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Wednesday 22 Nov 2017

अनूठा चरित्र- रायप्रवीण, जिसे इतिहास ने भुला दिया...

पं. गुणसागर 'सत्यार्थी'

कवि इतिहासकार नहीं होता, परन्तु उसकी कविता में उसके अपने समय में उसके द्वारा भोगी हुई अनुभूतियों की जो सुन्दर अभिव्यक्ति होती है, वह भविष्य में पहुंचकर इतिहास बोध में सहायक अवश्य हो जाती है। कवि की अभिव्यक्ति में उसके वर्तमान का सम्पूर्ण रेखाचित्र अंकित हो जाना भी सहज-स्वाभाविक है। नई पीढ़ी का इतिहासकार उस रेखाचित्र को अपनी विशिष्ट दृष्टि से सिर्फ टटोलता ही नहीं है, अपितु अपने शोध एवं अनुसंधान में गहरे पैठ कर उस रेखाचित्र में इतिहास के चटक रंग भरकर भावी-पीढ़ी के लिए इतिहास के विराट पथ में मील के महत्वपूर्ण पत्थर भी गाड़ देता है। यह एक सहज प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया से हटकर ओरछा के सुनहरे इतिहास को पंख लगा-लगा कर कल्पना के मुक्ताकाश में खूब उड़ाया गया है। उदाहरण के रूप में हमारे समक्ष एक अतिविशिष्ट एवं विलक्षण चरित्र हैं- 'रायप्रवीणÓ जिसके बारे में खूब लिखा गया और लिखा जा रहा है। अब तक के लेखकों ने उसे एक नर्तकी के रूप में ही प्रस्तुत किया है। नर्तकी शब्द का प्रचलित अर्थ समाज ने रंडी-बेडऩी, पतुरिया जैसे घोर असम्मानजनक रूप में ही स्वीकार किया है। अत: इस शब्द में रंडी-बेडऩी या पतुरिया का ही स्वरूप उभरता है। ये सभी लेखक अथवा बड़े-बड़े सम्मानों से विभूषित कवि 'रायप्रवीणÓ के काल में नहीं थे। इसलिए इन सभी ने स्वयं अपने वर्तमान के आइने में 'राय प्रवीणÓ की छवि को देखने का ही प्रयास किया है। अत: आज की सम-सामयिक परिस्थितियों की पृष्ठभूमि में आंख मीचकर उस अनूठे इतिहास-चरित्र को धड़ल्ले से नर्तकी अथवा राज नर्तकी मान लिया गया। सभी ने कल्पना के पंख लगाकर होड़ा-होड़ी ऊंची से ऊंची उड़ानें भरी हैं। फिर कवि-मन की बात ही निराली है, वह इन सभी लेखकों से भी ऊंचा उड़ा और गर्व के साथ यह भी कह दिया कि इसमें मेरा अपना कुछ भी नहीं है, मैंने तो ''श्रुतिलेखÓÓ लिखा है। मानो कथित ओरछा के प्रेत-यज्ञ में हुए महाकवि केशव के प्रेत ने, जो 'राय प्रवीणÓ के लिए पितृतुल्य गुरुदेव थे, वायवी रूप में आकर इन्हें इमला बोलकर ही यह लिखवा दिया है कि ''राय प्रवीण मेरी काव्य-कामिनी थीÓÓ ... वगैरह।
इस प्रकार आज हमारे समक्ष कल्पना के चटक रंगों से उकेरी गई राय प्रवीण की जो तस्वीरें हैं, वे राय प्रवीण के काल में विद्यमान रहे हिन्दी के प्रथमाचार्य और ओरछा के तत्कालीन राजकवि केशव की तत्कालीन कविता की पंक्तियों में उकेरी गई तस्वीर से भिन्न प्रतीत होती है। केशव का शब्द चित्र देखें-
''रत्नाकर लालित सदा, परमानन्दहिं लीन,
अमल, कमल, कमनीय कर, रमा कि राय प्रवीन?
राय प्रवीन कि सारदा? सुचि, रुचि, रंजित अंग,
वीणा-पुस्तक धारिणी, राजहंस-सुत संग।
वृषभ वाहिनी, अंग उर, वासुकि लसत प्रवीन,
सिव संग सो है सर्वदा- सिवा कि राय प्रवीन?ÓÓ
यह शब्द चित्र राय प्रवीण के समय में उकेरा गया था। अस्तु विचारणीय है कि- क्या इन पंक्तियों में रंडी-बेडिऩी अर्थात् नर्तकी की छवि दिखाई देती है? क्या किसी पतुरिया की तुलना- रमा, शारदा और शिवा जैसी महादेवियों से की जा सकती है? क्या हिन्दी-आचार्य एवं महाकवि ने एक साधारण पतुरिया के लिए यह लक्षण ग्रंथ अथवा रीति काव्य प्रणीत किया होगा?... यह प्रश्न बार-बार मन को कुरेदते हैं और हम ऐसे ही अनेक प्रश्न चिन्हों से घिर जाते हैं। अस्तु।
पहला प्रश्न तो यही है कि मुगल सम्राट अकबर ने राय प्रवीण को किस हैसियत से अपने यहां बुलवाया था? क्या कलाप्रेमी और कलाविदों का सम्मान करने वाले अकबर ने तानसेन के समान रायप्रवीण को दरबारी रत्न के रूप में नवरत्नों की संख्या बढ़ाने के लिए एक कलाकार नर्तकी के रूप में बुलाया था? यदि हां, तो दूसरा पूरक प्रश्न है- कि भला कलाकार जूठी पातर कैसे हो सकती है? कला कभी जूठी नहीं होती, वह समुद्र की तरह अथाह होती है, कितना ही उलीचो न खाली होगी और न ही जूठी, तो उस कथित राजनर्तकी ने ''जूठी पातरÓÓ वाली पंक्तियां क्यों सुनाई? दूसरा प्रश्न है- राजा इन्द्रजीत ने जब अकबर के हुक्म को नहीं माना, तो रायप्रवीण को न भेजने के अपराध में अकबर ने ओरछा राज्य पर भारी आर्थिक दण्ड कर दिया। इन्द्रजीत पर आर्थिक दण्ड का भी प्रभाव नहीं पड़ा, वह अपनी राय प्रवीण को किसी भी कीमत पर मुगल सम्राट के यहां भेजने को राजी नहीं हुआ। तब किसी और बड़े अनर्थ की संभावना को देखते हुए दूरदर्शी और विवेकशील, विदुषी, रायप्रवीण में आत्मविश्वास जागा और उसने राजा इन्द्रजीत को परामर्श दी कि विवेक से काम लो, जिसमें आपकी इज्जत भी बनी रहे और मेरा पतिव्रत भी भंग होने से  बच जाए... वगैरह। समझाने को रायप्रवीण ने यह पंक्तियां कहीं-
''आई हों बूझन मंत्र तुमें, निज सासन सों सिगरी मति गोई,
प्रानतजों कि तजों कुलकानि, हिये न लजो, लजि हैं सब कोई।
स्वारथ और परमारथ कौ पथ, चित्त, विचारि कहौ अब कोई।
जामें रहै प्रभु की प्रभुता अरु- मोर पतिव्रत भंग न होई।ÓÓ
यह पूरा वृत्तान्त सुन-पढ़कर अन्र्तात्मा से आवाज आती है और पूछती है कि क्या यह एक नर्तकी अर्थात् पतुरिया का आचरण था? तीसरा प्रश्न- राजकवि की पदवी की सनद से सम्मानित और भारत में विख्यात महाकवि केशव जो राजा इन्द्रजीत के घनिष्ठ मित्र भी थे, उन्हें राजप्रासाद अर्थात् किले से बाहर नगर में कितनी दूरी पर बसाया गया, उनका आवास गृह भी विशिष्ट नहीं, वरन् आम नागरिकों जैसा ही था। परन्तु जिसे आज नर्तकी कहा जा रहा है उस पतुरिया रायप्रवीण के लिए राजप्रासाद के परिसर में ही रानी-महारानी जैसा, 'गूजरी महलÓ सरीखा आलीशन महल बनवाया गया? क्या- महान विद्वान पं. मित्र मिश्र, आचार्य केशव और हरिराम व्यास जैसे भारत विख्यात व्यक्तित्वों की तुलना में यह पतुरिया ऊंचा स्थान रखती थी? ... वगैरह, ऐसे अनेक प्रश्न हैं जो बार-बार मन को कुरेदते हैं, झकझोरते हैं।
ऐसे ही प्रश्नों के ऊहापोह में, एक मजे की घटना और घटी-ओरछा में केशव जयंती समारोह में मुख्य वक्ता के रूप में आचार्य राममूर्ति त्रिपाठी पधारे। टीकमगढ़ के सुधी साहित्यकारों ने उन्हें आड़े हाथों लेते हुए उनसे पूछा- आपके द्वारा लिखी पुस्तक- 'हिन्दी साहित्य का इतिहासÓ में आपने पृष्ठ क्र. 123 पर केशव के लिए लिखा है कि- ''पतुरियों का आचारत्व उन्हें सौंपा था।....ÓÓ क्या प्रथमाचार्य केशव रंडियों को नाच-गान की तालीम देने वाले उस्ताद जी थे? ऐसे आपने क्यों लिखा? उन्होंने लीपा-पोती की, परन्तु ठोस उत्तर देकर आपत्ति उठाने वालों को संतुष्ट न कर सके। लेकिन यह ऐसी बात सामने आई थी कि दिलो-दिमाग से निकलने वाली न थी। कालान्तर में इन पंक्तियों के लेखक को सेंवढ़ा (दतिया) जाना पड़ा, वहां डॉ. सीताकिशोर खरे के बस्तों में बंधी हस्तलिखित पुरानी पाण्डुलिपियां देखी। उन्हीं पाण्डुलिपियों के जखीरे में एक इतिहास विषयक पाण्डुलिपि भी देखने में आई। यह पौष सुदी 14 भौम संवत 1914 विक्रमी तद्नुसार सन् 1857 ई. माह दिसम्बर में सेवढ़ा निवासी प्रधान स्वरूप कानूनगोह कायस्थ के द्वारा लिखी गई थी। इस भारी-भरकम पाण्डुलिपि में से मात्र बुन्देलखण्ड के इतिहास विषय कुछ पृष्ठों की छायाप्रति डॉ. सीताकिशोर खरे से प्राप्त की, जो आज टीकमगढ़ में पं. हरिविष्णु अवस्थी के पास सुरक्षित है। इसमें बुंदेलखण्ड का इतिहास बखानते हुए श्री कानूगोह साहब ने राजा मधुकर शाह के अवसान के बाद इस प्रकार लिखा- ''मधुकर शाह के बेटा आठ हुए। एक बेटा रामशाह वो चंदेरी का राजा हुआ और वह ऐसा साधु हुआ कि उसको ठाकुर दिवाले के पट आप खुल गए...।ÓÓ इसी प्रकार एक-एक करके आठों पुत्रों के बारे में संक्षिप्त जानकारी दी। इसी क्रम में- ''पांचवां बेटा हिंद्रजीत (इन्द्रजीत) हुआ और कछौआ-पिछोर का राज पाया और उसी राजा ने माधो लुहार की लड़की जो बहुत खूबसूरत थी, उसको अपने घर में डार ली, और उसका नाम प्रवीनराय रखा उसके पढ़ाने के वास्ते केसौदास को नौकर रखा...।ÓÓ (पांडुलिपि के पृष्ठ क्र. 70 एवं 71) इस उद्धरण की भाषा और आचार्य राममूर्ति त्रिपाठी के कथन की भाषा कुछ भी हो। परन्तु हमें अब मात्र आशय को समझना चाहिए। अत: स्पष्ट है कि महाकवि केशव काव्याचार्य एवं विद्वान पंडित तो हैं, गायन, वादन, नृत्य, कला के जानकार नहीं। लेकिन वे राजकवि के अतिरिक्त राजा इन्द्रजीत के एकमात्र घनिष्ट मित्र अर्थात् विश्वासपात्र भी हैं। अतएव कछौआ-पिछोर के रूप में साम्राज्ञी लुहार-बाला जो इन्द्रजीत लेकर आया है उसे राजमहलों की तहजीब एवं ललित कलाओं में पारंगत होने के संस्कार भी देना जरूरी थे। ऐसी रूपसी को वह हर किसी की सुपुर्दगी में भी ललित कलाओं के प्रशिक्षण हेतु नहीं दे सकता था। मात्र केशव ही एक मात्र विश्वासपात्र मित्र थे। अत: उन्हें यह दायित्व सौंपा गया था कि इस रूपसी प्रेयसी जो चोखा सोना है, उस सोने में सुगंध भरना है। तब केशव ने गुरुवत सर्वप्रथम भाषा और काव्यशास्त्र की शिक्षा दीक्षा स्वयं दी, एवं अन्य ललित कलाओं के प्रशिक्षण की व्यवस्था अपनी देखरेख में की होगी। ऐसा स्वाभाविक भी है। यह बात कविप्रिया संदर्भ में केशव द्वारा लिखी इन पंक्तियों से स्पष्ट हो रही है कि-
''सविता जू कविता दई, ता कंह परम प्रकाश
ता के काज 'कविप्रियाÓ, कीन्ही केसौ दास।ÓÓ
'कविप्रियाÓ केशव प्रणीत रीति-काव्य का प्रमुख लक्षण ग्रंथ है जो श्रृंगार रस से ओतप्रोत है। अत: इन पंक्तियों को पढ़कर हमने यह भी मान लिया कि यह रायप्रवीण नाम की कथित नर्तकी इतनी सुन्दर थी कि कवि हृदय केशव की वह काव्य कामिनी भी थी। राजा इन्द्रजीत तो उसके रूप लावण्य पर आसक्त थे ही... वगैरह। परन्तु हमने यह विचार क्यों नहीं किया कि एक मियान में दो तलवारें कभी संभव नहीं होती, तो रायप्रवीण एक साथ राजा इन्द्रजीत एवं कवीन्द्र केशव की प्रिया कैसे हो सकती है? यदि वह जन्मजात नर्तकी थी, तो आचार्य केशव क्या पागल थे? जो उसकी तुलना, रमा, शारदा और शिवा जैसी महादेवियों से कर बैठे? यह सब पढ़कर मन नहीं मानता रायप्रवीण को नर्तकी कहने के लिए। केशव की काव्य-कामिनी कहने से पूर्व हमें स्वयं केशव की पृष्ठभूमि एवं उनका धरातल भी तो समझ लेना चाहिए था। अपने बारे में केशव ने स्वयं लिखा है कि-
''भाखा बोल न जानहिं, जिनके कुल के दास,
भाखा कवि भौ मन्दमति, तिहि कुल केसौदास।ÓÓ
केशव के घर में नौकर-चाकर तक भाषा (हिन्दी) में बातचीत नहीं करते अर्थात् संस्कृत में बतियाते थे। उस समय रायप्रवीण को हिन्दी में काव्यशास्त्र का शिक्षण देने हेतु पाठ्य पुस्तक केशव कहां से लाते? अत: रायप्रवीण को ही काव्य शास्त्र पढ़ाने हेतु 'कविप्रियाÓ नाम का लक्ष्मण ग्रंथ उन्हें उस समय लिखना पड़ा था।- ''ताके काज कविप्रिया, कीन्हीं केसौदास।ÓÓ अर्थात् उसके लिए कविप्रिया तैयार की गई, न कि उसके ऊपर या उससे संबंधित। आश्चर्य है कि ''कविप्रियाÓÓ में रायप्रवीण की छवि हमने कैसे और किस आधार पर देख ली? और यह भ्रम फैला दिया कि रायप्रवीण तो केशव की काव्य कामिनी थी... वगैरह। ऐसी एक दो नहीं अनेक बातें हैं जो विवेक-बुद्धि की कसौटी पर सोचने को बाध्य करती हंै।
यथा 5 दिसम्बर 1964 को ''मध्यप्रदेश संदेशÓÓ में छपे स्व. लोकनाथ शिलाकारी के आलेख को भी देखें- वे तो यहां तक मानते हैं कि कवीन्द्र के सखा राजा इन्द्रजीत भी कवि हृदय और सौन्दर्य के परम उपासक थे। उन्होंने अपने आलेख में राजा इन्द्रजीत और रायप्रवीण का गंधर्व विवाह होना भी दर्शाया है। जबकि अन्यत्र इसका प्रमाण देखने को नहीं मिला। जो भी हो। हां रायप्रवीण को लुहार की कन्या शिलाकारी जी ने भी बताते हुए लिखा है कि अपने पिता के साथ वह कन्या मरसान खींच रही थी, कि सहसा राजा इन्द्रजीत ने उसे मरसान खींचते हुए देख लिया और कवि हृदय राजा इन्द्रजीत के मुख से यह पंक्तियां फूट निकली...
''वह हेरनि अरु वह हंसनि, वह मधुरी मुसकानि,
वह खेंचन मरसान की- हिय में खटकत आनि।ÓÓ
शिलाकारी जी द्वारा लिखे इस प्रसंग को पढ़कर सतसईकार बिहारी का दोहा स्मरण हो आया कि-
''सरब ढके सोहैं नहीं, उघरे, होत कुवेष
अध उघरे नीके लगें- कवि-आखर, कुच केस।ÓÓ
कौन जाने मरसान खींचते समय की ऐसी ही कुछ मुद्रा उस लुहार बाला की राजा को दिख गई हो? और उनके हिय में खटका हो कि ऐसा सौन्दर्य तो राजमहलों में होना चाहिए, यह स्थान इसके लिए सर्वथा अनुपयुक्त ही है। तो उस कन्या की उस मुद्रा के अध उधरे अंगों की ही भांति राजा के कवि आखर भी अध-उधरे रूप में पूरी कहानी का रहस्योद्घाटन यहां अवश्य कर गए हैं। यही कि राजा किसी नर्तकी की कला पर नहीं, मात्र रूप राशि पर ही मोहित हुए हैं। उस सम्मोहन क्षण तक वह नर्तकी-वर्तकी नहीं, सिर्फ लुहार की कन्या ही है। जिसे ओरछा के रायप्रवीण महल में लाकर तराशा गया और ललित कलाओं एवं काव्य शास्त्रों द्वारा आभा प्रदान की गई है।
महाकवि केशव की देखरेख में ललित कलाओं के प्रशिक्षण हेतु विधिवत कक्षा बनाई गई। अन्य सहेलियों को भी उस प्रशिक्षण में शामिल किया जाना भी स्वाभाविक है क्योंकि ऐसी रूपसी को अकेले किसी नृत्य गुरु को सौंपना संभव न था। जब राय प्रवीण अपनी सहेलियों सहित अपनी कला का प्रदर्शन अपने पितृतुल्य गुरु केशव एवं राजा इन्द्रजीत के समक्ष करती थी तो केशव क्यों न लिखते कि-
''रायप्रवीन, प्रवीन अति, नवरंगराय, सुवेस,
अति 'विचित्रनयना निपुण, लोचन ललित सुकेस।
सोहति सागर राग की, 'तानतरंगÓ तरंग,
'रंगरायÓ रंगचलति गति, रंगमूरति, अंग-अंग।
नाचति गावति पढति सब, सबै बजावति बीन,
तिनमें करत कवित्त इक, रायप्रवीन-प्रवीन।
यह सभी सहेलियां भले घरों की बेटियां थीं। जिस प्रकार वर्तमान में भी हमारे आपके घरों की बेटियां अपने छात्र जीवन में सांस्कृतिक कार्यक्रमों हेतु नाना प्रकार के नृत्य सीखती हैं व उनका प्रदर्शन करती हैं वैसे ही वे भी करती थीं। इस समूह को पतुरियों का समूह कह देना न्यायोचित नहीं है।
इस प्रकार हम इस निष्कर्ष पर आ जाते हैं कि रायप्रवीण कोई पेशेवर जन्मजात वैश्या अथवा नर्तकी किंचित नहीं थी। वह तो अपने अद्भुत सौंदर्य विशेष की धनी रही हो, तभी राजा इंद्रजीत उसके रूप सौन्दर्य पर मोहित हुए और उन्होंने उसे अपने राजप्रासाद में ले आने का निर्णय लिया। अलबत्ता उनमें ग्वालियर के इतिहासप्रसिद्ध राजा मानसिंह तोमर के समान वह साहस नहीं जाग पाया कि वह भी राजा मानसिंह तोमर द्वारा ऐसी ही एक रूपसी गूजरी-बाला से विधिवत ब्याह रचाने की घटना का यथा अनुकरण कर उस लुहार जाती प्रेयसी से विवाह रचाकर, उसे रानी बना लेते...। यह भी सच है कि समाज में मान्यता प्राप्त रानी का दर्जा राजा इन्द्रजीत भले ही न दे सके परन्तु अपने हृदय की साम्राज्ञी उन्होंने उसे अवश्य बना लिया था। दो दिलों का आत्मा से एकाकार हो जाना ही महत्वपूर्ण होता है। इसके लिए मात्र विधिपूर्वक विवाह रचा लेना ही एक मात्र कारण नहीं होता, बहुत से विवाहित जोड़े भी जीवन भर एकाकार नहीं हो पाते और बहुत से अविवाहित जोड़े भी एक प्राण दो देह के रूप में एकाकार हुए व होते रहे हैं। राजा दुष्यंत और शकुन्तला की व्यथा-कथा यही सब बताती है कि अंगूठी मिल जाने के बाद दुष्यंत और शकुन्तला को पहचान लेता है। परन्तु फिर शकुन्तला की ओर से उसके प्रति मोह भंग हो जाने के कारण वह विवाहित जोड़ी आत्मा को एकाकार हो सुख से दिन नहीं ही काट पाई। जबकि ओरछा के राजा इन्द्रजीत और रायप्रवीण बिन ब्याहे ही एकाकार हो चुके थे। वे एक दूसरे के प्रति परस्पर इतने समर्पित थे कि फेरे लेकर ब्याह रचाने की बात उनके लिए बौनी रह गई थी। उन्होंने आत्मा से उसे अंगीकार कर लिया था। ऐसी स्वीकृत पत्नी के लिए लोक प्रचलित शब्द है 'रखैलÓ और सामन्त परम्परा में रखैल की मान्यता भी हर काल में रही है। परिष्कृत रूप में उसके लिए 'प्रेयसीÓ शब्द स्वीकार कर लेना चाहिए।
प्रश्न उठता है कि क्या वह रखैल राजा इन्द्रजीत किसी कोठे से लेकर आए थे? क्या राजा इन्द्रजीत के सम्पर्क में आने के पूर्व वह लुहार-बाला सार्वजनिक प्रदर्शन हेतु नृत्य करती थी? यदि ऐसा है तो अंत तक उसके नाम के साथ 'नर्तकीÓ की पहचान अवश्य जुड़ी रहेगी। जैसे कि नवाब पटौदी के बे$गम की पहचान आज तक सिने तारिका के रूप में अक्षुण्ण है। परन्तु रायप्रवीण के पूर्व जीवन के किसी भी पृष्ठ पर नाचने-गाने विषयक इबारत पढऩे को नहीं मिलती। कानूनगोह की पाण्डुलिपि इसके लिए प्रमाण भी है। अस्तु।
ऐसी रूपसी के रूप सौन्दर्य की खबरें हवा में खुशबू की तरह जब उड़ी होंगी तो मुगल सम्राट अकबर का आकर्षित हो जाना भी कोई आश्चर्य की बात नहीं। यहां विशेष रूप से विचारणीय बात यही है कि यदि वह यथार्थ में नर्तकी अर्थात् वैश्या होती तो वह प्रसन्नतापूर्वक यह आमंत्रण स्वीकार करके मुगल शासक के हरम में जाकर ऐश करती। उसने ऐसा केवल इसलिए नहीं किया वह न केवल नृत्यकला में निष्णात थी, वरन काव्य कला, गायन, वादन, चित्रकला... आदि सभी ललित कलाओं में अग्रणी होते हुए भी नर्तकी नहीं, राजा इन्द्रजीत की प्राण प्रिया थी। नृत्य का प्रदर्शन उसके द्वारा सार्वजनिक सभा में होने का निश्चित कोई उल्लेख नहीं मिलता। एक मामूली से मामूली व्यक्ति भी यह कभी बर्दाश्त नहीं कर सकता कि उसकी प्रेयसी दूसरों के आगे नाचे गाये..। तब भला राजा इन्द्रजीत की प्रेयसी राजदबार में खुलेआम नृत्य कर सकती थी? राजदरबार में खुलेआम नृत्य करने का जब कोई ठोस प्रमाण नहीं है तो वह राजनर्तकी भी नहीं कही जा सकती। क्योंकि 'राजनर्तकीÓ की 'सनदÓ होने का भी कहीं कोई उल्लेख नहीं है। इन सभी कारणों से रायप्रवीण ने मुगल सम्राट के धन-वैभव को ठुकरा दिया तो वह भी आश्चर्य की बात नहीं है। बल्कि मुगल सम्राट के उस फरमान से विह्वल होकर वह मछली की तरह छटपटाई और उसकी अंत:पीड़ा- ''जा में रहै प्रभु की प्रभुता अरु मोर पतिवृत भंग न होई...।ÓÓ जैसी पंक्तियां फूट पड़ी। एक अजीब सी बेबसी की स्थिति उस समय ओरछा राज्य में आ गई थी। एक ओर तो राजा इन्द्रजीत पूरी ईमानदारी और वफादारी के साथ अपनी रखैल को ब्याहता पत्नी के समकक्ष मान अपना पत्नीव्रत धर्म निभाने पर तुले हुए थे। तो दूसरी ओर ओरछा रियासत की हैसियत से अधिक अर्थदंड मुगल सम्राट रायप्रवीण को न भेजने के अपराध में कर चुका था। दोनों पक्ष अपनी-अपनी बात पर अडिग थे। तब स्वयं रायप्रवीण ही आगे आई और उसने इन दोनों के बीच सामंजस्य बैठाते हुए- ''सांप मरे न लाठी टूटेÓÓ वाली कहावत को चरितार्थ करने की ठानी। परिस्थिति असाधारण थी, जिससे निपटने के लिए रायप्रवीण के पास था आत्मविश्वास, वाक् चातुर्य, काव्य कौशल... अत: अपने पितृतुल्य गुरु केशव को साथ लेकर मुगल सम्राट अकबर के समक्ष गई। वहां रायप्रवीण के प्रवीणत्व और 'आत्म विश्वासÓ की गरिमापूर्ण जीत हुई, और महाबली अकबर मानो परास्त हो गया। अपनी वाक्-पटुता के साथ उसने अपने काव्य चातुर्य का भी खुलकर परिचय देते हुए यह पंक्तियां वहां पढ़ी।
'सुवर्ण ग्राहक तीन है, कवि, व्यभिचारी, चोर,
पग न धरत, संशय करत, तनक न चाहत शोर।
विप्र बैद, नाई, नृपति, स्वान, सौत, मंजार,
जुगल जुरें इक ठौर पर, होय विरोध अपार।
स्वेत रंग सबसे भलौ, स्वेत भले न केस,
रमनी रमत, न रिपुबदत, सुनो सुजान नरेश।।Ó
मात्र इतने पर ही राय प्रवीण को जब तुष्टि नहीं मिली तो अन्त में दो पंक्तियां दो टूक और सुना दी-
''विनती राय प्रवीन की, सुनिया शाह सुजान,
जूठई पातर भखत हैं, बारी, वायस, स्वान।ÓÓ
सुनकर अकबर के पास कहने को कुछ भी शेष न रहा और वह अपनी जिद से हट गया। रायप्रवीण को बा-इज्जत ओरछा के लिए विदा कर दिया। रायप्रवीण ने अपने प्रभु (राजा इन्द्रजीत) की प्रभुता को हर प्रकार से सुरक्षित रखते हुए अपने पतिव्रत को भंग होने से बचा लिया। भारत की इतनी बड़ी हस्ती को इस प्रकार शिकस्त देना किसी नर्तकी-वर्तकी के वश की बात नहीं थी। अस्तु।
न केवल ओरछा राज्य के राजघराने में वरन सभी राजघरानों में यह चलन रहा है कि राजा महाराजा की रानी महारानियां विदुषी, काव्य कला में पारंगत, संगीत और निष्णात और नृत्य विशारद हुई व होती रही हैं। प्रेयसी- भी इस चलन की परिधि में सहज समाहित रही है। इसी परम्परा के प्रतिपालन में काव्य कला, संगीत, नृत्य और चित्रकला जैसी अनेक ललित कलाओं की सौगात उस रूपसी लुहार बाला को ओरछा आ जाने पर ही राजा इन्द्रजीत के सम्पर्क पश्चात प्राप्त हुई थी। ठीक वैसे ही जैसे मृगनयनी को राजा मानसिंह ने संगीत कला की सौगात बैजू बावरा के द्वारा उपलब्ध कराई थी। तो ओरछा के केशव भी बैजू बावरा की भांति उस काल में एक महान व्यक्तित्व अवश्य थे। अत: उस युग से लेकर ओरछा राज्य के अंतिम शासक महाराज वीरसिंह जू देव (द्वितीय) के शासनकाल तक अन्त:पुरों में गीत-संगीत, नृत्य आदि ललित कलाओं का वर्चस्व रहा है। इन पंक्तियों के लेखक के पितामाह स्व. मुंशी अजमेरी, जो ओरछा राज्य के अंतिम शासक महाराजा वीरसिंह जू देव के सनद प्राप्त राजकवि थे और राजा इन्द्रदेव और राजकवि केशव की भांति उनका महाराज से घनिष्ठ मैत्री भाव भी था, उनकी पहुंच अन्त:पुर तक हो चुकी थी। 1932 अक्टूबर 20 को अन्त:पुर के अंतरंग संस्मरण विस्तार से लिखते हुए उन्होंने टीकमगढ़ से राष्ट्रकवि गुप्त जी के नाम जो पत्र लिखा था वह गुप्त जी की 'मुंशी अजमेरीÓ शीर्षक पुस्तक में पृष्ठ-79 से 83 तक छपा है। उस पत्र के कुछ अंश यहां उद्धृत हैं- ''...भीतर महाराज और जनरल साहब खड़े थे और खड़ी थी कई स्त्रियां। महाराज ने सबका परिचय कराया- आप महारानी हैं, आप मझली बहू हैं, इन्होंने नृत्यकला का विशेष प्रशिक्षण भी पाया है... आप संझली बहू हैं, आप मेरी भगिनी हैं...। मैंने बारी-बारी से सबको प्रणाम किया, फिर बैठ गए। महाराज बोले ''अब सुनाइयेÓÓ मैंने कविताएं सुनाई। फिर और-और बातें हुई गाना-बजाना आदि, मैंने भी गाया, जनरल साहब ने बाजा बजाया और उन्हीं में से एक स्त्री ने तबला...।ÓÓ (आगे लिखा है) (कर्नल साहब ने)... इधर-उधर देखा और कहा- ''होने दो रासड़ाÓÓ महाराज ने भी कहा- ''हांÓÓ सब स्त्रियां नाचने को खड़ी हो गईं। महारानी समेत सबने गाया और नाचा...। ऐसा अपूर्व रास देखने में आया कि क्या कहूं?...ÓÓ
मात्र इतना ही नहीं, इस ऐतिहासिक पत्र में उल्लिखित संस्मरण के अलावा भी शिवानी के साहित्य में ओरछा राज्य के अंतिम शासक महाराजा वीर सिंह जू देव (द्वितीय) के अन्त:पुर की ऐसी राग-रंग से आपूरित झांकियों के दर्शन होते हैं। उदाहरणार्थ मंगलप्रभात (ग्वालियर) के ''टीकमगढ़ दर्शनÓÓ विशेषांक में 16 अप्रेल 1978 के अंक में पृष्ठ क्र. 59-60 पर प्रकाशित आलेख ''वे अन्त:पुरÓÓ विशेष उल्लेखनीय है। उस आलेख के कुछ उदाहरण देखे- ''...किले में आज विशेष गोठ अर्थात् गोष्ठी है। राज परिवार की राज कन्या सुधा राजा और उनकी सखियां गोष्ठी में अपना नाटक प्रस्तुत कर रही हैं।...ÓÓ
''... नाटक प्रारंभ होता है। समवेत नृत्य में सखियों से घिरी किशनगढ़ शैली में राधिका के चित्र सी लगती स्वयं सुधा राजा राधिका वेश में प्रवेश करती हैं। पैरों में असली सोने के वे भारी घुंघरू छनक उठते हैं जिन्हें उसी दिन रनिवास के अंधेरे तहखाने से निकालकर चमकाया गया था। उन्हें शायद बुन्देला वीर- वीर सिंह जू देव (प्रथम) की महारानी के चरण स्पर्श का सौभाग्य प्राप्त हो या मधुकर शाह जू देव की सुन्दरी महारानी के चरण भी चूम चुके हों...।ÓÓ
प्रश्न उठता है कि क्या वे महारानियां भी रायप्रवीण की भांति नर्तकियां थीं? यदि नहीं थीं तो राजघरानों की इस महती परम्परा की पृष्ठभूमि में रखकर ही राजा इन्द्रजीत की मानी हुई प्राणप्रिया रायप्रवीण को भी हमें रखना चाहिए। केवल 'रखैलÓ के नाते ही उसे पतुरिया मान लेना न्याय संगत नहीं है। सामंत लोग पतुरियों को भी रखैल के रूप में भोगने लगे हैं तो उस काल में भी यही स्थिति रही होगी। शिवानी जैसी लेखिका को राजकुमारी सुधा राजा के नृत्य की भाव भंगिमाओं में यदि किशनगढ़ शैली का चित्रांकन दिखाई दे सकता है। तो ऐसे ही अवसरों पर जब किले के भीतर होने वाली गोठों अर्थात् अति विशिष्ट गोष्ठियों में महाकवि केशव को ऐसे ही दृश्य देखने को मिले होंगे जैसे कि राजकवि मुंशी अजमेरी जी अथवा शिवानी जी ने अंतिम शासक के समय में देखे, तो केशव यह कहे बगैर कैसे चूक सकते थे कि-
''तंत्र तुंबरू सारिका, सुद्ध सुरन सों लीन,
देव सभा सी सोभिजें - रायप्रवीन-प्रवीन।
नरी किन्नरी आसुरी, सुरी रहति सिर नाड़,
नवरस नवधा भगति त्यों, जोजित नवरंग राय।...ÓÓ
और सुधा राजा की ही भांति राय प्रवीण की भी सखियां- नवरंगराय, विचित्रनयना, तानतंरग और रंगमूर्ति (यह सभी उन सहेलियों के उपनाम हैं) गोठ में भाग लेती थीं। अत: राजघरानों की तो यह रीति पूर्व से ही चली आई है। इसमें संदेह की तनिक भी गुंजाईश नहीं है कि राय प्रवीण-नर्तकी नहीं थी। भला रायप्रवीण जैसी अनूठे व्यक्तित्व की धनी जिसकी तुलना आचार्य केशव ने रमा, शारदा और शिवा जैसी महादेवियों से की हो उसे नर्तकी या राजनर्तकी कैसे किस आधार पर लिख दिया गया? यही आश्चर्य की बात है।