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Monday 20 Nov 2017

गांधी जी जहां हों, वहां!


राहुल राजेश
सहायक प्रबंधक (राजभाषा) भारतीय रिज़र्व बैंक, ला गज्जर चैंबर्स, आश्रम रोड, अहमदाबाद,380009
गुजरात
मो. 9429608159

जब मैं तीन अगस्त, 2009 की शाम तकरीबन साढ़े छह बजे इस शहर यानी अहमदाबाद की धरती पर पहली बार पांव रखा तो मन में एक नितांत नए शहर में नौकरी करने आने का तीव्र रोमांच जरूर था, पर मन में कोई पूर्व निर्धारित योजना नहीं थी। क्योंकि इस शहर में पहले से मुझे जानने वाला कोई नहीं था। न दोस्त-यार, न ही कोई नाते-रिश्तेदार! न तो यह आमार कोलकाता था न तो आमची मुंबई था और न ही अपणु अहमदाबाद था मुझ अजनबी आगंतुक के लिए! हाँ, जब इस शहर के लिए चला था, तब मन में जरूर एक बात थी ! वह यह कि इस शहर में साबरमती है और साबरमती नदी के तट पर बसा गाँधी आश्रम है ! मन में कविता की यह पंक्ति कब से बैठी, धड़क जो रही थी- साबरमती के संत, तूने कर दिया कमाल ! तो इस शहर में थोड़ा सहज होते ही मैंने जो पहली योजना बनाई, वह थी साबरमती आश्रम देखना। वहाँ रमना। वहां गाँधीजी के पदचाप सुनना। वहाँ की माटी में गाँधीजी के पदचिन्ह तलाशना-चीन्हना। वहाँ गाँधीजी की विराट उपस्थिति में नतशिर होना, ध्यानस्थ होना!
     वह इतवार का दिन था। मैं नहा-धोकर तैयार होकर चल पड़ा साबरमती आश्रम की ओर। जैसे मंदिर की ओर चल पड़ता है कोई। उसी आस्था, उसी भाव के साथ। शहर के मध्य से बहती साबरमती नदी के समानांतर ही है शहर का प्रसिद्ध मुख्य मार्ग यानी आश्रम रोड। और आश्रम रोड के ही अंतिम छोर पर है साबरमती आश्रम। वैसे तो शहर का यह मुख्य मार्ग यानी आश्रम रोड शहर के व्यस्ततम मार्गों में से एक है और इसके दोनों तरफ  शहर के तमाम बड़े-बड़े सरकारी, गैरसरकारी दफ्तर, प्रतिष्ठान स्थित हैं। इसी मार्ग पर गाँधीजी द्वारा स्थापित नवजीवन ट्रस्ट और गुजरात विद्यापीठ भी स्थित है। लेकिन आश्रम रोड का नामकरण साबरमती आश्रम पर ही हुआ है। जब साबरमती आश्रम पहुँचा तो सहसा विश्वास ही नहीं हुआ कि इस व्यस्ततम मार्ग पर कोई आश्रम भी बसा हो सकता है! साबरमती आश्रम के मुख्य द्वार पर बहुत सादगी से टँगा हुआ एक बोर्ड था, जिस पर माटी के रंग का आभास कराती कत्थई पृष्ठभूमि में सादगी का अहसास कराते सफेद रंग के अक्षरों में लिखा हुआ था- साबरमती आश्रम: गांधी स्मारक संग्रहालय। अन्य स्मारकों, स्मृति-स्थलों की तरह यहां न तो भारी-भरकम तोरण द्वार थे, न ही कोई सिंह द्वार और न ही कोई कीर्तिस्तंभ। मुख्य द्वार पर एक विनम्रता थी, सादगी थी, शांति थी, जो प्रवेश से पहले ही बता देती थी, यही गांधी आश्रम है। प्रवेश द्वार पर टंगा बोर्ड तो बस एक औपचारिकता मात्र थी! हां, इस बोर्ड को पार कर अंदर घुसते ही एक पतले से लौहस्तंभ पर टँगी गाँधीजी की मंझोले आकार की तस्वीर के नीचे गांधीजी का संदेश गुजराती, हिंदी और अंग्रेजी में दृढ़ता से कह रहा था- मरते भी सत्य नहीं छोडऩा!
    अंदर घुसते ही घने पेड़-पौधों की शीतल छाया ने हौले से अभिवादन किया और तत्क्षण ही शहर की चकाचौंध, चिल्ल पों छूमंतर हो गई ! तत्क्षण ही मन अचरज से भर गया। अरे, इस व्यस्ततम मार्ग पर इतनी सघन छाया, इतनी सघन शांति ! इतनी भरी-पूरी, सहज-देशज प्रकृति! इतनी मुलायम मिट्टी! इतनी भुरभुरी, इतनी मुरमुरी धरती! इतने पुरातन घर, इतनी पुरानी कुटिया! इतनी झुकी, इतनी पुरानी छप्पर-छानी!
    भला ऊंची-ऊंची अट्टालिकाओं के दंभी अहसास के बीच कोई सहसा विश्वास करे भी तो कैसे करे कि कंक्रीट के जंगलों के बीच भी साबुत बचा हुआ है यह आश्रम ! भरा-पूरा आश्रम ! केवल गांधी की विराट उपस्थिति मात्र से नहीं, केवल इतिहास के छापों से नहीं, वरन् अनगिनत पक्षियों के कर्णप्रिय कलरव से भरा आश्रम ! नन्ही-मुन्नी गिलहरियों की निरंतर उछल-कूद, कुदक-फुदक से भरा आश्रम! नंगे पांव देर तक हौले-हौले चलने को, हरी-हरी घास पर, नरम-नरम माटी पर मंथर-मंथर पांव धरने को नित्य आमंत्रित करता आश्रम!
   साबरमती आश्रम बहुत ही खुला-खुला है। ढेर सारी खुली और खाली जगहें मन को सम्मोहित कर लेती हैं। गांधी जी ने इसी खुली जगह की चाह में इस जगह पर अपना आश्रम फिर से बसाया था। दक्षिण अफ्रीका से लौटने के बाद, गाँधीजी ने 25 मई 1915 को पहले अहमदाबाद में कोचरब आश्रम बसाया था। लेकिन वहां जगह की कमी होने के कारण उन्होंने फिर 17 जून 1917 को साबरमती में दुबारा आश्रम बसाया ताकि वह अपनी आगामी योजनाओं को अंजाम दे सकें। यह वही स्थान है, जहाँ से गाँधी जी ने अपना सत्याग्रह आरंभ किया था। इसलिए इस आश्रम को सत्याग्रह आश्रम भी कहा जाता है।  आश्रम के प्रवेशद्वार से अंदर आते ही सबसे पहले गांधी स्मारक संग्रहालय है। लेकिन मैं आगे बढ़ जाता हूँ। संग्रहालय बाद में देखूंगा। सबसे पहले मैं आश्रम के विस्तार और संसार को मन-आँखों में समेट लेना चाहता हूँ। संग्रहालय पार करते ही सामने सबसे पहले उपासना मंदिर लिखा दिखता है। लेकिन यहाँ कोई मंदिर नहीं है। बस एक खुली चौकोर जगह है। तो यही वह जगह है, जहाँ गाँधी जी उपासना किया करते थे! वहीं पर प्रार्थना भूमि भी लिखा है। यानी जहाँ गाँधी जी सुबह-शाम प्रार्थना-सभाएँ किया करते थे! इस भूमि पर रेत बिछी है। मैं खाली पाँव इस रेत पर चलता हूँ। टहलता हूँ। ठहर-ठहरकर। सोचता हूँ कि गाँधी जी ने इसी भूमि पर चलकर, टहलकर, चिंतनकर कितने संकल्प लिए देश को कितना कुछ दिया !  इस प्रार्थना भूमि से सामने साबरमती नदी दिखती है। इसकी बायीं तरफ  साबरमती नदी की ओर उतरती लंबी-चौड़ी सीढिय़ों की कतार है, जो एक सुंदर, भव्य दृश्य रचती हैं। सीढिय़ाँ जहाँ खत्म होती हैं, वहाँ अब लोहे की जालीदार बाड़ है। इस पार आश्रम, उस पार नदी का घाट। कुछ-कुछ बनारस के घाटों जैसा लगता है यह। जब साबरमती सूखी नहीं होगी, पानी से भरी होगी, तब आश्रम के लोग इन्हीं सीढिय़ों से उतरते होंगे साबरमती के जल में। इस प्रार्थना भूमि की दायीं तरफ  हृदय कुंज है। यानी गांधी जी और कस्तूरबा का निवास स्थल। किनारे एक निर्देश है-जूते उतार दें। संभवत:यह निर्देश खासकर विदेशी पर्यटकों के लिए निर्दिष्ट है। हम भारतीय तो बगैर निर्देश भी श्रद्धाभाव से जूते उतारकर ही अंदर जाते। अंदर जाने से पहले झुककर प्रणाम करता हूं। यह पुराने ढंग का घर है, खपरैल की छप्पर वाला। बहुत बड़ा नहीं तो बहुत छोटा भी नहीं। थोड़ी ऊंचाई पर बना। पहले सीमेंट का बड़ा बरामदा है। दो-तीन सीढिय़ाँ चढ़कर बरामदे पर हूँ। बरामदे की सामने वाली दीवार पर ठीक बीच में गांधी जी की तसवीर बनी है और नीचे संगमरमर की चौकोर पट्टी पर गांधी जी की ईश्वर को संबोधित प्रार्थना अंकित है हिंदी और अंग्रेजी में- हे नम्रता के सागर!
बरामदे की बायीं तरफ  गाँधी जी का कमरा है। कमरा बंद है। लेकिन कमरे के भीतर झांकने के लिए एक जालीदार दरवाजा है और उसमें बित्ते-भर की एक वर्गाकार खिड़की भी बनी हुई है। मैं भी भीतर झांकता हूँ। भीतर से कमरा अच्छा-खासा बड़ा दिखता है। एक कोने में कुश की चटाई बिछी हुई है, जिस पर एक गद्दा और तकिया भी रखा हुआ है। एक छोटी मेज रखी हुई है। गाँधी जी इसी पर लिखते-पढ़ते होंगे। बगल में लकड़ी का बना एक बड़ा हाथ चरखा भी रखा है। बापू यहीं नियम से चरखा चलाते होंगे। वही चरखा, जो बापू के लिए सत्य और अहिंसा का प्रतीक था! श्रम और स्वदेशी का प्रतीक था! कमरे के बाहर एक तख्ती पर लिखा है- यह वही कमरा है, जिसमें गाँधी जी देश-विदेश से आने वाले आगंतुकों से भेंट करते थे और जहाँ ऐतिहासिक आंदोलनों की योजनाएं बनती थीं। कमरे में झाँककर अच्छा लगता है, पर खाली कमरा कचोटता है.. काश! यहाँ बापू अब भी बैठे मिलते! चरखा चलाते दिख जाते! बरामदे की दायीं तरफ  चटाई बिछी है, जिस पर एक हाथचरखा और एक बॉक्स चरखा रखा है। आश्रम के सदस्य-कर्मचारी यहां चरखा चलाते दिखते हैं। वे गाइड की भूमिका में भी होते हैं। वे खादी ही पहनते हैं। यहां आने वाला कोई भी आगंतुक इन चरखों को चलाने का अनूठा अनुभव ले सकता है। साबरमती आश्रम आने वाले देशी-विदेशी मेहमान भी इन चरखों को चलाकर अनुभव संजोते हैं!
मैं बरामदे से अंदर जाता हूँ। अंदर एक छोटा सा चौकोर आंगन है और छोटे-छोटे तीन कमरे हैं। एक कमरे में दो अलमारियों में गांधीजी द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली चीजें रखी हैं, बर्तन आदि रखे हैं। इन्हीं के बीच तीन बंदरों वाली एक छोटी-सी सफेद मूर्ति भी है। तो क्या गाँधी जी ने इसी चीनी खिलौने से बुरा मत कहो, बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो वाली सीख अपनाई थी! इस घर का यह छोटा सा आंगन बहुत प्यारा लगा! जिस पर कुछ लताएं झुकी हुई हैं। पेड़ों की छायाएँ बन मिट रही हैं!
   इस घर यानी हृदय कुंज के सामने और अगलबगल बहुत खुली खाली जगह है। सीमेंट से कठोर नहीं, मिट्टी बालू से भरी। जहां कई कई पेड़ लगे हैं। पेड़ों पर नाना तरह के पक्षियों का बसेरा है। तोता, मैना, कौआ, कबूतर, कोयल, गोरैये, बुलबुल, फाख्ते, वन बगुले, पंडुक आदि-आदि विविध पंछियों के झुंड वातावरण को अपनी चहचहाहटों से, अपनी उड़ानों से भर दे रहे हैं। मानो यह शहर का हिस्सा नहीं, कोई सघन वनप्रांतर हो! गिलहरियां जमीन पर पेड़ों पर चढ़ उतर रही हैं! बच्चे भी इस खुली जगह में खूब कूदफांद रहे हैं! सामने इस विस्तार को बांधती कमर तक ऊंची दीवार है, जिस पर सुग्गे नीम की निबौलियां कुतर रहे हैं, अनाज के दाने चुग रहे हैं! दीवार के पार से साबरमती नदी का आकर्षक नजारा दिख रहा है। साबरमती पर बने पुल दिख रहे हैं। बच्चे-बड़े-बूढ़े सब के सब इस सुख में सराबोर हो रहे हैं! तसवीरें खींच रहे हैं। कोई अपने कैमरों से, कोई मन की आँखों से! कोई दोनों से! आश्रम में ही हृदय कुंज से थोड़ी दूरी पर विनोबा कुटीर और मीरा कुटीर भी है। लेकिन यह देखकर अचरज हुआ कि कितना कुछ त्याग कर वे इस छोटी सी कुटिया में रहते थे। हृदय कुंज तो एक बड़ा-सा भरा-पूरा घर था लेकिन ये कुटीर तो बहुत ही छोटे थे। इसके आसपास सीमेंट के दो बड़े-बड़े चबूतरे थे, जो बाद में बनाए गए लगते थे।
विनोबा कुटीर से थोड़ा आगे बढऩे पर, इस तरफ भी साबरमती के घाट पर उतरने के लिए सीढिय़ाँ हैं। लेकिन ये उतनी चौड़ी नहीं हैं, जितनी प्रार्थना भूमि से लगी सीढिय़ाँ। यहां भी इन सीढिय़ों को लोहे की जालीदार बाड़ से बंद कर दिया गया है। साबरमती का पाट भी अब सिमट गया है। रिवर फ्रंट बन जाने से इस पाट पर अब पक्की सड़क बना दी गई है, जो आश्रम रोड के समानांतर चलती है। इसके आसपास भी एकाध घर हैं खपरैल की छत वाले। यहाँ एक छोटा सा स्कूल भी चलता है। यहां मुझे एक बहुत ही सुंदर चीज देखने को मिली। यहां चार छोटे-छोटे पौधे लगाए गए हैं, जो यकीनन बाद में विशाल पेड़ बन जाएंगे। इन पौधों को सुरक्षित रखने के लिए इनको घेरने वाली हरेक जाली पर इन पौधों का अद्भुत नामकरण किया गया है! पहला पौधा सत्य का है! दूसरा अहिंसा का है! तीसरा करुणा का है! और चौथा पौधा प्रेम का है! यानी ये पौधे सत्य, अहिंसा, करुणा और प्रेम के जीवंत प्रतीक हैं! सुंदर! वाकई, बहुत सुंदर!!
आश्रम के दूसरे सिरे पर मगन-निवास है। यह भी खपरैल की छत वाला बड़ा सा घर है। यह गाँधी जी के पोते मगन गांधी का निवास था, जिनकी मृत्यु 1928 में हुई थी और इनकी मृत्यु पर गाँधी जी ने कहा था, इसकी मृत्यु ने मुझे विधवा कर दिया है। कहा जाता है, मगन गाँधी इस सत्याग्रह आश्रम के प्राण थे और दक्षिण अफ्रीका के दिनों से ही वे गाँधी जी के साथ थे।
 आश्रम के दोनों छोरों तक घूम लेने के बाद मैं अब गाँधी स्मारक संग्रहालय की तरफ  मुड़ता हूँ। संग्रहालय की दायीं तरफ  छोटे से घास के मैदान में पालथी मारकर बैठे गाँधी जी की काले पत्थर में गढ़ी गई एक बड़ी सी मूर्ति है। मिट्टी के थोड़े ऊँचे टीले पर। यह मूर्ति संसद भवन के सामने लगी गाँधी जी की विशाल प्रतिमा की याद दिलाती है। पर उस विशाल प्रतिमा की तुलना में यह मूर्ति बहुत छोटी है। लोग-बाग, बच्चे इस घास के मैदान में खेल रहे हैं, लोट रहे हैं। कुछ लोग गाँधी जी की मूर्ति के साथ अपनी तसवीरें खिंचा रहे हैं। मैं भी गाँधी जी से सटकर अपनी तसवीर खिंचवाता हूँ। संग्रहालय के प्रवेश द्वार की बायीं तरफ भी गांधी जी के तीन बंदर बैठे हैं सफेद सीमेंट में गढ़े।
 संग्रहालय में घुसते ही इसकी बनावट मेरा ध्यान खींच लेती है। यह संग्रहालय अन्य संग्रहालयों से अलग है। बहुत खुला-खुला और लकड़ी से बने, छोटे-छोटे कई प्रिज्माकार छतों वाला। बाहर बैठने की खूब सारी जगह, जहां से आप चारों तरफ  के नैसर्गिक दृश्य भी देख सकते हैं। पूछने पर पता चला कि इस संग्रहालय को चाल्र्स कोरिया ने डिजाईन किया है। अपने नाम से विदेशी होने का भ्रम पैदा करने वाले चाल्र्स कोरिया सन् 1930 में सिकंदराबाद में जन्मे और अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त भारतीय वास्तुकार (आर्किटेक्ट) हैं। इन्हें सन् 2006 में पद्मविभूषण से सम्मानित किया जा चुका है। संग्रहालय में बाहर और भीतर गांधी जी के विभिन्न संदेशों, पत्रों, जनसभाओं, आंदोलनों, उनकी जीवन अवस्थाओं आदि की तस्वीरों, प्रतिकृतियों एवं मूल प्रतियों को बहुत सुंदर ढंग से संभालकर रखा गया है और उन्हें आकर्षक ढंग से प्रदर्शित किया गया है। यहाँ दाँडी मार्च का भी एक मॉडल बनाया गया है, जो लगभग जीवंत लगता है।
       इस संग्रहालय में मुझे एक तस्वीर देखकर बहुत खुशी हुई, जो गांधी जी के नाम भेजे गए एक पोस्टकार्ड की थी, जिस पर लिखा था- गांधी जी जहां हों, वहां! यहां रखी आगंतुक पुस्तिका (विजिटर्स बुक) में जब मैं अपनी टिप्पणी लिख रहा था, तब मन में ख्याल आया जरा देखूं तो औरों ने क्या-क्या लिखा है! इन टिप्पणियों को पढ़कर जाना कि गांधी जी के प्रति लोगों के मन में कितनी अपार श्रद्धा है। लेकिन लोग यह देखकर भी दुखी हैं कि गांधी जी ने जैसा चाहा था, वैसा हमारा देश क्यों नहीं बन पाया! एक आगंतुक ने खीजकर लिखा था- गांधी जी को रिज़र्व बैंक के नोटों से बाहर निकालो! संग्रहालय में ही एक पुस्तकालय सह अभिलेखागार है। यहां एक पुस्तक बिक्री केंद्र भी है, जहां गांधी साहित्य के साथ-साथ अन्य स्मारक चीजें भी बिकती हैं। मैंने इस संग्रहालय के छोटे से ऑफिस में बैठे एक बुजुर्ग व्यक्ति से बात की। पता चला, वे साबरमती आश्रम ट्रस्ट के प्रबंधक हैं। उनका नाम श्री अमृत मोदी है। मैंने उनसे जानना चाहा कि क्या आगंतुकों द्वारा लिखी गई टिप्पणियों को कभी पुस्तकाकार या डिजिटाइज किया गया है, उन्होंने बताया कि अब तक तो ऐसा नहीं किया गया है, लेकिन हम इस पर विचार करेंगे।
     शाम घिरने को थी। मुझे अब लौट चलना चाहिए। वैसे भी आश्रम शाम सात बजे तक ही खुला रहता है। लौटने से पहले मैंने एक बार फिर आश्रम का पूरा चक्कर लगाया। अंधेरा हो चला था। आश्रम से दिखने वाले सुभाष ब्रिज पर दौड़ती-भागती गाडिय़ों की लाल-पीली रौशनियाँ आकर्षक लग रही थीं। लेकिन आश्रम में सिर्फ  जरूरत भर रौशनी की ही व्यवस्था की गई थी ताकि यहाँ के पेड़-पौधों को, इनपर बसेरा करने वाले पशु-पक्षियों को रौशनी से कोई व्यवधान नहीं हो और यह आश्रम भी आश्रम ही लगे। पेड़ों पर पंछियों के झुंड लौटने लगे थे। आश्रम एक बार भी पंछियों की तेज चहचहाहटों से भर गया था। ऐसा लग रहा था, यह कोई सघन वन ही है। लगा, कुछ देर और यहाँ ठहर लूं!