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Friday 24 Nov 2017

रंगमंच: जीवन, कलाओं और संभावनाओं की विराट दुनिया

डा. सेवाराम त्रिपाठी
6, रजनीगंधा, शिल्पी उपवन श्रीयुत नगर, रीवा (म.प्र.)  486002
मो. 9425185272
रंगमंच सजीव विधा है। नाट्यालेख शब्दों-वाक्यों के मार्फत अर्थ की एक दुनिया रचता है जबकि रंगमंच उसमें हाड़मांस, गतिशीलता, सक्रियता और जीवंतता को प्रत्यक्ष करता है। रंगमंच गहरे अर्थों में संवाद और सम्प्रेषण भर नहीं है, वह जीवन का क्रिया व्यापार भी है। रंगमंच के भीतर जीवन और कलाओं की समूची दुनिया होती है। वह जीवन को बहुस्तरीय और बहुकोणीय रूपों में रचता है। वह कलाओं के विविध रूपों को अपने भीतर जज़्ब करता है। वह जीवन को 'क्रियेटÓ करने वाली वास्तविकता है। गोर्डन क्रेग मानते हैं कि ''रंगमंच  की कला न अभिनय है न नाटक न दृश्य है न नृत्य बल्कि उन सब तत्वों का समन्वय है जिनमें वह निर्मित होती है।ÓÓ रंगमंच में जीवन के कार्य-व्यवहार, रुचियों, प्रेम, गुस्से, घृणा, उल्लास और उमंग को दुख-सुख को रचा जाता है अर्थात् जीवन को 'क्रियेटÓ किया जाता है। रंगमंच यथार्थ का ऐसा प्रभामण्डल तैयार करता है कि वह जीवन का पर्याय जैसा आभास प्रदान करता है।
    रंगमंच जितना जटिल है उतना ही सरल भी। रंगमंच बहुत ही संघर्षशील आयाम है। वह दूसरों तक सूक्ष्म से सूक्ष्म, जटिल और सहज और उसके बिल्कुल निजी जीवन प्रसंग की बातें सम्प्रेषित करने का पक्षधर है इसलिये उसे अन्य कलामाध्यमों के द्वारा वहाँ पहुँचने का उद्यम करता है। रंगमंच सृजन के व्यवहार में विश्वास करने वाली कला है। अशोक वाजपेयी का कहना है कि ''हम यह न भूल जायें कि एक तरह से दूसरे कला माध्यम अर्थात् रंगेतर कला माध्यम भी उसके लिये दूसरे हैं - नाटक अक्सर दूसरा ही लिखता है, प्रकाश व्यवस्था और दृश्यबंध वेशभूषा आदि दूसरों के लिये होता है और निर्देशक और अभिनेता स्वयं एक दूसरे के लिये 'दूसरेÓ ही हैं। किसी और कला माध्यम पर दूसरे इतने छाये नहीं रहते जितने कि रंगमंच पर। एक दिलचस्प अर्थ में रंगमंच हमेशा ही दूसरों का माध्यम रहा है।ÓÓ (समय से बाहर-पृष्ठ 126)
    रंगमंच इकहरी कलासृष्टि नहीं है। वह कलाओं का समुच्चय है। समूची कलाओं की आवाजाही और भूमिकायें रंगमंच में सम्प्रेषण को जीवंत बनाती हैं और उसकी ग्रहण क्षमता को बहुस्तरीयता प्रदान करती है। रंगमंच में अमूर्त को मूर्त करने की क्षमता है। नाट्यालेख को निर्देशक की योग्यता और अभिनेताओं की अभिनय क्षमता और विभिन्न कला संरचनाओं के द्वारा जीवंत करने की क्षमता है अर्थात् वह शरीर में प्राण फूंकने उसे जीवंत गतिशील और सार्थकता में रूपांतरित भी करता है। दोनों की अनिवार्यता भी है। दोनों एक दूसरे से बहुत गहरे जुड़े हुए हैं।
    रंगमंच में निरंतर प्रयोग होते रहे हैं अभी भी हो रहे हैं और आगे भी होंगे। जब बंधा-बंधाया जीवन नहीं है तो रंगमंच को कौन बांध सकता है? रंगमंच समय की धड़कनों और काल के प्रवाह को भी ग्रहण करता है। वह समाज की गतिशीलता को बदलते हुए युग के प्रवाह को भी अपने भीतर समोता है। रंगमंच अपने उद्भव से लेकर विकास की तमाम प्रक्रियाओं और सोपानों से गुजऱता हुआ भी देशकाल और समाज से जुड़ा रहा है। उसकी प्रतिबद्धता समाज के प्रति है और जवाबदेही भी। वह समाज की गतिशीलता के जितना पक्ष में है उतना ही समाज में पनप रही अंधेरगर्दी और सत्ता प्रतिष्ठानों की अनुचित और अन्यायपूर्ण कार्यवाही के प्रतिरोध में भी है। वह मुकम्मल कला सृष्टि है। उसका कोई सानी नहीं। उसका कोई सक्षम विकल्प भी नहीं है। जो भी विकल्प खोजे जा सकते हैं वे इकहरे और एकायामी ही होंगे।
    रंगमंच की विकास यात्रा एकरेखीय नहीं है। उसकी अनेक धारायें हैं। उसकी अनेक कार्यवाहियाँ भी हंै। रंगमंच को हर कालखण्ड में चुनौतियाँ मिलती रही हैं और उसने उन तमाम चुनौतियों का हमेशा मुकाबला किया है। उसकी सक्रियता निरंतर बढ़ती रही और उसका विस्तार भी लगातार होता रहा। लोक रंगमंच, शास्त्रीय रंगमंच, नुक्कड़ रंगमंच से लेकर आधुनिकताओं और उत्तर आधुनिकताओं के प्रवाह में उसके भीतर अनेक प्रयोग होते रहे हैं। आर्तो का प्रस्ताव है कि ''रंगमंच लिखित भाषा से आक्रांत उपनिवेश है, उसको अपने को 'टेक्स्टÓ की सत्ताÓ से मुक्त कर प्रकाश गति, रंग, मुद्रा और स्पेस की भाषा में बोलना-सीखना चाहिये।ÓÓ यह अलग तरह की रंगभाषा और रंगमुद्रा है या अलग तरह के रंग अभियान का प्रस्ताव है। टी.वी. के आगमन और उसके पहले फिल्मों के बढ़ते प्रभाव से परेशान तमाम चिंतकों की चिंताओं के रहते रंगमंच ने अपने लिये अलग प्रयोग किये और अलग रास्ते अपनाये। विशेषता रंगमंच की यह भी है कि वहां 'रीटेकÓ संभव नहीं है क्योंकि उसका जीवंत रिश्ता प्रत्यक्ष और सजीव तथा सामने बैठे हुए दर्शकों से है। सिनेमा या टीवी में अनेक बार 'रीटेकÓ हो सकता है लेकिन रंगमंच में नहीं। प्रेक्षागृह या रंग प्रदर्शन उसके लिये 'जीना यहां मरना यहांÓ दोनों है। जाहिर है कि रंगमंच अपने लिये कहीं से भी कुछ ग्रहण कर सकता है परन्तु यह महत्वपूर्ण है कि इसके बावजूद वह प्रतिकृति या अनुकरण नहीं बल्कि स्वतंत्र रचना बना रहता है। अन्तोनिन आर्तो मानते हैं कि '' रंगमंच एक ठोस मूर्त दृश्यत्व प्रधान स्थल है जिसे भराव की आवश्यकता होती है और इसीलिये उसे 'ठोस भाषाÓ बोलने की इजाजत होनी चाहिये। तात्पर्य यह है कि यह शारीरिक और भौतिक भाषा इन्द्रिय अनुभव जागृत करने की क्षमता से युक्त हो। यह तभी संभव है जब वह ऐसे दृश्यमूलक तत्वों से निर्मित हो जिससे मंच की खाली जगह को भरी जा सके, जिन्हें दिखाया जा सके, भौतिक रूप से अभिव्यक्त किया जा सके।ÓÓ (उद्धृत गोविन्द चातक नाट्यभाषा पृष्ठ 22)
    रंगमंच में कई चीज़ें एक साथ घटित होती हैं। वह लगाव अलगाव दोनों हो सकता है। उसमें जीवन के अनेक रूपों अनेक रंगों और स्थितियों को घेरने की अभूतपूर्व क्षमता है। वह प्रथमत: और अन्तत: हमें जीवन के साथ जोड़ता है। जीवन की अपूर्णता को पूर्णता में परिवर्तित करने की कोशिश करता है। रंगमंच जितना परम्परा से संवाद करता है उससे कहीं ज़्यादा बदल रहे समय और समाज में हो रहे परिवर्तनों की आहट लेता है और उसी के अनुरूप अपने आपको बदलता हुआ विकास की मंजि़लें तय करता है। रंगमंच में ठहराव कहाँ, उसकी यात्रा अविराम है। रंगमंच की परम्परा को पहचानना उसमें नये प्रयोग करना, उन प्रयोगों का जीवन संघर्षों, प्यार-मोहब्बतों और सामाजिक गतिशीलता से जोडऩा और अन्याय के खि़लाफ़ हर तरह की ज़्यादतियों के खि़लाफ़  प्रतिरोध करते रहने के लिये तैयार करना उसके गहरे सरोकारों में शामिल है। यही उसकी सामाजिक प्रतिबद्धता है। इन सबसे वह हमेशा जुड़ा है। यही उसकी सार्थकता है।
    यह दुनिया अपने आपमें एक रंगमंच है जिसमें तरह-तरह की भूमिकायें निबाही जा रही हैं। हम सक्रिय और सचेष्ट होकर शामिल हो सकते हैं तथा निष्क्रिय होकर या उदासीन होकर आत्मलीन भी हो सकते हैं। मुक्तिबोध ने कहा था - जो है उससे बेहतर चाहिये। बेहतरी की लगातार खोज ही रंगमंचीय संभावनाओं का रंग आंदोलन है। आशीष त्रिपाठी का यह कहना सही है कि ''रंगमंच की भाषा, उसकी सम्प्रेषण क्षमता जीवन की तरह ही परतदार, बहुआयामी और बहुस्तरीय है। यह बहुस्तरीयता, बहुकोणीयता, बहुसंयोजकीयता और कलात्मकता के ये विभिन्न अन्त:स्रोत जीवन के जटिल और गहन अनुभवों को मंच पर जीवित करते हैं। मंच पर बन रही बहुआयामी दृश्यावली जीवन को उसकी पूरी विविधता के साथ चित्रित और संप्रेषित करती है।ÓÓ (समकालीन हिन्दी रंगमंच और रंगभाषा- पृष्ठ 18)
    रंगमंच का प्रभाव हमारे जीवन में अकूत होता है। वह जितना अंदर होता है उतना ही बाहर भी। उसके असीमित प्रभाव का तो कहना ही क्या? रंगमंच अन्य समूची कलाओं के बरक्स ज़्यादा प्रभाव पैदा करने में बेमिसाल है। रंगमंच कहने भर के लिये नहीं है उसमें जीवनी शक्ति भरपूर होती है। जब अशोक वाजपेयी यह कहते हैं कि ''रंगमंच इस दृष्टि से अधिक स्वतंत्र कला है - उसे जो घर में नहीं है उसे बाहर से लाने की पूरी छूट है , जो कि अन्य कलाओं में इतनी बेहिचक और नि:संकोच सुलभ नहीं है। यह भी कह सकते हैं कि इस मायने में रंगमंच अधिक प्रजातांत्रिक है - अपनी रुचि और दृष्टि दोनों में। शायद इसी कारण उसकी सरहदें सबसे तेज़ी से आगे खिसकती चलती हैं।ÓÓ
रंगमंच का समूचा वितान होता है, उसकी विधिक कार्यशैली होती है। उसमें समूची कलाओं की आवाजाही होती है। तभी वह पूर्णता को प्राप्त करता है। हम सबके सामने यह एक बड़ा प्रश्न है कि दरअसल रंगमंच क्या है ? उसकी पहुँच और पकड़ कहाँ तक है। कौन सी चीज़ है जो उससे बाहर है। रंगमंच में नाटक, अभिनेता, लेखक, निर्देशक, आहार्य माध्यम के विभिन्न रूप तो होते ही हैं । मेरी समझ में सबसे बड़ी बात यह है कि उसमें जीवन ही जीवन है। जीवन के बहुविध प्रयोग हैं। जीवन की सब प्रकार की धाराएँ हैं तो दूसरी ओर सभी प्रकार के कलाशिल्प हैं, सभी प्रकार की कलायें हैं। इन समूची कलाओं में जो विद्यमान था वह तो है ही कलाओं में और किस-किस प्रकार के प्रयोग हो सकते हैं और कितनी संभावनायें हो सकती हैं। यह सब रंगमंच की ही दुनिया है। उसमें समूचे आहार्य माध्यम रंगमंच के अति महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में शामिल हैं।