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Wednesday 22 Nov 2017

लोक बाबू के छत्तीसगढ़ी उपन्यास \'डिंगई\' का विमोचन


संस्कृति समाचार

भिलाईनगर। छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध कथाकार लोकबाबू के उपन्यास 'डिंगईÓ का विमोचन समारोह भिलाई में सम्पन्न हुआ। वैभव प्रकाशन द्वारा आयोजित समारोह में छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के पूर्व अध्यक्ष दानेश्वर शर्मा ने इस अवसर पर कहा कि छत्तीसगढ़ में कथा की वाचिक परम्परा बहुत पुरानी है किन्तु उसका लेखन लगभग नहीं हुआ है। लोकबाबू ने उसी परम्परा को अपने लेखन में जीवंत कर दिया। डॉ. गोरेलाल चंदेल ने कहा- 'डिंगईÓ उपान्यस डींग मारने वालों की शानदार व्यंग्य प्रस्तुति है। डींग मारने वाले अतीतजीवी होते हैं। मरना तो सबको एक बार है मगर ये बार-बार मरते हैं।  डॉ. जीवन यदु ने कहा लोकबाबू ने बड़ी जिम्मेदारी से लोककथात्मक उपन्यास में निर्वाह किया है। जो प्रयोग विजयदान देथा ने राजस्थान में किया है वही छत्तीसगढ़ी में लोकबाबू ने कर दिखाया। मुकुंद कौशल ने कहा- लोकबाबू ने छत्तीसगढ़ी साहित्य को अपनी सार्थक और रोचक रचना से समृद्ध किया है हिन्दी शब्दों का यथोचित प्रयोग कर उपन्यास को अधिक पठनीय व सम्प्रेषणीय बनाया गया है। रवि श्रीवास्तव ने कहा उपन्यास शुरू से अंत तक बांधे रखने की जबरदस्त क्षमता रखता है बाबू प्यारेलाल के रूप में लेखक ने एक ऐसे पात्र को उकेरा है जो पाठकों की स्मृतियों से हमेशा जीवित रहेगा। बतरस की सहज सरल शैली में भय 'डींगÓ और स्थिति के घालमेल के साथ पत्र सहित उपन्यास को ऐसा रोचक बनाया है कि ये छोटों से बड़ों तक को आकर्षित करता है। वैभव प्रकाशन की ओर से डॉ. सुधीर शर्मा ने कहा- वैभव प्रकाशन लोकबाबू की डिंगई प्रकाशित कर स्वयं ही सम्मानित हुआ है। हमारा प्रयास मुख्यत: छत्तीसगढ़ के लेखकों के रचना प्रकाशन पर है और छत्तीसगढ़ी भाषा की सर्वाधिक रचना भी हमने प्रकाशित की है। यह प्रयास आगे भी जारी रहेगा। समारोह का संचालन करते हुए छत्तीसगढ़ी एवं हिन्दी के कवि परमेश्वर वैष्णव ने कहा- 'डिंगईÓ उपन्यास सर्जनात्मक संवाद है आज बाजारवाद में पढऩे-लिखने की खत्म हो रही रुचि को जगाने, हंसी ठिठौली और आत्म विस्तार की प्रेरणा देती यह रचना अभिनव आकर्षक व्यंग्यात्मक लोक गाथा है। समारोह के अंत में धन्यवाद ज्ञापित करते हुए उपन्यासकार लोकबाबू ने कहा- 'मेरा यह प्रयास साहित्य के बिदकते पाठकों को वापस साहित्य की ओर ओर मोडऩे का एक लघु प्रयास है।
विमल शंकर झा, सचिव प्रगतिशील लेखक संघ, भिलाई-दुर्ग (छ.ग.)