता है। उसके पास नैतिक बल है। उसे जनशक्ति पर भरोसा है। अतएव वह विनम्र भाव से संकटा प्रसाद जी को समझाता है-'जमीन सरकारी है। फार्म के आस-पास की जमीन पर शिवमंगल बाबू का हक नहीं बनता। किसी भी हालत में मामला शिवमंगल जी के पक्ष में नहीं जा सकता। मैं ही क्या, कोई नहीं कर सकता ऐसा। सर, बताइए आप ही, फार्म पूरे जिले का है, उसे व्यक्तिगत सम्पत्ति कैसे बनाया जा सकता है।' (पृष्ठ 21)
नवीन की बात सुनकर संकटाप्रसाद आगबबूला हो जाते हैं। लेकिन नवीन अपने निर्णय पर अडिग रहता है। उसे बर्खास्त करवाने की कोशिश की जाती है। लेकिन चार हजार किसानों के हस्ताक्षरों से युक्त प्रेषित ज्ञापन इस प्रकरण को दबा देता है।
इस प्रकार लेखक ने अपने नायक के चरित्र का विकास करके यह संदेश देने का प्रयास किया है कि जनसहयोग और नैतिक बल से बेईमान प्रतिपक्ष का सामना डट के किया जा सकता है। लेखक ने उपन्यास की अन्तर्वस्तु में प्रासंगिक कथाओं का समावेश कलात्मक ढंग से किया है। उपन्यास पढ़ते हुए पाठक को महसूस होता है कि बिहार में एक ओर जमींदारों की सेना है, जो भूमिहीन खेत मजदूरों पर अत्याचार करती है। दूसरी ओर वामपन्थी राजनैतिक दल हैं जो भूमिहीन किसानों के पक्षधर हैं। बिहार का इतिहास इस बात का साक्षी है कि जमींदारों ने अनेक बार नरसंहार किए हैं। नागार्जुन की लम्बी कविता हरिजनगाथा ऐसे नरसंहारों का दस्तावेज है। उपन्यासकार ने उज्ज्वलपुर हत्याकांड का विस्तार से वर्णन किया है और उसे कथा नायक के प्रसंगों से जोड़ा है। इसके अलावा एक और प्रसंग भी नायक से जोड़ा गया है। वह है ग्राम बसंतपुर निवासी राम की कथा, जो शिक्षित होने के बाद महानगर में बस जाता है। संयोग ऐसा होता है कि वह अपने स्वर्गवासी ससुर के उद्योग का मालिक भी बन जाता है। वर्षों बाद वह अपने गांव लौटता है। अपने मित्र शेखर से मिलता है। जब वह यह देखता है कि हानिकारक कीटनाशकों के दुष्प्रभाव के कारण गांव के बहुत से लोग और उसके परिजन भी रोगग्रस्त हो गए हैं, तब वह चुपचाप गांव से चला जाता है और नोएडा स्थित अपना वह कारखाना बन्द करवा देता है, जहां कीटनाशकों का उत्पादन होता था। इस प्रसंग के वर्णन में उपन्यासकार का लोकरंग रूप कलात्मक ढंग से व्यक्त हुआ है। उपन्यास के नायक नवीन के प्रयासों का प्रयोजन यह भी है कि भारत का आर्थिक विकास ग्रामोन्मुखी हो। समतामूलक समाज की रचना हो। वर्तमान काल में जो अंधविकास हो रहा है उससे निर्धन किसानों का शोषण होता है। लेखक ने शोषण के विरूद्ध जनाक्रोश को भी अभिव्यक्त किया है। शोषित जन अपने अधिकारों की रक्षा के लिए अब हथियार उठाने लगे हैं। मुसहरटोला को अब आजादनगर कहा जाता है। ऐसे ही हथियारबंद लोगों से नवीन और उसके साथियों की मुठभेड़ अचानक हो जाती है। लेकिन संवाद के माध्यम से नवीन उन्हें आश्वस्त करता है कि वह भी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मायाजाल से किसानों को मुक्त कराना चाहता है।
इस उपन्यास के नायक के चरित्र का महत्व यह है कि वह कृषि वैज्ञानिक के रूप में ही बिहार के ग्रामीण क्षेत्र की कायापलट करना चाहता है। उसके विपरीत वास्तविकता यह है कि बिहार की शिक्षित प्रतिभाएँ गांव से न जुड़कर महानगरों की ओर पलायन करती रहती हैं। उपन्यास की कथावस्तु में संघर्ष तीव्र होता है। उससे सरकारी तंत्र बौखला जाता है। नकली किसानों का आन्दोलन नवीन के विरूद्ध किया जाता है। और इस विरोध का परिणाम यह होता है कि नवीन और उनके साथियों के विरूद्ध कृषि अधिकारी और मंत्री संगठित हो जाते हैं। वे सभा करते हैं। उसमें मंत्री महोदय घोषणा करते हैं कि किसानों को बहकानेवाले कृषि वैज्ञानिक नवीन कुमार को बर्खास्त किया जाता है। और उसके सहयोगियों- शौकत हयात, ए.के. श्रीवास्तव, कृष्णानन्द गर्ग, आदित्य सिंह, अखिलेश को निलंबित किया जाता है। यदि यह अपने को निर्दोष साबित नहीं करते हैं तो इनके विरूद्ध कार्रवाई की जाएगी। (पृष्ठ 198)
लेकिन परिदृश्य अचानक बदल जाता है। उपस्थित जनशक्ति की बुलन्द आवाज लोगों को भयभीत कर देती है। जोरदार नारे लगाए जाते हैं। मनगढ़ंत आदेश का प्रबल विरोध किया जाता है। इसका परिणाम यह होता है कि हिंसा शुरू हो जाती है। मंत्री जी की नाक चुटीली हो जाती है और किसान घायल होकर अस्पताल चले जाते हैं। उपन्यास के अन्त में लेखक ने सतत संघर्ष की ओर संकेत करते हुए लिखा है कि पत्थरों से जख्मी लोगों की जानकारी अभी नहीं मिल सकी है। (पृष्ठ 200)
उपन्यासकार का संदेश है कि कृषि संस्कृति की रक्षा करके ग्राम विकास किया जा सकता है। खेती करने के परम्परागत उपायों से धरती की उर्वरा शक्ति नष्ट होने से बचाई जा सकती है। जनशक्ति के बल से बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के विदोहन का विरोध किया जा सकता है। लेखक ने इस उपन्यास में ग्रामीण जीवन की समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करके आशा का संदेश दिया है। वर्णनात्मक एवं संवादात्मक शैली में रचित यह उपन्यास आदि से अंत तक पठनीय है। लोक रंग से रंजित है। स्थानीय बोली-बानी के वाक्यों का प्रयोग करके लेखक ने अपनी लोक-सम्बद्धता का परिचय दिया है। आजकल खेती की समस्याओं से सम्बन्धित उपन्यास बहुत कम लिखे जा रहे हैं। जबकि वास्तविकता यह है कि आजकल भारजीय किसान का जीवन संकटग्रस्त हो गया है। इस दृष्टि से अनन्त कुमार सिंह का यह उपन्यास स्वागत योग्य है। आशा है अन्य उपन्यासकार भी कृषि संस्कृति की रक्षा के लिए रचनात्मक प्रयास करेंगे।