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Monday 20 Nov 2017

माओवादी (ओडिया कहानी)

मूल कहानी : निबेदिता जेना
अनुवाद - प्रतिभू बनर्जी
शिवमंदिर गली
पुरानी पाइप फैक्ट्री रोड
न्यू शांति नगर  रायपुर,छतीसगढ़
शहर से लगी निचली बस्ती में सरकारी बाबूगण जो कभी जाते ही नहीं थे, ऐसा नहीं था। मात्र उस दिन पुलिस वालों का इस तरह आ धमकना अप्रत्याशित था।
बात यह थी कि जिले के नए पुलिस कप्तान ने अपनी आमद दर्ज कराई थी। उनके आने के बाद से प्रतिदिन नये-नये नियम लागू किये जाने लगे थे। चोरी-डकैती, हत्या, राहजनी, जो होना है, होने दो। उसे बाद में देखा जाएगा। आम नागरिकों से मोटा कुछ वसूल कर ऊपर वालों को कुछ कमाल कर न दिखा पाने से प्रमोशन या अच्छी पोस्टिंग की आशा धूमिल हो सकती है। इसीलिए नये साहब के नियमों को लागू करने के लिए विश्वस्त पुलिस विभाग जी जान से लग गया। कभी हेलमेट न पहनने के नाम पर, कभी इन्श्योरेंस चेकिंग के नाम पर और कभी दोपहिये वाहन में तीन सवारी बैठने के नाम पर फाइन वसूल करने के लिए रसीद काटे जाने लगे। माँ-बाप और एकाध संतान वाले आजकल के न्यूक्लियर परिवार के लिए छोटे बच्चे को अलग से दूसरी गाड़ी में ले जाना कैसे संभव है, यह बात पुलिस वाले समझने को राजी न थे। बच्चे को साथ लेकर यदि माँ-बाप जाना भी चाहें तो वर्दी वाले मामा लोगों की तरफ से परेशानी नियत है। इसीलिए माँ-बाप के साथ किशोरवय व बड़े बच्चों का बाहर निकलना मना हो गया।   
रसीद बुकों की फर्द दर फर्द काटने पर भी देखा गया कि आशानुरूप वसूली नहीं हो पायी। फिर नया नियम लागू किया गया कि रास्ता, घाट, स्कूल-कॉलेज, पार्क, सिनेमा जहां भी लड़के-लड़की की जोड़ी बैठे दिखे वहाँ हो चढ़ाई व फाइन वसूली। अशोभनीयता, निरोध के आड़ में ये भी कुछ दिनों तक जोर-शोर से चला। पर अँग्रेजी के बड़े ए अक्षर को झुलाकर सिनेमाघरों की दीवारों के साथ ही शहर के समस्त स्कूल-कॉलेजों की दीवारों पर खूब शोभा पाने वाली नग्न युवतियों के उलंग छातियों वाली तस्वीरों पर किसी का ध्यान नहीं गया। इतना सब कुछ करने के बाद भी अधीनस्थ हैरानी में थे कि साहब को खुश करने के लिए कुछ सार्थक कर्म नहीं हो पाया।
इन सबके बीच शहर से लगे जंगल में गजपति व मलकानगिरि अंचल से कुछ माओवादियों के आने की सतर्कता सूचना पुलिस जिला मुख्यालय को मिली। उपलब्ध आदम जमाने की बंदूकों तथा ठेलठाल के बाद मुश्किल से चलने वाली तीन खटारा जीपों के साथ जितना सतर्क होना चाहिए था, पुलिस विभाग उससे कुछ अधिक मुस्तैद हो गया। और फिर उस सूचना को दरकिनार कर वापस अधिक आमदनी की आड़ खोजने में सभी जी जान से लग गये।
 ऐसे समय में हवलदार गोकुलानंद महापात्र के भेजे में एक बात आई। शहर की बाहरी बस्ती में अक्सर उनका आना- जाना है। वहां समरू के पास अच्छी देशी दारू कम दाम में मिलती है। इतना जरूर है कि दाम से गोकुलानंद बाबू का कुछ लेना-देना नहीं है। उनकी खाकी वर्दी देख समरू उनसे कुछ मांगने की हिम्मत नहीं करता। उल्टे अपने जर्जर बेंच को यत्न से झाड़ पोंछ कर उन्हें ससम्मान बैठा कर चखना के साथ दो गिलास दारू पेश कर देता है।
 सब कुछ ठीक चल रहा था। लेकिन जबसे समरू का बेटा घिमुआ ब्याह कर नई दुल्हन लाया, तबसे बात गड़बड़ा गई। नई दुल्हन देखने में भारी सुंदर, जैसे काले पत्थर पे गढ़ी गई कोई सुगढ़ मूर्ति। ससुर के दारू दुकान में होने वाले दस प्रकार के लोगों के हो-हल्ले से उसका कुछ लेना देना न था। वह घर के काम में व्यस्त रहती। पानी लाना, गोबर लीपना, रसोई करना। कभी-कभार ससुर के कहने पर घर के अंदर रखी दारू की हंडिया को बाहर लाने या फिर जूठे गिलास धो देने का काम भी करती। कौन उसे किस नजर से देख रहा है, इस बात पर उसकी नजर न रहती। पर जबसे महापात्र बाबू ने उसे देखा है, उनके मन में हलचल सी मचने लगी है। उससे थोड़ी सी बात करने के लिए, उसके समीप रहने के लिए उन्होंने बहुत सारी योजनाएं बना डाली। बस घिमुआ के बाघ के समान तेज आंखों की चावनी और चम-चम करती उसकी कुल्हाड़ी की धार को देख बाबू गोकुलानन्द भय से गोकुलवा हो उठते।
ऐसे समय पर बड़े साहब के कड़े निर्देशों को ध्यान कर, ये ही अपूर्व सुयोग है, ऐसा उनके मन में आया। यदि किसी उपाय से घिमुआ और उसके बाप समरू को पैरों तले दबाया जा सके तो मन की सारी इच्छायें फलीभूत हो सकेंगी! इसीलिए ऐसे समय का सदुपयोग करने के लिए उन्होंने बड़े साहब को बोलकर निचली बस्ती में अवैध दारू की धर-पकड़ आरंभ करा दी। फिर तो अपने विशिष्ट अंदाज से पुलिस वालों ने उस जगह हाँका लगा दिया।  
उस दिन बस्ती के प्रारम्भ में स्थित सरकारी प्राथमिक विद्यालय से बच्चे अपने माह भर की कमाई आधा किलो चावल, सौ ग्राम दाल और एक अंडा लेकर अत्यंत प्रसन्न मन से घर लौट रहे थे। उनकी मास्टरनी भी अगले दिन से निर्दिष्ट समय तक के लिए शाला में ताला डाल बचे चावल-दाल के बोरों को रिक्शा में लदवाने के बाद अंडों की पेटी को सावधानी से उनके ऊपर रखने की ताकीद कर ही रही थी कि पुलिस जीप बस्ती के अंदर धमक के साथ घुसी। पुलिस पल्टन को देख बस्ती वाले आश्चर्यचकित हो उठे। साल में कभी-कभार पुलिस वाले, आबकारी वाले या स्कूल साहब गाँव में आते न हों ऐसा न था, पर एक साथ इतनी बड़ी पल्टन के आ जाने से सब को न जाने कैसा-कैसा लगा।
बस्ती में पहुँच कर पल्टन ने घोषणा की कि लोगों के घरों की खाना तलाशी होगी। कौन गैरकानूनी शराब बना रहा है, कौन पुलिस को हिस्सा दिये बिना चोरी का माल बेच रहा है, किसके घर की लड़कियाँ और औरतें छुप कर रात में होटलों में जाती हैं इत्यादि-इत्यादि सभी के बारे में छानबीन होगी। खाना तलाशी की बात कानों तक आते ही लोगों ने अपने-अपने बकरियों और मुर्गियों को घर से निकाल दूर भगा दिया। यहाँ तक कि घर के कोने में अंडे से रही मुर्गी को उसकी विधवा मालकिन मानदेइ ने ठंडे पानी के छींटे मार कर भगाया। लेकिन पल्टन के लोगों की गिद्ध दृष्टि से कुछ भी न बचा। लोगों के बाड़ी में लगे अमरूद, केला और पपीता से आरंभ कर मुर्गी, बकरी जो भी हो सका जीप में भरे गये। कौन किस कार्य को गैरकानूनी घोषित कर जुर्माना वसूल सकता है, उसकी मानो प्रतियोगिता सी चल रही थी पल्टन में। परिस्थिति ऐसी हो गयी थी कि बस्ती में जगा की माँ, जिसने किसी क्षम्य भूल के लिए जगा को तुझे चुड़ैल खा ले की गाली दी थी, के लिए भी गैरकानूनी गाली के रूप में जुर्माना की रसीद काटी गई। पिछले तीन दिनों से दस्त की शिकायत से परेशान जगा के पिता को उस समय बस्ती से दूर निस्तार की जगह में बैठ कर शांति मिल रही थी। वहाँ से उसे पकड़ कर बाबू लोगों ने गाली के जुर्माना के रूप में कट चुकी रसीद की राशि की वसूली की।  
पल्टन के सभी लोग जब अपने-अपने कार्य में व्यस्त थे, बाबू गोकुलानन्द सीधे चल पड़े समरू के दारू की दुकान की ओर। लेकिन समरू पल्टन की खबर आने के बाद भी निश्चिंत बैठ बीड़ी फूंक रहा था। संयोगवश बीते दो दिन से उसके पास माल नहीं था। नए पुलिस साहब के रंग-ढंग देख कर कुछ अघटन होने की आशंका वह भी कर रहा था। ऐसे में वह कोई नया माल न बना कर पानी किस ओर बहता है, इसके इंतजार में चुपचाप बैठा था। और इसीलिए आज की इस चढ़ाई में उसके हैरान-परेशान होने का कोई कारण न था। महापात्र जी ने घर के आंगन में समरू को देखते ही दो-चार झापड़ लगाते हुए दारू कहां है पूछा।  
समरू भी बड़ा पुराना खिलाड़ी था। अतिदीन होकर कहा- नहीं बाबू, कहां दारू और कहां मैं!
गोकुलानन्द उसे परे ठेलते हुए घर के अंदर घुस गए। घर के भीतर आंखों को ठंडक पहुंचाने वाला अंधकार था। उस अंधकार के बीच बरामदे के एक किनारे चूल्हा धक-धक जल रहा था। उसके समीप बैठ कर समरू की बहू, घिमुआ की बीबी जलाऊ लकड़ी चूल्हे के अंदर ठेल रही थी। चट-चट कर रही जलती लकडिय़ोंं से चूल्हा और जोर से धधक उठा था। चूल्हे की आग की ताप से चूल्हे के पास बैठी घिमुआ की बीबी टुक टुके लाल पके स्वादिष्ट फल की तरह दिखाई पड़ रही थी। गोकुलानन्द दारू है या नहीं तलाशी करूंगा, कह उसके पास बेरोकटोक पहुंच गये। उसे देख बहू खड़ी हो गई और दृढ़ स्वर में बोली- बाबू, मेरी रसोई में आना है तो जूता खोल कर आ।
गोकुलानन्द को यह बात निमंत्रण सी लगी। वे खुले में जूता खोल आनंद मग्न हो वापस अंदर जा पहुंचे। रसोईघर में रखे एल्यूमिनियम की चपटी हांडी, डेकची को खंगाल डाला, छींके में रखे दूध का भगोना नीचे उतार कर रख दिया, पानी के घड़े से निकालकर पानी पिया, यहां-वहां देख कर कुनमुनाये और तब बहू के पास जाकर बोले-सत्य कह, तेरे ससुर ने दारू कहां छुपा कर रखा है। नहीं तो तेरे आदमी और ससुर दोनों को अंदर कर दूंगा।  
मुझे नहीं पता बाबू, घर खुला पड़ा है, जा ढूंढ। बूढ़ा यदि कहीं दारू छुपा कर रखा होगा।
नहीं जानती, तू सब जानती है। उसे छूने का अवसर खोज रहे बाबू ने उसकी कलाई पकड़ ली। बहू का हाथ एक क्षण के लिए काँप उठा गोकुलानन्द के रूखे हाथ के अंदर। दूसरे ही क्षण बहू ने उनको ठेल कर घर के बाहर भाग जाने की कोशिश की। गोकुलानन्द इतनी जल्दी विफल मनोरथ होना नहीं चाह रहे थे। उन्होंने बहू को कमर से पकड़ लिया और उसके कान में फुसफुसा कर कहा-  
मुझसे डर क्यों रही हो? बड़े साहब जानते हैं कि तेरा ससुर दारू का धंधा करता है। मैं अकेला ही इस पल्टन से तेरी रक्षा कर सकता हूँ। तू बस मेरी बात मान ले।
बहू ने वह बात पूरी तरह सुनी या नहीं कौन जाने! किसी प्रकार अपने को गोकुलानन्द की जकड़ से मुक्त कर वह चूल्हे से जलती लकड़ी निकाल लायी और उससे उन पर दो प्रहार किया। बाबू गोकुलानन्द आश्चर्यचकित हुए, भयभीत हुए, अंतत: विफल मनोरथ हो वापस चले गए। किन्तु ज्वलंत लकड़ी पकड़ जलती हुई आंखों वाली अधिकारिणी समरू की बहू की दृढ़ता को वे क्षमा नहीं कर पाये। नहीं, जैसा भी हो इसे सबक सिखाना ही होगा, नहीं तो इस खाकी वर्दी की महत्ता नहीं रहेगी।
इस घटना के ठीक पांच दिनों के बाद हेडक्वार्टर से खबर आई कि शहर के भीतर तीन माओवादी घुस आये हैं। फिर से पल्टन की हलचल शुरू हो गई। शहर भर में तन्न-तन्न कर माओवादियों को खोजा जाने लगा। पर वे तो मानो हवा में विलीन हो गए थे। उनका कोई भी सुराग नहीं मिला।
उस दिन थाना बाबू फोन पर बड़े साहब से गालियां सुनने के बाद लस्त हो सिर झुका अपने सीट पर बैठ थे। ऐसे समय में गोकुलानन्द ने अत्यंत धीमे से, अत्यंत नम्रता के साथ उनके कमरे में प्रवेश किया। फिर यथासंभव अपने अभिनय की पराकाष्ठा दिखलाते हुए माओवादियों के संबंध में थाना बाबू को कुछ महत्वपूर्ण सूचना दे दी। गालियों से लस्त हुए थाना बाबू खबर पाते ही तन कर बैठ गये।
आधा ही घंटे बाद माओवादियों से संपर्क रखने के आरोप में समरू और घिमुआ को पकड़ कर थाना लाया गया। रात भर बाप-बेटा दोनों को पीट-पीट कर लहूलुहान कर दिया गया। किन्तु वे दोनों ऐसे हार्डकोर माओवादी थे, जिन्होंने मुंह ही नहीं खोला।
थाना में जब यह सब कांड चल रहा था, गोकुलानन्द महापात्र को एक ही स्वर सुनाई दे रहा था-खोल कर आ। उन्होंने खाकी वर्दी खोली। अपने सबसे कीमती शर्ट-पैंट को पहना। जितना अधिक संभव था, अपने ऊपर इत्र उड़ेली।
लौंग वाला पान मुँह में दबा गोकुलानन्द बाबू को देर रात गये अपनी साइकिल पर बस्ती की ओर जाते हुए किसी-किसी ने देखा था। अगले दिन जरूर सारे शहर ने देखा कि बस्ती के बाहर की निस्तारी जमीन पर बाबू का शव पड़ा था।
पुलिस छानबीन से पता चला, हँसिये से शव का गला काटा गया था और हथौड़ी से पीट कर सिर कुचल दिया गया था। शव के पास लाल कपड़े का एक टुकड़ा, शायद किसी साड़ी का फटा हुआ हिस्सा, एक टहनी में फंसा हुआ पताका की तरह उड़ रहा था। यह प्रमाण पर्याप्त था गोकुलानन्द महापात्र की मृत्यु का कारण जानने के लिए।
उसके अगली सुबह राज्य के समस्त टीवी चैनलों और अखबारों की सुर्खियां थीं-
माओवादियों के आक्रमण में हवलदार गोकुलानन्द महापात्र मारे गये।