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Wednesday 22 Nov 2017

लेखन में भी स्त्री अनुभव अपने वैशिष्ट्य के साथ उभरा है

वैद्यनाथ झा
क्यू 36, फेज- 2
 न्यू पालम विहार (निकट प्रकाश पुरी आश्रम)
गुडग़ांव-1222017 (हरि.)
मो.9582221968
वोन्मेष, नव-दर्शन, नवसृजन नई पीढ़ी की विशिष्ट पहचान है। अतीत की नींव पर ही वर्तमान अपना भवन खड़ा करता है, जिसका लाभ भविष्य भी उठाता है। वर्तमान अतीत की महत्ता की नींव के पत्थरों के अस्तित्व को नकारता नहीं बल्कि भवन को नव-रूप देता है। यही काम नई पीढ़ी के कवि-कवयित्रियाँ, कथाकार आदि कर रहे हैं। नए प्रतिमान गढ़ रहे हैं। ''कविता लिखने को सांस तो नहीं, मगर सांस से कम जरूरी नहींÓÓ, मानने वाली युवा कवयित्री बाबुषा कोहली इसी पीढ़ी की सशक्त प्रतिनिधि हैं।
6 फरवरी 1979 में कटनी (म.प्र.) में जन्मी बाबुषा कोहली अपनी कविताओं में इसी नूतन दृष्टि का परिचय देती हैं। विज्ञान में स्नातक एवं 3 विषयों में स्नातकोत्तर शिक्षा प्राप्त बाबुषा केन्द्रीय विद्यालय, जबलपुर में अध्यापिका हैं और उनका पहला ही काव्य-संग्रह 'प्रेम गिलहरी, दिल अखरोटÓ भारतीय ज्ञानपीठ की पारखी नजरों में आ गया और उन्हें भारतीय ज्ञानपीठ के नवलेखन पुरस्कार से सम्मानित किया गया। आज की परिस्थितियों में समाज, संस्कृति साहित्य के संबंध में वे क्या सोचती हैं, यह जानने के लिए उनसे बातचीत की गई। प्रस्तुत है, इस संवाद के अंश:-
प्र. आप कविता क्यों लिखती हैं ? क्या कविता लिखने के लिए आप किसी दबाब का अनुभव करती हैं?
उ. यह सबसे मुश्किल सवाल है कि कविता क्यों लिखती हूँ-साँस लेने की तरह तो नहीं, मगर उससे कुछ कम भी नहीं। कविता लिखना मेरे जीने के लिए जरूरी है। न लिखूँ तो निस्पंद होती लगती हूँ। लिखकर लगता है, पुतलियों में हरकत लौट आई है। यह दबाव नहीं है, जीने की जरूरत है। कई बार लगता है, मैं कविता नहीं लिखती, कविता मुझे लिखती है - वह चुपचाप बाबुषा को कुछ नया कर जाती है।
प्र. आपने पहली कविता कब लिखी और कहाँ प्रकाशित हुई? उस रचना को पढ़कर क्या आप 'थ्रिल्डÓ हुई थीं?
उ. पहली कविता कक्षा छठवीं में लिखी थी सूर्यास्त पर। कहीं प्रकाशित नहीं हुई, टीचर्स ने पढ़ा और सराहा था।
प्र. एक धारणा है कि छायावादी कालखण्ड तक कविताएँ व्याकरण के 'फ्रेमÓ और कला के स्थापित मानदण्डों के अनुशासन में लिखी जाती थीं। कविताओं की भाषिक संरचना भी एक खास 'प्रिस्क्राइब्डÓ साँचे में ढली होती थीं। उस साँचे पर पहला हथौड़ा निराला जी ने चलाया और आज 2015 में वे साँचे तो छिन्न-भिन्न हो चुके हैं, आपकी पीढ़ी अपने नये-नये साँचे गढ़ रही हैं जहाँ शब्दों की उन्मुक्तता है, बिम्बों, प्रतीकों, मुहावरों के नये उपयोग की संयोजित अभिव्यक्ति है। क्या यह धारणा सच है?
उ. छायावादी कविता व्याकरण या किसी और फ्रेम के अपरिहार्य अनुशासन में लिखी जाती थी, ऐसा मैं नहीं मानती। बेशक वह छंदोबद्ध कविता थी, मगर उसके मूल तेवर विद्रोही थे। महादेवी प्रार्थना और समर्पण और दीप और दुख ही नहीं रचतीं, वे मोतियों की हाट और चिनगारियों का मेला भी लगाती हैं। निराला ने तो छायावाद का बार-बार अतिक्रमण किया। प्रसाद का सभ्यता-विमर्श बिल्कुल अद्वितीय है। तो ये सारे कवि अपनी छंदोबद्धता के बावजूद पुराने बंधन तोड़ते हैं। पूर्व छायावादी कविता में क्या आपको यह स्वच्छंदता दिखाई पड़ती है? उत्तर छायावादी कवियों ने बेशक विद्रोह की यह परंपरा आगे बढ़ाई।
उ. हमारे समय की कविता बिंबों, प्रतीकों या मुहावरों का नया इस्तेमाल करती है-यह सुनना जितना सुखद लगता है, दावा करना उतना उचित नहीं लगता है। एक तो इसलिए कि हमारी पीढ़ी अभी अपनी रचनाशीलता के संधान में लगी है। इतनी जल्दी उसके बारे में कोई निर्णायक टिप्पणी उचित नहीं। हां, इसमें संदेह नहीं कि हमारी पीढ़ी परंपरा के दबाव से बहुत दूर तक मुक्त है-कुछ अपने अपरिचय की वजह से तो कुछ अपने समय के स्वभाव के चलते। शायद इसीलिए हमारा लिखा नया लग रहा है।
प्र. एक कवयित्री के रूप में क्या आप खुद को किसी विशेष विचारधारा से सम्बद्ध पाती हैं? क्या एक कवि के लिए वैचारिक प्रतिबद्धता और वर्ग-चेतना आवश्यक है? यहां यह जिक्र करना आवश्यक है कि एक पश्चिमी साहित्यकार ने कहा है-''कविता विचारों से नहीं, शब्दों से बनती है। इस सम्बंध में आप क्या कहेंगी?
उ. ऐसे किसी वक्तव्य की जानकारी मुझे नहीं है। यह सरलीकृत सा वक्तव्य है जिसे उसके संदर्भ के साथ शायद समझा जा सके। लेकिन मैं किसी विचारधारा से न बंधी हूँ न उसे कविता की अपरिहार्य शर्त मानती हूं। मगर कवि होने के लिए जितना संवेदनशील होना जरूरी है उतना ही विचारशील होना भी। एक परिपक्व संवेदना विचार के पानी से ही सींची जा सकती है, वरना वह अंधी या छिछली भावुकता रह जाएगी।
प्र. युवा कवियों पर कुछ आक्षेप वरिष्ठों द्वारा लगाए जाते हैं। मसलन इनकी कविताओं में 'सामाजिक-सरोकारÓ नहीं होते, स्वानुभूति की सघनता होती है, परानुभूति की कमी होती है। स्पष्ट दृष्टि नहीं है, भाषा में 'एरोगेंसÓ है, आदि आदि। यह भी कि इनकी कविताओं में प्रतिरोध, छटपटाहट, मुठभेड़ के वे आयाम नहीं मिलते जो निराला, मुक्तिबोध, नागार्जुन, रघुवीर सहाय धूमिल, गोरख पाण्डे या आलोक धन्वा की रचनाओं में मिलती है। क्या यह आरोप-पत्र संज्ञान में लेने योग्य है?
उ. वरिष्ठजनों के ऐसे आक्षेप से अपने अनभिज्ञ होने पर क्षमाप्रार्थी हूं। लेकिन जिन बड़े कवियों का उल्लेख आप कर रहे हैं, उनके संदर्भ के साथ हमारा जि़क्र तो हमारे लिए एक उपलब्धि है-भले ही इस शिकायत के साथ कि हम उनसे कमतर हैं। धीरे-धीरे हम भी मँजेंगे, काल हमें भी माँजेगा। बहरहाल, परानुभूति और स्वानुभूति अंतर मिथ्या है। परानुभूति जब तक स्वानुभूति नहीं होती, रचना नहीं हो सकती या नकली हो सकती है।
प्र. एक आम सवाल-आपके दौर के कवियों/कवयित्रियों की कलम से ऐसी पंक्तियाँ नहीं निकलती जो काफी समय तक लोगों की जुबां पर चढ़ी रहे जब कि इससे पहले के दौर के कवियों की रचनाओं में अनेकानेक ऐसी पंक्तियाँ मिलती हैं। इस अल्पजीवता का कारण?
उ. यह सच है कि छंदोबद्ध या तुकांत कविताएं-या गज़़लें भी आसानी से याद रह जाती हैं अच्छी हुई तो जुबान पर भी चढ़ जाती हैं। जैसे फिल्मी गीत भी जुबान पर चढ़ जाते हैं। मगर यह कविता की श्रेष्ठता का प्रमाण नहीं है। वैसे कई कवियों की छंदमुक्त कविताएं भी खूब उद्धृत की जाती हैं। मुझे विश्वास है, हमारे समय की अच्छी कविता भी याद रखी जाएगी।
प्र. नव-पूंजीवाद और भूमंडलीकरण ने सामाजिक व पारिवारिक संबंधों, जीवन-मूल्यों की जड़ें हिला दी हैं। संवेदना का दायरा महावृत्त से सिकुड़ कर बिंदु पर केन्द्रित हो गया है। युवा कवि राकेश रंजन इस संकट की ओर संकेत करते हैं-घंटो तक माँ/दीप जलाने का जतन करती रही/ उसकी आँखों से बरसता रहा अंधेरा। तो क्या यह स्थिति युवा कविता के लिए चुनौती नहीं है?
उ. बेशक, इस दौर में कविता के सामने कई चुनौतियां हैं। सरपट बाजारवाद ने अनुभव और स्मृति के लिए जैसे अवकाश ही नहीं छोड़ा है जबकि ये दोनों कविता के रासायनिक तत्व हैं। दूसरी तरफ  छिछला उपयोगितावाद साहित्य के मूल उद्देश्य को ही प्रश्नांकित कर रहा है, उसे सतही मनोरंजन से विस्थापित कर रहा है। लेकिन कौन सा दौर है जब कविता या लेखन के लिए चुनौतियां नहीं रही हैं? कम से कम मैं हताश नहीं होती।
प्र. आपके दौर में काफी संख्या में महिलाएं कविता के क्षेत्र में उतर रही हैं जो निर्भीकता से अपने अनुभव और विचार कलात्मक रूप से भिन्न तेवर से व्यक्त कर रही हैं। क्या समाज के विभिन्न वर्गों से युवतियों का अधिक संख्या में आना पुरूष-सत्ता या स्त्री के प्रति दोयम दर्जे की 'ट्रीटमेंटÓ के विरूद्व ऐलान-ए-जंग है या यह दर्ज कराने की दमदार कोशिश कि स्त्री भी सोचती है-पुरूषों की तरह, उनसे अलग या उनसे ऊंचा भी? क्या आज स्त्री की उपस्थिति को नजरन्दाज किया जा सकता है?
उ. स्त्रियां सिर्फ  कविता या साहित्य में नहीं, हर क्षेत्र में अपनी एक जगह बना रही हैं। यह कुछ साबित करने की कोशिश नहीं, एक सहज प्रक्रिया है जिसका विशिष्ट पहलू यह है कि यह सदियों से स्त्री को कमतर मानने और बनाए रखने की ऐतिहासिक प्रक्रिया का प्रतिरोध भी बनाता है। लेखन में भी स्त्री अनुभव अपने वैशिष्ट्य के साथ उभरा है जो खुद बताता है कि महिलाओं को या उनके लेखन को कमतर मानने वाले लोग पिछड़े हुए हैं।
प्र. आपकी कविताएँ प्रेम की अलग ही परिभाषा गढ़ती हैं, सर्वथा अलग राह बनाती हैं। आपका प्रथम काव्य-संग्रह 'प्रेम गिलहरी दिल अखरोटÓ ऐसा ही कहता है एकदम नये बिंब, नये प्रतीक नये उपालंभ-
''होना तो यह था कि तुम होते बरगद का घनापन/और मैं तुम्हारी शाखों पर फुदकती फिरती ...... धूप धूप भटकता रहा प्रेम/कौर कौर दिल कुतरता रहा।ÓÓ या 'देह देह वैदेहीÓ में। क्या इस शिल्प, प्रवृत्ति व संरचना को इस दौर की प्रतिनिधि कविता मानी जाए?
उ. प्रेम, या शायद कोई भी अनुभव, दरअसल हर किसी के लिए बहुत निजी होता है। निस्संदेह उसमें बहुत सारे आवेग साँझा या एक जैसे होते हैं लेकिन उन्हें महसूस करना बिल्कुल एक अलग प्रक्रिया है। मैंने प्रेम की कोई नई परिभाषा देने की कोशिश नहीं की, लेकिन चीजों को जिस तरह महसूस किया, लिखती गई। हां, घिसे-पिटे बिंब और प्रतीक मुझे बेमानी या अपनी बात कहने को अपर्याप्त लगते रहे। जो मैं कहना चाहती थी, उसे कहने के लिए जो सार्थक लगा, वह चुना।
प्र. आप अपने काव्य-संग्रह ''प्रेम गिलहरी दिल अखरोटÓÓ के बारे में खुद कुछ बताइए। अपनी कविताओं में आप बिम्बों और प्रतीकों के लिए प्रकृति के उपादानों का न्यूनतम उपयोग और अपने परिवेश के जिंसों का अधिकतम उपयोग करती है। ऐसा क्यों?
उ. प्रेम गिलहरी दिल अखरोट की कहानी क्या हो सकती है ? एक छोटी सी गिलहरी थी जो लिखती गई, लिखती गई, लिखती गई। वह अपने समय को कुतरती थी जिसमें प्रेम भरा पड़ा था। लेकिन यह सिर्फ  प्रेम नहीं था, उसमें बहुत गहरी यातना थी, कई बार मृत्यु की मंडराती हुई छाया थी, बुखार की लंबी तपिश थी - कविता मेरा दर्द भी बनी, मेरी दवा भी। उसमें मेरा जल भी रहा, मेरी हवा भी। जब किताब का नाम रखने की घड़ी आई तो बहुत दुविधा थी। मैंने कई नाम सोचे। लेकिन अंतत: लगा, मेरी कविता के लिए यही नाम सबसे सही होगा, छोटे से जीव की प्रतीकात्मकता से जुड़ा।
प्र्र. तमाम आक्षेपों के बावजूद यह कैसे संभव होता है कि युवा रचनाकारों की पुस्तकें काफी लोकप्रिय हो रहीं हैं, पाठक बढ़ रहे हैं इनके शिल्प, कथ्य भाषिक संरचना में ऐसा कौन सा चमत्कार है?
उ. जैसा आप बता रहे हैं-अगर कविताएं पढ़ी जा रही हैं, किताबें बिक रही हैं, कवियों की पहचान बन रही है तो बहुत सारे आक्षेप अपने आप खारिज हो जाते हैं।
प्र. अगर आप अपनी कविताओं का स्व-मूल्यंाकन करें तो अपनी कृतियों को समाज के, हमारे समय के जरूरी प्रश्नों से जूझने की प्रक्रिया में किस पायदान पर खड़ी पाती हैं?
उ. अच्छा हो, मेरी कविताओं का मूल्यांकन दूसरे ही करें। मैं बस इतना महसूस करती हूं कि जिन दबावों और सवालों के बीच मैंने लिखा, शायद उन्हें बहुत सारे लोग साझा करते हैं।