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Friday 24 Nov 2017

हिंदी उपन्यास और आदिवासियों का जीवन


नौरत सिंह मीना

जनजातियाँ विश्व के लगभग सभी भागों में पायी जाती हैं। भारत अफ्रीका के बाद सर्वाधिक जनजातियों वाला देश है। भारत में भील, भारव, कोल, किरात, गरासिया, सहरिया, डामोर, गोंड़, संथाल, मीणा, मुंडा, आदि जनजातियाँ विभिन्न राज्यों के जंगली एवं पहाड़ी क्षेत्रों में अपना जीवन यापन करती हैं। आजादी के बाद देश के राजनेताओं एवं उच्चवर्ग के लोगों ने पश्चिमीकरण एवं आधुनिकता का चोला पहनकर राष्ट्र में विभिन्न विकास योजनाओं का निर्माण करके उन्हें आदिवासियों के मूलनिवास स्थान पहाड़ी एवं जंगली क्षेत्रों में क्रियान्वित किया गया। आदिवासियों की विस्थापन की कहानी प्राकृतिक विस्थापन से भी अधिक खतरनाक साबित हुई, क्योंकि प्राकृतिक आपदा के बाद उस स्थान पर वापस विकास किया जा सकता है। लेकिन विकास के नाम पर आदिवासियों को उनकी परंपरा, संस्कृति, मूलनिवास स्थान से खदेड़़कर उनको समाज के हाशिए पर डाल दिया जाता है। विस्थापन की समस्या के साथ-साथ आदिवासियों की परम्परा, संस्कृति, भाषा, वेशभूषा, राष्ट्रीय आन्दोलन में उनका योगदान आदि विशेषताओं को समकालीन हिंदी के गैरआदिवासी एवं आदिवासी रचनाकारों ने अपने कथासाहित्य के लिए प्रमुख विषयवस्तु के रूप में चित्रित करके समाज की मुख्यधारा में आदिवासियों की अस्मिता को स्थापित करने का प्रयास किया जा रहा है।
सबसे पहले हिन्दी साहित्य में आदिवासियों की समस्याओं को देवेंद्रसत्यार्थी ने 'रथ के पहिएÓ उपन्यास में चित्रित किया है। यह उपन्यास आदिवासी समाज एवं उनकी विस्थापन की समस्या को समाज के सामने रखता है। इसके बाद 1954 में आंचलिक उपन्यास के रूप में प्रकाशित हुए फणीश्वरनाथ रेणु के 'मैला आँचलÓ से हिंदी में एक नई उपन्यास पम्परा की शरुआत होती है। 'मैला आँचलÓ वैसे तो आंचलिक उपन्यास के रूप में प्रसिद्ध है, लेकिन इसमें संथाल आदिवासी समाज की समस्याओं को चित्रित किया गया है। संथालों को अपने जमीनी हक से बेदखल कर दिया जाता है, संथाल अपने सत्व के लिए लड़ते-भिड़ते हैं, तो जुल्म के शिकार होते हंै। रेणु पीडि़तों के साथ हैं, आजादी के बाद हमारा कथा-साहित्य तब अधिकतर शहरी मध्यवर्ग पर केन्द्रित था, वह व्यक्ति के अकेलेपन, सम्बन्धों में टूटन और महानगरीय संत्रास आदि में उलझा था। लेकिन इसी समय हिंदी के कई कथाकारों ने समाज के हाशिए पर जीवन यापन करने वाले आदिवासियों की सामाजिक संरचना को अपने लेखन के लिए प्रमुख विषयवस्तु के रूप में लेकर आदिवासियों की समस्याओं की तरफ  समाज का ध्यान खींचा। रांगेय राघव का 'कब तक पुकारूँÓ (9158)उपन्यास में राजस्थान के ब्रज प्रदेश की सीमा पर स्थित बैर क्षेत्र के नट आदिवासियों के सामजिक-सांस्कृतिक परिवेश को यथार्थ के साथ चित्रित किया है। रांगेय राघव के धरती मेरा घर ,उपन्यास में गाडिय़ा लुहारों के खानाबदोश जीवन को चित्रित किया गया है।
बीसवीं सदी के नवम दशक में आदिवासी जीवन पर लिखे गए उपन्यासों का एक नया दौर शुरू होता है। यहाँ आकर कथाकार नई संवेदना, विचार-विमर्श के साथ आदिवासी समाज के जीवन को गहराई से छानबीन करता हुआ दिखाई देता है। इसकी शुरुआत मणि मधुकर के उपन्यास पिंजरे में पन्ना, से होती है। इसमें राजस्थान के रेगिस्तान क्षेत्र में जीवन जीनेवाले गाडिय़ा लुहारों के सामाजिक, सांस्कृतिक परिवेश का गहराई से जीवंत चित्रण किया है। हिमांशु जोशी के अँधेरा और उपन्यास में थारू आदिवासियों के जीवन संघर्ष का नग्न यथार्थ देखने को मिलता है। इसमें आदिवासियों का पुलिस-जमींदारों द्वारा किया जाने वाला शोषण चित्रित हुआ है। शोषण के केंद्र में नारी है। पुलिस, जमींदारों के खिलाफ संघर्ष करने वाला परसिया सशक्त, प्रतिरोधी, विद्रोही एवं जीवंत पात्र बनकर समाज के सामने आता है जो शोषित समाज के लिए एक प्रेरणा बन जाता है ।
आदिवासियों के साहित्य में किसी ग्रामीण, अंचल विशेष के आदिवासियों के सामाजिक, सांस्कृतिक एवं उनके जीवन संघर्ष को उनकी ही ग्रामीण, देशज भाषा में चित्रित किया है। जो पाठकों को झकजोर देती है। संजीव के उपन्यास पांव तले दूब, के केंद्र में झारखंड केपंचपहाड़अंचल के आदिवासियों के अस्तित्व, अस्मिता के इर्द-गिर्द विकसित और गुंफित हुई एक बेबाक कथा है। इस उपन्यास में औद्योगिकीकरण के कारण विस्थापन की समस्या है। उपन्यास का शीर्षक ही आदिवासियों की स्थिति को स्पष्ट कर देता है। शीर्षक यह संकेत करता है कि पांव तले की दूब जिसे हम बिल्कुल सहजता और बिना किसी संकोच से कुचलते हुए चले जाते है। और इस कुचलने का कोई अपराध भी नहीं होता है। संकट तब खड़ा होता है,जब कभी यह दूब हमारे पांवों को चुभ जाती है और हमारे मुलायम चेहरे पर उभरे विचलन के साथ ही उसके होने का भी हमें अहसास हो जाता है। इसका प्रतीकार्थ यह संकेत करता है कि देश में विभिन्न प्रकार की विकास योजनाओं के द्वारा आदिवासियों को उनकी जन्मभूमि,कर्मभूमि से दरकिनार किया जाता है। तथाकथित समाज के लोगों को जरा भी अपराधबोध या अहसास नहीं होता है। लेकिन जब आदिवासी समाज के लोगों के धैर्य का सब्र टूट जाता है, तब वह अपनी अस्मिता को बचाने के लिए उग्र रूप धारण करके सरकारी योजनाओं एवं सभ्य कहे जाने वाले समाज के प्रति विद्रोह करते हैं, सभ्य समाज के लोगों के मुलायम चेहरे पर दूब की नुकीली नोक की तरह चुभते हुए अहसास कराते हैं। लेखक ने आदिवासी समाज के अन्तर्विरोध, जीवनसंघर्ष और विस्थापन की गहरी समस्या को उठाया है। संघर्ष ही इनका प्राणतत्व बन गया है।
हरिराम मीणा ने राजस्थान के बांसवाड़ा अंचल में निवास करनेवाली भील एवं मीणा जनजाति को केंद्र में रखकर धूणी तपे तीर, उपन्यास की रचना की है। यह उपन्यास राष्ट्रीय आन्दोलन में आदिवासियों के योगदान को हमारे सामने रखता है। जिसको इससे पहले हम इतिहास की किताबों में मात्र दो पंक्तियों में पढ़ते आ रहे हैं। भारतीय समाज की यह कितनी बड़ी विडम्बना है कि जो लोग समाज के हाशिए पर अपना जीवन यापन करते हंै, उनके बहुत बड़े योगदान को समाज की नजरों से छुपाया जाता है। यह कार्य हमारे समाज के मात्र मुट्ठी भर लोग अपने स्वार्थ के लिए करते है। अभी तक बांसवाडा अंचल में स्थित मानगढ़ पहाड़ी इस आदिवासी शहादत के कारण एक स्वतंत्रता-तीर्थ में बदल जानी चाहिए। भील-मीणों ने गोविन्द गुरु के नेतृत्व में पहले एक लम्बा शांतिपूर्ण अभियान चलाया था, लेकिन उनके इस अभियान को ठिकानेदारों ने बगावत के रूप में लिया और उसे कुचलने के लिए अंग्रेजो से मदद की गुहार की।
गोविन्द गुरु ने भीलों-मीणों के बीच कैसे जागृति फैलाई, कैसे उन्हें संगठित किया और कैसे उन बे-आवाजों को अपने हकों के लिए बोलना सिखाया व बलिदान के लिए तैयार किया, यही इस उपन्यास की अन्तर्वस्तु है। गोविन्द गुरु आर्य समाज में दीक्षित धार्मिक व्यक्ति थे। उनकी धर्म-चेतना आत्म-लाभ वाली धर्म-चेतना नहीं थी। वह आर्य-समाज की आरम्भिक लोकवादी और सुधारवादी न्याय-चेतना से अनुप्राणित थी। यह चेतना ही उन्हें समाज-चिन्ता की ओर ले गई, ठीक मध्यकालीन भक्तों-संतों की परम्परा में। समय की माँग थी कि वे केवल साधक और गुरु बनकर ही रहें, अपने अनुयायियों में अन्याय के प्रतिरोध की भावना भी जगाएँ तथा उसके लिए संघर्ष में उनका नेतृत्व करें। लेखक का लक्ष्य निकट अतीत की इस अविस्मरणीय घटना को आख्यान के जरिये इस तरह प्रस्तुत करना है कि उसकी सच्चाई असंदिग्ध बनी रहे। लेखक की इस बलिदान-कथा में दिलचस्पी स्वाभाविक है, वह स्वयं उस समाज का अंग है। लेकिन केवल जातिगत दिलचस्पी से ऐसी कथा नहीं लिखी जा सकती जो मानवीय मुक्ति-संग्राम की अटूट श्रंृखला की कड़ी बन सके। उसके लिए जिस व्यापक स्वातंत्र्र्य-दृष्टि की अपेक्षा है, वह लेखक के पास है और उसके साथ है एक कवि की संवेदना। लेखक ने अपनी नायक के संन्यासी-व्यक्तित्व के अनुरूप साधु-गिरी वाली जबान का कुशल विनियोग किया है। जिस सामाजिक परिवेश में गोविन्द गुरु जीये, वह धर्म-शासित था, ऐसे समाज में कोई धार्मिक व्यक्ति ही सामाजिक नेतृत्व दे सकता था, मध्यकाल के इतिहास से इस बात को हम समझ ही सकते हंै। लेखक ने धर्म गुरु गोविन्द जी की इस मानवीय भूमिका को स्पष्ट रूप से रेखांकित किया है। गोविन्द गुरु स्वयं भील-मीणा समुदाय के नहीं थे, उस समुदाय से कुछ बेहतर स्थिति के घुमन्तू व्यापारी बंजारा वर्ग से आए थे। पहले उन्होंने अपने को जाति-मुक्त (डी-क्लास) किया और भील-मीणों से स्वयं को एक कर लिया। तदनन्तर उन्हें अंधविश्वासों, कुप्रथाओं और नशाखोरी से छुटकारा दिलाने का प्रयास किया। तभी वह उन्हें एक प्रतिरोधी समाज में संगठित कर सके। उनका यह कार्य प्रकटत: अराजनैतिक था, लेकिन परिणाम में राजनैतिक दिशा की ओर ले जाता था। अंग्रेज ठिकानेदारों की मदद से वनभूमि-वनोपज आदि पर उनके प्राकृतिक और परम्परागत अधिकारों से उन्हें वंचित करने लगे थे। एक तरफ  उनका सामंती शोषण चल रहा था, ठिकानेदार उन्हें सताते थे, जबरन वसूली करते थे और उनसे गुलामों जैसा सलूक किया जाता था। दूसरी तरफ  वे उपनिवेशवादी शोषण से और त्रस्त किए गए। इन अत्याचारों के विरोध में हकों की माँग को राज-विरोध माना गया और उसे कुचलने के लिए विदेशी शासन ने देशी शासकों को पूरी फौजी मदद दी । लेखक ने यह ध्यान रखा है कि आंदोलन की पराजय संघर्ष के अंत का संकेत न बने, वह संघर्ष के अंतिम विजय तक जारी रहने का संदेश भी दे। यह संदेश लेखक भावुक आशावाद के साथ नहीं, एक हल्की-सी उम्मीद जगा कर देता है। कथा का समापन जो इतिहास-रस देता है । वह द्वन्द्व-रहित रसानन्द के रूप में नहीं मिलता। एक गहरे विषाद का अनुभव भी साथ ही जुड़ा होता है ।
इस आदिवासी संघर्ष के आख्यान द्वारा लेखक इस समाज को उसका खोया मानवीय गौरव लौटाता है। जिस समाज को लगभग असभ्य समझा जाता रहा है, वह एक जीता-जागता समाज है और बहुत-सी बातों में तथाकथित समाज से ज्यादा मानवीय है। स्वतंत्रता की मूलभूत मानवीय आकांक्षा से उन्हें भी उसी प्रकार विद्रोह के लिए प्रेरित किया था। इस औपन्यासिक आख्यान की विशेषता यह है कि इसमें आदिवासी-अस्मिता को वृहत्तर समाज से काटकर नहीं देखा गया है, संघर्ष के केन्द्र में वर्ग-चरित्र है, लेखक उसे उत्पीडि़त और उत्पीड़क वर्ग के बीच सदा से चलते आ रहे संघर्ष के रूप में ही देखता है।
संदर्भ ग्रंथ सूची:-
1.    आदिवासी विमर्श    -    डॉ. रमेश चंद मीणा, राजस्थान हिंदी ग्रंथ अकादमी,
2.    आदिवासी दुनिया    -    हरिराम मीणा, नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया, नई दिल्ली
3.    धूणी तपे तीर     -    हरिराम मीणा, साहित्य उपक्रम
4.    आदिवासी और उनका इतिहास-    हरिशचन्द्र शाक्य,अनुराग प्रकाशन, नई दिल्ली  ठ्ठ